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असली ‘हीरो’ कौन

कन्नड़ फिल्म की शूटिंग के दौरान दो स्टंटमैनों की जलाशय में गिरने से हुई मौत ने फिर सही मायनों में फिल्मों के असली ‘हीरो’ की दयनीय स्थिति को उजागर कर दिया है।

Author January 22, 2017 12:58 AM

श्रीशचंद्र मिश्र

एक बार में दस-बीस गुंडों को अधमरा कर देने वाले, दर्जन भर गोलियां खा कर भी खलनायक के साम्राज्य को ध्वस्त करने वाले और हवा में उड़ते हुए मार्शल आर्ट के करतब दिखाने वाले जांबाज हीरो के कारनामों पर तालियां पिटती हैं, उनकी सुपर हीरो की छवि बन जाती है जिसकी बदौलत दौलत और शोहरत उनकी मुट्ठी में आ जाती है। लेकिन असल में जो ये खतरनाक स्टंट करते हैं, वे हमेशा गुमनाम रह जाते हैं।

कन्नड़ फिल्म की शूटिंग के दौरान दो स्टंटमैनों की जलाशय में गिरने से हुई मौत ने फिर सही मायनों में फिल्मों के असली ‘हीरो’ की दयनीय स्थिति को उजागर कर दिया है। सवाल है कि अपनी जान जोखिम में डालने वाले इन स्टंटमैननों, डुप्लीकेटों या डबल्स की सुरक्षा पर क्या कभी ध्यान दिया जाएगा? परदे के पीछे के ये ‘हीरो ’ खतरनाक स्टंट करते हैं पर तालियां पिटती हंै उस हीरो के नाम जिसका सिर्फ चेहरा दिखता है। उसे महानायक बनाने वाले ‘हीरो’ अगर जख्मी हो जाएं तो उनका इलाज नहीं हो पाता। मर जाएं तो घर वालों को उपयुक्त मुआवजा नहीं मिलता। उन्हें बीमा कराने की सुविधा तक मयस्सर नहीं है। फिल्मों में इन दिनों एक्शन दृश्यों की प्रधानता हो गई है। इनको साकार करते हैं स्टंटमैन। वे आग की परवाह नहीं करते। मोटर साइकिल से शीशा तोड़ कर हवा में कलाबाजियां दिखाते हैं। गाड़ियों के टकराने के दृश्य को सजीव करते हैं। विस्फोटों का सामना करते हैं और बहुमंजिली इमारत से बिना हिचके कूद जाते हैं। बदले में उन्हें मिलती है उपेक्षा। जिस कन्नड़ फिल्म की शूटिंग के दौरान दो स्टंटमैन मारे गए उसी दृश्य में फिल्म के नायक को भी कूदना था। उसकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कर लिए गए। जाहिर है नायक को खरोंच तक नहीं आई। यही इंतजाम अगर दोनों स्टंटमैनों के लिए कर लिए जाते तो उनकी जान बच जाती। लेकिन सामान्य लोगों की परवाह आखिर कोई क्यों करे?

एक बार में दस-बीस गुंडों को अधमरा कर देने वाले, दर्जन भर गोलियां खा कर भी खलनायक के साम्राज्य को ध्वस्त करने वाले और हवा में उड़ते हुए मार्शल आर्ट के करतब दिखाने वाले जांबाज हीरो के कारनामों पर तालियां पिटती हैं, उनकी सुपर हीरो की छवि बन जाती है जिसकी बदौलत दौलत और शोहरत उनकी मुट्ठी में आ जाती है। लेकिन असल में जो ये खतरनाक स्टंट करते हैं, वे हमेशा गुमनाम रह जाते हैं। महाबली दिखने वाले हीरो कितने कागजी शेर होते हैं, इसकी एक मिसाल तो ‘कुली’ की शूटिंग के वक्त सामने आ गई थी जब नकली की जगह असली घूंसा खा जाने की वजह से अमिताभ बच्चन की यह हालत हो गई कि आज भी बीच-बीच में उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। वेंकटेश तेलुगु फिल्मों के महाबली नायक हैं। एक तमाशाई क्रिकेट मैच में वे फील्डिंग करने उतरे। गेंद को बाउंड्री सीमा पार करने से जरूर रोक लिया लेकिन उसे विकेट कीपर तक थ्रो नहीं कर पाए। पास खड़े खिलाड़ी की तरफ उन्होंने गेंद उछाल दी और दो मिनट बाद मैदान से बाहर चले गए। कप्तान होने के बावजूद खेल में उनकी सक्रियता कहीं नहीं दिखी। हो सकता है कि मनोरंजन के लिए होने वाले मैचों में उन्हें अपना चेहरा दिखाना ही काफी लगा हो या यह भी संभव है कि शूटिंग की थकान और बढ़ती उम्र की वजह से थकान उन पर हावी हो गई हो। लेकिन इमरान खान तो जवान हैं। ‘आई हेट लव स्टोरी’ में स्टूडियो में बने लकड़ी के नकली पुल को दौड़ कर दो तीन बार उन्हें पार क्या करना पड़ा कि उनके पैर में मोच आ गई।
फिल्मों में महाबली और शूरवीर दिखने वाले सितारों को यह झूठी पहचान देने के लिए खास प्रपंच रचा जाता है। खतरनाक स्टंट दृश्य बेचारे डुप्लीकेट जान की बाजी लगा कर करते हैं, वाहवाही हो जाती है सितारों की। पूरी कोशिश की जाती है कि उनसे ऐसा कोई काम न कराया जाए जो उन्हें चोटिल या बीमार कर दे। करोड़ों वे लेते हैं और करोड़ों में फिल्म बनती है। उन्हें मामूली चोट भी लग जाए तो फिल्म तो लटक गई न। लेकिन बेहद सावधानी बरतने के बावजूद हादसे हो ही जाते हैं। स्टार इसका कम शिकार होते हैं। ‘मदर इंडिया’ की शूटिंग के वक्त नरगिस आग में फंस गई थीं, लेकिन बच गर्इं। 1951 में फिल्मिस्तान की फिल्म ‘शबिस्तान’ की शूटिंग के दौरान नायक श्याम घोड़े से गिर कर बुरी तरह जख्मी हो गए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया लेकिन बचाया नहीं जा सका। अगले दिन उनकी मौत हो गई।

तब श्याम की उम्र महज तैंतीस साल थी और उनका करिअर रफ्तार पकड़ रहा था। फिल्मों में गुंजाइश खत्म होने के बाद अभिनेता संजय खान ने टीवी सीरियल बनाने शुरू दिए। ऐसे ही एक सीरियल ‘द स्वार्ड आॅफ टीपू सुल्तान (टीपू सुल्तान की तलवार) की 1989 में मैसूर के प्रीमियर स्टूडियो में शूटिंग के दौरान भयंकर आग लग गई। संजय बुरी तरह झुलस गए। उनका चेहरा बिगड़ गया। कई महीने इलाज कराने के बाद वे थोड़ा बहुत ठीक हो पाए। लेकिन उस हादसे में जो पचास से ज्यादा लोग मर गए, उनके प्रति कोई संवेदना नहीं जागी। घायलों को इलाज तक मयस्सर नहीं हो पाया। छोटे-मोटे हादसे तो हर सितारे के साथ होते रहे हैं। और कुछ हादसों ने सितारों का जीवन ही बदल दिया। एक समय था जब हीरोइन के रूप में ललिता पवार का जलवा था। एक फिल्म की शूटिंग के दौरान नायक उन्हें चाटा मारना था। कई बार कोशिश हुई पर निर्देशक को शॉट नहीं भाया। अचानक नायक का हाथ ललिता पवार के गाल पर पड़ा और जोरदार आवाज आई। शॉट तो बहुत शानदार हो गया लेकिन ललिता पवार को ऐसी चोट लगी कि उनका चेहरा ही बिगड़ गया। अर्जुन रामपाल को एक फिल्म की शूटिंग के दौरान चोट लग गई। ठीक होने और फिर काम शुरू करने में उन्हें कई हफ्ते लग गए। ‘काइट्स’ की शूटिंग के दौरान शीशे की दीवार खुद तोड़ने की जिद में ऋतिक रोशन जख्मी हो गए। ‘अग्निपथ’ बनते समय एक दृश्य में फाइटर को उठाते समय उनकी कमर में ऐसी लचक आ गई कि कई दिन उन्हें अस्पताल में रहना पड़ा। ऐसे कागजी शेरों को परदे पर सुपरमैन की तरह करतब दिखाने में जो मदद करते हैं उनकी चोट की कभी परवाह नहीं की जाती। तर्क दिया जाता है कि सितारे मेहनत करते हैं, तभी करोड़ों रुपए पाते हैं।

यह स्टंटमैन की ज्यादा खतरनाक मेहनत को नकारना ही है। परदे पर उनके अविश्वसनीय करतब उन्हें स्टार जरूर बना देते हैं लेकिन कितने स्टार हैं जो ऐसे करतब खुद करते हैं। चेहरा उनका होता है और जान हथेली पर रख कर असली काम करते हैं बेचारे ड़ुप्लीकेट, जिन्हें रोज के हिसाब से पैसा मिलता है। चोट लग जाए तो ठीक से इलाज नहीं हो पाता। अपंग हो जाएं तो काम मिलना बंद और मुआवजा एक पैसा नहीं। बीमा उनका होता नहीं। स्टंट करते हुए मर जाएं तो उनके घर वालों को खैरात मिल जाती है, वाजिब मुआवजा नहीं। सितारों को खांसी भी आ जाए तो उन्हें हर तरह की चिकित्सा उपलब्ध हो जाती है लेकिन डुप्लीकेट जख्मी हो जाए तो उसकी कोई चिंता नहीं करता। फिल्म ‘इंटरनेशनल क्रुक’ में हेलिकॉप्टर से समुद्र में कूद कर धर्मेंद्र ने तो तालियां बजवा लीं लेकिन असल में वह दृश्य करने वाले डुप्लीकेट की गिरते ही उसकी मौत हो जाना किसी के लिए दुख और चिंता का सबब नहीं बना।
पिछले कुछ समय में स्थितियां थोड़ी बहुत सुधरी हैं, खास तौर पर मेहनताने के मामले में। अस्सी के दशक में आठ घंटे की एक शिफ्ट के लिए स्टंटमैन को पौने दो सौ रुपए मिलते थे। नब्बे के दशक में यह रकम सिर्फ बीस रुपए बढ़ी।

पांच-सात साल पहले तक स्टंटमैन का एक शिफ्ट का मेहनताना डेढ़ हजार रुपए था जो अब चार हजार रुपए हो गया है। शूटिंग के दौरान गंभीर रूप से घायल हो जाने पर निर्माता को एक महीने में पंद्रह शिफ्ट का पैसा उन्हें देना होता है। लेकिन रिहर्सल के दौरान चोट लगने पर फूटी कौड़ी नहीं मिलती। मौत हो जाने पर पांच लाख रुपए का मुआवजा दिए जाने की व्यवस्था है लेकिन यह रकम आसानी से नहीं मिल पाती। रही जोखिम से बचने की बात तो बार-बार होते हादसों के बावजूद इस दिशा में कुछ ठोस नहीं हुआ है। हॉलीवुड में इस तरफ विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सुरक्षा के विशेष इंतजाम वहां किए जाते हैं ताकि शूटिंग के दौरान हादसों को न्यूनतम किया जा सके। इसके लिए बेहतर उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है। भारत में भी यह हो सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की और स्टार को पूजने की मानसिकता बदलने की। स्टार पर जितना पैसा खर्च किया जा सकता है, उसके दस फीसद से ही स्टंटमैन को सुरक्षित माहौल दिया जा सकता है। ०

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