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विचार बोध: हनुमान कूद वाली शिक्षा

विनोबा का जीवन और विचार भारतीय संत परंपरा का सर्वाधुनिक सर्ग है। एक ऐसा सर्ग जिसमें अहिंसक राष्ट्र निर्माण की संभावना और विकल्प के कई जमीनी प्रयोग हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं। गीता की आधुनिक व्याख्या से लेकर देश में भूमि के असमान वितरण को दूर करने के मकसद से शुरू किए गए भूदान आंदोलन तक विनोबा कई भूमिकाओं में हमारे सामने आते हैं।

संत विनोबा भावे।

प्रेम प्रकाश

भारतीय जनमानस के लिए यह वह दौर है जब वह अपने सौ-डेढ़ सौ साल पीछे के अनुभवों से बहुत कुछ सीख सकता है। बा-बापू की 150वीं वर्षगांठ को लेकर कई तरह के अभिक्रम पहले से चल रहे हैं। 11 सितंबर से महात्मा गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माने गए विनोबा भावे की 125वीं जयंती को लेकर देशभर में कई तरह के आयोजनों के बारे में जानकारी मिल रही है।

विनोबा का जीवन और विचार भारतीय संत परंपरा का सर्वाधुनिक सर्ग है। एक ऐसा सर्ग जिसमें अहिंसक राष्ट्र निर्माण की संभावना और विकल्प के कई जमीनी प्रयोग हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं। गीता की आधुनिक व्याख्या से लेकर देश में भूमि के असमान वितरण को दूर करने के मकसद से शुरू किए गए भूदान आंदोलन तक विनोबा कई भूमिकाओं में हमारे सामने आते हैं।

तारीफ की बात है कि इन सब भूमिकाओं में वे अहिंसक और रचनात्मक तकाजों से तो काम लेते ही हैं, साथ में यह सिद्धि भी आजमाते चलते हैं कि भारतीय लोकमानस की स्वाभाविकता किसी भी हिंसक होड़ के बजाय सद्भाव और सहयोग के साझे से बनी सामाजिकता से मेल खाती है। वे कई ऐसी मान्यताओं और प्रयोगों के प्रति हमें चेताते भी हैं, जिनका वरण पहले तो सरकार ने और फिर समाज ने आधुनिकता की रूढ़ दरकार के तौर पर किया है। इस लिहाज से खासतौर पर आधुनिक जीवन और शिक्षण को लेकर उनके विचार काफी अहम हैं।

विनोबा कहते हैं, ‘आज की विचित्र शिक्षा-पद्धति के कारण जीवन के दो टुकड़े हो जाते हैं। पंद्रह से बीस वर्ष तक आदमी जीने के झंझट में न पड़कर सिर्फ शिक्षा प्राप्त करे और बाद में, शिक्षण को बस्ते में लपेटकर रख, मरने तक जिए। यह रीति प्रकृति की योजना के विरुद्ध है। हाथ-भर लंबाई का बालक साढ़े तीन हाथ का कैसे हो जाता है, यह उसके अथवा औरों के ध्यान में भी नहीं आता। शरीर की वृद्धि रोज होती रहती है। यह वृद्धि सावकाश क्रम-क्रम से, थोड़ी-थोड़ी होती है। इसलिए उसके होने का भास तक नहीं होता।

यह नहीं होता कि आज रात को सोए, तब दो फुट ऊंचाई थी और सबेरे उठकर देखा तो ढाई फुट हो गई। आज की शिक्षण-पद्धति का तो यह ढंग है कि अमुक वर्ष के बिल्कुल आखिरी दिन तक मनुष्य, जीवन के विषय में पूर्ण रूप से गैर-जिम्मेदार रहे तो भी कोई हर्ज नहीं! यही नहीं, उसे गैर-जिम्मेदार रहना चाहिए और आगामी वर्ष का पहला दिन निकले कि सारी जिम्मेदारी उठा लेने को तैयार हो जाना चाहिए। संपूर्ण गैर-जिम्मेदारी से संपूर्ण जिम्मेदारी में कूदना तो एक हनुमान कूद ही हुई। ऐसी हनुमान कूद की कोशिश में हाथ-पैर टूट जाए, तो क्या अचरज!’

यहां विनोबा जिस ‘हनुमान कूद’ की बात कर रहे हैं वह हमारी शिक्षण पद्धति की बुनियादी रचना पर एक गंभीर सवाल है। आखिर ऐसी शिक्षा का क्या मतलब है जो दी तो जाती है जीवन के लिए जरूरी हर तरह की सीख या ज्ञान के नाम पर, पर जब जीवन में इन्हें आजमाने की बारी आती है, तो ये हमारी कोई मदद नहीं करते। उलटे हमें जिंदगी के बड़े सवालों और जिम्मेदारियों के आगे निस्सहाय छोड़ देते हैं। गौरतलब है कि विनोबा से पहले महात्मा गांधी ने ‘नई तालीम’ का प्रयोग शुरू किया था।

गांधी का यह प्रयोग ज्ञान और जीवन जीने के लिए जरूरी श्रम, समझ और अभ्यास को बराबर का महत्व देता है। दुर्भाग्य से गांधी के इस प्रयोग को आगे बढ़ाने का रचनात्मक धैर्य न तो समाज ने दिखाया और न सरकारों ने। इसका हश्र आजाद भारत में विनोबा अपनी आंखों से देख रहे थे। वे देख रहे थे कि शिक्षा के नाम पर विद्यार्थियों को ऐसी राह पर धकेला जा रहा है, जहां अंतिम तौर पर उन्हें सिर्फ अंधेरा ही हाथ लगेगा।

विनोबा जीवन और प्रकृति के साहचर्य की बात करते हैं। इसलिए वे शिक्षा और जीवनाभ्यास को अलगाने को खतरनाक मानते हैं। वे कहते हैं, ‘कल्पना की क्या आवश्यकता है, प्रत्यक्ष देखिए न। हमारे लिए जो चीज जितनी जरूरी है, उसके उतनी ही सुलभता से मिलने का इंतजाम ईश्वर की ओर से है। पानी से हवा ज्यादा जरूरी है, तो ईश्वर ने हवा अधिक सुलभ कराई है। जहां नाक है, वहां हवा मौजूद है।

पानी से अन्न की जरूरत कम होने की वजह से पानी प्राप्त करने की बनिस्बत अन्न प्राप्त करने में अधिक परिश्रम करना पड़ता है। ईश्वर की ऐसी प्रेमपूर्ण योजना है। इसका खयाल न करके हम निकम्मे, जड़-जवाहरात जमा करने में जितने जड़ बन जाएंगे, उतनी तकलीफ हमें होगी। पर यह हमारी जड़ता का दोष है, ईश्वर का नहीं।’

साफ है कि शिक्षा का मकसद अगर सिर्फ भौतिक सफलता की भूख पैदा करना है तो इससे तो लौकिक जीवन की सार्थकता ही नष्ट हो जाएगी। जीवन और कर्म की बात एक साथ करते हुए वे भगवद्गीता की शिक्षा की बात करते हैं। वे कहते हैं, ‘भगवद्गीता जैसे कुरुक्षेत्र में कही गई, वैसी शिक्षा जीवन-क्षेत्र में देनी चाहिए, दी जा सकती है। दी जा सकती है-यह भाषा भी ठीक नहीं है, वहीं वह मिल सकती है।

अर्जुन के सामने प्रत्यक्ष कर्तव्य करते हुए सवाल पैदा हुआ। उसका उत्तर देने के लिए भगवद्गीता निर्मित हुई। इसी का नाम शिक्षा है।’ विनोबा के लिए शिक्षा का मतलब कर्म और पुरुषार्थ है और जो शिक्षा इस लिहाज से हमारी मदद नहीं करता, वैसी शिक्षा का न तो कोई मूल्य है और न ही औचित्य। जीवन और शिक्षण को लेकर उनकी बातें हमारी समझ की सीमाओं को जाहिर करती हैं।

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