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व्यंग्य : सैर वार्ता

वे दो गधे दोस्त थे। दोनों अब जान-पहचान से आगे बढ़ कर दोस्त बन चुके थे। दिन भर लादी लादते। मालिक की चाकरी करते। शाम को थोड़ा आराम करने के बाद जब उनके मालिक उन्हें घास चरने के लिए खुला छोड़ देते

Author नई दिल्ली | January 24, 2016 6:25 AM
वे दो गधे दोस्त थे। दोनों अब जान-पहचान से आगे बढ़ कर दोस्त बन चुके थे। दिन भर लादी लादते। मालिक की चाकरी करते। शाम को थोड़ा आराम करने के बाद जब उनके मालिक उन्हें घास चरने के लिए खुला छोड़ देते

वे दो गधे दोस्त थे। दोनों अब जान-पहचान से आगे बढ़ कर दोस्त बन चुके थे। दिन भर लादी लादते। मालिक की चाकरी करते। शाम को थोड़ा आराम करने के बाद जब उनके मालिक उन्हें घास चरने के लिए खुला छोड़ देते तो वे अपने अपने जंजालों से पिंड छुड़ा कर घास भरे मैदानों की ओर सरपट भाग निकलते। इस तरह उनकी चराई भी हो जाती। सैर भी। कुछ देर आपस में बात-चीत कर लेने से उनका मन हल्का भी हो जाता था।

आज भी जब वे रोज की तरह मिले, तो पहले वाले ने दूसरे से पूछा-कैसे हो यार?
– ठीक ही हूं। दूसरे ने रोज की तरह मुंह लटका कर जवाब दिया।
– इसका मतलब तुम अब भी दुखी चल रहे हो।
– सब कुछ कर के देख लिया, पर मेरी जिंदगी में कोई बदलाव आ ही नहीं रहा। इस बीच ससुरे कितने घूरों के दिन बहुर गए, पर मेरी जिंदगी तो वैसी की वैसी ही पड़ी है।
– तो भाग क्यों नहीं जाते बहुत मालिक मिल जाएंगे। वैसे भी, आज कल बाजार में खटनेवालों की कमी चल रही है। मालिकों की नहीं।
– यार, भाग तो जाऊं। पर…अच्छा यह बताओ कि यह धरती किस चीज पर टिकी हुई है।
पहले वाला चौंका-क्या मतलब?
– बताओ?
– पता नहीं यार, पर इस मसले को लेकर बड़ा भ्रम है। कोई कहता है कि दुनिया गाय की सींग पर टिकी है। कोई कहता है कि कछुए की पीठ पर। कोई कहता है कि दुनिया शेषनाग के फन पर है। कुछ वैज्ञानिक टाइप के लोग कहते हैं कि दुनिया गुरुत्वाकर्षण बल पर टिकी है।
– यह तो किताबी बातें हैं…मेरा व्यावहारिक ज्ञान कहता है कि यह धरती केवल और केवल उम्मीद पर टिकी है। हर जीती-जागती चीज उम्मीद पर ही टिकी है। मैं भी टिका हूं। और सच-सच बताना, तुम भी तो किसी उम्मीद पर ही टिके हो। सब कुछ सहने के बावजूद।
– हां यार, बात तो तुम पते की कह रहे हो। उम्मीद है, तो जिंदगी है। लोग तो उम्मीद टूट जाने के बाद कभी कभी इतने निराश हो जाते हैं कि आत्महत्या तक कर लेते हैं।
– तो मैं जानबूझ कर इस मालिक की नौकरी नहीं छोड़ रहा। इस बात की क्या गारंटी कि नया मालिक इससे अच्छा ही होगा। न मारेगा, न पीटेगा, न ज्यादा लादी लादेगा और भर पेट खाना भी देगा। देखो नए लोगबाग कितनी उम्मीदों से तो सरकार बदलते हैं। बड़ी-बड़ी उम्मीदें लगा कर नई सरकार का स्वागत करते हैं। पर अगर वही नई सरकार जब पुरानी वाली की तरह या उससे भी ज्यादा खराब साबित होने लगती है तो कितना कष्ट होता है। फिर अगले पांच सालों तक रोने और आंसू पीने के अलावा कोई कुछ नहीं कर सकता।
– हा, यार, तुम बिल्कुल ठीक कह रहे हो। अपने अच्छे समय, अच्छे दिनों और दिन बहुरने की उम्मीद में लोगबाग कड़ुवी दवाइयां भी खा लेते है। जब उम्मीदें पूरी नहीं होती हैं तो दिल टूट जाता है। जैसे कि उस बंदे का टूट गया था।
– किस बंदे का..
– अरे उसी बंदे का, जिसने ईनाम की उम्मीद में जाड़े की पूरी रात ठंडे पानी में नंगे बदन खड़े हो कर गुजार दिया था। पर हुआ क्या बाद में बादााह सलामत ने उसे बेवकूफ तो बना ही दिया।
– अच्छा वह, लेकिन यार, बाद में बीरबल ने अपनी खिचड़ी वाले प्रयोग से बादशाह की आंखें खोल तो दी थीं। और तब बादशाह सलामत ने माफी मांगते हुए उस बंदे को घोषित किया हुआ ईनाम दे तो दिया था।
– हां, पर आज कल बीरबल जैसे लोग कहां हैं आजकल तो हर तरफ अंधभक्त, प्रवक्ता और प्रचारक भरे पड़े है। आजकल तर्कों से नहीं, कुतर्कों से समझाया जा रहा है।
– हैं यार, तर्क वाले लोग भी हैं। पर अभी वे सब नक्कारखाने में तूती की आवाज बने हुए हैं।
– खैर छोड़ो। तुमने क्या सोचा है, ऐसे ही चुपचाप मालिक के लात-डंडे खा कर दिन रात रोते रहोगे या कि जिंदगी बदलने के लिए कुछ करोगे भी।
– करूंगा। पर अभी नहीं। मैं अभी कुछ दिनों तक और इंतजार करूंगा।
– किस चीज का?
– खैर मेरी छोड़ो, अपनी सुनाओ।
– मैं तो सोच रहा हूं कि घोड़ा बन जाऊं।
– घोड़ा, पर वह कैसे ?
– सुना है कि सरकार बाहर से कोई ऐसी नकनीक आयात कर रही है जिससे घोड़ा बना जा सकता है।
-अरे वाह! यह तो बड़ा अच्छा है। चलो, फिर मैं भी कुछ दिन और इंतजार करता हूं। और अगर इस बीच मालिक ने अपनी कथनी को करनी में नहीं बदला तो फिर मैं भी तुम्हारे साथ चल कर घोड़ा बन जाऊंगा।

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