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संदर्भ: अस्मिता विमर्श के स्वर

साहित्य में वास्तविक मुद्दा हमेशा मानवीय मुक्ति और विशाल जनजीवन के जनतांत्रीकरण का रहा है। जब तक रचनाकार का आंतरिक संघर्ष स्पष्ट, मुखर और व्यवस्थित नहीं होगा, तब तक वह बाह्य समस्याओं से लड़ नहीं सकता।

Author May 20, 2018 5:19 AM
समकालीन परिप्रेक्ष्य में भी जिस गहराई और सघनता से अस्मिता विमर्श का रचनात्मक लेखन सामने आया है उसमें नई मूल्य दृष्टि और आधुनिक चेतना के प्रसार को देखते हुए पाठक समुदाय में स्त्री, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक विमर्शों में किसी प्रकार की सीमाओं और विभाजन को स्वीकार करना असंभव है।

मीना बुद्धिराजा

यह साहित्य में अस्मिता विमर्श का दौर है। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक सभी स्तरों पर हिस्सेदारी और अपने अधिकारों की मांग को लेकर हाशिए की अस्मिताओं का संघर्ष और स्वर उभरे हैं। वर्ग, जाति, वर्ण, लिंग, स्थानिकता, सांस्कृतिक पहचान, विस्थापन आदि को आधार बना कर नई अस्मिताएं सामने आई हैं। इन्होंने समानता, न्याय, हिस्सेदारी और आत्मसम्मान के लिए प्रतिरोध, आंदोलन और संघर्ष को अपना मुक्ति पथ घोषित किया है। अस्मिता विमर्श का आशय स्पष्ट है- अपने अस्तित्व का बोध, जो आत्मनिर्णय और आत्माभिव्यक्ति का प्रश्न है। अपनी स्वतंत्र अस्मिता को चिंतन के केंद्र में स्थापित करना आधुनिकता की अवधारणा से जुड़ा है, जो वैश्वीकरण की प्रक्रिया के समांतर वर्चस्ववादी सत्ता के निरंतर प्रतिरोध में प्रकट हुई।

इन अस्मिताओं के उभार ने पंरपरागत केंद्रीय सत्ता संरचना के वर्चस्व, निरंकुशता, छद्म चेतना, दमन और शोषण को चुनौती देते हुए उनकी कार्य-पद्धतियों का विरोध किया। एक आरोपित और विशेष तरह के इतिहास, सांस्कृतिक परंपरा और स्थापित मूल्यदृष्टि के विरोध में नई आत्माभिव्यक्तियां और पहचान के प्रश्न सामने आए। हाशिए पर पड़े एकल स्वर, प्रत्यक्ष और भोगा हुआ यथार्थ, उपेक्षित और त्रासद इकाइयां, लघुतर जनसमूह, अदृश्य और विलुप्त अधिकार वंचित वर्ग की पीड़ाएं आज अपने इतिहास, अपनी सामाजिक पहचान और जटिलताओं को सामने रख कर साहित्य में भी अपना प्रतिनिधित्व चाहती हैं। समकालीन समय के विस्मृत इतिहास बोध और भूमंडलीकरण से उत्पन्न त्रासद परिस्थितियों में अस्मिता विमर्श का साहित्य निस्संदेह सामाजिक यथार्थ के अनेक पहलुओं को उद्घाटित करने का सार्थक प्रयास हो सकता है। अगर वह लेखक, पाठक, बौद्धिक वर्ग के साथ-साथ आम जनता से भी अर्थपूर्ण संवाद स्थापित कर सके।

संपूर्ण साहित्य निर्विवाद रूप से व्यापक मानवीय मूल्यों को बचाने का ही महान प्रयास करता और अनेक पूर्वाग्रहों से मुक्त करता है। जिस प्रकार जीवन में, समाज में कोई अन्य से अलग या स्वायत्त नहीं रह सकता उसी प्रकार रचनाशीलता में भी। साहित्य की वैचारिकी और समग्र अंतर्दृष्टि में समूचा यथार्थ अनेक विचारों, अनुभवों और संवेदनाओं के सहअस्तित्व से बन कर सामने आता है। वह सामान्य जन के दुख-दर्द, विडबंनाओं और आकांक्षाओं को अधिक लोकतांत्रिक तथा व्यापक संदर्भ में देखता है, इसलिए जाति, वर्ग, संप्रदाय, संस्कृति आदि के अलग-अलग विमर्शों के बीच भी साहित्य की मूल चेतना मानवीय प्रतिबद्धता की ही पक्षधर होती है। इसमें रचनाकार की दृष्टि युग और समाज के वर्तमान के साथ भविष्य के प्रति भी आशान्वित होती है।

साहित्य का मूल उद्देश्य सामूहिक अस्मिता के स्वप्नों को पूरा करने, जीवन में अदम्य आस्था और संकीर्णताओं-सीमाओं से मुक्त विराट जनजीवन की वैश्विक दृष्टि में समाहित होता है। इसलिए साहित्य में स्त्री विमर्श हो, दलित या आदिवासी विमर्श, देखना यह भी जरूरी है कि उसमें जीवन के संघर्ष और आगामी मानवता का निर्माण करने की कितनी शक्ति है। समाज में सार्थक रचनात्मक हस्तक्षेप करने के साथ उसकी विश्वसनीयता और जनसरोकारों की प्रतिबद्धता का होना ज्यादा जरूरी है। समाज में जो असंख्य महिलाएं अपने निरंतर संघर्ष से पितृसत्तात्मक ढांचे को तोड़ रही हैं, जो दलित-शोषित अपने मानवीय संघर्षों से वर्णव्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं और जो आदिवासी अस्मिताएं जल, जगंल और जमीन पर वर्चस्ववादी शक्तियों के एकाधिकार को चुनौती दे रही हैं, उनसे गहरा और संवेदनात्मक संबंध बनाए बिना ये विमर्श महज बौद्धिक विमर्श बने रहेंगे।

जब तक साहित्य यथास्थिति से टकराने का साहस और प्रेरणा नहीं देता और किसी नई मूल्य दृष्टि और चेतना का प्रसार नहीं करता, तब तक स्त्री लेखन या पुरुष लेखन, दलित और गैर-दलित, आदिवासी-गैर-आदिवासी लेखन का विभाजन सही दिशा निर्माण और वास्तविक समस्याओं को व्यापक परिदृश्य में और सार्थक तरीके से प्रस्तुत नहीं कर सकता। जैसे स्त्री-पुरुष समानता और लैंगिक भेदभाव की समस्या आज एक बड़ा सवाल है और हमारे जैसे पंरपरावादी समाज की संरचना में यह बहुत-सी जटिलताएं लिए हुए है। इसलिए साहित्य में धर्म, जाति, लिंग, भाषा आदि की सीमाएं नहीं होनी चाहिए और स्त्री पर केवल स्त्री लेखन कर सकती है और दलित पर केवल दलित लिख सकते हैं, तभी वह प्रामाणिक होगा, यह धारणा भी एकांगी है। किसी रचना की सार्थकता इसमें है कि वह अपने समय, समाज और परिवेश की मनुष्य-विरोधी ताकतों से कितनी मुठभेड़ करती है। व्यवस्था में न्याय और समानता के लिए कैसे संघर्ष और हस्तक्षेप करती है। अलग-अलग विमर्शों के लेखन में वैचारिक मतभेद संभव हो सकते हैं, लेकिन किसी का निषेध और अस्वीकार्यता साहित्य की विराट संभावनाओं और वृहत्तर चेतना में संभव नही है। समाज और साहित्य के भीतर क्षेत्र, जाति और वर्ग के नाम पर अस्मिताओं के समूहों की टकराहट सकरात्मक परिवर्तन के लिए होनी चाहिए और अपना सम्मान और स्थान अर्जित करने के लिए उनका आत्मकेंद्रित निजी हितों के बजाय संपूर्ण मानवता के साझा सरोकारों से जुड़ना जरूरी है। इसलिए विमर्श की मूल प्रकृति यानी संवादधर्मिता और जीवंत रूप से विचारों के आदान-प्रदान के माध्यम से इन्हें सकारात्मक और रचनात्मक रूप दिया जा सकता है।

साहित्य में वास्तविक मुद्दा हमेशा मानवीय मुक्ति और विशाल जनजीवन के जनतांत्रीकरण का रहा है। जब तक रचनाकार का आंतरिक संघर्ष स्पष्ट, मुखर और व्यवस्थित नहीं होगा, तब तक वह बाह्य समस्याओं से लड़ नहीं सकता। मुक्तिबोध ने इसे ‘सर्वहारा चेतना’ का नाम दिया था, जो लेखक के क्षोभ और आत्मसंघर्ष को समस्त पीड़ित मानवता से एकाकार कराती है। प्रतिरोध की यही चेतना और संघर्ष की आंकाक्षा उन्हें साधारण मानव में असाधारणता का बोध कराती है। प्रेमचंद, निराला, राहुल सांकृत्यायन, यशपाल और नागार्जुन जैसे अनेक प्रसिद्ध लेखकों ने अपने लेखन और साहित्य में वर्चस्ववादी, अभिजात मूल्यों को हमेशा प्रश्नांकित किया और सदियों से चले आ रहे शोषण, उत्पीड़न का सशक्त विरोध करते हुए जाति, सांप्रदायिकता, और वर्ण से मुक्त लोकतांत्रिक मूल्यों से साहित्य को जोड़ा।

समकालीन परिप्रेक्ष्य में भी जिस गहराई और सघनता से अस्मिता विमर्श का रचनात्मक लेखन सामने आया है उसमें नई मूल्य दृष्टि और आधुनिक चेतना के प्रसार को देखते हुए पाठक समुदाय में स्त्री, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक विमर्शों में किसी प्रकार की सीमाओं और विभाजन को स्वीकार करना असंभव है। समाज की वास्तविकता और यथार्थ की जटिलताओं को पहचानने में एक रचनाकार की अनेक दृष्टियां और अस्मिताएं परस्पर पूरक का काम करती हैं। यथार्थ कभी इकहरा नहीं होता, इसलिए समय और परिवेश के अंतर्विरोधों को समग्रता में आत्मसात करने और अभिव्यक्त करने में साहित्यकार के विविध दृष्टिकोण, संवेदनाएं और वैचारिकताएं मिल कर कालजयी रचना का निर्माण करती हैं।

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