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‘चिंता’ कॉलम में रोहित कौशिक का लेख : पुस्तकालय आंदोलन की जरूरत

दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि आज बच्चों को पुस्तकों से जोड़ने की कोई कोशिश नहीं हो रही है। दरअसल, पढ़ाई के दबाव के कारण बच्चे कोर्स की किताबें तो पढ़ते हैं।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 1:33 AM
देश के पुस्तकालयों की दयनीय स्थिति को सुधारने में ‘पुस्तकालय अधिनियम’ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मगर यह अब भी देश के सभी राज्यों में पारित नहीं हुआ है।

भारत में सबसे अधिक भाषाओं की पुस्तकों का प्रकाशन होता है। मगर मात्र इस आधार पर पुस्तकों से संबंधित कोई भ्रम पाल लेना तर्कसंगत नहीं है। विडंबना है कि दिल्ली में पुस्तकों की एक भी ऐसी दुकान नहीं है, जहां सभी लेखकों की पुस्तकें एक स्थान पर मिल जाएं। आज कहीं इलेक्ट्रॉनिक साधनों को पुस्तकों पर छाए इस संकट के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है, तो कहीं साइबर क्रांति को। एक तरफ पुस्तकों की बढ़ती कीमतों को दोष दिया जा रहा है, तो दूसरी ओर समय की कमी को। बहरहाल, वास्तविकता यह है कि हिंदीभाषी समाज में आज तक पढ़ने की प्रवृत्ति विकसित नहीं हो पाई है। कहें कि हिंदीभाषी समाज में बौद्धिक भूख ही नहीं है तो अतिशयोक्ति न होगी। बौद्धिक भूख की कमी के कारण अगर आज हिंदी पुस्तकों की मुद्रण संख्या लगातार घटती जा रही है तो यह आश्चर्यजनक नहीं है।

आजकल प्रकाशक मात्र सरकारी पुस्तकालयों की खरीद पर निर्भर रहने लगे हैं। पुस्तकालयों द्वारा पुस्तकें खरीद तो ली जाती हंै, लेकिन भारत में पुस्तकालयों के कुप्रबंधन के कारण अधिकतर किताबें मात्र अलमारियों की शोभा बढ़ाती हंै। स्पष्ट है कि पुस्तकों की सभी प्रतियां पाठकों तक अपनी पहुंच नहीं बना पाती हंै। दुर्भाग्य यह है कि जब भी पुस्तकों के संकट पर चर्चा होती है, तो कहीं भी बदतर पुस्तकालय-सेवा की समीक्षा नहीं की जाती। हमारे यहां पुस्तकालय आंदोलन सुसुप्त अवस्था में है। दरअसल, लेखकों और पाठकों के बीच दूरी बढ़ने में पुस्तकालयों की दयनीय स्थिति को कारक माना ही नहीं जाता है। अगर हम चाहते हैं कि प्रकाशित पुस्तकों की सभी प्रतियों का समुचित उपयोग हो तथा लेखकों और पाठकों के बीच की दीवार समाप्त हो तो पुस्तकालों को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे।

हिंदीभाषी समाज में पुस्तकें थोड़े-बहुत लिखने-पढ़ने वाले वर्ग में ही सिमट कर रह जाती हंै। बदली हुई परिस्थितियों में हमें सबसे ज्यादा ध्यान इस बात पर देना होगा कि पुस्तकों की जितनी भी प्रतियां प्रकाशित हों वे सभी किसी न किसी रूप में पाठकों तक अवश्य पहुंचें। इसमें सबसे बड़ा योगदान पुस्तकालय दे सकते हैं।

पिछले पचास वर्षों में देश में पुस्तकालयों की स्थिति पर गौर करें तो इस संबंध में हमारे नीति-निर्माताओं की लापरवाही स्पष्ट उजागर होती है। हमारे देश के नीति-निमार्ताओं ने कभी पुस्तकालयों के विकास को देश के विकास के साथ जोड़ कर नहीं देखा। विदेशों में समृद्धि का एक बड़ा कारण पुस्तकालय भी हैं। पुस्तकालयों पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता है। पुस्तकालयों के विकास में सबसे बड़ी बाधा आर्थिक संसाधनों में कटौती है। सरकार अपने अनापशनाप खर्चों में तो कोई कटौती नहीं करती, जबकि पुस्तकालयों के नाम पर आर्थिक संसाधनों की कमी का रोना रोया जाता है।

देश के पुस्तकालयों की दयनीय स्थिति को सुधारने के लिए सर्वप्रथम सरकार को पुस्तकालयों के लिए बजट में अपेक्षित बढ़ोत्तरी करती होगी। दूसरे, विभिन्न पुस्तकालयों में रिक्त पड़े पुस्तकालयाध्यक्ष और अन्य दूसरे पदों पर नियुक्तियां कर सुसुप्त पड़ी हुई पुस्तकालय-सेवा को चुस्त-दुरुस्त करें।

हिंदीभाषी समाज में पढ़ने की प्रवृत्ति विकसित करने में भी पुस्तकालय अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते है। पुस्तकालयों के तत्त्वावधान में कविता-कहानी प्रतियोगिताएं या सामान्य ज्ञान प्रतियोगिताएं आयोजित की जा सकती हैं। इसी तरह नई प्रकाशित पुस्तकों पर परिचर्चाएं आयोजित की जा सकती हैं। परिचर्चाओं में लिखने-पढ़ने वाले लोगों के साथ-साथ आम जनता को भी आमंत्रित किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया से जहां एक ओर जनता को पुस्तकालयों द्वारा संचालित सृजनात्मक गतिविधियों की जानकारी मिलेगी, वहीं दूसरी ओर आम जनता को नई प्रकाशित पुस्तकों की जानकारी भी मिल सकेगी। इस तरह आम जनता भी पुस्तकालयों के प्रति आकर्षित होकर पुस्तकालयों से जुड़ सकेगी। इन सब गतिविधियों के माध्यम से आम जनता में भी धीरे-धीरे पढ़ने की प्रवृत्ति विकसित होगी।

लगभग सभी जिलों मे राजकीय जिला पुस्तकालय स्थापित हैं, लेकिन आम लोगों को इनकी जानकारी ही नहीं है। चंद जागरूक लोग इन पुस्तकालयों में जाते भी हैं, तो पुस्तकालयाध्यक्ष के उदासीन रवैए के कारण वे पुस्तकालयों से सक्रिय रूप से नहीं जुड़ पाते हैं। आज स्वयं पुस्तकालयाध्यक्षों को इस बात पर विचार करना होगा कि वे किस प्रकार ज्यादा से ज्यादा लोगों को पुस्तकालयों से जोड़ सकते हैं। अक्सर देखा गया है कि राजकीय जिला पुस्तकालयों में पुस्तकों की खरीद प्रशासनिक स्तर पर तय होती है। इस प्रक्रिया से अनेक अनुपयोगी पुस्तकें पुस्तकालयों पर थोप दी जाती हैं और स्थानीय पाठकों की पसंद की अनेक पुस्तकें पुस्तकालयों में नहीं आ पाती है। इसलिए पुस्तकालयों में नई पुस्तकें मंगाने की प्रक्रिया में स्थानीय पाठकों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि आज बच्चों को पुस्तकों से जोड़ने की कोई कोशिश नहीं हो रही है। दरअसल, पढ़ाई के दबाव के कारण बच्चे कोर्स की किताबें तो पढ़ते हैं। साथ ही उल्टे-सीधे कॉमिक्स पढ़ने में रुचि लेते हैं। लेकिन अच्छा बाल साहित्य पढ़ने में उनकी रुचि नहीं होती। स्कूल की पढ़ाई से समय मिलने पर वे टीवी से चिपक जाते हैं। पहले जब टीवी जैसे साधन उपलब्ध नहीं थे, शिक्षा ग्रहण करने वाले किशोरों का एक बड़ा वर्ग स्वयं किताबों से जुड़ जाता था। फलस्वरूप उनमें पढ़ने की प्रवृत्ति तो विकसित होती ही थी, उनमें जमीन से जुड़े संस्कार भी पनपते थे। आज बड़े स्कूलों में पुस्तकालय तो हैं, लेकिन प्राथमिक स्कूलों में पुस्तकालयों की कोई व्यवस्था नहीं है। सरकार को प्राथमिक स्कूलों में भी पुस्तकालयों की स्थापना करनी चाहिए।

देश के पुस्तकालयों की दयनीय स्थिति को सुधारने में ‘पुस्तकालय अधिनियम’ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मगर यह अब भी देश के सभी राज्यों में पारित नहीं हुआ है। आज पुस्तकालयों में प्राण फूंकने के लिए नए पुस्तकालय-आंदोलन की आवश्यकता है। भले हिंदी प्रेमी और विभिन्न बुद्धिजीवी हिंदी पुस्तकों के संकट पर कितनी ही चर्चा क्यों न कर लें, लेकिन हिंदी पुस्तकों पर छाया संकट तब तक दूर होने वाला नहीं है जब तक कि हिंदीभाषी समाज में पढ़ने की प्रवृत्ति विकसित नहीं होगी। यह विडंबनापूर्ण है कि आज मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों पर तो हमें अपने अधिकार याद आने लगने हैं, लेकिन ऐसे मुद्दों पर भूल जाते हैं। ध्यान रखना चाहिए कि पुस्तकों से मुंह मोड़ना हिंदीभाषी समाज के लिए खतरनाक सिद्ध होगा।

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