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सिनेमाः कौन सुने मेरे मन की पीर

बहुत कम लोगों को पता होगा कि स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर, उनकी बहन आशा भोसले और बाद की पीढ़ी में अनुराधा पौडवाल को पहला गीत गवाने वाले संगीतकार दत्ता डावजेकर थे।

Author April 15, 2018 1:16 AM
बहुत कम लोगों को पता होगा कि स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर, उनकी बहन आशा भोसले और बाद की पीढ़ी में अनुराधा पौडवाल को पहला गीत गवाने वाले संगीतकार दत्ता डावजेकर थे।

बहुत कम लोगों को पता होगा कि स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर, उनकी बहन आशा भोसले और बाद की पीढ़ी में अनुराधा पौडवाल को पहला गीत गवाने वाले संगीतकार दत्ता डावजेकर थे। हिंदी फिल्म पार्श्वगायन के क्षेत्र में लता की तो शुरुआत ही उन्होंने ठुमरी की पारंपरिक बंदिश से कराई थी- ‘पां लागूं कर जोरी’। बात है देश की आजादी के साल 1947 की और फिल्म थी ‘आपकी सेवा में’। दत्ता डावजेकर ने महज पांच हिंदी फिल्मों में संगीत दिया, लेकिन पूरी तरह हिट। उनकी मराठी धुनों को गुनगुनाते संगीत प्रेमी आज भी महाराष्ट्र की गलियों में आपको आसानी से मिल जाएंगे।

15 नवंबर, 1917 को पुणे में जन्मे मूलत: मराठी संगीतकार दत्ता डावजेकर, ‘डीडी’ के नाम से मशहूर थे। पिता बाबूराव डावजेकर, सोहराब मोदी के भाई केके मोदी की नाटक कंपनी ‘आर्यसुबोधिनी’ के मराठी तमाशों और उर्दू नाटकों में तबला बजाते थे, सो पहले दत्ता का बाल मन ताल पर मचला और फिर तबले पर उंगलियां थिरकने लगीं। फिर वह मशहूर शास्त्रीय गायिका हीराबाई बड़ौदकर के संगीतकार भाई सुरेशभाई माने से संगीत की सरगम और रागों की बारीकियां सीखने लगे। दत्ता ने हारमोनियम पर भी उंगलियां दौड़ाने का अभ्यास किया। शिक्षक के बीमार होने पर उन्हें गीतों की धुन बनाने का अवसर मिला। उन्होंने खुद गीत लिख कर उनकी धुनें बनार्इं और उन्हें गणपति उत्सव में प्रस्तुत किया। तब की मशहूर विद्रोही गायिका-अभिनेत्री शांता आप्टे को उनकी संगीत प्रतिभा इतनी भाई कि उन्होंने अपने ‘बैले ग्रुप’ के कार्यक्रमों के लिए दत्ता को बीस रुपए की मासिक पगार पर बतौर प्यानो वादक बुला लिया। थोड़ी-सी फुरसत मिलते ही दत्ता ने पंडित दत्तोपंत मंगल वेडेकर से जल तरंग पर उंगलियां चलाना सीख लिया और फिर संगीतकार पंडित गोविंदराव टेंबे के सहायक के तौर पर मराठी फिल्म ‘सवंगड़ी’ के गीतों की धुन बनाने लगे। उन दिनों दुर्गा खोटे और नसीम को गायन के शौक ने बेचैन कर रखा था और दोनों दत्ता से ही गाना सीख रहे थे, लिहाजा उनको संगीत सिखाने के लिए दत्ता गाहे-बगाहे पुणे से मुंबई आते थे। सोहराब मोदी को दत्ता की यह खूबी भाती थी कि कोई गीत सुनते समय वे फौरन ही उसकी स्वरलिपि को कागज पर उतार लेते थे, इसलिए सोहराब मोदी ने ‘सवंगड़ी’ के पूरा होते ही उनको ‘मिनर्वा मूवीटोन’ में बुला लिया।

स्वतंत्र संगीतकार के रूप में फिल्मों में दत्ता डावजेकर की आमद 1941 में मराठी सिनेमा से हुई- कॉलेज के जमाने के अपने दोस्त कोशी और ‘नवयुग स्टूडियो’ की फिल्म ‘म्यूनिसिपैलिटी’ से। 1942 में इसी बैनर की दूसरी फिल्म ‘सरकारी पाहुणे’ में सुपरिचित गायक पंडित विष्णु पंत जोग और नर्तकी वत्सला कुमठेकर की जुगलबंदी को फिल्माने के लिए दत्ता ने शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक हिंदी गीत भी कंपोज किया- ‘नाचे संगीत नटवर’, जो बहुत लोकप्रिय हुआ। ये दोनों सफलतम फिल्मों में शुमार हुर्इं। 1942 में मास्टर विनायक ने कोल्हापुर में ‘प्रफुल्ल पिक्चर्स’ की बुनियाद रखी तो दत्ता डावजेकर भी उनके साथ चले गए। उन्हीं दिनों नौकरी के लिए संघर्षरत चौदह साल की किशोरवय लता मंगेशकर को वसंत जोगलेकर ने दत्ता डावजेकर के पास भेजा। कोमल, महीन और मीठी आवाज वाली लता से वे इतना प्रभावित हुए कि अस्सी रुपए प्रतिमाह पर उन्हें ‘प्रफुल्ल पिक्चर्स’ में नौकरी दिला दी। लता उनके इतने करीब थीं कि जब मालती पेंढारकर ने मराठी फिल्म ‘मोहित्यांची मंजुला’ में लता से संगीत देने को कहा तो लता (जिन्होंने कुछ कारणों से ‘आनंदघन’ नाम से संगीत दिया था) ने धुनें बनाने के बाद संगीत पक्ष में मदद के लिए अपने भाई हृदयनाथ मंगेशकर की अनुपलब्धता के कारण दत्ता डावजेकर को ही राजदार बनाते हुए चुना। दत्ता डावजेकर ने ‘प्रफुल्ल पिक्चर्स’ की तीन फिल्मों में संगीत दिया- 1943 में बनी ‘माझे बाल’ और ‘चिमुकला संसार’ और 1944 में बनी ‘गजभाऊ’ में। ‘माझे बाल’ में उन्होंने लता से गीत गवाए। एक गीत ‘चल चल नव बाला’ को उन्होंने चारों मंगेशकर बहनों- लता, आशा, उषा और मीना- के स्वरों में सजाया। इस तरह आशा भोंसले ने भी अपना पहला गीत दत्ता डावजेकर के संगीत निर्देशन में ही गाया।

1947 में वसंत जोगलेकर निर्देशित ‘आपकी सेवा में’ फिल्म से दत्ता डावजेकर ने बतौर संगीतकार हिंदी सिनेमा में कदम रखा। इस फिल्म में रोहिणी भाटे पर फिल्माई गई ठुमरी ‘पां लागूं कर जोरी रे श्याम मोसे न खेलो होरी’ को उन्होंने लता की आवाज में सजाया, जो हिंदी फिल्मों में बतौर पार्श्वगायिका लता मंगेशकर का पहला गीत बना। फिल्म में लता के गाए दो अन्य एकल गीत- ‘एक नए रंग में दूजे उमंग में’ और ‘अब कौन सुनेगा मेरे मन की बात’ भी बुलंदियों की सीढ़ियां चढ़े। इनके अलावा मुहम्मद रफी के स्वर में सजा ‘मेरी आंखों के तारे’ भी संगीत रसिकों की जुबान पर खूब चढ़ा। अन्य चार गीत- ‘देश में संकट आया है’, ‘गुलशन में मेरे थी बहार’, ‘फुलबगिया लहराए’ और ‘मैं तेरी तू मेरा’ भी खासे सराहे गए। दत्ता डावजेकर की संगीतबद्ध चार अन्य हिंदी फिल्में रहीं- ‘अदालत’, ‘जीत किसकी’, ‘गोलकुंडा का कैदी’ और ‘बाल शिवाजी’। 1948 में बनी ‘अदालत’ में रफी का ‘दो विदा दो प्राण मुझको’ काफी लोकप्रिय हुआ, तो 1952 में बनी ‘जीत किसकी’ का संगीत भी लोकप्रिय हुआ। इसी साल उन्होंने लता मंगेशकर की सलाह पर मुंबई को अपना स्थाई ठिकाना बना लिया और करीब दस साल फिल्मों में सी. रामचंद्र और चित्रगुप्त के मुख्य सहायक के रूप में काम किया। इस बीच 1954 में बनी प्रेमनाथ की ‘गोलकुंडा का कैदी’ में दत्ता डावजेकर को दो सह-संगीतकार मिले- जगन्नाथ और कुंदनलाल। इस फिल्म में दत्ता ने सुधा मल्होत्रा को मौका दिया और उनसे एक बहुत मीठी रचना ‘लहर में डोले, कोयल बोले’ गवाई, तो शमशाद बेगम के गाए ‘धड़ धम चक लग रही जंगल में’ की गूंज भी पूरे देश में हुई। 1982 में बनी ‘बाल शिवाजी’ दत्ता की संगीतबद्ध अंतिम हिंदी फिल्म थी, जिसका संगीत भी खासा उल्लेखनीय रहा।

दत्ता डावजेकर ने पांच हिंदी के अलावा इक्यावन मराठी फिल्मों, बारह नाटकों और तकरीबन पांच सौ वृत्तचित्रों में एक हजार से अधिक गीतों को धुनों में बांधा। ‘थैंक्यू मिस्टर ग्लैड’ नाटक के लिए उन्होंने जर्मन संगीत तक सीखा। 1974 में मराठी फिल्म ‘यशोदा’ में अनुराधा पौडवाल को भी पहला पार्श्वगीत- ‘घुमला हृदयी निनाद हा’ दत्ता डावजेकर ने ही गवाया, जिसे सुनने वाले महाराष्ट्र में आज भी मिल जाएंगे; तो ‘सुल्तान शहर के यार हम हैं म्यूनिसिपैलिटी वाले’ और ‘सैनिक हो तुमच्या साथी’ की लोकप्रियता भी कम नहीं हुई है। हिंदी सिनेमा को समृद्ध बनाने में मराठीभाषी संगीतकारों और गायक-गायिकाओं की शृंखला में दत्ता डावजेकर भले एक अनसुना-सा नाम रहे हों, लेकिन मराठी फिल्मों की दुनिया में वह एक बड़ा नाम रहे। वह बताते थे कि एक मराठी बाल नाटक में उन्होंने खुद एक गीत लिखा और संगीतबद्ध किया था- ‘इना मीना मोना बस’, जिस पर सी रामचंद्र ने 1957 में बनी फिल्म ‘आशा’ का हिट गीत ‘इना मीना डीका’ बनाया था। दत्ता डावजेकर ने सुर पेटी जैसे वाद्यों को प्रचलित किया, तो क्ले वॉयलिन के आरंभिक प्रयोग करने वाले संगीतकारों में भी शुमार हुए। 1962 से लगातार पांच साल तक महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ संगीतकार’ माना, तो ‘लता मंगेशकर’ और ‘सुर सिंगार’ जैसे सम्मानों से भी सम्मानित हुए। 19 सितंबर, 2007 को मुंबई में दत्ता डावजेकर ने सिने जगत को ही नहीं, इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन अंधेरी (पश्चिम) के चार बंगला-लोखंडवाला क्षेत्र में अंतिम समय तक उनके पास से गुजरते हुए बहुत कम लोग जान पाए थे कि साधारण-सा दिखने वाला शख्स लता मंगेशकर की गायकी का सूत्रधार था। ल्ल

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