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व्यंग्य : वह भी कोई बताने की बात है भला

अब पाठक ही बताएं कि आखिरकार इनमें से किसका चयन होगा? बता सकते हैं आप?

व्यंग्य : वह भी कोई बताने की बात है भला

इंटरव्यू चल रहा है। पोस्ट एक है, उम्मीदवार चार। इनमें से एक तो सिफारिशी था। दूसरा भी सिफारिशी ही है। वैसे, होने को वे चारों ही सिफारिशी हो सकते थे क्योंकि आजकल हर कोई सिफारिश का इंतजाम करके ही ऐसी जगह जाता है। पर संयोगवश यहां दो ही थे।… और बकाया दो ? उनमें से एक तो रिश्वत का जुगाड़ करके चला है।… अब बचा एक। उसका क्या?… उसका क्या बताएं साहब! मान लें कि वह तो बस था। यों ही खांमखां। न पैसा। न सिफारिश। न जान, न पहचान। बस, अपनी योग्यता के भरोसे यहां आ गया है और इस अजीब से भ्रम में है कि मात्र सबसे काबिल होने के बूते यहां उसका चयन हो जाएगा। बताइए! अब क्या कहें एैसे आदमी को! पर होते हैं। एैसे भी होते हैं। चमत्कारों पर विश्वास करने वाले ऐसे भोलों को समझदार लोग ‘वह’ भी कहते हैं जो इस रचना को समझदारों द्वारा अश्लील घोषित किए जाने के भय से हम कह नहीं पा रहे हैं।

अभी पहला उम्मीदवार ही अंदर गया है। यह जो अंदर गया है, बड़ा निश्चिंत टाइप दीख जरूर रहा था पर था अंदर ही अंदर तनिक चिंतित भी। सिफारिश वैसे तगड़ी है पर डर तो रहता है न, कि न चली तो? वैसे, चलेगी जरूर। उसकी बात सीधे ही इंटरव्यू बोर्ड के चेयरमैन से हो चुकी है। नहीं, नहीं, उसकी स्वयं नहीं बल्कि उसके पिताजी की। बल्कि, कहें तो पिताजी की भी डायरेक्टरली न होकर उनके जिगरी दोस्त की। जिगरी दोस्त की मुंहलगी दोस्ती इसी विभाग के मंत्री के पीए से है जो स्वयं मंत्रीजी का एैसा मुंहलगा है कि खुद मंत्रीजी के मुंह पर, उनके ही फोन पर, एकदम उनकी ही आवाज की हुबहू नकल करके दूसरी पार्टी से मंत्रीजी की तरफ से लेनदेन की खुली बात कर लेता है। मंत्रीजी का वरदहस्त है उस पर। उसी ने सिफारिशी फोन किया था। पिताजी के सामने ही। बल्कि कह लें कि पिताजी के जिगरी दोस्त के सामने ही। बता रहे थे कि स्पीकर आॅन करके बात की थी। उस तरफ से चेयरमैन घिघिया रहा था- ऐसा कह रहे थे पिताजी के दोस्त। चेयरमैन साहब यही कहते रहे कि कैंडीडेट से कहिएगा कि पॉजीटिव उत्तर दे, बस। अभी वही उम्मीदवार अंदर है। पॉजीटिव उत्तर ही दे रहा होगा। वैसे भी, उत्तर को पॉजीटिव मानना भी उनका ही काम है। अपुन तो दे देंगे, बस।… वह निश्चिंत है।

इसके बाद जो दूसरा उम्मीदवार अंदर जाने वाला है, उसे भी अपनी सिफारिश पर पूरा भरोसा है। परंतु साथ ही एक डर भी है। डर है कि मान लो, उसने सिफारिश न मानी तो? या मान लो कि कहीं कोई उससे भी तगड़ी सिफारिश पहुंच गई, तो? अपना यह भय उसने मामाजी के समक्ष भी प्रकट किया था। सिफारिश का इंतजाम मामाजी ने ही किया है। उसका डर सुनकर मामाजी ठठा कर हंसने लगे थे। बोले थे कि यार, अब तुमको हम क्या बताएं? जानते भी हो कि तुम्हारी सिफारिश जिस शख्स ने की है उसकी बात को नजरंदाज करने का गूदा साहब में नहीं है। ऐसी हिम्मत विष्ट साहब कर ही नहीं सकते। एक आंख दबाकर शरारतभरी मुस्कान के साथ, मामाजी ने पहले इशारों ही इशारों में और बाद में एकदम खुलकर यह बताया था कि सारा सिलेक्शन जिन विष्ट साहब को करना है, यह सिफारिश उनकी खास रखैल की समझ लो! विष्ट साहब जिस औरत के आगोश में दिनरात पड़े रहते हैं उसकी बात टालने का दुस्साहस, बेवकूफी या कमीनापन करने जितना कमीनापन विष्ट जैसे कमीने आदमी के बस की बात भी नहीं है। ‘तुम चिंता मत करो। विष्ट तुमको ही सिलेक्ट करेगा’- मामाजी ने आश्वस्त किया है। ‘उसका बाप भी करेगा’- मामाजी को पूरा विश्वास है। ‘आप कैसे जानते हो उस सिफारिश को?’, पूछने का मन तो हुआ था, लेकिन मामाजी से अभी ऐसा संवेदनशील प्रश्न पूछना नीतिगत गलत होता। फिर कभी पूछेंगे। …अपनी बारी की प्रतीक्षा करता हुआ दूसरा सिफारिशी यह सब सोच कर ही, बैठा बैठा, अनायास मुस्कुराने लगा है।

तीसरा उम्मीदवार कई इंटरव्यू में बैठ-बैठ कर इस नतीजे पर पहुंचा है कि इन मामलों में न तो किसी सिफारिश पर भरोसा किया जा सकता है, न पहुंच पर। डिग्री-फिग्री और अनुभव-फनुभव पर तो बिल्कुल नहीं। सब बेकार की बातें हैं। पहले, वह भी बड़ी- बड़ी सिफारिशों की जुगाड़ करके बैठ चुका है। ऐसे कई इंटरव्यू में। मंत्रीजी की। सीधे साहब के साले साहब की। सीधे उनके एकदम लंगोटिया यार की। एक बार तो सीधे सेलेक्शन बोर्ड के मुखिया की पत्नी तक पहुंच गई थी। बेटे से दोस्ती थी। बेटे ने मां से, मां ने मुखिया से कह भी दिया था। हुआ कुछ नहीं। टापते रह गए।

बाद में पता चला कि मुखिया तो सप्ताह में एक-दो बार, लगभग नियमित अंतराल पर पत्नी की ठुकाई करनेवाला शख्स था। सिफारिश की बात सुन कर, इसी बहाने एक और ठुकाई करते हुए पत्नी को फटकार दिया था होगा कि तुम्हारे लाड़ले के दोस्त को देखें या फिर उसे सेलेक्ट करें, जो हाथ में नकद कैश लेकर घूम रहा है?..तो धीरे धीरे उसे आत्मज्ञान प्राप्त हुआ कि ऐसे मामलों में कोई चीज अगर शर्तिया काम कर सकती है तो वह है पैसा। नोट लगेंगे। वही एक रास्ता है। इस इंटरव्यू के लिए वह यही इंतजाम करके आया है। कठिन काम था। रिश्वत देना भी कौन सा सरल काम है आजकल। पहले तो इस पोस्ट का क्या भाव चल रहा है, यह पता करो। फिर भटकते रहो कि वह कौन सा सही आदमी है, जिसे देना है। गलत को पकड़ा दिए तो पैसे भी डूबे, काम भी रह गया। फिर सही आदमी खुद सीधे रिश्वत लेगा या किसी के थ्रू ? रिश्वत लेने में पचास झंझटें। पर उसने दी। देकर ही यहां आया है। ‘साहब एडवांस में लेते हैं, पर काम सॉलिड करते हैं’-बताते हैं लोग। इस मामले में बड़ी प्रतिष्ठा सी है उनकी। उसी के भरोसे अभी निश्चिंत बैठा है वह। यहां वहां से पैसा उठाया है। पटा देगा। एक बार सेलेक्शन हो जाए, बस। कमाऊ पोस्ट है।
अब बचा चौथा।

अरे वही सटक मूरख जो मात्र योग्यता के बल पर चयन का सपना देखता यहां आकर बैठा हुआ है। उसे उम्मीद है कि उसका बायोडॉटा इतना तगड़ा है कि सेलेक्शन तो होगा ही। पूरी उम्मीद है उसे। वैसे उम्मीद बांधने में कोई बुराई भी नहीं। खूब बांधिए। कोई नहीं रोक सकता। अभी तक सरकार ने ऐसा कोई कानून भी संसद से पास नहीं कराया है कि मात्र योग्यता के बल पर नौकरी उम्मीद बांधने वाले शख्स को तीन माह की साधारण कैद या पांच हजार रुपए का जुर्माना, या फिर दोनों साथ देने होंगे। अभी तक तो वैसा कानून नहीं है। हो सकता है आ जाए। फिलहाल तो वह कानूनी दायरे में उम्मीद बांधे बैठा है यहां। यों कहें कि अभी तक बैठा था। वैसे, अभी नजर नहीं आ रहा। अभी कहां हो सकता है? शायद टॉयलेट में हो। जब से आया है, आधे समय टॉयलेट में ही रहा है। घबराहट में मानो पेशाब छूटी जा रही है। हाथ कांप रहे हैं। बार-बार जाते जाते, नंबर आने तक इतना पेशाब कर डालेगा कि निर्जलीकरण हो जाएगा।

चारों उम्मीदवारों में वही सबसे ज्यादा घबराया हुआ और भयभीत है, जिसके पास योग्यता सबसे ज्यादा है। तो मैंने पूरी स्थिति बयान कर दी, यहां। अब पाठक ही बताएं कि आखिरकार इनमें से किसका चयन होगा? बता सकते हैं आप? मैं बस उसका बता सकता हूं, जिसका एकदम पक्का है कि उसका तो चयन नहीं होगा। और उसका भी हम क्या पूछें। आप समझदार है। खूब जानते हैं। वह भी बताने वाली कोई बात है भला!

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