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समाज: रिश्तों से ऊबे उकताए लोग

तालमेल का अभाव विवाह में हावी होते शहरी जीवन की एक सच्चाई है, क्योंकि अनुमान है कि अब हर साल दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में दस हजार से ज्यादा शादियां टूट जाती हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

हमारे देश में भी विवाह संबंधी कई धारणाएं अब बदल रही हैं। कैरियर और जीवन को अहमियत देने वाले युवा अब शादी टूटने की नौबत से बाहर निकलना बेहतर समझने लगे हैं। इसमें अब भी ज्यादा कष्ट महिलाओं को होता है, क्योंकि विवाह टूटने की स्थिति में उनके पास पति से मिलने वाले गुजारा भत्ता (अगर वह मिले तो) के अलावा जीवन-यापन का कोई और जरिया नहीं होता। यही वजह है कि हर हाल में महिलाएं अपने रिश्ते को बचाने की कोशिश करती हैं। जबकि पुरुषों के लिए वैवाहिक रिश्ते से बाहर आना इतना मुश्किल नहीं होता।

तालमेल का अभाव विवाह में हावी होते शहरी जीवन की एक सच्चाई है, क्योंकि अनुमान है कि अब हर साल दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में दस हजार से ज्यादा शादियां टूट जाती हैं। इनमें से ज्यादातर शादियों में दोनों पक्ष सामंजस्य की कमी में एक दूसरे पर अनगिनत आरोप लगाते हुए वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाते हैं। इस दौरान अप्रिय स्थितियां पैदा हो जाती हैं। वे वकीलों को फीस देकर मामले को अंतहीन बहसों में खींचते हैं। इन बातों का अंदाजा समाज और कोर्ट, दोनों को है। तलाक से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट यह टिप्पणी एकाधिक बार कर चुका है कि कानूनी तंत्र होने के बावजूद इनका निपटारा करना सबसे कठिन काम है। सच्चाई यह है कि जब लोग तलाक की याचिका लेकर कोर्ट के पास जाते हैं, तो उसमें इतने झूठ होते हैं कि यह पता ही नहीं चलता कि झूठ कहां खत्म होते हैं और उनके अधिकार कहां शुरू होते हैं। यों इसमें एक दोष हमारी न्याय प्रक्रिया का भी है। इसके बारे में हमारे देश में एक आम राय यह है कि न्याय तभी मिलता है, जब मामले को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाए। इसके साथ यह बात भी सही है कि कुछ प्रतिशत शादियों में एकतरफा प्रताड़ना के आरोप सही होते हैं। यानी तलाक के सभी मामलों में एकतरफा कुछ भी नहीं होता। दोनों ही पक्ष बराबर दोषी होते हैं और दोनों ही अपनी-अपनी वजहों से तलाक चाहते हैं।

तलाक सिर्फ मर्द नहीं चाहते, महिलाएं भी चाहती हैं। खुल रहे एक समाज में बदलती धारणाएं उन्हें शादी से बाहर आने के लिए प्रेरित करते हैं। महिलाओं में भी पढ़ाई-लिखाई का स्तर बढ़ने और नौकरियों में उनकी मौजूदगी बढ़ने का नतीजा यह निकला है कि उनमें सड़ चुकी शादी से बाहर निकलने का आत्मविश्वास भी आया है। अब वे घुट-घुट कर जीने के बजाय तलाक लेकर नए सिरे से अपना जीवन शुरू करना ज्यादा बेहतर समझने लगी हैं। उन्हें भी लगता है कि शादी का जो बंधन सामाजिक रीतियों के कारण उन पर बोझ बन गया है, सम्मानजनक तलाक उससे उन्हें आजाद कर सकता है। हालांकि यह सच है कि आज भी शादी के मामले में गांव, कस्बों और शहरों का समाज एक अलग ही रुख अख्तियार करता है। गांवों-कस्बों में तो प्रेम और जाति-गोत्र के बाहर शादी गुनाह है, लिहाजा वहां शादी के बेहद सीमित विकल्पों में अगर थोड़ा पढ़ा-लिखा, कमाई के मामले में स्वावलंबी और दिखने में ठीक-ठाक विकल्प मिल जाए, तो जीवन धन्य मान कर शादी को ताउम्र निभाने का चलन है, भले शादी के चंद सालों बाद रिश्ते में पड़ी गांठें रिसने ही क्यों न लगें। शहरों में लड़के-लड़कियां अपने विकल्प चुनने को कुछ तो आजाद हैं ही, इसके बावजूद शहरी समाज में तलाक की बढ़ती दर बताती है कि वहां सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। असली बात यह है कि शहरी और पढ़ा-लिखा युवा तबका भी अब शादी के मामले में मां-बाप, समाज और जाति-गोत्र के बंधनों को सहने को मजबूर हुआ है। ऐसे में प्रेम विवाह करने के बाद भी उसे समाज, परिवार और मित्रों की तरफ से कई चाहे-अनचाहे दबावों का सामना करना पड़ता है, जिनके असर से उनके समझदारी वाले रिश्ते में भी टीस पड़ जाती है। कई बार समस्या की शुरुआत परिजनों की सामान्य टीका-टिप्पणी से होती है, क्योंकि उन्हें लगता है कि दूसरों की निजी जिंदगी को नियंत्रित करना उनका हक है। विवाह को लेकर अभी हमारा समाज इस मानसिकता से नहीं उबर पाया है कि यह सिर्फ दो लोगों की जिंदगी का निजी मामला है, उसमें तीसरे के दखल की गुंजाइश नहीं है। अक्सर ऐसी ही दखलंदाजी पति या पत्नी में से किसी एक के अहं को उकसाती है और ठीकठाक चल रहे रिश्ते में गांठें पड़ने लगती हैं।

ऐसे मामलों में हालांकि फेमिली कोर्ट की एक भूमिका हो सकती है, जहां तलाक और समझौता करके शादी बचाने का प्रयास किया जाता है। लेकिन समस्या यह है कि देश में कुछ ही राज्यों में फेमिली कोर्ट हैं। अच्छा होता अगर तलाक के मामले फेमिली कोर्ट में ही सुलझाए जाते, उन्हें ज्यादा अधिकार देकर ऐसे मामलों में कमी लाई जाती। बीच-बचाव की संभावनाओं को खोज कर शादी टूटने से बचाई जाती। परिवारों की मदद और रिश्तेदारों से सलाह-मशविरा करके शादी को बचाने के जतन किए जाते, लेकिन भाग-दौड़ और तनाव भरे शहरी जीवन और पैसे को ज्यादा अहमियत दिए जाने के चलन के कारण ऐसी गुंजाइशों के अवसर काफी सीमित हुए हैं। ऐसी विवशताओं पर कुछ वर्ष पूर्व महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय ने विचार किया था और शादी से पहले एक अनिवार्य करार के इंतजाम पर गौर किया गया था। यह तो तय है कि ऐसे करार को हमारा समाज सहज रूप में स्वीकार नहीं करेगा। इसकी अहम वजह समाज का पितृसत्तात्मक होना और औरत को पांव की जूती समझने की मानसिकता का मौजूद होना है। पर ऐसे में ज्यादा उचित यही होगा कि लोग शादी से पहले के करार या तलाक की शर्तें स्पष्ट करने वाले समझौते को बुरा मानने से बाज आएं।

बच्चों की परवरिश के लिए अगर पति-पत्नी शादी टूटने के बाद वाली स्थितियों या शादी को ही बचाने के लिए कोई समझौता करते हैं, तो इससे वे ज्यादा जिम्मेदार साबित होते हैं। ऐसी जिम्मेदारी को विदेशी या पाश्चात्य सभ्यता का असर कहने से बचना चाहिए और इसे वक्त की जरूरत या व्यावहारिकता का तकाजा मानना चाहिए। साफ है कि तलाक और इस संबंध में शादी से पहले किया गया करार महिलाओं की दुर्दशा पर अंकुश लगाएगा, पर कुछ चीजें अब भी इसमें बाधक बन सकती हैं। असल में, विवाह हमारे देश में धार्मिक कानूनों के अधीन आता है। यानी हर मजहब में शादी के अलग-अलग कायदे-कानून हैं। दूसरी बड़ी बाधा इसमें यह है कि भारतीय करार कानून (इंडियन कान्ट्रैक्ट एक्ट) में शादी को समझौता नहीं माना गया है। यानी अगर करार के आधार पर की गई शादी स्वत: रद्द मानी जाती है और उसके लिए करार कानून में कोई प्रावधान नहीं है। स्पष्ट है कि इसके लिए पहले कानूनी बदलाव करने होंगे। साथ ही, समाज की मानसकिता में तब्दीली लानी होगी। यूरोपीय समाजों जैसे कानून अगर ठस मानसिकता वाले समाज में लागू किए जाएंगे, तो लोग ऐसे बदलावों को लेकर चकित और दुखी होने वाली प्रतिक्रिया देंगे और ऐसे कानूनी प्रावधानों को वैवाहिक रिश्तों में एक नई जटिलता ठहराने का प्रयास करेंगे।

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