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समाज : निर्भया और हिंसा का मिथ

निर्भया कांड और उसके चरम हिंसात्मक प्रतिबिंबों से दहला यह समाज अपनी प्रतिक्रिया से उसे हर संभव ऐतिहासिक बना गया, फिर भी हिंसा का मिथक यहां इतिहास का पीछा नहीं छोड़ रहा..

Author नई दिल्ली | Updated: December 27, 2015 12:16 AM
निर्भया केस के दोषी किशोर की रिहाई के खिलाफ इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शन के दौरान की एक तस्वीर (पीटीआई फोटो)

निर्भया कांड और उसके चरम हिंसात्मक प्रतिबिंबों से दहला यह समाज अपनी प्रतिक्रिया से उसे हर संभव ऐतिहासिक बना गया, फिर भी हिंसा का मिथक यहां इतिहास का पीछा नहीं छोड़ रहा। हिंसा क्या एक मिथक भर है, जो कहीं भी कभी भी गढ़ी जा सकती है? अगर ऐसा नहीं है तो आज हम निर्भया कांड के ‘नाबालिग’ के प्रति इतने हिंसक क्यों हो रहे हैं? ऐसा नहीं कि इस घटना से पहले स्त्री शरीर और उसकी सहमति की हिंसक अवहेलना नहीं हुई थी और न ही यह किसी मायने में आखिरी घटना साबित हुई।

भारतीय मानस में स्त्री हिंसा को लेकर इस घटना के बाद कोई परिमार्जन हुआ हो, ऐसा भी नहीं जान पड़ता, पर प्रश्न उससे कहीं बड़े हैं। क्या हिंसा (शारीरिक, मानसिक, वाचिक) जैसे विघटनवादी तत्त्व का उन्मूलन संभव है? क्या हम वास्तव में सहमति की अवहेलना को लेकर तत्पर और उत्सुक हैं? क्या अहिंसा परमोधर्म: गाने वाला यह समाज अपने धर्म की चिंतन, मनन और सुधारवादी परिधि से बाहर जा चुका है? ऐसे में ही शायद महाभारत की धर्म संबंधी अवधारणा सनातन प्रतीत होती है कि जब जब धर्म का विनाश होगा, उसकी पुनर्स्थापना उस हर युग में होगी, क्योंकि युग की जरूरतें और स्वरूप बदलेगा और तदनुसार उस अमुक युग का धर्म दुष्टों का विनाश करके सज्जनों की रक्षा के लिए जन्म लेगा।

यहां युधिष्ठिर के एक यक्ष प्रश्न का उत्तर बेहद समीचीन जान पड़ता है- ‘इस लोक में परमधर्म क्या है?’ का जवाब युधिष्ठिर ‘अनृशंस्यं परो धर्म:’ कह कर देते हैं, यानी जो धर्म नृशंसता के निषेध में हो। यहां अहिंसा और अनृशंस्य में फर्क है और वही फर्क हमें निर्भया के मामले में दहला गया, जहां नृशंस हिंसा थी।

अब सवाल यह है कि इस युग का धर्म है क्या? क्या वह हमें नृशंस होने से रोक पा रहा है? मनु का धर्म शुद्ध मानव धर्म है, देवी देवता का नहीं, कोई स्तुति, कोई वंदना नहीं है। क्या वास्तव में मानवधर्म को सोचा और पढ़ा है हमने? इस युग का मानवधर्म क्या हो, उसमें किन बातों के आचरण का निषेध हो, क्या तय किया है हमने? यहां सवाल सिर्फ भाषण में निषेध का नहीं है। क्या हमारा हृदय इस बात की गवाही देता है कि हम इस देश के नागरिक, जो संविधान और उसकी मान्यताओं से बंधे हैं, आज उस ‘नाबालिग’ को न्यायसम्मत प्रक्रिया से मुक्त किए जाने के बाद भी उसका लहू पीने को लपलपाती जीभ के साथ तैयार हैं?

गां धी के हृदय परिवर्तन को हमने सिर्फ नारा बनाया, कभी विश्वास नहीं किया कि यह भी संभव है, क्योंकि मानव और हृदय की पारस्परिक संकल्पना कभी समझ ही न पाए हम। उपनिवेश ने हमें आत्मविमुख कर दिया था, धर्म सांप्रदायिकता में बदल दिया गया और हृदय तो संभवत: राजनीतिक-सामाजिक संवाद से हमेशा के लिए मिटा दिया गया, उसका प्रमाण जो नहीं था। ऐसे में यह संकट क्या आधुनिकता का सघन संकट नहीं दिखता और गांधी और भी समीचीन नहीं लगते, जब वे आधुनिकता के संकट की बात करते हैं, सिविल सोसाइटी के विद्रूप की बात करते हैं।

यह भी गौर करने लायक है कि हमने गांधी की आशंकाओं को अनदेखा कर एक ऐसे राष्ट्र-राज्य का निर्माण किया, जिसका तेवर ‘वैज्ञानिक’ था, प्रमुखता विज्ञान की तय की गई, मानव की नहीं। शहर और बांध नए ‘मंदिर’ बन गए और गांव की आत्मा कहीं नृशंसता से कुचल दी गई। उसी नृशंसता से पैदा ये मानव त्रासदियां हमें एक के बाद एक झंझोरतीं रहीं। प्रश्न अनुत्तरित होकर मुंह बाए खड़े रहे और हमारी बौखलाहट बनी रह गई। इसी क्रम में धर्मनिरपेक्षता का एक अजायबघर बनाया गया, जिसमें प्रतिबद्धता धर्म के सापेक्ष तय की गई। नतीजा हमारे सामने एक ऐसे नजरिए के तौर पर आया, जिसका सरोकार राज्य की स्थापना में ज्यादा और मानवमूल्यों की स्थापना में न के बराबर रहा, और वह ‘कल्याणकारी’ राज्य भी ऐसा, जो
अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के परे कभी तुष्टीकरण के अमानवीय खेल से बाहर राज्यधर्म की स्थापना कर ही नहीं सका। आखिरकार ऐसे में ‘नो वन किल्ड जेसिका’ और इस ‘नाबालिग’ के कुछ ‘तकनिकी’ कारणों से रिहाई जैसे रस्साकस्सी तो जन्म लेंगे ही।

पर उलझनें यहीं विराम नहीं ले रहीं, यहीं नहीं रुक रहीं। जिस निर्भया की मां का बिंब हमें दहलाए जा रहा है, वही हमारा हृदय उस ‘नाबालिग’ को हर हाल में मिल कर मार डालने को तैयार है, अदालत में नहीं तो अदालत के बाहर।

उसकी मां की असहायता, गुहार, संतान का इंतजार, कुछ नहीं दिख रहा, क्योंकि हम नृशंसता के आदी हो चुके हैं। भीड़ नृशंसता के, सामजिक नृशंसता के, समाज उसे अबाध्य ‘मर्दानगी’ पढ़ा कर बड़ा तो कर पाई, पर अपने ही पैदावार के लिए आज न्यायसम्मत रिहाई की कोई कीमत नहीं, कोई उत्तर भी नहीं। आज उसी समाज को उस युवक की स्वतंत्रता नामंजूर है, जिसने उसे अबाध्य उद्दंडता के सिवा ‘मर्द’ होने के कोई और मायने नहीं समझाया। उससे हम किसी पश्चाताप की, हृदय परिवर्तन की और स्वयं पर किसी भी अतिरेक से बचने की कोई बाध्यता, कोई अंकुश नहीं लगा पा रहे।

क्या हमारा धर्म यही कहता है? अगर धर्म, जो हृदय को सर्वोपरि मानता हो, की अवधारणा हम आजतक कुशलता पूर्वक समाज के आचरण से संप्रेषित करने में सफल हुए रहते तो न निर्भया महज एक कांड के तौर पर हमारे सामने आती और न ही क्रमश: राजनीतिक, न्यायिक प्रतिबिंबों में सिर्फ एक ऐसा अध्याय बन कर रह जाती, जो बार-बार सिर्फ हिंसा के नए-नए अध्याय और पुनरावृत्ति की संभावना पैदा करती और हिंसा, नृशंस हिंसा सिर्फ एक मिथक बनती जाती, जिसे जब चाहा अपने अनुसार परिभाषित कर दिया।

ऐसे में हिंसा के इन रोज उत्पन्न होते मिथकों को तोड़ने के लिए इस युग का एक धर्म निर्धारण करना होगा, मानव धर्म। स्त्री अपने आप महज असुरक्षा के बिंब से निकलने को स्वतंत्र हो जाएगी, आखिरकार स्त्री के प्रश्न और भी हैं।

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