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रविवारीः आभासी दुनिया में खुलते पंख

सूचना तकनीक के रूप में सोशल मीडिया के युवाओं पर पड़ रहे दुष्प्रभावों को लेकर दुनिया भर में अध्ययन हुए हैं। इसके बरक्स हकीकत यह भी है कि यूट्यूब जैसे माध्यमों ने अनेक युवाओं को अपनी प्रतिभा साबित करने और पहचान बनाने का मौका दिया है। यह रोजगार के एक नए माध्यम के रूप में भी विकसित हुआ है। अनेक लोग इसके जरिए अच्छी-खासी कमाई कर रहे हैं। यूट्यूब जैसे माध्यमों ने किस तरह युवाओं को पंख दिए हैं, बता रहे हैं राजकुमार।

Author September 16, 2018 5:41 AM
यूट्यूब ने युवा प्रतिभाओं को खिलने का एक अवसर और विश्व मंच दिया। जिनके लिए बड़े मंच के रास्ते बंद थे या वहां लंबी कतार थी, वहां यूट्यूब ने उन्हें झटके में ही जगह दे दी।

राजकुमार

इक्कीसवीं सदी में इंटरनेट और सोशल मीडिया, अभिव्यक्ति के एक माध्यम के रूप में विस्फोट की तरह प्रकट हुआ। यह अखबार, रेडियो, फिल्म और टीवी से कहीं अधिक ताकतवर और विशालकाय और उलझे हुए माध्यम के रूप में सामने आया। सबसे पहले इसने माध्यमों के अधिनायकत्व को ध्वस्त कर दिया। एकरेखीय सूचना, ज्ञान, मनोरंजन और अवसर के पैमानों, उसके निर्धारित, पूर्वनिर्धारित संहिताओं और स्थापित मानदंडों को उलट कर रख दिया। निहायत असंगठित, लोकतांत्रिक और चलताऊ जैसे कई विशेषणों को समेटे हुए, निजी दुनिया को भी सार्वजनिक करता हुआ बेडरूम तक घुस गया। गली, चौराहे, नुक्कड़ से लेकर राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-सार्वजनिक दुनिया की रचनात्मकता, कृत्रिमता-अकृत्रिमता, रंग-बदरंग सबको मुठ्ठी में समेट लाया। इससे न सिर्फ हमारी रचनात्मक और कल्पनात्मक दुनिया बदल गई, बल्कि सोच के दायरे, तरीके, संरचना और जीवनशैली में परिवर्तन उपस्थित कर दिया।

चीजों को देखने, पढ़ने और सुनने के हमारे तरीके और ढंग में बदलाव आ गया। हमारी वैचारिक, कलात्मक, सांस्कृतिक और तकनीकी दुनिया समृद्ध हुई। व्यक्ति और नागरिक की अभिव्यक्ति को एक नई आजादी और अवकाश मिला। आंतरिक कसमसाहट, रचनात्मक कुलबुलाहट को अभिव्यक्त हो जाने का अवसर मिला। सोशल साइटों में यूट्यूब की उपस्थिति दमदार है। यूट्यूब दुनिया की सर्वाधिक लोकप्रिय सर्च इंजन में से दूसरे नंबर पर है। यह एक ऐसी खिड़की है, जहां से दुनिया की गतिविधियों में प्रवेश किया जा सकता है और अपनी बनाई दुनिया में लोगों को आमंत्रित किया जा सकता है। यानी अब आप किसी स्टेडियम के दर्शक दीर्घा में बैठे दर्शक-श्रोता भर नहीं हैं, बल्कि मन करे तो सीधे मैदान में उतर सकते हैं। यही कारण है कि दुनिया भर के युवा अपने अनुभव, विचार, दृष्टि, तकनीकी-रचनात्मक-कलात्मक कौशल के साथ यूट्यूब पर शिफ्ट होने लगे हैं। उन्हें इंफोंटमेंट का खजाना भी मिल रहा और अवसर भी।

मनोरंजन भी रोजगार भी

दुनिया भर में यूट्यूब की बढ़ती लोकप्रियता पर नजर डालें तो एक बात बहुत साफ दिखती है कि यह युवाओं के लिए रोजगार के बड़े अवसर भी उपलब्ध करा रहा है। सूचना, ज्ञान और मनोरंजन की दुनिया के नए खिलाड़ी के लिए एक आकाश खुला है, वहीं पुराने खिलाड़ियों को भी अपने को बदल कर आने का मौका मिला है। इंटरनेट, सेटेलाइट और स्मार्ट फोन की दुनिया में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, घमासान ने बाजार में इन्हें सस्ता कर दिया। मध्यवर्ग के बड़े हिस्से तक इसकी पहुंच बन गई। इस कारण लोग यूट्यूब तक पहुंचने लगे।

भारतीय संदर्भ में यूट्यूब का विस्तार एक परिघटना की तरह है। यूट्यूब इंडिया के ‘कंटेट क्रिएशन’ प्रमुख सत्य राघवन की मानें तो ‘द वायरल फीवर’ (टीवीएफ) और ‘ऑल इंडिया बकचोद’ (एआईबी) ने भी उत्प्रेरक का काम किया। इन वीडियो ने दर्शकों को अपनी ओर खींचा और रुकने के लिए बाध्य किया। उपभोक्ता के इंटरनेट सर्फिंग की क्षमता को बढ़ाया, साथ ही कनेक्शन, स्मार्ट फोन बाजार को भी गति दी। बाजार के विस्तार में इसकी भूमिका असंदिग्ध है। तीन वर्ष पूर्व हर महीने चार लाख से ज्यादा वीडियो अपलोड होने लगे, एक करोड़ से अधिक सब्स्क्राइब होने लगे। महीने में एक औसत भारतीय लगभग आठ घंटे यूट्यूब पर अपना वक्त बिताने लगा और तकरीबन अस्सी वीडियो तक देखने लगा। नतीजन, यूटयूब बाजार ने अपना रोल मॉडल खुद विकसित कर लिया। नए युवा इससे जुड़ कर अपनी प्रतिभा को निखारने और बिखेरने लगे। इससे मुख्यधारा मनोरंजन की दुनिया फिल्म, टीवी और क्रिकेट से अलग वैकल्पिक या वर्चुअल दुनिया के ‘स्टार’ और ‘फैन’ बनाने लगे।

आर्थिक मसलों से जुड़े एक अखबार ने यूट्यूब फैन क्लब के संदर्भ में लिखा कि वर्चुअल दुनिया ने अपने फैन क्लब खुद बना लिया। वालीवुड के प्रशंसक के समांतर वर्चुअल दुनिया के स्वतंत्र फैन बनने लगे। ‘यूट्यूब फैन फेस्ट’ में सिने आइकन शाहरुख खान मंच पर आसीन थे। शमां बंधा था। अचानक तेज शोर, सीटियां और तालियों ने स्टेज पर लिली सिंह का जोरदार स्वागत किया। एक नए इतिहास को बनते हुए शाहरुख खान और लोगों ने महसूस किया। बांद्रा के एंफीथिएटर में ‘लिली सिंह’ के नाम की अनुगूंज ने नए इतिहास की बुनियाद रखी। प्रशंसकों की यह दुनिया वर्चुअल दुनिया ने निर्मित की थी। यह नए ‘आडियंस’ थे जो बेसब्री से लिली सिंह को अपने सामने चाहते थे। इन प्रशंसकों ने अपने नए आइकन वर्चुअल दुनिया से चुन लिया था। वहां बैठे उसके फैन उसके नाम का ‘प्लेकार्ड’ पहने हुए थे। यह किंग खान के लिए भी चौंकाने वाली बात थी।

फ्यूचर ब्रांड के सीईओ ने इस बात को नोटिस किया कि वर्चुअल दुनिया ने अपनी एक समांतर दुनिया बना ली है। ये सबके सब युवा डिजिटल दुनिया के निवासी हैं। उनका नया पता-ठिकाना डिजिटल दुनिया है। उन्होंने अपना नया आशियाना और सपने वहीं बसा लिए हैं। यूट्यूब की दुनिया में लिली सिंह की छवि सुपरवुमन की है। उनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि उनके वीडियो के पचासी लाख से अधिक सब्स्क्राइबर हैं। आमदनी एक करोड़ साठ लाख के आसपास है। दो अरब दर्शक हैं। सत्तर लाख फॉलोवर इंस्टाग्राम पर हैं। महज सात-आठ वर्षों में उन्होंने विश्व स्तर पर अपने को स्थापित किया। मनोरंजन और कला की दुनिया को प्रभावित किया। लेखक, कॉमेडियन, फिल्मकार, वीलॉगर (वीडियो ब्लॉगर) कई रूपों में उन्होंने अपनी पहचान बनाई। उदास और डिप्रेशन में रहने वाली और साधारण-सी दिखने वाली लड़की ने यूट्यूब से फिल्मों तक का सफर पूरा किया। ‘ए ट्रिप टू यूनिकॉर्न आइलैंड’ नाम से फीचर फिल्म पिछले वर्षों में बनाई। बॉलीवुड में भी उसके लिए रास्ते खुल गए। फोर्ब्स की रैंकिंग के हिसाब से 2017 में सर्वाधिक कमाई करने वाली यूट्यूबर हैं। वीलॉगिंग की दुनिया को सर्वाधिक प्रभावित करने वाली सुपरवुमेन। भारतीय मूल की लिली भले कनाडा में बसी हैं, लेकिन उन्होंने वीलॉगिंग में पंजाबी संस्कृति, रोजमर्रा की जिंदगी और स्थिति को ही मनोरंजन या हास्य को विषय बनाया। ‘सुपरवुमनवीब्लॉग्स’ या ‘आईआईसुपरवुमनआईआई’ नाम से चैनल चलाती हैं।

पहचान बनाने के अवसर

यूट्यूब ने युवा प्रतिभाओं को खिलने का एक अवसर और विश्व मंच दिया। जिनके लिए बड़े मंच के रास्ते बंद थे या वहां लंबी कतार थी, वहां यूट्यूब ने उन्हें झटके में ही जगह दे दी। वे लोगों के बीच उपस्थित हो गए या लोगों में लोकप्रिय हो गए। दुनिया के कई हिस्सों या भारतीय समाज में आज भी रूढ़िवादिता या दकियानूसी मौजूद है। सामंती मानसिकता और पिछड़ेपन के शिकार होने के कारण परिवार या समाज युवाओं, खासकर लड़कियों, को आगे आने से रोकता है। लेकिन यूट्यूब ने बंद समाज और परिवार में भी लड़कियों के लिए अवसर बना है। इस बात को बहुत ताकतवर तरीके से बड़े पर्दे पर आमिर खान ने ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ के माध्यम से दिखाया। फिल्म के लेखक-निर्देशक अद्वैत चंदन ने लोगों के संपर्क में पाया कि एक दूध बेचने वाले का छोटा बच्चा यूट्यूब में वीडियो देख कर गोल्फ खेलना सीखने और चैंपियन बनने का ख्बाब देख रहा है। इंटरनेट उनके सपने का सहयात्री बन गया है। इन सपनों को पालने और उसे मूर्त रूप देने का माध्यम बन गया है।

यूट्यूब ने न सिर्फ सपने देखना सिखाया, बल्कि यह विश्वास और भरोसा जगाया कि अगर आपके पास प्रतिभा है, कुछ कर गुजरने की तमन्ना है तो उसके लिए यह उचित प्लेटफॉर्म है। आप अपने सपने को आकार दे सकते हैं। अद्वैत ने इन चीजों से सबक लेते हुए फिर समाज की एक दो घटनाओं से प्रभावित होकर उस सच को फिल्मी शिल्प में प्रस्तुत किया। अब भारतीय दर्शक या श्रोता टीवी से चिपके रहना पसंद नहीं करते। वे अपने पसंदीदा कार्यक्रम का इंतजार नहीं कर रहे या निर्धारित समयानुसार टीवी को घेर कर नहीं बैठते। वे आॅनलाइन कंटेंट की दुनिया में धंस गए हैं। उनकी ऊंगलियां मोबाइल के बटन पर थिरक रही है।

यूट्यूब सिर्फ वीडियो अपलोडिंग और शेयरिंग का नहीं, बल्कि कमाई का जरिया बना है। सांस्कृतिक-सामाजिक गतिविधियों से आगे एक आर्थिक प्रत्यय भी बना है। कई युवा यूट्यूबरों (वीडियो ब्लॉगर्स/ वीलॉगिंग) ने अपने जीवन को इसी माध्यम से संवारा। उनकी पहचान बनाने में इस माध्यम की बड़ी भूमिका है, वहीं उनकी आजीविका का साधन भी यही माध्यम बना। यह ‘वीडियो कंटेंट मेकर्स’ के रचनात्मकता के लिए शानदार और बड़ा मंच साबित हो रहा है। अगर आप विदेशी चैनल में बेहतरीन काम देख या खोज पा रहे हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि भारतीय पीछे छूट गए हैं बल्कि वे समांतर रूप से प्रतिस्पर्धा में खड़े हैं।

‘आॅल इंडिया बकचोद’ (एआईबी) के तन्मय भट्ट भी अगुआ हैं। इकतीस वर्षीय तन्मय ने यूट्यूब की दुनिया में अपने स्टैंडअप कॉमेडी शो से तहलका मचा दिया। एक अंग्रेजी अखबार ने दस बेस्ट कॉमिक नामों में इन्हें शुमार किया है। सर्वाधिक कमाई करने वाले भारतीय यूट्यूबर में भी शामिल हैं। एक वीडियो से एक लाख से डेढ़ लाख तक कमाते हैं। फोर्ब्स इंडिया ने 2015 में ‘रिचेस्ट सेलेब्रेटी आॅव इंडिया’ की सूची बनाई, उसमें कमाई के मामले में अच्छी रैंकिंग इन्हें मिली। एआईबी की टीम राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक मसले को नए ढंग के हास्य में बदलता है। ऐसे अनेक लोग यूट्यूब पर अपना चैनल खोल कर हास्य कार्यक्रम, खानपान, भोजन पकाने की विधियां, गाने-बजाने, फिटनेस, साज-सिंगार आदि के कार्यक्रम पेश करते हैं।

मिसाल बने युवा

श्रद्धा शर्मा ने तो अपनी पहली वीडियो पंद्रह साल की उम्र में ही अपलोड किया और इस क्षेत्र में एक मुकाम बना लिया। उसके सबस्क्राइवर लाखों में हैं। कम उम्र में ही उसने ख्याति अर्जित कर ली। प्रभावशाली आवाज और प्रस्तुति और आकर्षक वीडियो और खूबसूरती के समन्वय ने उसे ऊंचाई दी। प्रचलित गीतों को वह उसी अंदाज में पेश करने के बजाय अपनी शैली और अंदाज में पेश करती है। वह एक ऐसे तरीके से आगे बढ़ी और लोगों के लिए उदाहरण बनी जहां कोई जज नहीं है, रियलिटी शो नहीं है, कोई निर्धारित मापदंड नहीं है, जिसमें किसी का हाथ पकड़ कर चलने जैसी कोई चीज नहीं है, जिसके पीछे कोई गॉडफादर नहीं है। बेडरूम में बैठ कर गिटार लेकर गाने लगी और उसकी गाने को लोगों ने पसंद किया। ‘रास्ते’ अलबम का रास्ता बेडरूम से निकला।
आशकीन महज पचीस वर्ष के हैं और पिछले तीन वर्षों में उनके पंद्रह लाख सब्स्क्राइबर हैं। इंजीनियरिंग करके अंधेरे में थे और उन्होंने ‘कंटेट क्रिएटर’ बनना पसंद किया।

सेजल कुमार फैशन और लाइफ स्टाइल वीडियो ब्लॉगर हैं। रजत शर्मा इंजीनियरिंग करने के बाद थिएटर में डिप्लोमा किया और फिर वीब्लॉगिग के क्षेत्र में आ गए। परिवार के बीच देखे जाने लायक वीडियो अपलोड किया और इसी सफर में आगे बढ़ गए। उनका मानना अभ्यास, मेहनत और धुन से ही आगे बढ़ा जा सकता है। लेकिन मौलिकता होना जरूरी है। अनिशा दीक्षित उर्फ रिक्शावाली के ग्यारह लाख खरीददार हैं। वे स्त्रियों के मुद्दे उठाती हैं और उसे कॉमिक रूप में पेश करती हैं। आशीष चंचलानी के छह लाख से अधिक खरीददार हैं। आशीष छात्रों युवाओं के लिए वीडियो शेयर करते हैं।

पंक कल्चर

आमतौर पर राइम्स, कॉमेडी, संगीत, डू इट योरसेल्फ (डीआईबाय विधा) और फूड आदि ही यूटयूबर्स के इंटरेस्ट के विषय हैं। इसने पंक कल्चर को जन्म दिया। मनोरंजन की दुनिया में पंक कल्चर एक नई अवधारणा और विधा ही बन गई, जिसमें तेज संगीत, साहित्य, गीत, रॉक, हिपहॉप, फैशन, विजुअल आर्ट सब एक जगह मिलकर एक हो गए। राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक प्रतिष्ठानों के खिलाफ एक विरोध और मतांतर के साथ अपनी विचारधारा आदि के माध्यम से अभिव्यक्त करना पंक कल्चर है। पंक कल्चर ने डीआईबाय को बढ़ावा दिया। इस संस्कृति ने हर व्यक्ति को आजादी दी कुछ नया और बेहतर करने का। अपने को सांस्कृतिक और आर्थिक दुनिया में पांव जमाने का।

इसके उभार ने मनोरंजन के मुख्यधारा के कंटेंट को प्रभावित किया। उनकी रुचियों के ट्रेंड को बाजार के खिलाड़ी पकड़ने लगे और अपनी फिल्मी गतिविधियों में बदलाव लाने लगे। शॉर्ट फिल्में इसलिए पसंद की जा रही हैं, क्योंकि लोग अपने घंटे, आधे घंटे, दस मिनट के खाली वक्त में मनोरंजन चाहने लगे। बस, ट्रेन, मेट्रो या कैब में बैठे रोज के मुसाफिर के मनोरंजन के लिए यही मुफीद है। संगम या शोले की तरह लंबी फिल्में देखने का वक्त धक्कामुक्की करते आते-जाते मुसाफिर के लिए संभव नहीं है। यही कारण है कि माइक्रो और शॉर्ट फिल्मों की लहर ही चल पड़ी है।

आभासी दुनिया के सितारे

वास्तविक दुनिया के सितारों और आभासी यानी वर्चुअल दुनिया के सितारों में अंतर है। सलमान खान, आमिर खान या शाहरुख खान का स्टारडम में दशकों की मेहनत है। स्टार से सुपरस्टार होने में उन्हें कई पड़ावों से होकर गुजरना पड़ा है। एक लंबा संघर्ष इनके साथ रहा है। वर्चुअल वर्ल्ड के फैन अलग हैं। यह उनके लाइक और डिसलाइक पर निर्भर करता है। लाइक के साथ ही यहां स्टारडम उठने लगता है। यह स्टारडम के लिए लगातार अपने प्रशंसकों के साथ चैटिंग चलती है। कमेंट के लिए जगह दी जाती और आग्रह किया जाता है। वीडियो कॉल किया जाता है। प्रश्नों के उत्तर दिए जाते हैं। एकरेखीय दिशा में सब कुछ घटित नहीं होता। जिसके पास इंटरनेट कनेक्शन है वह स्टार बन सकता है।

बाजार में प्रतिस्पर्द्धा

किसी वीडियो का बन जाना महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उसका ब्रांड बनना जरूरी है। ब्रांड वीडियो को वायरल करना आसान होता है या वे आसानी से वायरल होते हैं। इसके लिए जरूरी है कि वीडियो संप्रेषणीय हो, रुचिकर हो और प्रासंगिक भी हो। श्रोताओं या दर्शकों को आकर्षित करने की क्षमता भी हो। कुछ अध्ययन बताते हैं कि दर्शक एक्शन पसंद करते हैं, इसलिए एक्शन वीडियो ज्यादा बनते हैं। किताब पढ़ने की तुलना में लोग फिल्म देखना अधिक पसंद कर रहे हैं, इसलिए कंटेंट उसी आधार पर निर्धारित हो रहा है। नए वीडियो को बाजार में उतारना और सफल बनाना आसान काम नहीं है। इसके लिए बाजार की रणनीति को भी समझना पड़ता है और दर्शकों की पसंद को भी। तकनीकी ज्ञान और दक्षता भी जरूरी है। यह युवाओं के बड़े अवसर बने हैं लेकिन आसान भी नहीं हैं।

यूट्यूब ने भी स्पेस में नई भिड़ंत शुरू की। इसका नतीजा यह रहा कि उसने फिल्मकारों के सामने ‘सनडांस फिल्म फेस्टिवल’ में यह चैलेंज फेंका कि छह सेकेण्ड में अपनी रचनात्मक कौशल को दिखाए। मजेदार बात यह है कि लोगों ने छह सेकेण्ड में भी अपने तकनीक, कैमरा, दृष्टि, कला को उभारने में सफल रहे। ‘इनोवेटिव स्टोरी टेलिंग’ की कहानी यहां से भी आगे बढ़ी। ‘थिंक योर स्टोरी लाइक जोक’ की थियरी विकसित की गई। घटनाओं, दृश्यों को मुहावरे की शक्ल में प्रस्तुत करने की शैली विकसित हुई। इसके पीछे ऐसे लोगों को चुनना भी रहा होगा, जो कम समय में बेहतरीन विज्ञापन तैयार कर सकें। बाजार में बैठा पूंजीवादी दिमाग हमेशा अपने लाभ पर निगाहें गड़ाए रखता है। अपने मुनाफे के लिए बेहतर फिल्मकार, एजेंसी या कंटेंट सप्लायर ढूंढ़ना भी उसके लिए जरूरी है, ताकि वह अपने उत्पाद को शॉर्ट मूवी के बीच भी बेच सके। यही कारण है कि यहां दिखने वाले ज्यादातर विज्ञापन बेहद छोटे और छह सेकेंड के आसपास के होते हैं।

उत्तेजना और सनसनी

आभासी दुनिया ने अपने ‘स्पेस’ के भीतर एक अराजकता भी कायम की है। रचनात्मकता के अलावा कला, घटनाएं और सूचना के नाम पर भसड़ भी मचाई है। लोगों ने ऐसे-ऐसे वीडियो डाले, जिनका मकसद सनसनी फैलाना, सस्ती लोकप्रियता हासिल करना, युवाओं के कोमल भावनाओं को उत्तेजित कर गुदगुदी करना, यौन उत्तेजना जगाना भी है। प्रेम का काल्पनिक फरेब रच कर अपने बाजार भाव को चमकाना या आर्थिक लाभ हासिल करना भी है। यहां सब कुछ अच्छा ही अच्छा नहीं है, बल्कि कई मायनों में यह भटकाते भी हैं, गलत दिशा में उकसाते भी हैं और मन पर नकारात्मक प्रभाव भी डालते हैं। यह खुद ही नशे की लत की तरह किशोरों के मन छाने भी लगे हैं। सोशल मीडिया की लत के शिकार लोगों में चिड़चिड़ापन बढ़ने को देख रहे हैं। डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं।

अकेलापन और मानसिक अवसाद ग्रस्तता को महसूस कर रहे। वे वर्चुअल दुनिया में रहते हुए धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया से कटते जाते हैं। फिर अनुभव में एकांगीपना आता है। आपके मूड को प्रभावित करता है। अच्छे वीडियो मूड को फ्रेश करते हैं, तो खराब वीडियो तनाव भी देते हैं। झूठ परोसने का एक बड़ा बाजार ही खड़ा हो गया है। सत्ता के पक्ष में अजीबोगरीब तर्क गढ़े जा रहे हैं। उसे सही ठहराने के लिए इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। शारीरिक और मानसिक प्रभावों का अध्ययन किया गया है। व्यक्ति और समाज का भी अध्ययन किया गया है। सोशल मीडिया से हासिल अनुभव प्रामाणिक और जरूरी ही हो, बिल्कुल ऐसा नहीं है। अपने सामाजिक जीवन और व्यवहार से हासिल किया गया अनुभव कई मायनों में प्रभावशाली होता है। अगर सोशल मीडिया टेक्नीक सिखा सकता है, अनुभव तो अभ्यास से ही हासिल किया जा सकता है। तेंदुलकर, द्रविड़, धोनी, विराट कोहली की टेक्नीक उपलब्ध हैं, लेकिन उन्हें देख कर वैसा खिलाड़ी नहीं बना जा सकता। दृष्टि हासिल करना एक बात है, लेकिन उस कौशल का हासिल करना दूसरी बात। बगैर मैदान में उतरे, सामने की चुनौतियों को महसूस किए बगैर उस जैसा या उसकी छाया होना भी असंभव है।

 

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