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कहानी: अनकहा रिश्ता

पढ़ें राजेंद्र जोशी की कहानी- अनकहा रिश्ता।

Author November 4, 2018 5:38 AM
प्रतीकात्मक फोटो

डाक खुद प्राप्त करना, खोलना, एक-एक डाक को पढ़ना रजनी को बहुत अच्छा लगता है। रविवार होने के कारण आज पोस्टमैन की छुट्टी है। कितनी बोरियत होती है रविवार को, हर रविवार को रजनी की इस बोरियत को दूर करने का काम घर के जूते और चप्पलें करते हैं। फटाफट नाश्ता करते हुए रजनी ने जैसे घर में तूफान मचा दिया- ‘मम्मी, भाभी, भइया, पापा अपने-अपने जूते-चप्पल दे दीजिए, बाद में किसी के बूट बगैर पॉलिश या मरम्मत के रह गए तो मैं जिम्मेदार नहीं हूं।’

हर जोड़ी का अलग थैला, जैसे शादी की खरीददारी हो, घर के तमाम जूते-चप्पल अपनी गाड़ी की पीछे वाली सीट पर रखते हुए रजनी शहर के बीचोबीच स्थित कोटगेट के समीप बैठे मोचियों में मुकेश के पास पहुंच गई।
मुकेश मोची खड़ा होकर गाड़ी का दरवाजा खोलते हुए बोला, ‘नमस्कार मेमसाहब।’ उसने हाथ जोड़ दिए।

‘हां! नमस्कार, आप तो मुझे आशीष दिया करो, आप मुझसे बड़े हैं।’ रजनी ने हंसते हुए कहा।
मुकेश ने गाड़ी में से जूते के थैले निकालते हुए कहा, ‘अरे रजनी मेमसाहब आप हमसे तो बहुत बड़ी हैं, कितनी ज्ञानी हैं, सब कुछ तो पढ़ी हैं, कॉलेज में पढ़ाती हैं, डॉक्टर भी हैं, मैं कहां आपसे बड़ा हो सकता हूं?’
‘रहने दो मुकेश चाचा आपके पास कितने वर्षों का अनुभव है’, आत्मविश्वास के साथ रजनी ने कहा- ‘देखो मुकेश चाचा, आप कितने अच्छे-से जूतों को गांठ देते हो! इतने महीन महीन, सफाई से धागा या सिलाई तो चश्मा चढ़ाने पर भी नजर नहीं आ सकता। जूता भले फट जाए, पर चमक नहीं जाती।’‘फिर भी मेमसाहब आप हर हफ्ते पॉलिश करवाती हो।’

‘यह तो मैं इसलिए करवाती हूं कि ये जूते-चप्पल सिकुड़ न जाएं, साथ ही आपसे भी मिलना हो जाए।’ मुकेश ब्रश चलाते-चलाते, थोड़ी हिम्मत जुटा कर आज पूछ बैठा, ‘रजनी मेमसाहब, आप घर में कौन-कौन रहते हैं…? इन जूतों के साथ एक भी बच्चों का जूते नहीं है। क्या उनको बिना पॉलिश वाले पहनाते हैं? मेमसाहब, आप कहें तो मैं घर आकर उनकी पॉलिश कर दूं? ‘नहीं नहीं मुकेश चाचा, आपको घर आने की तकलीफ नहीं करनी।’ रजनी हंसते हुए कहने लगी, ‘अभी घर में सबसे छोटी बच्ची मैं ही हूं और मेरे जूतों की तो सभी जोड़ी आ गई।’मुकेश जूते ठीक करता रहा और गाड़ी में बैठे हुए रजनी मोबाइल पर मेल देखती रही।

आगरा के एक कॉलेज का मेल था, जिसमें अगले महीने व्यावसायिक शिक्षा पर होने वाले सेमिनार में उसे आमंत्रित किया गया था। वहां खासकर चमड़ा उद्योग पर चर्चा होनी है। मेल पढ़ते हुए रजनी सोचने लगी- मुकेश चाचा का अनुभव, चमड़े का काम, चमड़ों की जानकारी, पिछले दस बरसों से तो मेरे सामने है और फिर मैं मुकेश चाचा को कोई प्यार का तोहफा भी तो नहीं दे पाई आज तक। कितनी सेवा करते हैं, मन लगाकर काम करते हैं। सेमिनार में मुकेश चाचा के चमड़े के काम को मैं इस तरह पेश करूंगी कि सारी दुनिया जान जाएगी कि काम के प्रति समर्पण की सीख ऐसे व्यक्ति से लेनी चाहिए। यही उन्हें जरा-सा प्यार का तोहफा होगा।
‘मेमसाहब, ये लो रख दिए गाड़ी में सारे थैले। संभाल लो, चाहो तो गिन लो।’

एकदम से अपने आपको संभालती हुई रजनी ने कहा- ‘मुकेश चाचा, ऐसी बातें क्यों करते हो?… क्या हो गया आपको? आपकी ईमानदारी तो मैं कबकी पहचान चुकी…’ रुपए पकड़ाती हुई बोली… ‘मुकेश चाचा, क्या आपको ठंड नहीं लगती…? आप कोट स्वेटर क्यों नहीं पहनते…? सर्दी का मौसम है, सर्दी-जुकाम लग जाएगा। परेशानी होगी। डॉक्टर के चक्कर लगाने पड़ेंगे और घर वालों को तकलीफ होगी, सो अलग। मैं चलती हूं खयाल रखना।’
मुकेश अपनी गद्दी पर बैठे हुए सोचता रहा- ‘कौन है घर में जो परेशान होगा, कहां है घर? किसके घर की बात करती हैं मेमसाब!’

आधी धूप, आधी छांव की अठखेलियों से खेलते हुए मुकेश के दिमाग में मेमसाब की बातें घूमती रहीं। आकाश की छत के घर में धूप और छांव दोनों तो हैं, फिर कैसा घर होता है। रात बस स्टैंड के पिछवाड़े बने नगर निगम के रैन बसेरे में ही तो बितानी है, जहां एक कोना मेरे लिए बरसों से आरक्षित है और कोटगेट के करीब यह जूते ठीक करने की पेटी बरसों से उसके लिए दुकान से भी बढ़ कर है…। पड़ोसी मोची हंसते हुए बोले- ‘अरे मुकेशिया, भोजन वाली गाड़ी आ गई… आज भूख नहीं है क्या? मोटरवाली मेमसाब भोजन भी देकर गई है क्या?’

घर के विचार को छोड़ कर मुकेश अपने बर्तन जूतों की पेटी से निकाल कर खड़ा हो गया, ‘अरे नहीं नहीं भइया, आपके साथ ही भोजन करना है।’ खुद को अब भी वह संभाल नहीं सका घर के विचार से। मुकेश का रोजाना का यही क्रम होता था। सुबह रैन बसेरे से चल कर कोटगेट आना। मोचियों की कतार में बैठ जाना। दोपहर को भोजन की वैन आए तो पेट भर लेना, नहीं आए तो धूप सेंकना। आजकल जूतों की पॉलिश या मरम्मत के ग्राहक कभी-कभार ही आते हैं, इसलिए शाम का भोजन भी कभी-कभार ही होता है। लेकिन वह मेमसाब की दी हुई साप्ताहिक मजदूरी से जैसे तैसे सप्ताह चलाने की जुगत भिड़ाता है। अकेले को क्या चाहिए? ‘रजनी आज तुम्हें कॉलेज नहीं जाना क्या…?’ मम्मी ने रजनी की रजाई हटाते हुए पूछा।

‘नहीं मम्मी, आज मुझे बाजार जाना है, कुछ खरीददारी करनी है। आज कॉलेज से छुट्टी ली है।’ रजाई को वापस ओढ़ते रजनी ने जवाब दिया। वह मोबाइल की गैलरी खोल फोटो देखने लगी। उसमें जूतों की पालिश करते मुकेश चाचा के फोटो पर नजर टिक गई। कितनी तल्लीनता से अपने काम में लगे हैं वे। उसके मन में उनके प्रति अजब से भाव जनमने लगते हैं, वह उन्हें देखती है। इन भावों को कोई नाम नहीं दे पाई है वह। पर भावनात्मक रिश्ता जरूर बन गया है उसका मुकेश चाचा से। कुछ समय पूर्व कॉलेज के कॉमन रूप में नई नियुक्त हुई प्राध्यापक/प्राध्यापिकाएं अपने-अपने प्यार के संदर्भ में चर्चा कर रहे थे। एक-दूसरे को अपने-अपने प्यार के किस्से सुनाए जा रहे थे। अधिकतर साथी रजनी से उसके प्यार के बारे में सुनना चाहते थे, सब लोग प्यार के संबंध में गंवार समझ रहे थे रजनी को। उसी दिन रजनी ने मन ही मन विचार किया कि उसे भी प्यार करना होगा। रजनी प्यार को अब तक बहुत अधिक महत्त्व नहीं देती थी। अनेक प्रस्ताव रजनी को स्कूल और कॉलेज में पढ़ते हुए मिलते रहते थे, अपनी कॉलोनी के लड़कों ने भी खूब प्रयास कर लिए, लेकिन रजनी का मन किसी के प्यार को स्वीकार नहीं कर पाया।

साथी लेक्चरर सुहानी ने झकझोरते हुए सबको सुना कर रजनी से पूछा, ‘क्या हुआ रजनी, किसके प्यार में खोई हो, हमको बताना नहीं चाहती हो क्या? लगता है सीधा दूल्हेराजा बना कर ही लाओगी।’ मुस्कुराते हुए बोल पड़ी रजनी- ‘पीरियड लग गया, मुझे क्लास में जाना है… इस समय आप लोग भी अपनी-अपनी कक्षाओं से प्रेम करो।’ उस दिन घर आकर वह सोचती रही कि मैं किसी से प्यार क्यों नहीं कर पा रही हूं। मुझे प्यार करना होगा, लेकिन मेरा प्यार सच्चा होना चाहिए। रजनी का मन बहुत उदास हुआ, पर दुखी नहीं। रजनी को अपने प्राइमरी अध्यापकों की सीख याद आ गई- काम की पूजा होनी चाहिए… प्यार करो तो काम से करो। हाथ से काम करने वाला मनुष्य, जिसके काम में कोई स्वार्थ न हो, सेवा का भाव हो, मन में सादगी हो… काम ऐसा हो जिसमें सुकून मिलता हो, उससे प्यार करना चाहिए। उस दिन बाजार जाकर रजनी ने मां-पापा, खुद के लिए और मुकेश चाचा के लिए ढेर सारे गरम कपड़े खरीदे।

आज फिर रविवार के साप्ताहिक पॉलिश कार्यक्रम में रजनी ने घर के सभी जूते-चप्पल ले जाकर मुकेश को थमाए, साथ ही गरम कपड़े खोल कर मुकेश को देते हुए, उन्हें पहनने का आग्रह किया। उसने कोने में जाकर पहने। शेष कपड़े भी देते हुए कहा, ‘ये सभी आपके नाप के हैं, एकदम फिट, आप सर्दी का खयाल रखा करो मुकेश चाचा, बदलते मौसम की मार हमारे शरीर को जकड़ लेती है।’ ‘अरे रजनी मेमसाहब, आप इतना खर्चा क्यों करती हैं।’ मुकेश के खुशी के आंसू छलक आए। लगभग रोते-रोते वह बोलने लगा, ‘मुझे कहां जाना होता है यह इतने मंहगे कपड़े पहन कर मेमसाहब! आप क्यों तकलीफ करती हैं, जूतों की पॉलिश के भी आप मुझे पैसे समय पर देती हो, कभी उधार नहीं रखती।’
नाराजगी जताते हुए रजनी कहने लगी, ‘मुकेश चाचा आपको मैंने पहले भी कहा है, आप पैसों की बात न किया करें, दुनियादारी केवल पैसों से ही नहीं तोली जाती। अच्छा, फिलहाल यह सब आप रखें, मुझे और भी काम करने हैं। अगले महीने आगरा भी जाना है।’

आज किए गए पॉलिश का हिसाब करके मुकेश चाचा का अभिवादन कर रजनी जा चुकी थी। मुकेश के भाग्य पर साथी मोची अब ईर्ष्या करते हुए मन ही मन अपने दुर्भाग्य पर अफसोस करते रहे। ‘तुम सुबह से काम में ही लगी हो रजनी! खाना-पीना, नहाना कुछ है या नहीं।’

रजनी लेपटाप देखते-देखते ही बोली, ‘मम्मी, अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला है आगरा में। मुझे वहां पेपर पढ़ना है और वहां चमड़े की फैक्ट्रियां भी देखनी हैं। मैं उसकी तैयारी में लगी हूं।’ उस दिन उत्साहित रजनी ने अपने पर्चे में मुकेश के अनुभव और कुशलता की तस्वीर पेश करते हुए दुनिया को बताना चाहा कि सड़क पर बैठा मोची अगर अपने अनुभवों के आधार पर जूते बनाने की फैक्ट्री लगाता है, तो वह दुनिया भर को उनकी इच्छानुसार जूते देने में सफल हो सकेगा।
दुनिया भर के विशेषज्ञों ने रजनी के पर्चे को मॉडल पर्चा बताते हुए इस पर काम करने की सिफारिश अपने देशों की सरकारों से करने पर सहमति प्रकट की। अब तक स्विच ऑफ मोबाइल को ऑन करते ही अचानक मोबाइल की घंटी घनघनाने लगी। ‘हेलो हेलो क्या आप रजनीजी बोल रही हैं…?’

‘हां हां मैं रजनी हूं, बताइए!’
उधर से आवाज आई, ‘मैडम, क्या जमना प्रसाद जी आपके पिताजी हैं?’
‘हां हां मैं उनकी बेटी हूं… क्या हुआ उनको…?’ रजनी ने घबराते हुए पूछा।
‘मैडम, उनका ऐक्सीडेंट हुआ है, हॉस्पीटल में एडमिट हैं। उन्होंने ही आपका मोबाइल नंबर बताया है। आप तुरंत पीबीएम हॉस्पीटल पहुंचें।’
रजनी बदहवास-सी हो गई। पूछा, ‘कैसे हो गया एक्सीडेंट?’
‘आपके परिवार के सदस्य कहीं कार में जा रहे थे कि ट्रक की टक्कर से ये हादसा हो गया।’
‘बाकी सब कैसे हैं… मम्मी, भैया, भाभी!’ रजनी ने लगभग चिल्लाते हुए पूछा।
‘प्लीज हिम्मत रखिए, आप तुरंत आइए… यहां पता चल जाएगा… वे भी सीरियस हैं।’
रजनी जोर-जोर से रोने लगी। सभागार में सन्नाटा छा गया। उसकी मोबाइल पर हुई बातचीत से सबको हादसे का पता चल चुका था। सेमिनार स्थगित कर दिया गया और तीन-चार सहभागी रजनी के साथ रवाना हो गए। आगरा से बीकानेर का सफर सबके लिए बहुत लंबा हो गया था। रजनी की हालत खराब थी। लगभग बेहोशी में थी। कुछ होश आता तो पूछती- ‘कैसे हैं मेरे मम्मी-पापा, भैया-भाभी।’
अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि रजनी का सब कुछ खत्म हो गया। मम्मी, भैया-भाभी तो ‘आॅन द स्पॉट’ ही चले गए थे और पापा जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे थे। उनके लिए खून की तुरंत जरूरत थी। लेकिन उनके खून का ग्रुप शहर में कहीं नहीं था। शहर के सैकड़ों लोगों ने अपना ग्रुप जांच करवा लिया। अस्पताल प्रशासन पहले ही कह चुका था कि यह ग्रुप रेयर है। शहर में अब तक कोई नहीं मिला हमको।
रजनी वार्ड के बाहर बेंच पर उदास बैठी थी, पूरे शहर में एक्सीडेंट की चर्चा हो रही थी।
आज सुबह ही कोटगेट पर मोचियों की कतार में चर्चा के दौरान मुकेश ने सुना कि किन्हीं जमना प्रसाद जी का एक्सीडेंट हुआ है। उनकी एकमात्र बेटी रजनी बची है, जो अपने पिता को मौत से संघर्ष करते हुए देख रही है।
रजनी का नाम तो मुकेश के जेहन में रचा हुआ था ही। अपनी पेटी खुली छोड़ कर वह पूछते-पूछते पहुंच गया पीबीएम अस्पताल। वहां लोगों की भीड़ लगी थी। उसे रजनी दिखाई दी। बोला- ‘रजनी मेमसाब…’
‘अरे मुकेश चाचा! आपने क्यों तकलीफ की।’
नर्स दौड़ती हुई आई, ‘मेम खून की व्यवस्था हुई या नहीं? मरीज कोमा में है।’
रजनी ने उदासी से कहा, ‘नहीं मिला ब्लड ग्रुप!’ अचानक मुकेश बोला, ‘मेमसाब मेरा खून ले लीजिए।’
‘नहीं नहीं चाचा आपके…।’
नर्स ने धीरे से आग्रह किया, ‘मेम यह ठीक कह रहे हैं। ब्लड ग्रुप की जांच करवा लेते हैं… हो सकता है आपके पिताजी से मेल खाता हो।’
सबके चेहरों पर उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी। शायद मुकेश का ब्ल्ड ग्रुप मिल जाए। टेक्नीशियन ने फुर्ती से मुकेश का ब्ल्ड लिया और लेबोरेट्री में चला गया। लेबोरेट्री के सामने खड़ी रजनी के साथ शहर के अनेक लोग मन ही मन प्रार्थना कर रहे थे कि इस बार तो ब्ल्ड ग्रुप मिल जाए। कुछ ही देर में लैब से पेथोलोजिस्ट बाहर निकले और उत्साह से कहा- मुकेश का ब्ल्ड ग्रुप जमना प्रसाद जी के ग्रुप से मैच कर गया है… अब पूरी उम्मीद है कि पेशेंट को जल्दी आराम मिल जाएगा।
रजनी ने डबडबाई आंखों से मुकेश चाचा को देखा, जैसे वह कह रही हो कि अब तो आपसे खून के रिश्तों से भी गहरा रिश्ता हो गया है हमारा मुकेश चाचा।
लेकिन तब तक जमना प्रसाद जी अंतिम सांस ले चुके थे।

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