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सबमें रमै रमावै जोई

भक्ति और आस्था के जरिए विचार की यात्रा दिलचस्प है।

रूपा

भक्ति और आस्था के जरिए विचार की यात्रा दिलचस्प है। इसमें हृदय और बुद्धि दोनों के लिए पाने के लिए अथाह होता है। इसके उलट अनास्था का सबसे बड़ा खतरा यह है कि वह विचार की जगह पूर्वग्रह की मरोड़ को जन्न देता है, जिसके जरिए मनुष्य एक ऐसी तिक्तता से भर जाता है, जिससे वह जीवन और भविष्य के लिए कुछ भी सार्थक नहीं सोच पाता है, कुछ भी रचनात्मक नहीं कर पाता है। ज्ञान, आस्था और भक्ति की भारतीय परंपरा में राम, कृष्ण और शिव ऐसे मीलस्तंभ हैं, जिससे जुड़ने का आकर्षण बड़ा भी है और कारगर भी।

राम, कृष्ण या बुद्ध को अवतार घोषित किए जाने के बारे में विनोबा भावे ने एक बार कहा था- ‘विचार का भी अवतार होता है, बल्कि विचार का ही अवतार होता है। लोग समझते हैं कि रामचंद्र एक अवतार थे, कृष्ण, बुद्ध, अवतार थे। लेकिन उन्हें हमने अवतार बनाया है। वे आपके और मेरे जैसे मनुष्य थे। …हम अपनी प्रार्थना के समय लोगों से सत्य प्रेम, करुणा का चिंतन करने के लिए कहते हैं। भगवान किसी न किसी गुण या विचार के रूप में अवतार लेता है और उन गुणों या विचार को मूर्त रूप देने में, जिनका अधिक से अधिक परिश्रम लगता है, उन्हें जनता अवतार मान लेती है। अवतार व्यक्तिका नहीं विचार का होता है और विचार के वाहन के तौर पर मनुष्य काम करते हैं। किसी युग में राम के रूप में सत्य की महिमा प्रकट हुई, किसी में कृष्ण के रूप में प्रेम की, किसी में बुद्ध के रूप में करुणा की।’

नाम और दर्शन की पूरी रचना को हम समझें तो जिन तीन अवतारी नामों की चर्चा हम कर रहे हैं, उनकी स्वीकृति का बड़ा संदर्भ सामने खुलता है। इसमें सबसे विलक्षण है नाम-महिमा। भक्ति की भारतीय लोक परंपरा में नाम-जपन का विशेष है। नाममाला से नाम-गुण तक कई विलक्षणताओं के साथ आस्था की यह परंपरा भारत में काफी गहरी है। यही वजह है कि नाम की महिमा भक्ति से लेकर विमर्श तक बनी हुई है। नाम की इस महत्ता और दरकार को जो दूसरा शब्द सबसे ज्यादा पूरा करता है, वह है राम-नाम। राम की मौजूदगी हर जगह है। वे तुलसी के प्रिय हैं तो कबीर के भी।

यह नाम जहां ब्रह्मवादियों का ब्रह्म है, तो निर्गुणवादी संतों की अंतरात्मा है। यह नाम सगुणवादियों के लिए ईश्वर रूप है, तो अवतारवादियों के लिए अवतार है। इस शब्द या नाम की विशालता इतनी है कि वह ऋषि वाल्मीकि के रामायण में एक रूप में वर्णित हुआ है, तो उन्हीं के लिखे ‘योगवशिष्ठ’ में दूसरे रूप में। ‘कम्ब रामायणम’ में वह दक्षिण भारतीय जनमानस को भावविभोर कर देता है, तो तुलसीदास के रामचरितमानस तक आते-आते वह उत्तर भारत में एक लोकादर्श के तौर पर स्थापित हो जाता है। श्रद्धा और आस्था में डूबे लोग कभी उनमें आदर्श राजा का रूप देखते हैं, तो कभी शिष्ट पुत्र या सौम्य पति का। शील से लेकर शौर्य तक हर गुण का वास है राम के चरित्र में।

राम-नाम की महत्ता को सबने अलग-अलग वर्णित किया भी है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि ‘राम न सकहिं नाम गुन गाहीं।’ यानी खुद राम भी इतने समर्थ नहीं हैं कि वे अपने नाम के प्रभाव का गान कर सकें। राम-नाम की यह अवर्णनीय शोभा कबीर तक आते-आते अर्थ की दूसरी तह तक पहुंच जाती है।

कबीर की भाषा और शैली बहुधा प्रत्याख्यान के रूप में सामने आती है तो राम के बारे में बताते हुए भी वे इसी तेवर में दिखते हैं। वे कहते हैं, ‘दसरथ सुत तिहुं लोक बखाना, राम नाम का मरम है आना।’ तुलसी के साकार राम कबीर के यहां आकर निराकार ही नहीं हो जाते हैं बल्कि देशकाल के उन सरोकारों से भी जुड़ जाते हैं जिनकी बात कबीर करते हैं। शील और विनय के प्रतीक राम कबीर के यहां आकर ज्ञान की सूक्ष्मता और अंतरात्मा के पर्याय बन जाते हैं। अक्खड़ कबीर राम का वर्णन करते हुए यहां तक कह जाते हैं, ‘राम गुण न्यारो न्यारो न्यारो, अबुझा लोग कहां लों बूझै, बूझनहार विचारो।’ साकार राम सरोकार के राम कैसे बदलते हैं इसके कई उदाहरण कबीर के यहां देखने को मिलते हैं।

सांप्रदायिक कटुता के नाम पर एक-दूसरे से भिड़ने वालों से कबीर ने बार-बार संवाद का जोखिम लिया है। उन्हें दो टूक नसीहत दी है। दिलचस्प यह कि यह कहते हुए कबीर जिन नाम की दुहाई देते हैं, वह राम-नाम ही है। जाहिर है कि यहां यह नाम पर्याय है ज्ञान का, अंतरात्मा का। कबीर कहते हैं, ‘राम रहीमा एकै है रे काहे करौ लड़ाई।’ आगे वे यह भी कहते हैं, ‘राम रमैया घट-घट वासी।’ यानी वह तो हर मनुष्य के भीतर समाया है। कबीर इस नाम गुण के लिए यह भी जोड़ते हैं, ‘सबमें बसै रमावै जोई, ताकर नाम राम अस होई।’ राम नाम का महत्व और आकर्षण तुलसी और कबीर से आगे एक और महात्मा तक पहुंचता है।ये महात्मा कोई और नहीं बल्कि बीसवीं सदी में शांति और अहिंसा का अलख जगाने वाले महात्मा गांधी हैं।

राम की लोकसत्ता और लोक-स्वीकृति इतनी व्यापक है कि उनके लिए अस्वीकार कहीं नहीं है। राम हर लिहाज से सार्वदेशिक हैं और सार्वभौमिक भी। तारीफ तो यह कि भक्ति का साकार अवलंबन जब निराकार सूक्ष्मताओं में बदला तो भी राम-नाम का आसरा बना रहा। वाल्मीकि और तुलसी की परंपरा से अलग कबीर, नानक और रैदास जैसे संतों की वाणी में हमें जिस आत्माराम रूपी ‘राम’ के दर्शन होते हैं, वहां यह नाम ज्ञान और भक्ति के सूक्ष्म तकाजों को पूरा करता है।

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