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शख्सियत: रांगेय राघव को क्यों कहा जाता है हिंदी साहित्य का शेक्सपियर?

निधन: रांगेय राघव का निधन कैंसर के कारण 1962 में हो गया।

Author January 13, 2019 1:59 AM
रांगेय राघव (जन्म : 17 जनवरी, 1923- निधन : 12 सितंबर, 1962)

किसी वाद या विधा में खुद को न बांधने वाले रांगेय राघव को हिंदी साहित्य का शेक्सपियर कहा जाता है। तमिल भाषी होने के बावजूद हिंदी साहित्य को उन्होंने अपनी अमूल्य रचनाओं से परिपूर्ण किया। उनका निधन केवल उनतालीस वर्ष की उम्र में हो गया था, लेकिन इतने कम समय में उन्होंने अड़तीस उपन्यास लिखे। यही नहीं, उन्होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लिखा। रांगेय राघव का कहना था कि कोई व्यक्ति जितने समय में कोई पुस्तक पढ़ेगा, उतने में वे एक किताब लिख सकते हैं। रांगेय राघव का मूल नाम तिरूमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य था। लेकिन उन्होंने अपना साहित्यिक नाम रांगेय राघव रखा। इनका परिवार मूलरूप से तिरुपति, आंध्र प्रदेश का निवासी था, पर राघव का जन्म उत्तर प्रदेश के आगरा में हुआ था। रांगेय राघव का विवाह सुलोचना से हुआ था।

लेखन की शुरुआत: रांगेय राघव ने जब विधिवत लेखन की शुरुआत की तब देश स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था। आजादी के संघर्ष में हिंदी का जोर था। ऐसे में उन्होंने भी हिंदी में लेखन किया। उन्होंने सबसे पहले कविता लिखनी शुरू की। पर वे ‘घरौंदा’ उपन्यास के जरिए प्रगतिशील कथाकार के रूप में चर्चित हुए। यह उपन्यास उन्होंने महज अठारह साल की उम्र में लिखा था।

इसलिए कहा जाता है शेक्सपियर: हिंदी और तमिल के अलावा रांगेय राघव को कई विदेशी भाषाओं का ज्ञान था। उन्होंने जर्मन और फ्रांसीसी साहित्यकारों की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया। उन्होंने शेक्सपियर की रचनाओं का भी हिंदी में इतना अच्छा अनुवाद किया कि वे मूल रचना जैसी प्रतीत होती हैं। यही वजह है कि रांगेय राघव को हिंदी का शेक्सपियर कहा जाता है। शेक्सपियर के दस नाटकों का उन्होंने हिंदी में अनुवाद किया था।

स्त्री की आवाज बने राघव: रांगेय राघव ने केवल ऐतिहासिक उपन्यास नहीं लिखे, बल्कि ऐसे ऐतिहासिक उपन्यास लिखे जिनके चरित्र महिलाओं से जुड़े थे। रांगेय राघव ने इन ऐतिहासिक या पौराणिक पात्रों को एक स्त्री के नजरिए से देखा। राघव अपने वक्त के लेखकों से पहले ही प्रगतिशील हो गए थे। उन्होंने ‘गदल’ कहानी लिखी, जो आधुनिक स्त्री-विमर्श की कसौटी पर खरी उतरती है। राघव के उपन्यासों के नाम उनसे जुड़ी महिलाओं के नाम पर थे। जैसे ‘भारती का सपूत’ जो भारतेंदु हरिश्चंद्र की जीवनी पर आधारित है। ‘मेरी भव बाधा हरो’ कवि बिहारी के जीवन पर आधारित है, ‘लखिमा की आंखें’ जो विद्यापति के जीवन पर आधारित है। तुलसी के जीवन पर आधारित ‘रत्ना की बात।’ ‘लोई का ताना’ जो कबीर जीवन पर आधारित है। गोरखनाथ के जीवन पर आधारित कृति है ‘धूनी का धुआं।’ ‘यशोधरा जीत गई’ जो गौतम बुद्ध पर लिखा गया है। ‘देवकी का बेटा’ जो कृष्ण के जीवन पर आधारित है। उन्होंने ‘कब तक पुकारूं’ और ‘धरती मेरा घर’ जैसे आंचलिक उपन्यास भी लिखे। रांगेय ने कुल मिलाकर डेढ़ सौ से अधिक पुस्तकें लिखीं।

सम्मान: साहित्य में उनके योगदान को सरकार ने भी सम्मानित किया। उन्हें 1947 में हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार, 1954 में डालमिया पुरस्कार, 1957 और 1959 में उत्तर प्रदेश शासन पुरस्कार, 1961 में राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार और 1966 में मरणोपरांत महात्मा गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

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