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समाज : सफाई और परंपरा

स्थिति बिगड़ी है तब वृक्षारोपण की याद आने लगी है। वृक्षारोपण या पौधारोपण के नाम पर करोड़ों रुपए बर्बाद होते हैं।

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स्वच्छता का स्वास्थ्य के लिए कितना महत्त्व है, इसकी झलक यूनीसेफ की एक रिपोर्ट से मिलती है। इसमें कहा गया है कि शौच के बाद केवल और केवल सही तरीके से हाथ धोने से अतिसार (डायरिया) का खतरा चालीस फीसद कम हो जाता है। यही नहीं, श्वास संबंधी बीमारी में तीस फीसद, बच्चा पैदा होते समय डॉक्टर और नर्स अपने हाथों को अच्छी तरह से साफ कर लें तो शिशु मृत्यु दर में उन्नीस फीसद फीसद कमी हो जाती है। चारों तरफ नई-नई तरह की गंदगी, पर्यावरणीय समस्याएं, जलवायु परिवर्तन के चलते रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित हो रही है। पिछले दिनों इंग्लैंड में हाथ धोने की जागृति अभियान चलाकर दस हजार लोगों की जिंदगी को बचाया गया है। यह केवल इंग्लैंड की स्थिति नहीं है। सारी दुनिया में इस तरह का अभियान चले तो कल्पना की जा सकती है कि लाखों लोगों को बीमारियों के चंगुल से बचाया जा सकता है।

जाहिर है कि अतिसार, श्वांस, एलर्जी आदि बीमारियां केवल हाथ न धोने या शरीर की सही तरीके से सफाई न करने की वजह से फैलती हैं। यही कारण है कि हमारी परंपरा में इसे धार्मिकता से जोड़ दिया गया था, जिसे हम आज आधुनिकता के नाम पर नकारने लगे हैं। दरअसल हमारे यहां जीवन पद्धति को धार्मिक जामा पहनाने की परंपरा रही है। एक समय था जब जीवन शैली, पर्यावरण या सामाजिक व्यवस्था के लिए जरूरी बातों को आचार-विचार से जोड़ दिया गया। सूर्योदय के पहले उठना, सवेरे भ्रमण के दौरान ही नीम की टहनी या किसी अन्य मंजन से दांतों की सफाई, शौच के बाद हाथ धोना, कुल्ले करना, चौके में खाना खाना आदि हमारी आदतों का हिस्सा था। आजकल लोग इसे अंधविश्वास से जोड़ देते हैं।

आज हम पर्यावरण की इतनी बातें करते हैं। स्थिति बिगड़ी है तब वृक्षारोपण की याद आने लगी है। वृक्षारोपण या पौधारोपण के नाम पर करोड़ों रुपए बर्बाद होते हैं। पक्षियों को बचाने की बात हो रही है। परंपरागत जलाशयों के पुनरुद्धार पर पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। हमारे पुरासाहित्य में इन सबको धार्मिक ताने-बाने में, सामाजिक सरोकारों में इस तरह से पिरोया गया कि कभी प्रकृति में विकृति की बात हो ही नहीं सकती। नदी नालों, पशुपक्षियों को रिश्ते का दर्जा दे दिया गया। गंगा-यमुना आदि नदियों को भी मां कहकर पुकारा गया। जल की पूजा होती है। पेड़-पौधों, नदी नालों में, पशुपक्षियों में देवता का रूप देखा गया है। गाय मां है तो घर में तुलसी का देवरा अपना स्थान बनाए हुए हैं। पीपल पूर्णिमा, आंवला नवमी, बड़ अमावस्या या इसी तरह के अन्य दिवस प्रकृति के संरक्षण के संदेश देते हैं। फलदार और छायादार वृक्ष लगाने का संदेश शास़्त्रों ने दिया है। भूखे को खाना, प्यासे को पानी हमारी परंपरा रही है। पक्षियों को चुग्गा डालकर कुपित गृह से रक्षा की बात की गई है। गर्मियों में पक्षियों की प्यास बुझाने के लिए छतों पर पानी रखना आदि पुरानी व्यवस्था रही है।

इन सबके पीछे परोपकार और मानव कल्याण छिपा है। जिसे आधुनिकता के नाम पर हमने नकारना शुरू कर दिया है। एक समय था जब बच्चों को ‘आंख में अंजन- दांत में मंजन नित कर नित कर’ का संदेश दिया जाता था। सुबह उठते ही कुल्ले करने और बासी मुंह से कुछ भी नहीं खाने-पीने को कहा जाता था। लघु शंका के बाद भी हाथ धोने, कुछ भी खाने पीने से पहले अच्छी तरह हाथ धोने आदि को आचार में ढाल दिया गया था।

इसे कुछ तथाकथित जानकार लोगों ने दकियानूसीपन से जोड़ दिया। लेकिन इसका वैज्ञानिक महत्त्व अब लोगों की समझ में आ रहा है। ब्रिटिश जनरल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार हाथ धोने के अभियान के सकारात्मक परिणाम निकले हैं। वहां अस्पताल के प्रत्येक कर्मचारी को मरीज को छूने से पहले, छूने के बाद, खाना या नाश्ता करने के पहले व बाद में, शौच से आने से बाद साबुन से अनिवार्यरूप से हाथ धोने पर जोर दिया गया है। इससे संक्रमण से होने वाली बीमारियों में कमी आई है, मौतों पर प्रभावी अंकुश लगा है। यह बड़ी उपलब्धि है।

दरअसल हमें नई सोच के नाम पर पुराने को पूरी तरह नहीं नकारना चाहिए। पुराने का विरोध हमारी आदत नहीं बननी चाहिए, बल्कि गुण-दोष के आधार पर उसे छोड़ना और अपनाना चाहिए। नए से लगाव तो हो पर पुराने को एकदम पुरातन के नाम पर नकारना सही नहीं कहा जा सकता। पुराने संस्कारों, आचार-विचार में भी कोई सही बात छिपी हो सकती है। शौच के बाद जिस तरह से मिट्टी या साबुन से हाथ धोने को पोंगापंथी कह कर नकारा गया, आज उसके महत्त्व को सारी दुनिया समझ रही है। इसलिए हमें अपनी सोच को बदलनी होगी। जांच परख कर ही पुराने को नकारना होगा। यह एक शुभ संकेत है कि शरीर की शुद्धता खासतौर से हाथों की सफाई के प्रति जिस तरह से सजगता आई है उससे संक्रामक बीमारियों से लड़ने में सहायता मिली है। वह भी केवल अपनी सजगता से।

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