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नन्ही दुनियाः कहानी – लक्ष्मी के रूप

लक्ष्मी, जरा जल्दी जल्दी आ। ध्यान से चल, देख कहीं तेरे पैर में कोई कांटा न चुभ जाए।’ नन्ही लक्ष्मी मां की बातें सुनती-सुनती तेजी से उसके पीछे चली जा रही थी। वह पूरे जंगल को देख रही थी। घने जंगल में आम, नीबू, पीपल, अमलतास, कनेर वगैरह के न जाने कितने पेड़ खड़े थे। […]

Author June 3, 2018 6:59 AM
कई लोग लक्ष्मी से पूछते, ‘अम्मा, आप जंगल के बारे में इतना सब कुछ कैसे जानती हैं?’ इस पर वह मुस्करा कर कहती, ‘बेटा, अब तो जंगल मुझे अपनी संतान जैसा लगने लगा है।

लक्ष्मी, जरा जल्दी जल्दी आ। ध्यान से चल, देख कहीं तेरे पैर में कोई कांटा न चुभ जाए।’ नन्ही लक्ष्मी मां की बातें सुनती-सुनती तेजी से उसके पीछे चली जा रही थी। वह पूरे जंगल को देख रही थी। घने जंगल में आम, नीबू, पीपल, अमलतास, कनेर वगैरह के न जाने कितने पेड़ खड़े थे। नन्हे-नन्हे पौधे हवा के संग झूम रहे थे।

‘लक्ष्मी, यह जंगल है न, अद््भुत रहस्यों से भरा हुआ है। यहां मनुष्य की बीमारियों का तोड़ रहता है। बस जरूरत है तो उन पारखी आंखों की, जो इन कीमती पेड़-पौधों को पहचान सकें और उन्हें प्रेम का स्पर्श देकर दवाइयां बना सकें।’
‘मां, मुझे पेड़-पौधे बहुत पसंद हैं। अब तो मुझे भी यह जंगल बहुत अच्छा लगने लगा है। पर मुझे लगता है कि इन सबके बारे में अच्छी तरह से जानने के लिए पढ़ाई जरूरी है। मैं स्कूल जाऊंगी।’

लक्ष्मी की मां बोली, ‘बेटी, हम तो तिरुवनंतपुरम के कल्लार जंगलों में रहते हैं। यहां से स्कूल दस किलोमीटर है। इतनी दूर तू अकेले कैसे जाएगी?’

उस समय लक्ष्मी कुछ न बोली, पर उसने दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह स्कूल अवश्य जाएगी।

जड़ी-बूटियां लेकर आने के बाद मां उनसे औषधि बनाने में जुट गई, तो लक्ष्मी ने पिता से कहा, ‘पिताजी, आप हमारा स्कूल में नाम लिखा दीजिए।’ मां की तरह पिता भी अवाक होकर बोले, ‘बेटी, लड़कियां कहां स्कूल जाती हैं? यहां तो लड़के भी स्कूल नहीं जाते।’

‘न जाते हों, पर मैं जाऊंगी।’

लक्ष्मी की जिद के आगे किसी की न चली। आखिर पिता ने दस किलोमीटर दूर लक्ष्मी का नाम स्कूल में लिखवा दिया। उस समय स्कूल में केवल तीन विद्यार्थी थे। दो लड़के और तीसरी स्वयं लक्ष्मीकुट्टी। वह अपने जनजातीय समूह की पहली लड़की थी, जो स्कूल जा रही थी। लक्ष्मीकुट्टी को स्कूल में पढ़ना बहुत अच्छा लगता था। वह हर कक्षा में अव्वल आती रही। लेकिन वह केवल आठवीं कक्षा तक पढ़ पाई, क्योंकि आगे वहां कोई स्कूल नहीं था।

उसके बाद वह मां के साथ बैठ कर औषधियों का ज्ञान प्राप्त करने लगी। सोलह साल की आयु में लक्ष्मी का विवाह अपने बचपन के मित्र के साथ हो गया। उन्होंने लक्ष्मीकुट््टी का हर कदम पर साथ दिया।

लक्ष्मी सचमुच जीवट महिला थी। एक दिन बड़ा बेटा जंगल की ओर गया हुआ था। तभी एक जंगली हाथी चिंघाड़ता हुआ आया और उसने लक्ष्मीकुट्टी के बेटे को कुचल कर मार दिया। यह देख कर लक्ष्मीकुट्टी अपनी सुधबुध खो बैठी। बेटे से उसे बहुत आशाएं थीं। वह पढ़ाई का महत्त्व जानती थी, इसलिए वह उसे अच्छी शिक्षा भी दिला रही थी।

अभी वह बड़े बेटे के सदमे से उबर भी न पाई थी कि एक और दुर्घटना में छोटे बेटे की मृत्यु हो गई। कई बार लक्ष्मी स्वयं से पूछती, ‘यह सब क्या है? मैं जंगलों में विषैले पेड़-पौधों और भंयकर जीवों के बीच से भी जीवित निकल आती हूं और मेरे बच्चे असामयिक दुर्घटनाओं का शिकार होकर मुझे छोड़ कर चल बसे।

एक दिन वह बेहद उदास अपने बेटों को याद कर रही थी। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। यह देख कर पति ने कागज और कलम लक्ष्मी के सामने रखे। जब आंसू की बूंद कागज पर गिरी तो लक्ष्मी ने पति की आहट महसूस की। वे बोले, ‘लक्ष्मी, तुम्हारा जन्म अतीत की यादों में रोने के लिए नहीं, बल्कि इस समाज और देश को अपनी योग्यताओं से लाभान्वित करने के लिए हुआ है। तुम आज से जब भी उदास हो तो अपने विचारों को कागज पर उतार लिया करो।’

लक्ष्मी पति के निश्छल प्रेम को देख कर मुस्करा उठी और उस दिन से उसने कागज-कलम थाम लिया। फिर जल्दी ही उनका एक नया गुण कविताओं के रूप में सामने आया। उनकी कविताओं में आदिवासी संस्कृति की झलक नजर आने लगी। अब लक्ष्मी अपने क्षेत्र में प्रसिद्ध हो गई थी।

एक दिन एक युवक को जहरीले सांप ने काट लिया। उसे लक्ष्मी के पास लाया गया। लक्ष्मी ने जल्दी से औषधि तैयार की और युवक को लगा दिया। कुछ ही समय में युवक को होश आ गया और वह बिल्कुल भला-चंगा हो गया। यह देख कर सब लोगों ने लक्ष्मीकुट्टी को ‘वनमुतषी’ नाम दे दिया। मलयालम में वनमुतषी का अर्थ जंगल की बड़ी मां होता है। अब कोई भी जहरीला कीड़ा किसी को काट लेता, तो वह सीधा लक्ष्मी के पास आता। लक्ष्मी सबके जहर उतारती थी। अनेक संस्थाओं ने लक्ष्मी की औषधियों का परीक्षण किया और उन्हें श्रेष्ठ कोटि का पाया। लक्ष्मी अपनी याददाश्त के आधार पर लगभग पांच सौ दवाएं बना चुकी हैं। धीरे धीरे उनकी ख्याति पूरे देश में फैलती गई। 1995 में उन्हें राज्य सरकार ने ‘नट्ट वैद्य रत्न अवॉर्ड’ से सम्मानित किया। अब तो हर कोई लक्ष्मी की योग्यता का कायल हो गया था। पहले लक्ष्मी से रोगी केवल अपना इलाज कराने के लिए आते थे, लेकिन अब ऐसे लोगों की संख्या अधिक थी जो लक्ष्मी से मिलने के लिए आते थे, उनकी सराहना करते थे और उनके साथ फोटो के रूप में अमूल्य यादें ले जाते थे।

कई लोग लक्ष्मी से पूछते, ‘अम्मा, आप जंगल के बारे में इतना सब कुछ कैसे जानती हैं?’ इस पर वह मुस्करा कर कहती, ‘बेटा, अब तो जंगल मुझे अपनी संतान जैसा लगने लगा है। मैं उसके चप्पे-चप्पे से परिचित हो गई हूं। बचपन जंगल की छांव में ही गुजरा है। मुझे लोगों की दुख-तकलीफ दूर कर बहुत सुकून मिलता है। व्यक्ति व्यक्ति के काम आए यही मानवीयता है।’ यह सुन कर उससे मिलने वाला हर व्यक्ति द्रवित हो उठता और अपने मन में मानवीयता बीज बोने के लिए अम्मा से नए बीज लेकर जाता।
इस साल लक्ष्मीकुट्टी को पदम श्री से सम्मानित किया गया। इस सम्मान ने लक्ष्मीकुट्टी को केवल देश-विदेश में पहचान दिला दी। साधारण-सी दिखने वाली लक्ष्मीकुट्टी की असाधारण योग्यता ने उनके नाम को सार्थक कर दिया है। पचहत्तर साल की आयु में भी वे जोश और संकल्प के साथ समाज सेवा में लगी हुई हैं।

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