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रविवारी: बचपन की नई बुनियाद

बदलते समय, तकनीकी विस्तार, छोटे होते परिवार, माता-पिता की बढ़ती व्यस्तताएं, समाज के सिकुड़ते दायरे, पढ़ाई-लिखाई के बदलते स्वरूप आदि का प्रभाव बच्चों पर भी पड़ रहा है। बच्चों की मासूमियत छिन रही है। वे बहुत जल्दी बड़ों की दुनिया में दाखिल हो जा रहे या फिर उससे अलग हो जाते हैं। बच्चों में आ रहे कई बदलाव गंभीर चिंता भी पैदा करते हैं। पर बच्चों को लेकर जैसी नीतियां और व्यवस्थाएं होनी चाहिए, उनका भी अभाव है। बच्चों की बदलती दुनिया का विश्लेषण कर रही हैं क्षमा शर्मा।

Author November 11, 2018 1:31 AM
प्रतीकात्मक फोटो

मध्यवर्ग के किसी बच्चे की दिनचर्या पर आपने कभी नजर डाली है। हर बच्चा सवेरे उठता होगा। जल्दी-जल्दी नहा कर, नाश्ता करके स्कूल की तरफ दौड़ता होगा। वहां पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद के बाद दोपहर को घर लौटता होगा। घर में हाथ-मुंह धोकर, कपड़े बदल कर खाना खाता होगा। होमवर्क निपटाता होगा। हो सकता है, थोड़ा-बहुत टीवी देखता हो या नेट सर्च करता हो। होम वर्क निपटाने के बाद वह ट्यूशन पढ़ने जाता होगा। शाम को कुछ समय बचा तो दोस्तों के साथ खेलता होगा वरना तो ट्यूशन या कोचिंग सेंटर में ही रात हो जाती होगी। इन बच्चों की इतनी व्यस्त दिनचर्या देख कर इन पर तरस आता है। यह ऐसा समय है जब बड़ों से लेकर बच्चे तक समय न होने की बात करते हैं। आखिर हमारा समय कहां गया। अगर बच्चे दुधमुंहेपन से ही इतने व्यस्त हो जाएंगे, तो बड़े होकर उनका क्या होगा। चौदह नवंबर चाचा नेहरू के जन्म दिवस पर क्या ठहर कर हम आज के इस बच्चे के बारे में सोच सकते हैं।

जब कभी माता-पिता के पास समय होता है, तो वे इन्हें घुमाने, फिल्म दिखाने, किसी के जन्मदिन पर, किसी त्योहार-वार की खरीदारी, किसी रिश्तेदार के यहां उत्सव पर ले जाते हैं। मगर ज्यों ज्यों बच्चे बड़े होते हैं वे अपने दोस्तों के साथ रहना चाहते हैं। बड़ों और माता-पिता की संगत में बोर होते हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि घर वालों को बच्चों की इसी संगत पर विशेष ध्यान देना चाहिए। क्योंकि अपने आसपास के बच्चों को देखकर ही बच्चे बहुत-सी बातें सीखते हैं। एक प्रतियोगिता की भावना भी होती है। सबसे पहले तो यह प्रतियोगिता यहां से शुरू होती है कि जब तुम्हारे दोस्त या तुम्हारी कोई सहेली सौ में से सौ नंबर ला सकती है, तो तुम क्यों नहीं। माता-पिता घर वाले और अध्यापक इस तरह की तुलना अकसर करते हैं। उनका उद्देश्य बच्चे को और अच्छा बनने और पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित करने का होता है, मगर अगर आपसी प्रतियोगिता शुरू हो जाए तो वह वहीं नहीं रुकती, जहां माता-पिता चाहते हैं।

इसीलिए कई बार माता-पिता की आशाओं पर खरा न उतरने पर बच्चे अपनी जान तक दे देते हैं। हाल ही में एक बच्ची ने सिर्फ इसलिए जान दे दी क्योंकि उसका भाई उसे टीवी का रिमोट नहीं दे रहा था। बच्चों पर अच्छा कर दिखाने, तमाम प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने का इतना दबाव होता है कि वे कई बार इस तनाव को नहीं झेल पाते। परीक्षा के दिनों में बच्चों का तनाव दूर करने के लिए हेल्पलाइनें होती हैं। तरह-तरह के विशेषज्ञ सलाह के लिए होते हैं, मगर तनाव दूर नहीं होता। यही कारण है कि सोचा जा रहा है कि बच्चों को खुशी देने के लिए हैप्पीनैस पाठ्यक्रम अलग से बनाए जाएं। दिल्ली के स्कूलों में ऐसा पाठ्यक्रम शुरू भी किया गया है। मध्यप्रदेश में हैप्पीनैस मंत्रालय बनाया गया है। लोग ऐसी कक्षाएं चलाने के बारे में सोच रहे हैं, जहां बच्चों और बड़ों को खुश रहने के तरीके सिखाए जा सकें। ऐसा क्या हुआ कि पास में सब कुछ है, महंगी से महंगी उपभोक्ता वस्तुएं हैं, चीजें खरीदने के लिए खूब पैसे हैं, पर खुशी नहीं है। जिनके पास कोई सुविधा नहीं, जो गरीब बच्चे हैं, किताब-कॉपी खरीदने और स्कूलों में मास्टरों के लिए तरसते हैं, वे क्या करें।

अभिभावकों की जिम्मेदारी
पहले कहा जाता था कि खुशी हमेशा अपने अंदर से आती है, लेकिन अब इसे बाहर से ढूंढ़ना पड़ रहा है। घर खुशी पाने की जगह क्यों नहीं रहे। मित्रों के साथ खेलना-कूदना, गप्पें लड़ाना, यहां तक कि लड़ना-झगड़ना, बहस करना, घूमना बच्चों को खुशी क्यों नहीं दे रहा। जिन उपभोक्ता वस्तुओं के बारे में रात-दिन शोर मचा रहता है कि यह खरीदो, वह खरीदो, फिर देखो कि तुम्हारी झोली खुशियों से किस तरह भरती है, वे सब चीजें माता-पिता अपने बच्चों को उपलब्ध भी कराते हैं। बल्कि सोच यह रहती है कि बचपन में जो मुश्किलें, अभाव माता-पिता ने झेले वे उनके बच्चों को न झेलने पड़ें। बच्चों के हाथ में छुटपन से ही उनन्त तकनीक के उपकरण, जैसे कि मोबाइल टेबलेट पकड़ा दिए जाते हैं। अधिकतर माता-पिता बच्चों को इस तरह से व्यस्त करके सोचते हैं कि इससे वे बच्चों के तमाम तरीके के सवालों और जिज्ञासाओं से बचेंगे।

पर वे यह भूल जाते हैं कि बच्चा शायद इन चीजों को पाकर खुश हो जाए, मगर माता-पिता से अपने मन की बात कहना, उसका समाधान पाना, यह विश्वास कि वह अपने माता-पिता को कोई भी बात, समस्या बता सकता है और उसका हल पा सकता है, यह विश्वास अगर बच्चे के मन में हो, यो यह न केवल उसका आत्मविश्वास बढ़ाता है, बल्कि बहुत-सी चुनौतियों से जूझने की क्षमता भी देता है। बच्चे की मानसिक ताकत के लिए जरूरी है कि वह अपने माता-पिता का विश्वास जीत सके और माता-पिता भी उसके विश्वास पात्र बन सकें। इसके लिए बच्चे को नहीं, माता-पिता को पहल करनी पड़ती है। उन्हीं को भरोसा दिलाना पड़ता है कि वे बच्चे के लिए हर समय मौजूद हैं।

सर्वेक्षण बताते हैं कि आज माता-पिता और बच्चे के बीच समय के अभाव के कारण भावनात्मक रिश्ते टूटते जा रहे हैं। तकनीक ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई है। पिछले दिनों ब्लू वेल के चंगुल से एक बच्चे को बचाया गया था, तो उसने कहा था कि उसके माता-पिता के पास उसके लिए समय ही नहीं है। वे दिन भर दफ्तर में रहते हैं और लौट कर अपने-अपने मोबाइल या लैपटाप में व्यस्त हो जाते हैं। बहुत साल पहले मुंबई के एक प्रसिद्ध स्कूल के बारे में छपा था कि वहां जुड़वां भाई पढ़ते हैं। छुट्टियों में भी, बड़े-बड़े पदों पर काम करने वाले उनके माता-पिता उन दोनों को साथ नहीं ले जाना चाहते। वे कहते हैं कि दो बच्चों को एक साथ नहीं संभाल सकते। स्कूल का कहना था कि बहुत से माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चों को छुट्टियों के दौरान भी स्कूल में रखने की व्यवस्था की जानी चाहिए। मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग के बच्चों का यह डरावना सच है। तकनीक ने जहां बच्चों की राह आसान बनाने की कोशिश की है, वहीं वे भावनात्मक रूप से कमजोर होते गए हैं।

प्यार बनाम पैसा
आज रिसर्च बता रही हैं कि माता-पिता के प्यार भरे स्पर्श का कोई मुकाबला नहीं। जो बच्चे जन्म के तुरंत बाद मां के दिल के पास सोते हैं, वे बड़े होकर भावनात्मक रूप से बेहद मजबूत होते हैं। इसी तरह कहा जाता है कि बच्चों को कम से कम तीन साल की उम्र तक अपनी मां के पास सोना चाहिए। यह सच भी है। मां और बच्चे का जो नाभि-नाल सम्बंध है, उसकी मिसाल किसी दूसरे रिश्ते से नहीं दी जा सकती। पर समाज में बच्चे की खुशियों को किसी भावनात्मक संबंध के मुकाबले किसी कार, किसी महंगे खिलौने, किसी घड़ी, अच्छे कपड़ों वगैरह से जोड़ दिया गया है। और कुछ इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है कि अगर ये चीजें बच्चों के पास हैं, तो वे दुनिया में परम सुखी हैं। गिजमोज के जरिए जिस राह को आसान बनाने की कोशिश की जाती है आखिर बच्चों के लिए वह कठिन क्यों होती जाती है। कम्प्यूटर और नेट बच्चों के लिए दुनिया के दरवाजे खोल सकता है, मगर हमारे यहां ज्ञान के लिए एक उम्र तय की गई है। हर उम्र का ज्ञान हर एक के लिए ठीक नहीं है। ज्ञान की सीमा बच्चों और बड़ों के लिए अलग-अलग होती है। जो ठीक भी है। बच्चों को बड़ों का ज्ञान देकर हमें उनकी मासूमियत नहीं छीननी चाहिए। जो कुछ उम्र के जिस पड़ाव पर जानना चाहिए वह उसी पड़ाव पर पता चलना चाहिए, वह ठीक भी है। वरना ऐसी खबरें आती ही हैं कि बच्चे इन दिनों बड़ी संख्या में पोर्न देखते हैं। वे सबसे अधिक फेसबुक यूजर्स हैं। इनमें से कोई भी बात बच्चे के विकास में नकारात्मक भूमिका ही निभा सकती है।

हालांकि अपने देश में अलीक पदमसी जैसे लोग भी हैं। अलीक ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उनके दोस्त का बच्चा आठ साल में पोर्न पत्रिका देखता था और उनके दोस्त को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। शायद अलीक अपने बच्चों को ऐसा नहीं करने देंगे। अपने और दूसरे के बच्चे के लिए हमारे मानक अलग होते हैं। तभी तो फैंटेसी के संपादक ने एक बार कहा था कि वे अपनी पत्रिका कभी घर नहीं ले जाते हैं। वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे उसे देखें।

खुशी की तलाश
बच्चों के बारे में उनकी उम्र को ध्यान में रख कर ही सोचा जाना चाहिए। अगर सब कुछ होने के बावजूद बच्चे खुश नहीं हैं, तो ऐसा है क्यों। यह खुश और संतुष्ट न होने का परिणाम ही तो है कि मामूली बातों पर कोई अपनी जान ले ले या दे दे। किशोरों में यह प्रवृत्ति बढ़ती पाई गई है। बल्कि बड़े पैमाने पर बच्चे हिंसक हो रहे हैं। और आश्चर्य तो यह है कि बच्चे बच्चों की हिंसा का शिकार हो रहे हैं। बल्कि बड़े भी इससे नहीं बच पा रहे हैं। गुड़गांव के स्कूल में सिर्फ इम्तिहान टलवाने के लिए एक किशोर ने एक छोटे बच्चे को मार डाला। उसने इस पर कोई अफसोस भी प्रकट नहीं किया। इसी तरह एक बच्चे की मां ने उसे टीवी देखने को मना किया और पढ़ने को कहा, उसे यह बात इतनी बुरी लगी कि अपने किक्रेट बैट से मां के सिर पर तब तक मारता रहा जब तक कि वह मर नहीं गई। फिर नीचे आकर पहले की तरह टीवी देखने लगा जैसे कि कुछ हुआ ही न हो! कई बार तो इन बच्चों को सही राह पर लाने वाले काउंसिलर्स भी इन्हें नहीं समझ पाते। पिछले दिनों दक्षिण दिल्ली में एक अट्ठाइस साल के युवक की गरदन दो कूड़ा बीनने वाले बच्चों ने बोतल से काट दी। यह युवक इन बच्चों से परिचित था। समय-समय पर इनकी आर्थिक मदद भी करता था। एक शाम यह शराब पी रहा था। ये दोनों बच्चे पास आकर उससे पैसे मांगने लगे। युवक ने उनसे भाग जाने को कहा। बस बच्चों ने आव देखा न ताव, उसी बोतल को तोड़ा जिससे युवक पी रहा था और उससे उसकी गरदन काट दी। इन बच्चों को भी इस युवक की इस तरह से हुई मौत का कोई दुख नहीं था।

छीजती संवेदना
क्या वजह है कि छोटी उम्र में ही बच्चे किसी भी तरह की संवेदनशीलता और भावुकता से दूर होते जा रहे हैं। और ऐसा नहीं कि इस बारे में किसी ने चेताया न हो। स्कूलों के तमाम अध्यापक, समाज शास्त्री, बच्चों के लिए काम करने वाले संगठन लगातार इस ओर इंगित कर रहे हैं। बच्चों के अकेलेपन के कारण भी वे उन राहों पर बढ़ते हैं जहां से वापस लौटना मुश्किल होता है, लेकिन जब तक समाज, परिवार या बच्चों के अन्य शुभचिंतकों को यह बात समझ में आती है, बहुत देर हो चुकी होती है। बच्चे अपराधों की दुनिया में न चाहते हुए भी शामिल हो जाते हैं। उन्हें ड्रग एडिक्ट बना दिया जाता है। वे साइबर अपराधियों के चंगुल में फंस कर न केवल तरह-तरह के अपराधों को अंजाम देते हैं, बल्कि बहुत बार उनसे घर से भी चोरी-चकारी कराई जाती है। यूनीसेफ ने साइबर अपराधियों से बच्चे कैसे बचें, इस पर कई साल पहले एक सेमिनार भी कराया था। इसमें अनेक स्वसहायता समूहों, अध्यापकों, माता-पिता और पुलिस अधिकारियों को बुलाया गया था। बहुत से लोगों ने अपने-अपने अनुभव सुनाए थे, जो रोंगटे खड़े कर देने वाले थे।

सच तो यह है कि बच्चों पर किसी का ध्यान तभी जाता है, जब वे किसी हादसे का शिकार हो जाते हैं। वरना राजनीति से लेकर मीडिया तक बच्चे हमारी चिंताओं से बाहर हैं। यही कारण है कि किसी राजनीतिक दल के घोषणापत्र में बच्चों की किसी समस्या का जिक्र नहीं होता। हो भी कैसे। बच्चे वोट तो देते नहीं, जो उन्हें रिझाने के लिए तरह-तरह के वादे किए जाएं। मीडिया का हाल भी यही है। वहां बच्चे लगभग उपेक्षित हैं। जबकि चैनल्स जिन विज्ञापनों से भरे रहते हैं वहां आजकल बच्चे बड़ी संख्या में नजर आते हैं। कंपनियां अपनी-अपनी ब्रांड को बच्चों के बीच बच्चों के जरिए लोकप्रिय करना चाहती हैं, क्योंकि जो आदतें बचपन में पड़ जाती हैं वे जीवन भर बनी रहती हैं। बच्चों के खान-पान, कपड़ों-लत्तों से लेकर बड़ों की चीजें बेचने तक में उनकी सहायता ली जा रही है।

मगर जिन बातों से उनका मानसिक विकास हो सकता है, जैसे कि किताबें, उनके बारे में बहुत कम जानकारी दी जाती है। मान लिया गया है कि बच्चे को जो चाहिए, जो पढ़ना है, जो ज्ञान लेना है, वह सबका सब गूगल पर उपलब्ध है, तब फिर और किसी पचड़े में क्यों पड़ जाए। इसीलिए बाल साहित्य भी जैसे ऐसी बात है कि बच्चों के लिए लिखना भी कोई लिखना होता है! क्या हिंदी के लिए यह दुर्भाग्य की बात नहीं कि मुकाबला तो हम विश्व साहित्य से करना चाहते हैं, लेकिन बच्चों की बात आते ही कन्नी काटने लगते हैं। बांग्ला, मलयालम, मराठी आदि भाषाओं में बड़े साहित्यकारों ने बच्चों के लिए खूब लिखा है। हिंदी में भी पुरानी पीढ़ी के बहुत से साहित्यकार बच्चों के लिए लिखते रहे हैं। पर बीच में एक दौर ऐसा जरूर आया कि लोग बच्चों के लिए लिखना अपने स्तर से नीचे की बात समझने लगे।

यों बच्चों के लिए हर साल हजारों की संख्या में किताबें छपती हैं। मगर न बच्चों को और न उनके माता-पिता को इसके बारे में कुछ पता होता है। क्योंकि अखबारों आदि में अक्सर बाल साहित्य और बच्चों के लिए लिखी गई पुस्तकों की जानकारी बहुत कम दी जाती है। राजनीतिक दलों की तरह बच्चे अखबारों के भी पाठक नहीं हैं, तो अखबार भी उनकी ज्यादा चिंता क्यों करें! फिर दादी नानी का जमाना भी चला गया है। संयुक्त परिवारों के टूट जाने से जहां बच्चों का अकेलापन बढ़ा है, वहीं बात-बात में घर के बड़ों द्वारा सुनाई गई कहानियों, कहावतों, मुहावरों आदि से बच्चों की जो ज्ञान वृद्धि होती थी, वह भी बच्चों को सहज उपलब्ध नहीं रही। १

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