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होली का रंग स्वाद के संग

होली प्रेम और सत्कार का पर्व है। इस दिन घरों में एक-दूसरे से मिलने-मिलाने की परंपरा है। ऐसे में इस बार इस अवसर पर मेहमानों को कुछ विशेष प्रकार के व्यंजनों से स्वागत करें। यहां देखें वह क्या होगा और उसकी विधि क्या है।

Dana Pani, Festivalहोली पर मालपुआ और कांजी वड़ा बनाकर मेहमानों का करें स्वागत।

मानस मनोहर
हमारे देश में होली और दिवाली दो ऐसे त्योहार हैं, जिन पर खूब मीठे पकवान बनते हैं। वैसे आजकल कई लोग बाजार से कुछ मिठाइयां और नमकीन खरीद लाते हैं, उसी से घर आए मेहमानों का स्वागत करते हैं। पर घर के बने व्यंजन की तो बात ही कुछ और है। इस बार कुछ ऐसे व्यंजनों की बात, जिन्हें बनाने के लिए होली से दो-तीन दिन पहले तैयारी करनी पड़ती है।

मालपुआ
पुआ शुद्ध भारतीय पारंपरिक पकवान है। देश का कोई ऐसा हिस्सा नहीं, जहां पुए न बनते और खाए जाते हों। लोक परंपरा में पुए का महत्त्व इससे समझा जा सकता है कि हर खुशी के मौके पर पुए जरूर बनते हैं। पुए पकाने की परंपरा को देखते हुए ऐसा लगता है कि जब मनुष्य ने पहली बार कोई मीठा पकवान बनाना सीखा होगा, तो उसने मीठी रोटी या पुआ ही बनाया होगा। मालपुआ बनाने के भी अलग-अलग इलाकों में तरीके अलग हैं। राजस्थान में आमतौर पर मालपुए को चाशनी में डुबो कर परोसा जाता है, तो बंगाल में रबड़ी के साथ।

उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश के इलाकों में बिना किसी चाशनी या रबड़ी के, इसे लोग कटहल की तरकारी के साथ खाते हैं। हम मालपुए को मिठाई के विकल्प के तौर पर बनाएंगे, इसलिए इसमें चाशनी या रबड़ी आप अपनी इच्छा के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं। पर सबसे पहले मालपुआ बनाने की विधि।

मालपुआ गेहूं के रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले आटे से भी बनाया जाता है और मैदे से भी। मैदे से बनने वाला मालपुआ गेहूं के आटे की अपेक्षा अधिक मुलायम होता है, इसलिए मैदे का ही इस्तेमाल करें। इसके लिए एक कप मैदा, दो कप दूध, चार-पांच खाने के चम्मच बराबर चीनी, दो सौ ग्राम मावा, दो कुटी छोटी इलाइची, दस-बारह किशमिश, दो-तीन चम्मच नारियल का बुरादा और कुछ काजू या पिस्ते के बारीक कटे दाने ले लें। पहले दूध को गुनगुना गरम करें। उसमें चीनी और मावा डाल कर अच्छी तरह घोल लें, ताकि सारी चीजें अच्छी तरह घुल जाएं।

अब इसमें मैदा और मेवे डाल कर अच्छी तरह चलाते हुए मिलाएं। ध्यान रखें कि घोल में कोई गांठ न रहने पाए। घोल न तो बहुत गाढ़ा होना चाहिए और न पतला। ऐसा हो कि कड़ाही में डालें तो अपने आप फैल कर गोल आकार ले ले। इस घोल को एक-डेढ़ घंटे के लिए ढंक कर रख दें।

एक ऐसी कड़ाही लें, जिसका तला ज्यादा गहरा न हो, कुछ चपटे आकार का हो। उसमें भरपूर तेल या घी गरम करें। फिर आंच को मध्यम कर दें। एक कलछी या बड़े चम्मच में घोल लेकर सावधानी से तेल में डालते जाएं। पुए को पलट कर दोनों तरफ से सुनहरा होने तक तल लें। अगर कड़ाही छोटी है, तो एक बार में एक ही पुआ बन पाएगा, बड़ी है तो दो या तीन एक बार में तल सकते हैं।

मालपुए तैयार हैं। अब इन्हें परोसने के लिए या तो चाशनी में डुबो सकते हैं या फिर रबड़ी के साथ दे सकते हैं। रबड़ी बनाने के लिए दो लीटर दूध को चलाते हुए गाढ़ा होने तक पका लें। उसमें करीब ढाई सौ ग्राम चीनी, कुछ केसर की कलियां और कुटी हुई इलाइची डाल कर पका लें। जब रबड़ी ठंडी हो जाए, तो उसे पुओं पर डाल कर ऊपर से पिस्ता कुतर कर डालें और फ्रिज में रख दें। जब मेहमान आएं, तो निकाल कर परोसें। यह मालपुआ होली से एक-दो दिन पहले भी बना कर रखा जा सकता है।

कांजी वड़ा
कांजी वड़ा मूलत: सिंधी व्यंजन है। होली और दिवाली के अवसर पर राजस्थान के हर घर में यह अवश्य बनता है। दरअसल, कांजी एक प्रकार का पाचक है। दिनभर गरिष्ठ और मीठे पकवान खाने से अपच की शिकायत हो सकती है, इसलिए उसे पचाने में कांजी बहुत सहायक साबित होती है।

कांजी वड़े में वड़े तो मूंग दाल या उड़द दाल के ही बनते हैं, पर इसमें खास होती है कांजी। कांजी तैयार करने में तीन से चार दिन का समय लग जाता है। इसलिए इसे होली से चार-पांच दिन पहले ही बनाना पड़ता है। इसमें मुख्य रूप से हींग, लाल मिर्च पाउडर, नमक और राई का इस्तेमाल होता है। इसके अलावा भुने और कुटे हुए जीरे से इसका स्वाद और बढ़ जाता है। हींग का धुआं लगा दें, तो इसका अनंद और बढ़ जाता है।

कांजी बनाने के लिए पहले दो चम्मच पीली सरसों यानी राई को महीन कूट लें। एक बड़े साफ और सूखे जार या मिट्टी के बरतन में पहले एक कटोरी रखें। कोयले का एक टुकड़ा आंच पर अच्छी तरह जला लें। उस टुकड़े को चिमटे से उठा कर कटोरी में रखें और उस पर आधा चम्मच देसी घी डालें। उसी के साथ चुटकी भर हींग डाल दें। तुरंत बरतन के मुंह को किसी प्लेट से ढंक दें ताकि उसके धुएं की गंध बर्तन में भर जाए।

पांच मिनट बाद कोयले सहित कटोरी को बाहर निकालें और जार में एक लीटर या जितनी भी कांजी बनाना चाहते हैं, उतना गुनगुना पानी डालें। एक लीटर पानी के लिए दो चम्मच कुटी राई पर्याप्त है। पानी की मात्रा बढ़ा रहे हैं, तो राई की मात्रा भी बढ़ा लें। उसी पानी में स्वाद के अनुसार नमक, चौथाई चम्मच हल्दी, एक चम्मच लाल मिर्च पाउडर, चौथाई चम्मच हींग पाउडर और भुना-कुटा जीरा डाल कर अच्छी तरह मिलाएं और जार का मुंह ढंक दें। इस जार को अलग रख दें।

रोज सुबह एक बार ढक्कन हटा कर चम्मच से पानी को हिला दें। ऐसा कम से कम चार दिन करें। इसमें पड़ी राई पूरे पानी को खट्टा कर देगी और कांजी का असल स्वाद आएगा। जब कांजी परोसनी हो, तो मूंग दाल के वड़े बनाएं और उन्हें पहले गुनगुने पानी में थोड़ी देर रखने के बाद निचोड़ लें और फिर कांजी के साथ परोसें। बड़े भी चाहें, तो एक-दो दिन पहले बना कर पानी में भिगो कर रख सकते हैं और होली वाले दिन इसे परोसें।

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