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विचार बोध: जो कह गए सुकरात

सुकरात की निर्भीकता की बात को अलग से समझने की जरूरत है। ज्ञान की राह न तो आसान है और न ही मुश्किल। इस बात को यों समझे लें कि ज्ञान प्राप्ति की दरकार जब एक आत्मिक संकल्प में बदल जाती है तो व्यक्ति निर्भीकता के साथ ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ने लगता है।

यूनान के महान दार्शनिक, संत और ज्ञानी पुरुष सुकरात

रोहित कुमार

अगर आप ज्ञान की पक्षधरता के साथ अडिग और निर्भीक हैं तो सत्य की कसौटी पर आप खरे हैं। तर्क की मौजूदा शब्दावली में बात करें तो महान दार्शनिक और संत सुकरात के जीवन और विचार का सार यही होगा।
आधुनिक बोध और ज्ञान के अनगिनत संदर्भों में यूनान की चर्चा होती है। सुकरात भी यूनान के ही थे। एक ऐसे समय में जब हम भौतिकता से आगे ‘चरमभोग के परम दौर’ तक पहुंच गए हैं, सुकरात की बातें हमारे कई संशय और दुविधाओं को दूर करती हैं। दिलचस्प है कि जब ये बातें सुकरात ने कहीं तो उस समय का प्रचलन और मान्यताएं बिल्कुल इनसे भिन्न थीं। बावजूद इसके निर्भयता के साथ सुकरात ने न सिर्फ अपनी बातें कहीं, ज्ञान के अपने अनुभव साझा किए बल्कि ऐसा करने के हर जोखिम को भी उन्होंने स्वीकार किया।

सुकरात ने सत्य की आधुनिक और व्यावहारिक व्याख्या करते हुए कहा, ‘सच्चा ज्ञान संभव है, बशर्ते उसके लिए ठीक तौर पर प्रयत्न किया जाए। जो बातें हमारी समझ में आती हैं या हमारे सामने आई हैं, उन्हें तत्संबंधी घटनाओं पर हम परखें, इस तरह अनेक परख के बाद हम एक सचाई पर पहुंच सकते हैं। ज्ञान के समान पवित्रतम कोई वस्तु नहीं हैं।’ कहने की जरूरत नहीं कि सुकरात ज्ञान या सत्य की अपनी समझ को आस्था के साथ वैज्ञानिकता से भी जोड़ते हैं। यही कारण है कि आधुनिक दर्शन परंपरा में उनका स्थान खासा ऊंचा है।

इस महान संत और विचारक के जीवन को देखें तो वे साधारण परिस्थितियों को असाधारण उपलब्धियों और यश में बदलते हैं। ऐसा वे इसलिए कर पाए क्योंकि जीवन की सार्थकता और निष्कर्ष के बारे में उन्होंने ठोस व वैज्ञानिक राय विकसित कर ली थी। उनका जन्म एथेंस के बहुत ही गरीब घर में हुआ था। विद्वता और ख्याति के बावजूद उन्होंने वैवाहिक जीवन की लालसा नहीं रखी। ज्ञान का संग्रह और प्रसार, ये ही उनके जीवन के मुख्य लक्ष्य रहे। सुकरात एक गुरु तौर पर भी काफी यशस्वी रहे। ज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में उनके कई अधूरे कार्य उनके शिष्य अफलातून और अरस्तू ने पूरे किए। यही नहीं, इन दोनों ने अपने गुरु के कई दार्शनिक सूत्रों को और आगे भी बढ़ाया ।

सुकरात की निर्भीकता की बात को अलग से समझने की जरूरत है। ज्ञान की राह न तो आसान है और न ही मुश्किल। इस बात को यों समझे लें कि ज्ञान प्राप्ति की दरकार जब एक आत्मिक संकल्प में बदल जाती है तो व्यक्ति निर्भीकता के साथ ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ने लगता है। उसे साफ लगता है कि जीवन का अर्थ सांसारिकता नहीं बल्कि संसार में किए गए वे सार्थक कर्म हैं जो आत्मा को संतोष देते हैं, जीवन को सार्थकता प्रदान करते हैं। यह सब करने-समझने के लिए गहरे आत्मबल की जरूरत होती है। ऐसा आत्मबल जो आपको निर्भय बनाए।

सुकरात ने एक धर्मभीरू दौर में जब सत्य और ईश्वर के अभेद की बात कही तो वह उस दौर के लिहाज से एक बड़ा और निर्भीक कदम था। इसकी कीमत जान से हाथ धोना तक हो सकता है, यह बात सुकरात के आगे पहले से साफ थी। बावजूद इसके उन्होंने ज्ञान की पक्षधरता स्वीकार की और अपने तरीके से लोगों के सामने जीवन और सत्य की व्याख्या रखी। उस समय के लिहाज से यह एक क्रांतिकारी कदम था। पूर्वग्रह और पोंगी मान्यताओं के बूते धार्मिक-सांस्कृतिक जागीरदारी करने वालों को उन्होंने एक तरह से खुली चुनौती दी कि वे उन्हें ठोस वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर गलत साबित करके दिखाएं। खैर इस चुनौती को तो किसी ने स्वीकार नहीं किया, उलटे यह जरूर किया गया कि नवयुवकों को बिगाड़ने, देवनिंदा और नास्तिक होने का झूठा आरोप लगाकर उन्हें जहर देकर मारने का दंड दिया गया।

सुकरात ने जहर का प्याला खुशी-खुशी पिया और जान दे दी। उनके शिष्यों तथा स्नेहियों ने उन्हें कारागार से भाग जाने का आग्रह किया किंतु उन्होंने कहा- ‘भाइयो, तुम्हारे इस प्रस्ताव का मैंं आदर करता हूं कि मैं यहां से भाग जाऊं। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और प्राण के प्रति मोह होता है। भला प्राण देना कौन चाहता है? किंतु यह उन साधारण लोगों के लिए है जो लोग इस नश्वर शरीर को ही सब कुछ मानते हैं। आत्मा अमर है फिर इस शरीर से क्या डरना? हमारे शरीर में जो निवास करता है क्या उसका कोई कुछ बिगाड़ सकता है? आत्मा ऐसे शरीर को बार-बार धारण करती है।

अत: इस क्षणिक शरीर की रक्षा के लिए भागना उचित नहीं है। क्या मैंने कोई अपराध किया है? जिन लोगों ने इसे अपराध बताया है उनकी बुद्धि पर अज्ञान का प्रकोप है। मैंने उस समय कहा था- विश्व कभी भी एक ही सिद्धांत की परिधि में नहीं बांधा जा सकता। मानव मस्तिष्क की अपनी सीमाएं हैं। विश्व को जानने और समझने के लिए अपने अंतस के तम को हटा देना चाहिए। मनुष्य यह नश्वर कायामात्र नहीं, वह सजग और चेतन आत्मा में निवास करता है। इसलिए हमें आत्मानुसंधान की ओर ही मुख्य रूप से प्रवृत्त होना चाहिए। यह आवश्यक है कि हम अपने जीवन में सत्य, न्याय और ईमानदारी का अवलंबन करें।’ वैसे तो यह सुकरात के जीवन का आखिरी संदेश है। पर अगर जीवन और उसके अभिप्राय के बारे में गहरे से विचार करें तो यह संदेश हमारे लिए एक ऐसे सूत्र की तरह है, जिसके भरोसे हम अज्ञान और सांसारिकता दोनों के जंजाल से बाहर निकल सकते हैं। ल्ल

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