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कविताः पत्ता कोई हिला नहीं

कुछ शब्द एक जैसे लगते हैं। इस तरह उन्हें लिखने में अक्सर गड़बड़ी हो जाती है।

Author July 8, 2018 7:08 AM
कविता

रावेंद्र कुमार रवि

सूरज का गुस्सा देखा तो,
हवा रूठ कर चली गई!
बहा जा रहा खूब पसीना,
पत्ता कोई हिला नहीं!

दर्जी को देकर आए थे
जो सफेद कुर्ता खादी का!
‘लाइट’ जाने के चक्कर में,
अब तक उसने सिला नहीं!

दिन भर धूप सही, कुम्हलाया
आंसू भर कर ना रो पाया!
कोशिश उसने बहुत करी पर,
फूल ‘बिचारा’ खिला नहीं!

आम चूस कर खाया हमने,
अनन्नास का जूस पिया!
हुआ सूख कर डंडे-जैसा,
गन्ना हमसे छिला नहीं!

कमी खल रही है पेड़ों की,
पेड़ लगाना भूल गए!
परेशान हैं गरमी से सब,
फिर भी खुद से गिला नहीं!

शब्द-भेद

कुछ शब्द एक जैसे लगते हैं। इस तरह उन्हें लिखने में अक्सर गड़बड़ी हो जाती है। इससे बचने के लिए आइए उनके अर्थ जानते हुए उनका अंतर समझते हैं।

बयान / बयाना / बयना

वक्तव्य देने, विवरण, वृत्तांत देने को बयान कहते हैं। जैसे अदालत में अभियुक्त के बयान लिए जाते हैं। जबकि किसी काम के लिए तय पारिश्रमिक का एक हिस्सा काम शुरू होने से पहले ही यानी पेशगी के तौर पर दिया जाता है, तो उसे बयाना कहते हैं। बयना, बायना या बैना त्योहारों या मांगलिक अवसरों पर अपने रिश्तेदारों-मित्रों-पड़ोसियों आदि को उपहार के तौर पर दी जाने वाली मिठाई को कहते हैं। बयना का एक अर्थ बीज बोना भी है।

नटखट

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