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मुद्दाः भय के साये में स्त्री

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक की प्रथा को असंवैधानिक मानते हुए इसको समाप्त करने का फैसला आधी आबादी को न्याय मिलने की दिशा में एक आरंभिक कदम ही माना जा सकता है।

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पीना बुद्धिराजा

देखा जाए तो अस्सी फीसद महिलाएं और लड़कियां अपने रिश्तेदारों, परिचितों या फिर पड़ोसियों के द्वारा छेड़छाड़, बलात्कार और हिंसा का शिकार होती हैं। इसके बावजूद पीड़ित को कभी उचित न्याय नहीं मिल पाता है। यह और भी अधिक भयावह स्थिति है। इस अनिश्चित और असुरक्षित माहौल में महिलाएं और बालिकाएं अपने अनुभवों से जिस जीवन दर्शन को सीखती हैं, वह अपमान और खौफ के रूप मे उनके व्यक्तित्व और आत्मविश्वास को हमेशा पराजित करता रहता है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक की प्रथा को असंवैधानिक मानते हुए इसको समाप्त करने का फैसला आधी आबादी को न्याय मिलने की दिशा में एक आरंभिक कदम ही माना जा सकता है। वास्तव में स्त्री संघर्ष और उसके अधिकारों को हासिल करने की राह अभी भी बहुत कठिन और चुनौतीपूर्ण है। देश की आधी आबादी वर्तमान में मानव इतिहास के अत्यंत क्रूर समय को झेल रही है। गैर-बराबरी, शोषण, हिंसा और नृशंसता से बनी व्यवस्था के दुष्चक्र मे फंसी स्त्री-अस्मिता के सवाल इस वक्त के सबसे ज्वलंत प्रश्न हैं। समाज, राजनीति और संस्कृति की शक्ति सरंचना जिस प्रकार स्त्रियों के प्रति उदासीनता, लैंगिक भेदभाव, उत्पीड़न और सामंतवादी नजरिए से ग्रस्त है, उसमें स्त्री मुक्ति और समान अवसर अभी दूर की कौड़ी ही हैं। इस यथार्थ का एक उदाहरण यह है कि न्याय से संबंधित अनेक कानून बनने के बाद भी उसका कोई सीधा फायदा नहीं मिल रहा है। देश भर में महिलाओं के प्रति हिंसा में हो रही बढ़ोतरी इसका प्रमाण है।

पितृसत्ता के नए उभार के कारण स्त्री-मुक्ति और सामाजिक, आर्थिक क्षेत्र में उनकी स्वतंत्र अभिव्यक्ति का स्थान निरंतर सिकुड़ता जा रहा है। महानगरों से लेकर गावों-कस्बों मे भी महिलाएं और बच्चियां सुरक्षित नहीं रह गई हैं। किसी समुदाय या जाति विशेष ही नहीं, बल्कि कामकाजी शिक्षित स्त्री से लेकर सामान्य, घरेलू और ग्रामीण औरत, सबका दैहिक और मानसिक शोषण किया जा रहा है। स्वतंत्र अस्तित्व की आवयश्कता आज के स्त्री समाज का एक विशिष्ट मुद्दा है और मुक्ति की यही चाह पितृसत्तात्मक संरचनाओं से विद्रोह भी है। यह उन प्रतिबंधों और नियमों को तोड़ने की आकांक्षा है जो समाज ने उसके लिए तय किए हैं।

आज जब स्त्री घर की चारदीवारी को लांघ कर आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए बाहर निकलती है तो सड़क पर उसका जीवन कठिन होता जा रहा है। मानसिक धरातल पर स्वयं को वह कहीं भी सुरक्षित अनुभव नहीं करती। यहां तक कि घर में, बसों में, स्कूल में, दफ्तर में और रात को सफर में भी आशंका और भय का साया हमेशा उसके साथ बना रहता है।

पिछले कुछ समय से छात्राओं के साथ होने वाली यौन हिंसा की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ी हैं। इसके पीछे पिछड़ी और बीमार सोच के ऐसे अनेक पहलू जुड़े हैं, जो आज के सभ्य समाज को भी शर्मिंदा कर देते हैं। महिलाओं और लड़कियों के प्रति बढ़ती हिंसक वारदातें और बलात्कार की घटनाएं नई सामाजिक व्यवस्था में स्त्री की भूमिका पर एक बार फिर से सोचने के लिए विवश कर देती हैं। बाहर की असुरक्षा तो स्पष्ट दिखाई देती है, परंतु आंकड़ों को देखा जाए तो 80 फीसद महिलाएं और लड़कियां अपने रिश्तेदारों, परिचितों या फिर पड़ोसियों के द्वारा छेड़छाड़, बलात्कार और हिंसा का शिकार होती हैं। इसके बावजूद पीड़ित को कभी उचित न्याय नहीं मिल पाता है। यह और भी अधिक भयावह स्थिति है। इस अनिश्चित और असुरक्षित माहौल में महिलाएं व बालिकाएं अपने अनुभवों से जिस जीवन दर्शन को सीखती हैं, वह अपमान और खौफ के रूप मे उनके व्यक्तित्व और आत्मविश्वास को हमेशा पराजित करता रहता है।
ऐसे खतरनाक हालात में स्त्री-गरिमा और समाज की एक स्वतंत्र इकाई के रूप में उसे स्थापित करने की चुनौती इस समय सबसे बड़ी है। इन स्थितियों पर दुख, आक्रोश और अफसोस जाहिर करने से ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर समाज में बदलाव होना अनिवार्य है।

आधी आबादी की सक्रिय भागीदारी व समर्थन के बिना कोई भी सामाजिक परिवर्तन संभव नही है। स्त्री मुक्ति का अभियान मानव-मुक्ति के संघर्ष में परिवर्तित होना जरूरी है। एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में बराबरी, न्याय और सम्मान से जीने का अधिकार जब तक नारी को नही मिलेगा, तब तक आधुनिक समाज की संकल्पना हमेशा अधूरी रहेगी।

जब हम ‘जेंडर जस्टिस’ की बात करते हैं तो यह मुक्ति मूलत: समानता ,आत्मसम्मान, न्याय और अस्तित्व के लिए संघर्ष की भूमिका होगी। स्त्री मुद्दों को अधिक उदार, संवेदनशील और जिम्मेदारी से देखने के लिए समाज के सभी क्षेत्रों से जुड़े लोगों व वर्गों को अपना सहयोग देना होगा और इस बिखराव को एक संगठित रूप देना होगा। आज स्त्रियों की मूलभूत समस्या आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ ही सुरक्षा, सम्मान और मनोवैज्ञानिक स्वतंत्रता से भी संबंधित है। समाज में स्त्री की समान दावेदारी को लेकर होने वाले अकादमिक, बौद्धिक विमर्शों और समय-समय पर सोशल मीडिया पर चलाए जाने वाले अभियान भी समाज की चुप्पी को तोड़ने और जागरूक करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। आज उन गंभीर सवालों पर भी सोचने की जरूरत है कि किन सीमाओं और अधीनताओं के तहत स्त्री-मुक्ति और उसके विकास को अवरुद्ध किया जा रहा है।

निश्चित रूप से पितृसत्तात्मक परंपराएं और वर्चस्ववादी विचार, जो स्त्री को एक रूढ़िगत छवि के रूप मे देखते आए हैं, उस परिवेश में अपनी आवाज बुलंद करना हमेशा खतरे से खाली नहीं होगा। भारत की जनतंत्र आधारित व्यवस्था में महिलाओं को अकेले पढ़ने, नौकरी करने, घूमने की जो आजादी होनी चाहिए, उस पर नैतिकता की आचार-संहिताओं और मान्यताओं को आरोपित करना पुरुष-प्रधान समाज के दोहरे मापंदड को उजागर करता है। विचारशील और आधुनिक होने का दावा करने वाले समाज मे यदि स्त्री को अपनी स्वतंत्र वैचारिक जमीन नहीं मिल पा रही है तो यह संघर्ष जारी रखना ही होगा। यह उसके अस्तित्व का भी बड़ा प्रश्न है।
प्रसिद्ध कवि अरुण कमल की कविता ‘स्वप्न’ की पंक्तिया इसे कुछ इस प्रकार से अभिव्यक्त करती हैं-
वह हर रात एक ही सपना देखती, ताकि भूल ना जाए मुक्ति की इच्छा मुक्ति ना भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न बदले ना भी जीवन तो जीवित बचे मुक्ति का यत्न।

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