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मूल्यांकनः बाल साहित्य का दायरा

बाल साहित्य वह माध्यम है, जिसके द्वारा किसी भी देश की और उसकी राह पूरी धरती की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा से बखूबी परिचित हुआ जा सकता है।

दुर्भाग्य से हमारे देश के बच्चों का एक बड़ा भाग आज भी बहुत उपेक्षित है। इसी प्रकार हिंदी जगत में बाल साहित्य का महत्त्व भी अभी बहुत उपेक्षित है।

दिविक रमेश

आज के रचनाकार को यह समझ आ गया है कि कविता, कहानी, नाटक आदि के रूप में रचना उसके लिए वक्तव्यों, निबंधों आदि की तरह ‘विषय’ नहीं होती, बल्कि अनुभव की कलात्मक अभिव्यक्ति होती है। मतलब यह कि सृजनात्मक रचना चाहे वह बड़ों की हो या बालकों की, विषयों मसलन राजा-रानी, परियों, भूतों, फूल-पत्तियों, त्योहारों, वैज्ञानिक उपकरणों, घटनाओं आदि पर नहीं होती, बल्कि उनके अनुभवों, कल्पना और दृष्टि के संयोग से उपजी सामग्री की कलात्मक अभिव्यक्ति होती है और इसीलिए मौलिक होती है। विषयवादी सोच के आलोचक या चिंतक अपनी-अपनी तरह की अतियों में फंस कर रह जाते हैं। समझने के लिए एक सवाल है कि क्या आजकल राजा-रानी या परियों आदि पहले से चले आ रहे तथाकथित विषयों पर नई सोच की मौलिक रचना नहीं लिखी जा सकती? लिखी जा सकती है। चुनौती यह है कि वे पुराने मूल्यों से ग्रसित न हों। हरिकृष्ण देवसरे ने लिखा है- ‘परीकथाएं सदियों से बच्चों का मन बहलाती रही हैं। नव बाल-साहित्य की रचना के सिलसिले में एक आवश्यकता यह भी अनुभव की गई कि बच्चों को झूठे कल्पना लोक से बचाने के लिए जरूरी है कि परीकथाओं के कथ्य को नए आयाम दिए जाएं।’ तो, बात नए आयाम देने की है, न कि परी की ही हत्या कर देने की।

सच तो यह है कि आज के बाल मनोविज्ञान का पारखी श्रेष्ठ बाल रचनाकार बच्चे के लिए न लिख कर, बच्चे का साहित्य रचता है। यानी बालक को वह मित्र समझता है, सो उसे उपदेश नहीं देता, बल्कि उनमें से एक होकर अपने को बांटता है। आयु में अधिक अनुभवी, दृष्टि संपन्न और ज्ञाता होने के कारण वह अपनी समझ साझा करने की दोस्ताना शैली अपनाता है। रचना निरा रूप नहीं होती। यानी कहानी, कविता, नाटक आदि को मात्र सांचा या ढांचा समझते हुए अगर आप किसी जानकारी को आरोपित करके प्रेषित करने की कोशिश करते हैं, तो उसे भले पाठ्य पुस्तकों की सी बालोपयोगी रचना कह लीजिए, लेकिन वह सृजनात्मक साहित्य की कोटि में नहीं ली जा सकती। कोई भी उसके महत्त्व से इंकार नहीं करेगा। समझना होगा कि किसी साबुन का विज्ञापन, रोचकता के लिए कविता के किसी भी रूप में पिरो दीजिए, उसे कविता तो नहीं ही कहा जाएगा। नहीं भूलना चाहिए कि कहानी कविता, नाटक आदि सृजनात्मक विधाओं की, रचना प्रक्रिया के धरातल पर, अपनी स्वायत्ता होती है। बड़ों के साहित्य और बाल साहित्य की रचना प्रक्रिया बुनियदी तौर पर एक ही होती है।

हिंदी में सीधे-सीधे विज्ञानपरक श्रेष्ठ रचनाएं (विशेष रूप से विज्ञान कथाएं) भी अनेक हैं। असल में आज के बाल साहित्यकार की दृष्टि अवश्य वैज्ञानिक होनी चाहिए। वैज्ञानिक दृष्टि रचना में आई कल्पना को भी अभिव्यक्ति के स्तर पर विश्वसनीयता का जामा पहनाने में समर्थ होती है। आज का बच्चा तार्किक है, लेकिन वह कल्पना की ऊंचाइयों पर उड़ना चाहता है- विश्वसनीयता की जमीन पर खड़ा रह कर। जब हम हिंदी और उसके साहित्य की बात करते हैं, तो उसके दायरे वे सब आते हैं, जो हिंदी जानते-बोलते और साहित्य का सृजन करते हैं- वे भले भारत की भूमि पर रहते हों या विश्व के किसी अन्य हिस्से में और वे चाहे भारतीय नागरिक हों या अन्य भागों की नागरिकता के। हिंदी में अनूदित उत्कृष्ट साहित्य भी हिंदी का ही अपना माना जाना चाहिए, क्योंकि वह हिंदी की प्रकृति में ढला होता है और हिंदी के जानकारों के लिए ही होता है।

भारतीय संस्कृति की अनुगूंजें या उसके समक्ष सोच या मूल्य-धारा भारत की सीमा के बाहर भी उपलब्ध हैं। भारतीय वसुधैवकुटुंबकम् की संकल्पना और पश्चिमी भूमंडलीकरण की संकल्पना में बुनियादी अंतर है। भूमंडलीकरण की आधारभूमि अंतत: अर्थ या अर्थ-संबंध है, जबकि वसुधैवकुटुंबकम् की आधारभूमि आत्मिक समतामूलक मानव-कल्याणकारी सोच है। दरअसल, भारतीय संस्कृति, जो एक जातीय पहचान के रूप में तमाम भारतीयों में वास करती है, मानवजाति की सामाजिक विरासत है, मनुष्य को मनुष्य से ही नहीं, ब्रह्मांड के शेष (पर्यावरण, प्राणी आदि) से भी जोड़ने का काम करती है। वह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें जीवन के प्रगतिशील प्रतिमान, व्यवहार-पद्धतियां, परंपराएं, विचार, सामाजिक मूल्य आदि शामिल हैं। हमें समझना होगा कि भारतीय संस्कृति कहीं के भी श्रेष्ठ को आत्मसात करने यानी अपना रंग देने की सामर्थ्य रखती है।

वह किसी से भी प्रभाव ग्रहण करने में विश्वास रखती है। हमारी हिंदी भाषा की भी यही प्रकृति है। आज बाहर से आए कितने ही शब्द हिंदी के अपने व्याकरण तक का अनुसरण करते हैं और इस रूप में कतई हिंदी के हैं। बाल साहित्य की भाषा पर इस दृष्टि से भी विचार किया जाना चाहिए। किसी अन्य भाषा का शब्द आते ही अपनी संस्कृति पर अन्य संस्कृति का हमेशा आक्रमण नहीं मान लेना चाहिए। सृजनात्मक साहित्य की एक वैश्विक संस्कृति भी होती है। सहज सृजनात्मक साहित्य (जो किन्हीं विशेष पूर्वाग्रहों, दबावों या अतिरिक्त उद्देश्यों से नहीं लिखा-लिखवाया गया होता) कभी मानव-विरोधी नहीं होता, वह मनुष्यता को बचाता ही नहीं, बल्कि उसे बेहतर बनाने को भी तत्पर रहता है। वह पृथ्वी के किसी भी हिस्से के मनुष्य से घृणा करने की सीख दे ही नहीं सकता। वह तो कमतर रह गए मनुष्य की साथीनुमा मदद करने को तत्पर रहता है। शायद इसीलिए हमारे मनीषियों ने भी सृजनात्मक साहित्य को सार्वभौमिक माना है। यों भी साहित्य की यात्रा निजता से सामाजिकता या बहुलता तथा अनेकता से एकता की ओर हुआ करती है। उसका रंगमंच अंतत: अपनी धरती से चल कर शेष धरती ही नहीं, पूरा ब्रह्मांड हुआ करता है।

दुर्भाग्य से हमारे देश के बच्चों का एक बड़ा भाग आज भी बहुत उपेक्षित है। इसी प्रकार हिंदी जगत में बाल साहित्य का महत्त्व भी अभी बहुत उपेक्षित है। बाल साहित्य वह माध्यम है, जिसके द्वारा किसी भी देश की और उसकी राह पूरी धरती की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा से बखूबी परिचित हुआ जा सकता है। हमारे यहां बहुत विमर्श हैं, लेकिन आज बालक विमर्श की सख्त जरूरत है।

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