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विचार बोध: सब्र, शबरी और भक्ति

शबरी ने कई वर्ष तक मतंग ऋषि की पिता के समान सेवा की। लेकिन एक दिन मतंग ऋषि के दुर्बल शरीर ने उनका साथ छोड़ दिया। पर मृत्यु से पहले मतंग ऋषि शबरी को यह आशीर्वाद देकर गए कि उन्हें एक दिन उनके राम के दर्शन जरूर होंगे।

पौराणिक कथाभगवान राम की अनन्य भक्त शबरी।

रोहित कुमार

भक्ति की भारतीय समझ और परंपरा में सिर्फ सर्वशक्तिमान ईश्वर के प्रति शरणागत होने की बात नहीं है। भक्त और भगवान को लेकर भक्त कवियों ने ऐसे वर्णन किए हैं कि वह लोक आस्था की एक नई निर्मिति बनकर उभरती है। यही वजह है कि भारत में भगवान के साथ-साथ भक्तों के भी असंख्य मंदिर हैं।

जिस रामकथा की सर्वाधिक लोक व्याप्ति भारत में है और आज भी जिसे काफी श्रद्धा के साथ सुना-पढ़ा जाता है, उसमें तो एक से एक भक्तों के वर्णन आए हैं। आलम यह है कि पशु-पक्षी से लेकर मल्लाह तक सभी प्रभु के भक्त हैं और सबके साथ भगवान राम का व्यवहार विशाल हृदय और प्रेम से भरा है। भक्त और भक्ति के बीच जो संबंध होता है वहां तर्क और ज्ञान निर्मूल होते हैं और जो सबसे अहम और प्रभावी होता है, वह निर्दोष संवेदना है, अटूट भरोसा और अपरिमित प्रेम है।

भगवान के भक्तों में जिस नाम को लेकर लोकमन में एक खास तरह की श्रद्धा है, वह है माता शबरी। उनके नाम पर भी देश में कई मंदिर हैं। हर साल फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को शबरी जयंती मनाई जाती है। मान्यता है कि भगवान राम की अनन्य उपासक शबरी ने अपने आराध्य को जूठे बेर खिलाए थे।

यह एक अनूठा प्रसंग है। इसलिए जिस किसी भी भक्त कवि ने इसका वर्णन किया उसने इस प्रसंग को भक्ति और विनय के एक अद्भुत उदाहरण की तरह पेश किया। यह प्रसंग रामायण, रामचरितमानस, सूरसागर और साकेत जैसे ग्रंथों में मिलता है।

शबरी को लेकर जो भी कथाएं या वर्णन हैं उसके मुताबिक वह भील जाति से ताल्लुक रखती थीं। इस जाति में शुभ कार्यों में पशुओं की बलि दी जाती थी। पर शबरी को यह हिंसा बचपन से पसंद नहीं आती थी और इसे लेकर उसके मन में कई तरह की दुविधाएं थीं, प्रश्न थे। अपनी इस दुविधा और प्रश्न से उबरने के लिए शबरी ने जो मार्ग चुना, वह रामभक्ति का मार्ग था।

बताते हैं कि शबरी बचपन से ही भगवान राम की भक्त थीं। सुबह-शाम वह अपने रामजी के लिए पूजा-पाठ और व्रत रखतीं। जब उनका विवाह तय हुआ तब बकरों और भैसों को बलि के लिए लाया गया। इन पशुओं की जान बचाने के लिए उन्होंने विवाह न करने का फैसला किया और घर से निकल गईं।

हिंसा को लेकर यह विरोध इसलिए मायने रखता है क्योंकि पशुओं के प्रति हिंसा को कई बार जंगली कहे जाने वाले जनजातीय समाज के लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बता दिया जाता है। जबकि यह सही नहीं है। प्रकृतिपुत्रों का यह समाज तो वन और जीवन का एक ऐसा साझा बुनने वाला समाज है, जहां सबके जीवन का मान है, सबके लिए स्थान है और सबके साथ एक समन्वयी रिश्ता भी है।

घर छोड़कर शबरी जब वन में यहां-वहां भटक रही थीं तो उन्हें रास्ते में एक आश्रम दिखा। उस आश्रम को देख शबरी ठिठक गईं। आश्रम के अंदर दाखिल होने को लेकर वो दुविधा की स्थिति में थीं। तभी वहां मतंग ऋषि आए और शबरी से उनका परियच पूछा। काफी सोच-विचार के बाद ऋषि ने शबरी को आश्रम में आने की अनुमति दी। कुछ ही दिनों में शबरी अपनी रामभक्तिऔर अच्छे व्यवहार से आश्रम में सबकी प्रिय बन गईं।

शबरी ने कई वर्ष तक मतंग ऋषि की पिता के समान सेवा की। लेकिन एक दिन मतंग ऋषि के दुर्बल शरीर ने उनका साथ छोड़ दिया। पर मृत्यु से पहले मतंग ऋषि शबरी को यह आशीर्वाद देकर गए कि उन्हें एक दिन उनके राम के दर्शन जरूर होंगे। कई साल बीत गए। शबरी हर दिन अपने आराध्य के लिए रास्ते पर फूल बिछाती और उनके भोग का इंतजाम करतीं। इस आस में कि भगवान राम जरूर उन्हें दर्शन देंगे।

आखिरकार वह दिन भी आ गया। भगवान राम माता सीता की खोज में मतंग ऋषि के आश्रम पहुंचे। एक ऋषि ने प्रभु राम को वहां बिठाया और शबरी को आवाज दी। उन्होंने आवाज लगाते हुए कहा कि तुम जिन भगवान का दिन-रात पूजन करती हो वह खुद आश्रम पधारे हैं- आओ और मन भरके अपने आराध्य की सेवा करो। भगवान राम को सामने पाकर शबरी उन्हें निहारती रहीं। कुछ देर बाद उन्हें स्मरण हुआ कि उन्होंने अपने भगवान को भोग नहीं लगाया।

वो जंगल जाकर कंद-मूल और बेर लेकर वापस आश्रम लौटीं। कंद-मूल तो उन्होंने प्रभु राम को दिए, लेकिन बेर खट्टे न हों इस डर से उन्हें देने का साहस नहीं कर पार्इं। अपने भगवान को मीठे बेर खिलाने के लिए शबरी ने उन्हें चखना शुरू किया। अच्छे और मीठे बेरों को वे प्रभु राम को देने लगीं और खट्टे बेरों को फेंकने लगीं। भगवान राम शबरी की इस भक्ति को देख मोहित हो गए लेकिन उनके अनुज लक्ष्मण यह देख अचंभित हुए कि भैया जूठे बेर खा रहे हैं।

इस पर भगवान राम ने लक्ष्मण को समझाया कि ये जूठे बेर शबरी की भक्ति हैं और इसमें उनका प्रेम है। तभी से शबरी और भगवान राम की यह कहानी ‘शबरी के बेर’ नाम से प्रसिद्ध हुई।

शबरी की यह कहानी भगवान और भक्त के संबंध को जिस प्रेम और समर्पण के निकष पर कसती है, वह हम सबके लिए एक बड़ी सीख है। भक्ति के संबंध में अलग से यह बात दोहराई भी गई है कि प्रेम अपने आप में संवेदना का सर्वोच्च है और इस शिखर तक पहुंचे मन को ईश्वर के प्रति भक्ति या समर्पण के लिए किसी और साधन की जरूरत नहीं होती।

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