social impact of the growing trend of life danger games on internet like 'Kiki Dance' - नकली जिंदगी, जानलेवा खेल - Jansatta
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नकली जिंदगी, जानलेवा खेल

पिछले कुछ सालों में इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से खेले जाने वाले खेलों का बाजार काफी बढ़ा है। इन खेलों में ऐसे भी होते हैं, जिनमें दी जाने वाली चुनौतियों में जान का जोखिम होता है। इन दिनों दुनिया के अनेक देशों में फैल चुके ‘किकी डांस चैलेंज’ नामक खेल भी ऐसा ही साबित हो रहा है। इसके चलते कई लोग गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं। ऐसे खेलों के मनोविज्ञान और समाज पर पड़ रहे प्रभाव के बारे में बता रही हैं मनीषा सिंह।

Author August 12, 2018 7:08 AM
अमेरिका, भारत, सऊदी अरब, तुर्की, मलेशिया और ब्रिटेन आदि मुल्कों में हाल में चलन में आए इस खेल के पीछे कनाडा के गायक (रैपर) के गाने ‘किकी डू यू लव मी’ के साथ दिए जाने वाली एक चुनौती है।

हमारी जिंदगी में खुशी लाना, प्रतियोगिता का भाव पैदा करना और सेहत की तरफ मोड़ना- ये उद्देश्य खेलों के बताए जाते हैं। पर मुश्किल तब होती है, जब चुनौती देने वाले कुछ खेल जानलेवा बन जाएं। खासकर ऐसे नकली, आभासी और क्षणिक उन्माद में हमें झोंकने वाले खेल, जो कहने को किसी चुनौती का हिस्सा होते हैं, लेकिन उनका असल मकसद बाजार साधना है। उनमें लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ ही किया जाता है। इन दिनों ऐसा ही एक खेल ‘किकी डांस चैलेंज’ देश-दुनिया में चल रहा है। इससे हादसे हो रहे हैं, जिन्हें देखते हुए अमेरिका से लेकर भारत तक में पुलिस ने चेतावनी जारी की है कि इस खेल का जोखिम लेने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

अमेरिका, भारत, सऊदी अरब, तुर्की, मलेशिया और ब्रिटेन आदि मुल्कों में हाल में चलन में आए इस खेल के पीछे कनाडा के गायक (रैपर) के गाने ‘किकी डू यू लव मी’ के साथ दिए जाने वाली एक चुनौती है। इसमें चुनौती लेने वाले को चलती कार की अगली सीट से उतर कर यह गाना गाते और इसकी धुन पर नाचते हुए चलना होता है। इसकी शुरुआत हाल में (30 जून को) तब हुई थी, जब एक कॉमेडियन शिगी ने गाने पर डांस करते हुए अपना एक वीडियो सोशल मीडिया पर डाला और उसके बाद अमेरिकी फुटबॉल खिलाड़ी ओडेल बेकहम जूनियर ने चलती कार से यही गीत गाते हुए निकल कर नाचा और उसका वीडियो डाला। कई अन्य मशहूर लोगों ने यही किया और देखते ही देखते यह चुनौती पूरी दुनिया में छा गई।

इस चुनौती का खतरा यह है कि इसमें हिस्सा लेते हुए कई लोग कार से उतरते वक्त गिर गए और बुरी तरह घायल हो गए। हालांकि लोगों को इन हादसों की भी खबर है, लेकिन न जाने चुनौती के नाम पर पेश किए जाने वाले खेलों का यह कैसा नशा है कि लोग कोई भी जोखिम लेने को तैयार हो जाते हैं। पिछले साल ऐसी ही कुछ चुनौतियां ‘ब्लू वेल गेम’ और ‘पोकेमॉन गो’ आदि खेलों के रूप में सामने आई थीं। हालांकि ऐसे खेलों का जादू कुछ समय में अपने आप उतर जाता है, लेकिन जब तक ये लोगों, खासकर युवाओं, महिलाओं और बच्चों के दिमाग में फितूर की तरह सवार रहते हैं, तब तक ये हमारी दुनिया और समाज का काफी नुकसान कर चुके होते हैं।

किसी चुनौती वाले खेल क्यों खतरनाक साबित होते हैं, इस पर देश के कई चिकित्सीय संस्थानों के वैज्ञानिकों ने मिल कर एक शोध किया है। इस शोध के निष्कर्ष के अनुसार अकेलेपन और नकारात्मक सोच रखने वाले बच्चे और युवा ब्लू वेल और किकी चैलेंज आदि के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। यह शोध इस बात का संकेत करता है कि हमारा समाज अब आभासी और वास्तविक दुनिया का अंतर भूल कर नकली या वर्चुअल खतरों में गर्क होने लगा है। यह असल में समाज में उपेक्षा और अकेलेपन की समस्याओं का नतीजा भी हैं। ‘ब्लू वेल’ के वक्त यह बात निकल कर सामने आई थी कि बच्चे इसकी जद में आकर इसलिए आत्महत्या जैसा कदम उठा रहे थे कि कहीं खेल का संचालक उनकी मां या किसी प्रियजन को कोई नुकसान न पहुंचा दे।

इंटरनेट या सोशल मीडिया के जरिए आत्महत्या से लेकर अजीबोगरीब हरकतों के लिए उकसाने वाले खेलों को आखिर कैसे रोका जाएगा- इस सवाल का सीधा जवाब तो नहीं मिलता है, हालांकि फौरी उपाय के तौर पर सरकारें और पुलिस पाबंदियां लगाने का काम अवश्य करने लगी हैं। मगर इंटरनेट के इस दौर में जब प्रतिबंधों के बावजूद अफवाहें तक नहीं रोकी जा पा रही हैं, तो सवाल है कि खुद में उलझा लेने वाले चुनौती या गेम को कोई कैसे रोक पाएगा! जानलेवा स्टंट करने या आत्महत्या को उकसाने वाले खेल हमारे देश के लिए विशेष चिंता का विषय बन गए हैं। इसका अहम कारण है कि भारत अब उन देशों में शीर्ष पर है, जहां इस तरह के खेल सबसे ज्यादा सर्च किए जा रहे हैं। स्पष्ट है कि अब वह वक्त आ गया है, जब सरकारों को ही नहीं, हमारे समाज को भी इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि आखिर बच्चों और किशोरों को इस किस्म की जानलेवा शै से कैसे बचाया जाए।

यह एक अहम सवाल है कि क्या कोई खेल किसी को जानलेवा हरकतें या आत्महत्या के लिए उकसा सकता है? विशेषज्ञ कहते हैं कि कोई गेम खेलते समय हमें आनंद की अनुभूति होती है, तो वह हमारे दिमाग में उसे बार-बार खेलने के लिए प्रेरित करता है। इस किस्म के ज्यादातर गेमों में या तो कोई बड़ी चुनौती होती है या उसमें कई स्तर होते हैं, जो आसान से मुश्किल होते चले जाते हैं। अलग-अलग स्तर पर जो चुनौतियां मिलती हैं, उनसे बच्चों और किशोरों में यह सनक या भावना पैदा होती है कि वे इससे भी मुश्किल काम करके दिखा सकते हैं। कड़ी चुनौतियां मिलते चले जाने पर बच्चे यह अंदाजा नहीं लगा पाते कि इससे उन्हें क्या नुकसान हो रहा है और उनका कितना समय नष्ट हो रहा है। हर गेम उन्हें जानलेवा गतिविधि करने या आत्महत्या के लिए नहीं उकसाता, लेकिन जब वे कोई गेम खेलते हुए आभासी दुनिया और असली दुनिया का फर्क भूल जाते हैं, तो खुद को या फिर दूसरों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

असल में, दुनिया में जब से अकेले खेले जाने वाले वीडियो और मोबाइल गेम आए हैं, युवाओं, बच्चों और किशोरों की दुनिया ही अलग हो गई है। ऐसे खेल उन्हें समाज में सबसे कट कर सपनों के संसार में विचरण करने को अहमियत देने लगे हैं, जहां उन्हें प्रत्यक्षत: कोई रोकता-टोकता नहीं है, लेकिन खेल-खेल में जानलेवा चीजों में उलझा लेता है। इस पर तेजी से बढ़ते स्मार्ट मोबाइल फोनों ने ऐसे गेम्स को खेलना काफी सुविधाजनक बना दिया है, जिससे आत्मघाती प्रवृत्तियों बढ़ी हैं। सबसे ज्यादा मुश्किल अभिभावकों के लिए पैदा हो गई है। अगर वे अपने बच्चों को मोबाइल-इंटरनेट आदि के इस्तेमाल से रोकते हैं, तो समस्या पैदा होती है कि कहीं वे आगे चलकर नई तकनीकों और अधुनातन जानकारियों से वंचित न रह जाएं। दिक्कत यह भी है कि छोटे बच्चों को डांट-पुचकार कर ऐसे गेम्स से दूर ले जाया जा सकता है, लेकिन किशोरों को इस तरह बहलाना आसान नहीं होता।

ज्यादा गंभीर बात यह है कि आजकल के शहरी समाज में एकल परिवारों के चलन और मां-बाप के पास बच्चों के लिए समय न होने की समस्या ने कोई ऐसा पुख्ता विकल्प नहीं छोड़ा है, जिससे बच्चे अपने मन-बहलाव का कोई सही रास्ता चुन सकें और उन्हें सही मार्गदर्शन मिल सके। अक्सर ऐसी स्थितियों में मां-बाप को जब तक अपने बच्चों के किकी चैलेंज या ब्लू वेल जैसे शिकंजों में फंसने की जानकारी मिलती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।

इन आभासी खेलों की खतरनाक कामयाबी के पीछे असल में हमारे समाज की विफलता और टूट जिम्मेदार है, जिसमें नाते-रिश्तेदारों, बड़े-बुजुर्गों और सच्चे पड़ोसियों-मित्रों की जगह इंटरनेट के जरिए प्रसारित होने वाले खौफनाक इरादों वाले खतरनाक खेलों और उनकी चुनौतियों ने ले ली है। समझना होगा कि इंटरनेट की बेहद बड़ी दुनिया पर भले अंकुश न लगाया जा सके, पर हमारा समाज अगर अपने भीतर परिवारों, मित्रों, पड़ोसियों के बीच जुड़ाव की छोटी कोशिशें शुरू करेगा, तो इंटरनेट के ऐसे खतरनाक जाल को काटना थोड़ा आसान हो जाएगा।

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