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कहानी: कल नहीं आता

उसके होने से आसपास की दुकानों पर सन्नाटा पसरा रहता है और उसकी ग्राहकी बदस्तूर जारी रहती है। पर कहते हैं, नौकर और शिष्य भरोसेमंद नहीं होते। शिष्य शिक्षा प्राप्त कर गुरु को त्याग देता है और नौकर पगार देख रंग बदल लेता है।

चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है

हेमंत कुमार पारीक

वह कहां से आई थी पता नहीं, पर उसकी भाषा से समझ आ गया था कि वह बंगाली है। पानी पीने की जगह पानी खाबो कह रही थी। माथा नंगा था। टंयू उस्ताद की साईकिल की दुकान पर देखा था उसे। टंयू उस्ताद पहले खुद साईकिल के पंक्चर सुधारता था, पर बाद में बीस रुपए दिन के हिसाब के एक लड़का रख लिया और खुद पैटीज बेचने लगा। दुकान चलने लगी। एक कोने में एक पुरानी फोटोकॉपी मशीन रख ली उसने। वह औरत अक्सर फोटो कॉपियर पर खड़ी मुस्कुराती दिखती। हर वक्त उसके ओठों पर एक मुस्कान खेलती रहती थी। कभी-कभी तो वह पूरी दुकान संभालती जब टंयू उस्ताद डेढ़ बजे की नमाज पढ़ने जाता और वह लड़का साथ में लाया टिफिन खाने दुकान की धड़ से लगे गुलमोहर के नीचे बैठ जाता। कभी-कभी अचानक ग्राहक आ जाते। कभी कोई पैटीज के लिए आता तो कभी ऑफिस का कोई कर्मचारी फोटोकॉपी के लिए खड़ा दिखता और कोई पंक्चर साईकिल लिए उस लड़के का इंतजार करता। उस वक्त उसकी फुर्ती देखते बनती। वह मुस्कुराते हुए पंक्चर में टिकली लगा कर पुराने पंप से हवा भरने लगती।

वहां से निकलने वाला कोई राहगीर उसे आश्चर्य में देखता, तो कोई-कोई व्यंग्य से मुस्कुराता और मुड़-मुड़ कर उसे देखता जाता। आसपास बैठे ठलुए उसके भरपूर बदन पर हमेशा नजरें गड़ाए रहते, पर उसे किसी की चिंता नहीं थी। बिंदास पंप चलाती दिखती और वे ठलुए पंप को लेकर उल्टे-सीधे फिकरे कसने से बाज नहीं आते। उसके कानों में भी उनके फिकरे पड़ते, पर वह ध्यान ही नहीं देती। लुटी-पिटी औरत के पास जवाब देने के लिए कुछ था ही नहीं। वह भी फोटोकॉपी के लिए वहां जाता था। आते-जाते उसे देखता। मांसल देह, रंग गोरा और आंखें बड़ी-बड़ी। वे ही उसके आकर्षण का विषय थे। इसीलिए लोगों की भीड़ उस दुकान पर लगी रहती थी। टंयू उस्ताद ने भांप लिया था कि जहां गुड़ होता है वहीं मक्खियां भिनभिनाती हंै, इसलिए वह ज्यादातर बाहर ही रहता। कभी हाट-बाजार निकल जाता तो कभी मस्जिद से सीधे अपने घर की तरफ चल देता। वह जान गया था कि उस दुकान की जान है वह।

उसके होने से आसपास की दुकानों पर सन्नाटा पसरा रहता है और उसकी ग्राहकी बदस्तूर जारी रहती है। पर कहते हैं, नौकर और शिष्य भरोसेमंद नहीं होते। शिष्य शिक्षा प्राप्त कर गुरु को त्याग देता है और नौकर पगार देख रंग बदल लेता है। कहीं ज्यादा मिलता है, तो मालिक को तुरंत छोड़ जाता है। टंयू पढ़ा-लिखा तो था नहीं, पर उसने दुनिया देखी थी। अनुभवी था। हाथ आए शिकार को पिंजरे में बंद करने की सोचता रहता। लोगों की उस पर पड़ती नजरों को हमेशा तौलता रहता। हरदम उस पर नजरें गड़ाए रहता। उसे चिंता लगी रहती कि कहीं किसी पड़ोसी दुकानदार ने उसे ऊंची पगार का लालच दिया तो उसकी दुकान का भट्टा बैठ जाएगा। इसी तुकतान में लगा रहता कि वह उसकी बनी रहे।

वह दिन में एक-दो बार फोटोकॉपी के लिए वहां जाता था। लेकिन पता नहीं क्यों कभी-कभी वह उससे फोटोकॉपी का पैसा ही नहीं लेती थी। पूछो तो हंसते हुए कहती, ‘बाबू फिर दे देना।’ उसकी इस दरियादिली का सबब वह कुछ-कुछ समझने लगा था। शायद उसके प्रति उसका आकर्षण ही था। इसी के चलते एक अदृश्य रिश्ता बंध गया था उससे। इसलिए ज्यादातर वह नमाज के वक्त ही उसकी दुकान पर जाता था जब टंयू मस्जिद गया होता और वह लड़का अपना टिफिन खोल कर दुकान की आड़ में गुलमोहर के नीचे खाना खाते दिखता था। एक दिन उसने उससे पूछ ही लिया, ‘कहां से आई हो?… आपका नाम क्या है?…’ वह हंसी, ‘चौबीस परगना से। मेरा नाम कामिनी है। शार्ट में कम्मो कह सकते हो।’ ‘कौन-कौन हैं आपके घर में?’

उसकी आंखों में आंसू आ गए। बोली, ‘एक बेटा और एक बेटी।’ ‘पर वहां से इतनी दूर?…’ ‘यही तो समझ नहीं आता कि मैं इतनी दूर कैसे चली आई? पति दंगे में मारा गया। यहां एक रिश्तेदार के पास ठहरी थी।’ ‘फिर?’ ‘फिर क्या! कोई यों ही किसी पर मेहरबान नहीं होता बाबू। पराई चीज सबको अच्छी लगती है। चाहे आदमी छोटा हो या बड़ा, स्वाद चखने के लए हरेक लालायित रहता है। इसी वास्ते चालें चलते हैं लोग। औरत का मन कोई नहीं टटोलता। उसे तो दस्ती समझता है आदमी। अब मुझे तो अपने बच्चे पालने हैं। समय किसने देखा है बाबू? पति तो गोद में बच्चे डाल कर चल दिए और इधर देखो, मैं कहां से कहां आ गई। बच्चों की खातिर यह सब कर रही हूं।…’ वह बोलती जा रही थी और बगल में टंयू आ खड़ा हुआ। कुछ-कुछ उसने सुन लिया था। दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बोला, ‘कितना बिका?’

वह जैसे कि नींद से जागी। हक्की-बक्की उसे देखने लगी थी। हड़बड़ाते हुए बोली, ‘देखती हूं गल्ले में। पहले इनकी फोटोकॉपी निकाल दूं।…’ वह कुछ बोला नहीं, पर उसकी नजरें बोल रही थीं। उसने उसे नीचे से ऊपर तक देखा। आस्तीन बाहों तक चढ़ा ली। मानो बिना बोले वह कह रहा हो दूर रहना भाई…। उसने उसकी भाव-भंगिमा समझ ली थी। टंयू अंदर आया। गल्ला खोल पैसे गिनने लगा। फिर बोला, ‘पैटीज कितनी बिकी?… समोसे कितने बिके?…’ एक बार उसने उसे उड़ती नजरों से देखा। मानो कह रही हो, वहां से चला जाए। वह इशारा समझ गया। फोटोकॉपी गिनी और टंयू उस्ताद की तरफ दस रुपए का नोट बढ़ाते हुए बोला, ‘दस कॉपी के दस रुपए!’ टंयू ने उससे दस का नोट लेकर गल्ले के डाला और जाते-जाते उसे घूर कर देखा।

उस दिन ऊपर आसमान से आग बरस रही थी। बाहर सड़क सुनसान थी। एक परिंदा भी नजर नहीं आ रहा था। ऑफिस में भी सन्नाटा पसरा था। लोग अपनी-अपनी जगह हैसियत के हिसाब से या तो एसी में बैठे थे या कूलर में। उस भीषण गरमी में मस्जिद की अजान उसके कानों में पड़ी। वह टेर थी नमाजियों के लिए। टंयू के जाने का वक्त था। वह निकल पड़ा था। मेन गेट पर खड़े गार्ड ने उसे देखा और हंसते हुए पूछ बैठा, ‘इतनी धूप में कहां जा रहे है बाबू जी? क्या नमाजी हो गए हैं? रोज अजान के बाद ही निकलते हंै टंयू उस्ताद की दुकान की तरफ।’ वह असहज हो गया। शायद उस गार्ड ने भी अंदाजा लगा लिया था। हालांकि आते-जाते हमेशा सेल्यूट मारता था। कभी उसने इस तरह जबान खोलने की गुस्ताखी नहीं की थी, पर उस दिन…। अहिस्ता-आहिस्ता आॅफिस के अंदर और बाहर सभी को समझ आने लगा था, पर मुंह खोलने की हिम्मत उसके अलावा और किसी ने नहीं की थी।

गार्ड के मुंह लगना ठीक नहीं समझा उसने। फिर भी आगे के लिए उसे नसीहत देते हुए बोला, अपने काम से काम रखा करो। किसी के फटे में टांग डालने की जरूरत नहीं है।’ ‘यश सर!’ उसने सेल्यूट मारी और अंदर जाकर स्टूल पर बैठ गया। वह तेजी से आगे बढ़ा। ऊपर के ताप से एक मिनट में ही पसीने से नहा गया था। तेज-तेज कदम बढ़ाता दुकान के करीब पहुंचा। इधर-उधर देखा उसने। हमेशा की तरह लड़का दुकान की आड़ में गुलमोहर के नीचे टिफिन खोले बैठा था। सामने साईकिल का पहिया खुला पड़ा था और औजार इधर-उधर बिखरे थे। वह एकदम सामने आ गया दुकान के। दुकान पर कोई नजर नहीं आया। पीछे दो बाई पांच के हिस्से में फोटोकॉपियर मशीन रखी थी, जो बाहर से नहीं दिखती थी। उसने इधर-उधर देखा। लडके से पूछा, ‘कम्मो जी कहां हंै?’ उसने इशारे से बताया कि अंदर है।

वह हठात अंदर की तरफ आया और देखा तो दंग रह गया। टंयू कमीज की बटन बंद करते हुए बाहर आ रहा था और कामिनी सिर झुकाए, बिखरे बाल, अस्त-व्यस्त खड़ी थी। चेहरे पर बेबसी और घृणा के भाव थे। उसकी तरफ मुखातिब होकर टंयू बोला, ‘शरीफ लोग बिना आवाज दिए अंदर नहीं आते जनाब!’ वह बोला, ‘मगर तुम तो नमाज को जाते हो इस वक्त?’ उसने कोई जवाब नहीं दिया। कुर्सी पर धम्म से बैठ गया बेहया कहीं का। शिकार अब पूरी तरह उसके जाल में फंस चुका था। इतने दिनों से इसी तुकतान में था। उसके चेहरे पर संतुष्टि का भाव था, पर कामिनी शर्म के मारे अंदर से बाहर नहीं आई। उसे वहां से खदेड़ने के लिहाज से टंयू बोला, ‘बाबू, मशीन खराब है। कहीं और से करा लो।’ वह क्या कहता? वापस लौट पड़ा। लौटते वक्त उस लड़के ने उसकी तरफ देखा और धीरे से मुस्कुरा दिया। उसकी मुस्कुराहट अजीब थी। मतलब उसे वह सब कुछ मालूम था।

अगले दो-तीन दिन तक वह उस तरफ नहीं गया था। फिर भी कामिनी को एक बार देखना चाहता था। इस लिहाज से दोपहर में स्कूटर लेकर बाहर निकला। कुछ कागज-पत्तर रख लिए थे साथ। एक बहाना भर था वह सब। सड़क पार कर एक नजर उधर डाली। सामने जेसीबी खड़ी दिखी उसे। दुकान खाली थी। आसपास की दुकानें भी उठ गई थीं। सरकारी आदेश के तहत वहां सड़क के चैड़ीकरण का काम होना था। स्कूटर रोक लिया उसने। भीड़ ही भीड़ लगी थी। सारे दुकानदार इकट्ठा हो गए थे। टंयू उस्ताद लीडरी कर रहा था। लंबी-चैड़ी दरख्वास्त हाथ में लिए बोल रहा था, र्इंट से र्इंट बजा देंगे।… आसपास की दुकान वाले भी उसके सुर में सुर मिला रहे थे। वहीं खड़ा निगम का अधिकारी मुस्करा रहा था। बोला, ‘तुम्हारे बाप की जमीन है! खाली जमीन दिखी और फैल गए।…’ एक कोने में खड़ी कामिनी के चेहरे पर उदासी छाई हुई थी। उसे देखते ही जैसे एक मिनट के लिए वह सब भूल गई। मुसकुरा दी। उसने भी उसकी मुस्कुराहट का जवाब मुस्कुरा कर दिया।

अधिकारी ने पुलिस बुला ली थी। एक दस्ता और आ गया था। टंयू का स्वर धीमा पड़ गया। दूसरे लोग पुलिस के हाथों में डंडे देख दांए-बांए होने लगे थे। दुकानदार उस अधिकारी के सामने नरम पड़ गए थे। हाथ जोड़ एक बुजुर्ग दुकानदार अधिकारी से गुहार कर रहा था, ‘बताइए अब हम कहां जाएं?… इस दुकान से हमारा परिवार चलता है।’ पुलिस देख अधिकारी भी ऐंठ गया। इसके पहले वह कुछ नहीं बोल रहा था। सिर्फ इतना कह रहा था, सरकारी आदेश है। लेकिन पुलिस देख बोलने लगा, ‘हमसे कुछ मत पूछो। सरकार के पास जाकर अर्जी लगाओ। ज्यादा हाय-तौबा की तो अंदर करवा दूंगा।’ वे दुकानदार गिड़गिड़ाने लगे। पर उसके कान पर जूं नहीं रेंगी। जेसीबी वाले को आदेश देने लगा, ‘चालू करो रे अपना काम!…’

टंयू का ध्यान उस तरफ ही था। वह सब भूल गया। कामिनी धीरे-धीरे से चलते हुए उसके पास आई, ‘बाबू अब क्या होगा?’…वह बोला, ‘धैर्य रखो कम्मो! एक दरवाजा बंद होता है तो ऊपर वाला दस खोल देता है।’ ‘पर अब दुकान नहीं रहेगी तो गुजारा कैसे चलेगा?’ वह बोला, ‘किसी से कुछ कहना मत। टंयू से भी नहीं। हमारे आॅफिस के बाहर खाली जगह है। साहब से बात करनी पड़ेगी। तुम वहां खुद अपनी दुकान खोल सकती हो। चाय बनाना, भजिए तलना और क्या? गुलामी की घी वाली रोटी से आजादी की सूखी रोटी में ज्यादा स्वाद होता है।’ वह कुछ सोचने लगी। फिर बोली, मगर अब यह मुझे नहीं छोड़ने वाला।’ ‘घर में औरत है फिर भी?…’ उसने जेसीबी पर एक नजर डाली, खंडहर होती दुकान को देखा और किन्हीं खयालों में खो गई। वह बोला, ‘तुमने जवाब नहीं दिया?’ ‘क्या जवाब दूं बाबू? उसके घर के पिछवाड़े एक कमरे में रहती हूं। कहां जाऊंगी?… तुम्हारे पास कोई जगह है?’ उसने उसके चेहरे को गौर से देखा। वह बोला, ‘कल बताऊंगा।’ इतना कह उसने एक नजर टंयू पर डाली और चलने को हुआ। तब तक उसकी पूरी दुकान जमींदोज हो चुकी थी।

टंयू और उसके साथी दुकानदार, सब मिलकर, मंत्री के बंगले की तरफ निकल गए थे। वहां केवल जेसीबी का शोर था। र्इंट-पत्थरों के गिरने की आवाज आ रही थी। इधर -उधर चारों तरफ खाकी वर्दी वाले डंडा घुमा रहे थे और वह अधिकारी शान से गाड़ी में बैठा चाय का लुफ्त ले रहा था। सूनी आंखों से कम्मो कभी उसे देखती, तो कभी उस दुकान को जो धीरे-धीरे मैदान में तब्दील हो रही थी। अगले कुछ दिनों तक सन्नाटा पसरा रहा वहां। एकाध बार वह इस तरफ गया जरूर, पर साफ मैदान देख वापस लौट आया। ऐसा लगा मानो पहले वहां कुछ था ही नहीं। बजरी बिछाई जा रही थी और वह गुलमोहर का पेड़ भी नजर नहीं आया, जो उसकी दुकान की धड़ से लगा था।

एक दिन अचानक दफ्तर से जब अपने घर की विपरीत दिशा में तालाब की तरफ निकल रहा था, उसे वह दिखी थी फुटपाथ पर पैटीज बेचती हुई। हालत देखने लायक नहीं थी। पुरानी गंदी-सी साड़ी में थी। पर जवान औरत की काया की अलग ही सुंदरता होती है। चेहरे पर चमक थी। आवाज में वही खनक थी। आवाज लगा रही थी- पैटीज, ताजा-ताजा!… वह उसकी तरफ मुड़ गया। फुटपाथ के नीचे स्कूटर खड़ा किया। उसे देखते ही कामिनी का चेहरा मानो खिल गया। अचानक ही उसके मुंह से निकला- ‘बाबू!’ बाबू सुन कर वह भी खिल गया था। उसकी आवाज में अब टंयू का भय नहीं था। वह अकेली थी। दोनों के बीच आकर्षण ऐसा हो रहा था मानो चुंबक के दो विपरीत धु्रव हों। पर मर्यादा बीच में आ गई। सार्वजनिक स्थान था।

सामने पुलिस चौकी थी। कुछ देर वे एक-दूसरे को एकटक देखते रहे, फिर वह बोला, ‘कैसी हो, और टंयू कहां है?’ ‘मरदूद, इधर-उधर कहीं धक्के खा रहा होगा। पर ऐसे मर्दों का क्या, कहीं न कहीं जगह ढूंढ़ ही लेते हैं। आजकल चौराहे पर मैकेनिक की दुकान पर काम करने लगा है।’ ‘और तुम अभी वहीं हो?’ ‘हां, कुछ दिनों के लिए। उसकी औरत झगड़ा करती है। सामान बाहर फेंकने की धमकी देती रहती है।’ ‘टंयू कुछ कहता नहीं?’ ‘क्या कहेगा? औरत के आगे भीगी बिल्ली बना रहता है। जब तक फायदे में थे तब तक मीठा बोलते थे दोनों और अब तो घर से निकलते वक्त मुआं नजर उठा कर भी नहीं देखता।’ ‘इसमें गुजारा हो जाएगा?’

उसने पैटीज की तरफ देखते हुए कहा। उसने भी व्यंग्यपूर्वक पैटीज की तरफ देखा। बोली, पास का कुछ बेच-बेच कर काम चला रही हूं। सिवाय उसके मेरे पास बचा ही क्या है? तुम्हें तो सब पता है।’ लंबी-चौड़ी सड़क की तरफ सरसरी निगाहें डालते हुए बोली, ‘अच्छा एक बात बताओ?’ ‘क्या?’ वह बोला। गले का थूक गटकते हुए वह बोली, ‘अपने पास रख लो मुझे। तुम्हारे घर के एक कोने में पड़ी रहूंगी। तुम्हारे घर को हरेक काम करूंगी?…’ अचानक दागे गए मिसाईलनुमा सवाल को सुनते ही वह हड़बड़ा गया। फिर बोला, ‘कल बताऊंगा।’ उसकी आवाज तल्ख हो गई। ‘कल कभी नहीं आता है बाबू। जो कुछ है आज में है।…’ वह मौन हो गया। पैटीज की तरफ देखा। उसके तने हुए चेहरे को देखा, फुटपाथ पर नजर डाली और स्कूटर की तरफ बढ़ गया।

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