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कहानी : अपने लोग

प्रहेलिका अनुभव कर रही थी कि इस बार घर के वातावरण में कुछ धुंध सी छाई है जिसके पार वह चाह कर भी देख नहीं पा रही है। मां, पापा, भैया- सभी धुंध के उस पार हैं और वह इस पार।

Author नई दिल्ली | January 23, 2016 21:19 pm
प्रहेलिका अनुभव कर रही थी कि इस बार घर के वातावरण में कुछ धुंध सी छाई है जिसके पार वह चाह कर भी देख नहीं पा रही है। मां, पापा, भैया- सभी धुंध के उस पार हैं और वह इस पार।

प्रहेलिका अनुभव कर रही थी कि इस बार घर के वातावरण में कुछ धुंध सी छाई है जिसके पार वह चाह कर भी देख नहीं पा रही है। मां, पापा, भैया- सभी धुंध के उस पार हैं और वह इस पार। कहां क्या बदला है, वह सूंघ नहीं पा रही है पर कुछ है जो असामान्यता की गंध दे रहा है ।

जब भी वे साथ बैठते हैं तो रहस्य भी उनकी बैठक में शामिल हो जाता है। एक दो बार तो उसने स्पष्ट अनुभव किया कि पापा ने मां को कुछ संकेत किया और मां ने आंखों ही आंखों में उन्हें रोक दिया।

आज वह रात में मां के पास लेट कर लड़ियाते हुए बोली, ‘मां आज मैं तुम्हारे पास सोऊंगी पहले की तरह।’
मां ने उसे अपने पास खींच कर प्यार से कहा, ‘आ जा मेरी बच्ची मेरे लिए तो तू अभी भी बचपन वाली सोनचिरैया है’, मां उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगीं। फिर उन्होने पूछा, ‘बेटी ससुराल में सब कैसे हैं?’
‘अच्छे हैं, पर यहां जैसे थोड़े ही न है।’
‘ मतलब तुझे परेशान करते हैं ?’
‘नही मां, मम्मीजी और पापाजी ठीक हैं पर तुम्हारे जैसा कोई कहां’। उसने मां को बाहों में कसते हुए कहा।
‘तुम मुझे बेड पर ही चाय दे देती थीं, पापा अक्सर मेरे लिए समोसे ले आते थे। अब वहां मेरा ये लाड़ कहां, वहां तो सुबह उठ कर सारे घर के लिए चाय बनाओ, तब खुद पियो और कुछ खाने का मन हो तो मम्मी जी से निवेदन करो।’ प्रहेलिका ने कहा।
‘तो तू सास से निवेदन क्यों करती है, कार्तिक से कह, उसने शादी की है तुझसे, उसकी जिम्मेदारी है कि तेरी जरूरतों को पूरा करे।’
‘पर मां मैंने उनसे कहा तो कहने लगे मम्मी से कहो, घर चलाने की जिम्मेदारी उनकी है।’
मां बोली, ‘वाह भई वाह, यह भी कोई बात हुई, मैंने तो इतना बड़ा घर देख कर तेरी शादी की थी, अब तू वहां खाने को तरसे, हद है। तू चिंता मत कर, हम लोग ऐसा करेंगे कि वे राह पर आ जाएं।’ मां ने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा।
‘मतलब?’ प्रहेलिका उठ बैठी।
‘अरे तू चार महीने मत जा सब लाइन पर आ जाएंगे।’ मां ने उसे उकसाया।
‘ लेकिन, मैं तो कार्तिक से एक सप्ताह में ही आने के लिए कह कर आई हूं।’ प्रहेलिका ने कहा। उसे मां का यह सुझाव नहीं भाया।
‘ओ हो बेटी इंतजार से प्यार बढ़ता है।’ मां ने समझाया।
‘पर मां हम लोंगों में तो प्यार है ही और फिर मम्मीजी और पापाजी से मैंने कहा था कि मैं एक सप्ताह में अवश्य आ जाऊंगी।’
‘तो ठीक है जाओ, अब तुम्हारे लिए मुझसे ज्यादा वे लोग अहम हो गए हैं।’ मां ने चेहरा फेरते हुए कहा।
मां के रूठने से वह दुखी हो गई। ‘ओह मां ठीक है कुछ दिन और रुक जाऊंगी।’
प्रहेलिका स्वयं भी कार्तिक से शीघ्र मिलने को आतुर थी, पर मां के प्रेम को भी समझ रही थी। प्रहेलिका ने कार्तिक को फोन पर बता दिया कि मां की तबियत ठीक नहीं है, वह एक सप्ताह और रुकना चाहती है। कार्तिक का मूड बिगड़ गया। उसने कहा था कि एक सप्ताह में अवश्य आ जाना, उसकी मम्मी को अपनी भतीजी के विवाह में कानपुर जाना था। पर नई- नई पत्नी थी। यह सोच कर कि हो सकता है उसकी मां की तबियत अधिक खराब हो वह चुप रह गया।
प्रहेलिका अपने पुराने दिन जीने लगी। वही पुरानी मस्ती, नौ बजे तक सोना, बिना नहाए सीधे डायनिंग टेबल पर नाश्ता करना और मोबाइल पर दोस्तों से उनकी रिपोर्ट लेना और देना। एक सप्ताह तो पलक झपकते ही बीतने को आ गया।
प्रहेलिका ने कहा, ‘मां कल मैं कार्तिक को बुला लेती हूं।’
‘बेटी कुछ दिन और रुक जाती, वहां जा कर तो फिर उनकी चाकरी में लग जाएगी।’ मां ने फिर कहा।
प्रहेलिका को पछतावा हो रहा था कि व्यर्थ ही उसने कह दिया कि उसे ससुराल में यहां जैसा सुख नही हैं। उसने तो यों ही मां से दुलार दिखाने के लिए कह दिया था।
मां ने तो उसे हृदय से लगा लिया और उसे रोकने के बहाने ढूंढ़ने लगीं। जबकि ससुराल में सब ठीक ही था वह जो भी करती थी, नई वधू होने के कारण स्वयं ही करती। किसी ने उसे बाध्य नही किया था। कार्तिक का प्यार तो वैसे भी मायके के सारे सुख आराम पर भारी था।
उसने मां का विरोध करते हुए कहा, ‘मां, हमारा नया रिश्ता है, अगर मैं ऐसे करूंगी तो न चाहते हुए भी हमारे रिश्ते में दरार आएगी।’
‘और हमें बुरा लगे तो कुछ नही,’ मां के आंसू निकल आए।

पर अब प्रहेलिका भावना के जाल में और नहीं उलझ सकती। उसने दृढ़ आवाज में कहा, ‘नही मां, तुम लोग तो अपने हो, हमें जानते हो, पर वहां के रिश्तों की डोर अभी कच्चे धागों से बंधी है,पल भर की असावधानी से टूट सकती है।’
‘वही तो मैं कह रही हूं।’ मां ने उसकी बात का सिरा थामते हुए कहा।
‘अर्थात?’
‘बेटा, उनसे तो तुम्हारा नया रिश्ता है, अब तो माया मोह भी नहीं है, तुम्हें यहां के बारे में सोचना चाहिए।’ मां समझाने लगी।
प्रहेलिका को कुछ समझ न आया। आखिर मां का संकेत किस ओर है। उसने मां को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।
मां ने बोलीं, ‘ बेटा तुम तो जानती हो कि तुम्हारे विवाह में हमारा सारा धन संचय चुक गया।’
‘पर उससे मेरे यहां रुकने से क्या मतलब?’
‘तुम तो जानती हो कि प्रशांत को नौकरी नहीं मिल रही है। उसे दुकान खुलवाने में कम से कम पांच लाख चाहिए। हमारी जमा पूंजी पर तुम दोनों का समान अधिकार था, पर वह तो सारी की सारी तुम्हारी शादी में व्यय हो गई।’ फिर रुक कर बोलीं, ‘ क्या अब यह तुम्हारा कर्तव्य नही है कि तुम अपने भाई के बारे में कुछ सोचो।’
प्रहेलिका को ग्लानि हुई कि उसके विवाह में घर की जमा पूंजी व्यय हो गई। उसने कहा, ‘ पर मां उन लोगों ने तो कोई मांग रखी नहीं थी, फिर मुझे नहीं लगता कि आपने बहुत कुछ दिया। ऐसा था तो आप उतना भी व्यय न करतीं।’
‘अरे मांग कोई खुल कर नहीं रखता। फिर दुनिया को दिखाना पड़ता है और रस्म के नाम पर ही सही व्यय किया तो है ही।’
‘मां वह तो उन्होंने भी किया है, पर छोड़ो उस बात को। बताओ कि मैं क्या करूं, तुम कहो तो अपने गहने बेच कर प्रशांत की दुकान खुलवाने के लिए दे दूं।’
मां बिगड़ गई,‘हुंह तेरे छंटाक भर गहनों से तो दुकान की पगड़ी भी जमा नही होगी।’
‘फिर मां मैं क्या करूं अभी, कार्तिक से भी नहीं कह सकती, वह क्या सोचेंगे और थोड़ी बहुत की बात होती तो कहती भी, पांच लाख तो उनके पास होंगे भी नहीं।’
‘ देंगे, बस तुम हमारी मान कर चलो।’
‘कैसे?’
‘तुम कुछ दिन ससुराल मत जाओ और जब वे आएं तो कह देंगे कि इतना धन लाओ ।’
‘पर वे क्यों देंगे?’
‘नही देंगे तो हम उनके ऊपर दहेज लेने का आरोप लगा देंगे।’
‘क्या…?’ प्रहेलिका का मुंह खुला रह गया। उसे विश्वास नहीं हुआ कि उसकी मां ऐसा भी कह सकती है। ‘नहीं मां, मैं ऐसा नही कर सकती, जब उन्होने दहेज मांगा ही नहीं तो हम उन पर बेबुनियाद आरोप नहीं लगा सकते।’ प्रहेलिका आवेश में गई।
‘पर बेटी यह तुम्हारे भाई के जीवन का प्रश्न है।’
‘मां तुमने सोचा है कि उससे मेरे जीवन का क्या होगा?’
‘अरे जब जेल जाने की नौबत आएगी तो वे तुम्हें भी रखेंगे और हम जो कहेंगे वह भी करेंगे। तुम्हें पता नहीं है कि दहेज के कानून लड़की के पक्ष में हैं।’
‘मैं किसी निर्दोष को, वह भी अपने पति और सुसराल वालों के साथ ऐसा नहीं कर सकती।’
‘चाहे तुम्हारा भाई दर दर की ठोकरें खाता रहे और एक दिन आत्महत्या कर ले।’ मां ने भावना पांसा फेंका।
‘मां हम उसका कोई और रास्ता देख लेंगे।’
‘अरे कोई रास्ता होता तो हम तुम्हें यह सब झंझट करने को कहते क्या?’ मां ने कहा।
प्रहेलिका ऊहापोह में थी। उसका मन कार्तिक के पास जाने को मचल रहा था, वह समझ नहीं पा रही थी कि वह मां को कैसे मना करे। यह तो उसे समझ में आ गया था कि इसमें पापा और प्रशांत सभी की सहमति है, मां तो मात्र राह हैं उस तक बात पहुंचाने की।
सारी रात वह अंधेरी गुफा में भटकती रही, उसे आशा की कोई किरण दिखाई नहीं दे रही थी। कभी लगता वह कार्तिक के हाथों में हाथ डाले प्रणयोन्माद में खिलखिलाती चली जा रही है कि अचानक किसी वस्तु से टकराती है और जब वह झुक कर देखती है तो चीख पड़ती है,वह उसके भाई प्रशांत का मृत शरीर है, प्रहेलिका पसीने पसीने हो जाती है। कभी लगता कार्तिक उसे हाथ बढ़ा कर पुकार रहे हैं, वह उनकी ओर हाथ बढ़ाती है कि कोई उसे बलपूर्वक पीछे खींच लेता है, तभी दो पुलिस वाले आ कर कार्तिक के हाथों में हथकड़ी पहना देते हैं, वह पुलिस वालों को रोकने बढ़ती है तो पाती है कि पीछे उसके सास-ससुर भी हथकड़ी में जकड़े उसे घृणा से देख रहे हैं, अचानक उसकी आंख खुलती है और वह उठ बैठती है।
सूर्य की प्रथम किरण ने उसके मन की धुंध को मिटा दिया। उसने निर्णय ले लिया कि वह सही का साथ देगी। सुबह उठते ही उसने दृढ़ स्वर में उद्घोषणा कर दी कि वह आज ही अपने ससुराल जा रही है।

इस पर पापा ने गरज कर कहा, ‘मेंढकी को भी पंख लग गए हैं, अभी कल तक हमीं तेरे सब कुछ थे और आज उनसे मिले दो दिन भी नहीं हुए और उनके लिए मन में इतना दर्द?’
प्रहेलिका ने आज तक कभी पापा का विरोध नहीं किया था, कभी ऐसा अवसर भी नही आया था, पर आज उसे पापा, मां और प्रशांत भैया की यह योजना गले नहीं उतर रही थी। उसने साहस करके कहा, ‘पापा क्या और कोई तरीका नही है भैया के जीवन यापन का?’
‘तो तुम्हीं बताओ मैं भी तो सुनूं कि कौन सी अमूल्य योजना है आपकी मंजूषा में?’ पापा ने व्यंग्य से कहा।
‘पापा मैं कार्तिक से कहूगी कि वह कुछ सहायता कर दें।’
प्रहेलिका को कार्तिक से कुछ कहने का मन नहीं था, उसे इस समस्या से उबरने का यही मार्ग दिखाई दिया।
‘ हां और आपके कार्तिकजी कितना दे देंगे जादा से जादा एक लाख, वह भी दें न दें। ’ प्रशांत ने व्यंग्य से कहा।
प्रहेलिका को क्रोध आ गया, उसने कहा ‘वे जितना भी दें वह उनकी भलमनसाहत होगी।’
‘इस लड़की को कोई शर्म हया नहीं रह गई है, अपने से बड़ों के सामने कल के बने पति की तरफदारी करने में लगी है।’ पापा दहाड़े।
प्रशांत ने कहा, ‘वैसे मैंने तुम्हारे ससुराल वालों के खिलाफ रिपोर्ट लिखा दी है, तुम्हें तो बस पुलिस के सामने उनके अत्याचार और दहेज मांगने की कहानी पर स्वीकृति देनी है।’
प्रहेलिका चौंक पड़ी, बात इस सीमा तक पहुंच चुकी है, उसे अनुमान न था। उसे समझ न आया क्या करे, क्या कार्तिक से यहां हो रही साजिश के बारे में बताए, वह कैसे बताए कि उसके अपने घर वाले ही उसके विरुद्ध कितना घिनौना षडयंत्र रच रहे हैं ।
पर वह कार्तिक को जानती ही कितना है, क्या वे उसकी बात पर विश्वास करेंगे और कर भी लिया तो उसके घर वाले इस प्रकरण के बाद वे क्या उसे सम्मान देंगे? उसके समक्ष प्रश्न ही प्रश्नन थे, उत्तर कोई नहीं। उसने निर्णय ले लिया कि अपने घर वालों की लालच के लिए वह अपना और पति का जीवन नष्ट नहीं होने देगी।
उसने चाहा कि वह मोबाइल से अपने पति को सब कुछ बता दे।
प्रशांत बोला, ‘मैंने मोबाइल का सिम निकाल लिया है। मुझे मालूम था कि तुम ऐसा करोगी।’
‘तो क्या तुम मुझे बात भी नहीं करने दोगे?’
‘बात ही नहीं बहना, घर से निकलने भी नहीं देगे, तुम्हें अपने ससुराल वालों से मुआवजा वसूलना ही होगा। नहीं मानोगी तो तुम्हारे उस प्यारे पति का एक्सीडेंट भी हो सकता है।’
पुलिस आई तो उसे कुछ नशा दे दिया गया। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, वह खोई-खोई सी बैठी रही। प्रशांत ने पुलिस से कहा कि पता नहीं मेरी बहन को उन्होने क्या खिला कर यह हालत की है ।
अब कौन भला मानता कि यह हरकत ससुराल वालों ने नहीं, उसके अपनों ने की है।
उसे घर वालों की खुसपुस से ही ज्ञात हुआ कि कार्तिक और उसके माता पिता को गिरफ्तार किया गया। फिर उन्होंने पांच लाख दे कर समझौता कर लिया और अपने नाम हुए केस को वापस करवाया। अब प्रहेलिका के ससुराल जाने का तो प्रश्न ही नहीं था।
घर में दिवाली मनाई जा रही थी और वह अपने सपनों की चिता जलते देख रही थी। मां ने आ कर उसके हाथ में प्रसाद देते हुए कहा, ‘ले आज, तेरे कारण ही तेरे भाई का जीवन संवर गया, ये उसकी दुकान के उद्घाटन की मिठाई है।’
प्रहेलिका गुमसुम पड़ी रही। मां ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा ‘तू क्या सोचती है कि हमें तेरे सुख की चिंता नही है, कुछ समय रुक जा, हम तेरे लिए किसी दूर जगह पर कार्तिक से अच्छा लड़का देखेंगे और तेरा विवाह कर देंगे।’
प्रहेलिका कुछ न बोली।
पर प्रहेलिका का जीवन शून्य में विचरता रहा। कभी उसे कार्तिक के साथ व्यतीत वे कुछ दिन याद आते जो उसके जीवन में प्रेम की कुल जमा पूंजी थी, तो विचारों में भी उससे आंख न मिला पाती। वह तो उसे भी इस षडयंत्र का हिस्सा समझता होगा। उसने सुना था कि कार्तिक ने तो दूसरा विवाह भी कर लिया। वह न तो विवाहित थी, न विधवा न तलाकशुदा न कुंवारी। वह अपने चाचा के घर अनमने भाव से पड़ी रहती।
एक दिन उसने देखा कि उसने मां-बाप उसकी दूसरी शादी की तैयारी में हैं। एक परिवार उसे देखने आया था। लड़के ने उसे देखा और पसंद भी कर लिया।
लेकिन, तभी धमाका हो गया।
प्रहेलिका ने तय किया कि आज वह चुप नहीं रहेगी। उसका बरसों का बंधा बांध टूट गया। वह धाराप्रवाह सभी के बीच बोलती चली गई। लोगों ने पाया कि वह तो अपने घरवालों के कच्चे चिट्ठे खोल रही है..एक-एक बात, एक-एक सच्चाई। उसने अपनी शादी की असलियत, षड़यंत्र, मां-बाप-भाई के रंगे चेहरों को सबके सामने कर दिया था।
किसी की हिम्मत नहीं थी कि आज उस दावानल के सामने खुद को खड़ा कर सके। वह बस बोलती जा रही थी…
सबको मानो सांप सूंघ गया था…।

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