ताज़ा खबर
 

व्यंग्य- झपटमार को नमस्कार

ऐसा है बंधु! नेता और मुझमें कोई खास अंतर तो है नहीं। नाम का क्या है? आज है, कल नहीं है। असल चीज तो काम है। काम से मिलने वाला दाम है। जिसके पास दाम नहीं, वह बदनाम है। तो बात यह है कि हम दोनों के धंधे समान हैं। दोनों ही झपटने के मामले में अव्वल हैं।

Author January 22, 2017 12:12 AM

अभिषेक अवस्थी

गझपटमार को नमस्कार। मैंने अपने दोनों हाथों को नाक की सीध में लाकर, उनका योग कराया। झपटमार को नमस्कार किया। खुश होने के बजाय, वे बुरा मान गए। देश की पहचान यही है। लोग बुलेट ट्रेन की गति से बुरा मानते हैं। मेरे मुंह से नमस्कार शब्द रपट-सा गया। उन्होंने बिना किसी आव-ताव के मुझे डपट दिया। पटक भी सकते थे। मगर उनका एक उसूल है, ‘फील्ड-वर्क’ घर पर नहीं करते। नाराज होते हुए बोले, तुममें कुछ अक्ल-वक्ल है कि नहीं? झपटमारी मेरा पेशा है। यही मेरी जान है। शान है। पहचान है। सारी पढ़ाई-लिखाई बेकार है तुम्हारी। कुछ नहीं सीखा है तुमने अब तक। अरे, किसी नामी-गिरामी और पेशेवर आदमी को जब पुकारते हो, तो कम से कम नाम से पहले ‘श्री’ लगाया करो। नाम के बाद ‘जी’ लगाया करो।
मुझे अपराधबोध हुआ। काश नेताओं को भी इतनी ही जल्दी अपनी करनी और कथनी का बोध हो जाया करे। भारी गलती हुई मुझसे। शहर के भीषण नामी और परम झपटमार को मैंने सिर्फ झपटमार कहा। मैं बोला, ‘क्षमादान दीजिए। गलती हो गई। आप चाहें तो दंडस्वरूप मेरी जुबान ही खींच लीजिए। रुपया पैसा आदि तो आपके कर-कमलों द्वारा पूर्व मे खींचा ही जा चुका है। नेता के पीछे जी लगाया जाता है। लोग तो आतंकी को भी श्रीमान या साहब कहते हैं। श्रीमान फलां जी बड़े तबके के नेता हैं। कई लाशों की सीढ़ियों पर पांव रख कर ऊपर तक पहुंचे हैं। आज तो टुच्चे चोर को भी सब ‘जी’ कह कर ही पुकारते हैं। आपका नाम तो बहुत बड़ा है। न जाने मुझसे कैसे ऐसी हिमाकत हो गई। आगे से नहीं होगा। मैं आपको ससम्मान ही बुलाऊंगा। वे त्योरियां चढ़ाए मुझे घूरने में व्यस्त थे। मेरे हौसले पस्त न हों, इसलिए अंतत: बोल उठा, ‘श्रीमान झपटमार जी को मेरा नमस्कार।’ वे मोगैंबो की भांति खुश हुए। खुद सोफे पर विराज गए। मुझे ज्यों का त्यों खड़ा रखा। न जाने किसकी-किसकी मां, बहन को याद किया। फिर अपनी पवित्र भाषा में बोले, ‘बको जो बकना है…’
मैं बोला, ‘बस आपके प्रति श्रद्धा जगी है।’ वे बोले, ‘यार अब यह श्रद्धा कौन हैं? उनसे कह दो कि उन्होंने जागने में देरी कर दी। इतनी महंगाई में मैं पहले ही तीन जगह बुक्ड हूं। ‘मैंने कहा, ‘जी नहीं नहीं… मेरा मतलब यह कि मेरे मन में आपके प्रति श्रद्धा जागी है। वही आपको अर्पित करने आया हूं। आप जैसे पहुंचे हुए प्राणी का साक्षात्कार करने का मन है।’ वे सांसों को अंदर करते हुए बोले, ‘ओह! मतलब मुझे खालिस श्रद्धा-सुमन अर्पित करके, तुम खुद चर्चित होना चाहते हो। ठीक है। इसी बहाने मुझसे थोड़ा समाज कल्याण भी हो जाएगा। पूछो, जो भी पूछना है। लेकिन ध्यान रहे, दायरे के अंदर रह कर, खुल कर पूछना। कुछ गलत पूछ लो तो डरना नहीं। मैं मारूंगा नहीं। बल्कि मार डालूंगा।’
मैंने पूछना शुरू किया।
झपटमारी कैसे सीखी?
हा! हा! हा! भला अभिमन्यु से भी कोई पूछता है कि चक्रव्यूह भेदना किससे सीखा! हे हे हे।
मैं उनकी हंसी को अपनी किस्मत समझ कर मुस्कुराया। दूसरा प्रश्न पूछा- झपटमारी की शुरुआत कहां से हुई?
रिवाजानुसार घर से ही हुई। आदमी नेतागिरी भी तो घर से ही शुरू करता है। गुंडागर्दी भी पहले घर से ही शुरू होती है। सबसे पहले आदमी घर पर ही शेर बनता है। फिर स्थानानुसार, समयानुसार, और मौकानुसार वह शेर में परिवर्तित होने की कोशिश करता है।
आप बार-बार नेता को बीच में क्यों ले आते हैं?
ऐसा है बंधु! नेता और मुझमें कोई खास अंतर तो है नहीं। नाम का क्या है? आज है, कल नहीं है। असल चीज तो काम है। काम से मिलने वाला दाम है। जिसके पास दाम नहीं, वह बदनाम है। तो बात यह है कि हम दोनों के धंधे समान हैं। दोनों ही झपटने के मामले में अव्वल हैं। वे सफेद चोले में करते हैं, हम रंगीन कपड़ों में झपटते हैं।
आपका खानदान रईस है। पढ़ा लिखा है। खूब रुपया पैसा जमा है। फिर आपने यह झपटमारी का धंधा क्यों चुना?
बात तुम्हारी ठीक है। मगर अपना बिजनेस भी तो कुछ होता है न। आज मैं अपने बाप से ज्यादा सफल हूं। कितने ही नेताओं के लड़के खून-खराबा, लूट-मार, बलात्कार और भ्रष्टाचार करने में चार कदम आगे निकल गए हैं। मैंने उनसे बड़ी सीख ली है।
‘रिस्क फैक्टर’ कितना रहता है?
वह तो हर धंधे में ज्यादा होता है। कभी-कभी जान पर बन आती है। मगर पुलिस के प्यार और अपने नेताजी के साथ और आशीर्वाद से मुझ पर अब तक ऐसी कोई बला नहीं आई। अब तो खैर, आदत-सी हो गई है। रिस्क की टेंशन नहीं अपने को। बस लुटने वाले को थोड़ा सहयोग करना चाहिए। शांति के साथ खुद को लुटवा ले, तो समझो धंधा कभी मंदा नहीं पड़ेगा। तमंचे का खर्चा भी बचेगा।
क्यों करते हैं झपटमारी?
यह सीक्रेट है। लेकिन तुम अपने आदमी हो। बताए देता हूं। दरअसल, तीन ठो गर्लफ्रेंड हैं। तीज-त्योहार अलग बात है। साल में एक बार आते हैं। तीन ठो गर्लफ्रेंड होने का मतलब अलग है। तुम समझते ही नहीं। तुम कहां से समझोगे। तुमसे तो एक भी नहीं संभाली गई। और घिसो कलम। महंगाई का जमाना है। समझा करो यार। उस पर तमाम दूसरे खर्चे हैं। ये जो शराब और शबाब की दुकानें हैं। इनके बिजनस को भी सपोर्ट करना होता है। अच्छा यार, अब जल्दी करो। अगला माह फरवरी का है। ओवर टाइम अभी से करना पड़ेगा। तब जाकर तीनों का मामला निपटेगा। कोहरा छंट गया तो माल भी हट जाएगा।
बस एक प्रश्न और है। कभी बोर नहीं होते अपने धंधे से? या कभी छोड़ने का खयाल नहीं आया?
तुम भी यार। नेता, अफसर या बाबू को कभी रिश्वतखोरी से बोर होते देखा है? कमाल की बात करते हो।
तो इसका क्या अर्थ यह समझा जाए?
सब इंसान नाम के चोले में खुद की नंगई ढके हुए हैं। संसद में, थाने में, सभाओं में, संगोष्ठियों में, गोष्ठियों में, सरकारी दफ्तरों में, हर जगह हर कोई कपड़ों के नीचे नंगा नाच रहा है। मैं तो कहूंगा कि तुम भी…।
मैंने उन्हें टोकते हुए कहा, ‘जी मैं समझ गया, जो आप कहना चाहते हैं। जर्रानवाजी के लिए बहुत शुक्रिया। आपके कीमती समय के लिए भी शुक्रिया। चलता हूं। इससे पहले कि कोहरा छंट जाए, मैं यहां से हट जाता हूं। आप अपने कर्म की ओर बढ़िए। झपटमारी हेतु आगे बढ़िए’।
एक बार फिर, श्रीमान झपटमार को नमस्कार। ०

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App