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स्मृति: कविता का विस्तृत और विश्वसनीय संसार

नागार्जुन ने अपनी एक कविता में स्वयं को ‘तरल आवेगों वाला हृदयधर्मी जनकवि’ कहा है। उनका यह कथन एक ऐसे समय में सुनाई पड़ता है जब कविता में हृदय सुलभ गुण यानी भावुकता लगभग एक अस्पृश्य-सी वस्तु मान ली गई है।

Author July 1, 2018 5:52 AM
नागार्जुन की काव्य संवेदना के केंद्र में लोक है। अपने गांव, अंचल और परिवेश के प्रति नितांत घनिष्ठता और आत्मीयता का भाव उनकी अनेक कविताओं में व्यक्त हुआ है।

आनंद शुक्ल

प्रगतिशील काव्यधारा के महत्त्वपूर्ण कवि नागार्जुन के संबंध में यह बात सहज ही कही जा सकती है कि समकालीन काव्य परिदृश्य में भी उन्हें केंद्रीयता प्राप्त रही है। उनकी कविताएं अपनी काव्यात्मक ऊर्जा, गहरी आंचलिकता, ठेठपन, तद्भवता, व्यंग्यपूर्ण आक्रामकता और जीवन से गहरी संपृक्ति का प्रमाण देती हैं। नागार्जुन ने समकालीन परिवेश से प्रभावित होकर सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर पर्याप्त रचनाएं लिखी हैं। उनकी विशेषता यह भी है कि उन्होंने तात्कालिक विषयों पर महत्त्वपूर्ण रचनाएं की हैं। कविता के लिए जो विषय अकल्पनीय और असंभव माने जाते हैं, उन पर भी नागार्जुन ने कविताएं लिखीं और असाधारण सफलता प्राप्त की। उनकी कविताओं में बड़ी संख्या ऐसी रचनाओं की भी है, जिनमें जीवन और जगत के प्रति प्रगाढ़ और आत्मीय राग की अभिव्यक्ति हुई है।

उनकी कविताएं भाव, विचार, संवेदना और शिल्प की बहुलता का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। नागार्जुन हमारे समक्ष एक संवेदनशील, भावुक, आवेगवान, हृदयधर्मी रचनाकार होने के साथ-साथ सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों वाले, यथार्थदृष्टि संपन्न जनकवि के रूप में उपस्थित होते हैं। उनका काव्य-संसार जहां एक ओर प्रकृति, परिवेश, सौंदर्य, प्रणय, और प्रेमभाव की अनुभूतियों से अनुप्राणित है, वहीं दूसरी ओर अपने युग की सामाजिक-राजनीतिक चेतना से संपृक्त भी है।

नागार्जुन ने अपनी एक कविता में स्वयं को ‘तरल आवेगों वाला हृदयधर्मी जनकवि’ कहा है। उनका यह कथन एक ऐसे समय में सुनाई पड़ता है जब कविता में हृदय सुलभ गुण यानी भावुकता लगभग एक अस्पृश्य-सी वस्तु मान ली गई है। नागार्जुन ने अपने समय की प्रचलित कविता से भिन्न स्तर पर अपने काव्य में भावना यानी हृदय पक्ष को प्रधानता दी है। उनकी प्रकृति और प्रेम पर लिखी कविताओं में यह भावुकता अपने सर्वोत्तम रूप में उपलब्ध है, जो कि उनके समकालीन कवियों के यहां कम दिखती है। नागार्जुन के काव्य में आई यह भावुकता कोरी भावुकता या कल्पनाजनित नहीं, बल्कि यह निरंतर एक गहरी यथार्थ दृष्टि से अनुशासित होती रहती है। इस दृष्टि से नागार्जुन परंपरागत स्वच्छंदतावादी काव्य प्रवृत्तियों से भिन्न स्तर पर खड़े दिखाई देते हैं। उनके काव्य-व्यक्तित्व में मौजूद इस हृदयधर्मी चेतना की अभिव्यक्ति उनकी कविताओं में सदैव विद्यमान रही है।

नागार्जुन की काव्य संवेदना के केंद्र में लोक है। अपने गांव, अंचल और परिवेश के प्रति नितांत घनिष्ठता और आत्मीयता का भाव उनकी अनेक कविताओं में व्यक्त हुआ है। अंचल के प्रति गहरे लगाव और अपनी यायावरी वृत्ति के कारण नागार्जुन ने प्रकृति और परिवेश के विविध रूपों को अपनी खुली आंखों से देखा और अनुभव किया है। अपने इस अनुभव को बोलचाल की भाषा, लोक जीवन की शब्दावली और लोक छंदों में व्यक्त किया है। इस दृष्टि से उनकी कविता अपने पूरे विन्यास में लोक जीवन की सच्ची कविता है। ‘सिंदूर तिलकित भाल’, ‘ऋतु संधि’, ‘एक मित्र को पत्र’, ‘बहुत दिनों के बाद’ आदि अनेक कविताएं हैं, जिनमें अपनी धरती का मोह, जमीन से बिछुड़ने की पीड़ा, अपने गांव तरउनी की उमंग भरी यादें, वहां की प्रकृति, वहां की सामान्य से सामान्य वस्तु की अनुभूति मिलती है।

नागार्जुन के प्रकृति चित्रण की विशिष्टता इस अर्थ में भी है कि उनके यहां प्रकृति जनसाधारण के सुख-दुख में भागीदार बनती है और यह तभी संभव है जब कवि का जनसामान्य से सहज और आत्मीय संबंध हो। नागार्जुन की अनेक कविताएं इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं। नागार्जुन ने ‘बादल’ और ‘वर्षा ऋतु’ पर कई कविताएं लिखी हैं। अनुभव की प्रामाणिकता नागार्जुन में इतना साहस पैदा करती है कि वह कहते हैं- ‘जाने दो वह कवि कल्पित था/ मैंने तो भीषण जाड़ों में/ नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर/ महामेघ को झंझानिल से/ गरज-गरज भिड़ते देखा है/ बादल को घिरते देखा है।’ यह जीवन और जगत के व्यापक संदर्भों से संबद्ध होने के साथ ही निजी अनुभूतियों की कविता है। प्रकारांतर से इसे शास्त्रीयता पर लोक की विजय के रूप में भी देखा जा सकता है।

नागार्जुन के प्रणय चित्र शालीन और गरिमा युक्त हैं। ‘सिंदूर तिलकित भाल’ कविता में प्रिया के स्मरण के साथ-साथ ग्रामांचल के प्रति भी लगाव चित्रित है। ‘दंतुरित मुस्कान’ में प्रेयसी की मुस्कान पर मुग्ध होने के साथ ही उसकी मां को भी धन्यवाद ज्ञापित किया गया है। कई कविताओं में प्रेयसी के प्रेरणादायी रूप का चित्रण है। उनकी कविताओं में पत्नी प्रेम और गृहस्थ जीवन के आंतरिक सौंदर्य की दुर्लभ अभिव्यक्तियां मिलती हैं। प्रेम की अभिव्यंजना में व्यंग्य और हास्य भी कितनी सार्थक भूमिका निभा सकता है, इसका अनूठा उदाहरण नागार्जुन के यहां मिलता है। लोकगीतों की ठिठोली और मजाक की परंपरा को नागार्जुन ने अपनी कविताओं के माध्यम से आगे बढ़ाया है। कुल मिलाकर नागार्जुन के यहां प्रणयानुभूति का स्रोत समर्पण, आस्था, निष्ठा और गहरी आत्मीयता है। उनके यहां प्रेम जीवनोत्सव के रूप में सामने आता है, ठेठ भारतीय संस्कार के रूप में, जो मानवीय संवेदना को विस्तृत करते हुए मनुष्य को अधिक मानवीय बनाता है।

नागार्जुन को ‘स्वाधीन भारत का प्रतिनिधि जनकवि’ कहा गया है। उन्होंने स्वयं इसकी स्वीकारोक्ति की है ‘जनता मुझसे पूछ रही है, क्या बतलाऊं/ जनकवि हूं मैं साफ कहूंगा, क्यों हकलाऊं?’ नागार्जुन के काव्य में देश के सामाजिक-राजनीतिक जीवन की सच्चाइयों की प्रखर अभिव्यक्ति हुई है। आजादी के पूर्व और पश्चात के लगभग पचास-साठ वर्षों में भारतीय किसान, मजदूर, निम्न मध्यवर्ग और निचले तबके के जीवन में जो कुछ भी घटित हुआ है, उसके बहुलांश की स्वाभाविक और मार्मिक अभिव्यक्ति नागार्जुन के काव्य में मिलती है। उनके यहां अपने युग के सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ को देखने की एक विशेष दृष्टि है, जिसे वर्ग चेतना प्रधान दृष्टि कहा गया है। शोषित वर्ग के जीवन की विसंगतियों और विषमताओं को उजागर करते हुए नागार्जुन ने कहीं अपना क्षोभ प्रकट किया है और कहीं सात्विक क्रोध।

नागार्जुन ने सामाजिक-आर्थिक विषमता को किसान, मजदूर और निम्न मध्यवर्ग के जीवन की दीन-हीन दशाओं के माध्यम से चित्रित किया है। उनकी कविताओं में गरीबी, भुखमरी, बदहाली, अकाल, बेकारी, अभावग्रस्तता के असंख्य चित्र अपनी संपूर्ण मार्मिकता के साथ व्यक्त हुए हैं। ‘देखना ओ गंगा मैया’, ‘खुरदुरे पैर’, ‘नाकहीन मुखड़ा’, ‘प्रेत का बयान’, ‘अकाल और उसके बाद’ आदि अनेक कविताएं इसी चेतना का प्रमाण हैं। ‘प्रेत का बयान’ कविता प्राइमरी स्कूल के एक अल्पवेतन भोगी अध्यापक का यथार्थ चित्र है। ऐसे चित्र कविता के इतिहास में दुर्लभ हैं। ‘अकाल और उसके बाद’ कविता न केवल अकाल की भयावहता को चित्रित करती है, बल्कि इस बात का प्रमाण भी देती है कि काव्य में अप्रचलित शब्दों और स्थितियों को लेकर इतनी सशक्त कविता लिखना नागार्जुन की ही सामर्थ्य है।

नागार्जुन के यहां शोषण और अत्याचार की व्यवस्था की नियामक शक्तियों की पहचान स्पष्ट है और वे सदैव इन ताकतों का विरोध करते हैं, उनका प्रतिकार करते हैं। वे कहते हैं ‘प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव है मेरे कवि का’। यह प्रतिहिंसा ही नागार्जुन की शक्ति है, क्योंकि यह जितनी उनकी है उससे ज्यादा उस जनता की है, जिसके वे प्रतिनिधि कवि हैं। इसलिए नागार्जुन जनता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता स्पष्ट करते हुए कहते हैं ‘जन-जन में जो ऊर्जा भर दे, मैं उद्गाता हूं उस रवि का।’ नागार्जुन के काव्य में क्रांति का आह्वान सोद्देश्य है, जिसमें समसामयिक जीवन स्थितियों में परिवर्तन की आकांक्षा के साथ ही भविष्य की मंगलकामना भी है। नागार्जुन सामाजिक परिवर्तन के पक्षधर हैं, पर सामाजिक परिवर्तन की उनकी परिकल्पना स्वेच्छाचारी या अराजक नहीं है, बल्कि वह वांछित दिशा में ही परिवर्तन की कल्पना करते हैं, प्रयत्न करते हैं। उनकी कविता मानव की मुक्ति की कविता है। शोषण, दमन, उत्पीड़न, विषमता, विसंगति से मुक्ति की कविता। ‘प्रतिबद्ध हूं’ कविता में वे कहते हैं: ‘प्रतिबद्ध हूं, जी हां प्रतिबद्ध हूं/ बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त/ संकुचित ‘स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ/ अविवेकी भीड़ की ‘भेड़िया धसान’ के खिलाफ/ अंध बधिर व्यक्तियों को सही राह बतलाने के लिए/ अपने आपको भी ‘व्यामोह’ से बारंबार उबारने की खातिर/ प्रतिबद्ध हंू, जी हां, शतधा प्रतिबद्ध हूं।’

नागार्जुन ने मानव विरोधी शक्तियों का प्रतिकार और प्रतिरोध करने के लिए कविता में व्यंग्य का सार्थक उपयोग किया है। वह आधुनिक हिंदी कविता के सबसे बड़े व्यंग्यकार हैं। उनके काव्य में व्यंग्य कविता का जितना विलक्षण विकास देखने को मिलता है वह अन्यत्र दुलर्भ है। कथ्य से लेकर छंद, भाषा और लय तक में वे व्यंग्य उपजाने में सफल रहे हैं। व्यंग्यकार नागार्जुन की पैनी नजर सभी को घेरती है। उन्होंने स्वाधीन भारत की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक विसंगतियों और अंतर्विरोधों को जनवादी चेतना के आलोक में व्यंग्य के माध्यम से अभिव्यक्ति दी है। नागार्जुन ने भ्रष्ट राजनीति और राजनेताओं, कुप्रशासन, भ्रष्टाचार, स्वार्थलिप्त नौकरशाही, सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों, पाखंड, आर्थिक विसंगतियों, अंतर्विरोधों, आदर्शवादी मान्यताओं, खोखले आभिजात्य, प्रदर्शन प्रियता, फैशन और आधुनिकता की पुतलियों, काफी हाउस की शोभा बढ़ाने वाले बुद्धिजीवियों, छायावादी स्वतंत्रता से युक्त कवियों आदि पर सटीक और तिलमिला देने वाला व्यंग्य किया है। उनकी अनेक कविताओं में शोषित और पीड़ित जनता के प्रति करुणा और सहानुभूतिपूर्ण व्यंग्य देखने को मिलता है। इस सबके अतिरिक्त नागार्जुन ने स्वयं अपने ऊपर भी व्यंग्य लिखा है जिसमें वह उतने ही निर्मम हैं जितने दूसरों के प्रति।

नागार्जुन की व्यंग्य कविताओं का प्रखर रूप स्वाधीन भारत की राजनीतिक व्यवस्था, शासन व्यवस्था, नौकरशाही, राजनीतिज्ञों, राजनीतिक परिवर्तनों और जन आन्दोलनों से संबंधित कविताओं में परिलक्षित होता है। उनकी प्रारंभिक कविताओं में गांधी युग, नेहरू युग की पहचान मिलती है तो परिवर्ती कविताओं में इंदिरा युग, जनता शासन काल, लोकतांत्रिक उथल-पुथल, राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार, अंधसत्तावाद और राजनीति की जनविरोधी नीतियों का लेखा-जोखा है। नागार्जुन के काव्य में देश और समाजहित की आकांक्षा कई रूपों में व्यक्त हुई है। वे राष्ट्रहित की बात करने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा के कल्याण की भी कामना करते हैं। यह उनके काव्य में संवेदना के विस्तार और लोकमंगल की भावना को प्रमाणित करता है। समसामयिक विषयों पर कविता लिखने के कारण नागार्जुन अक्सर विवादों के केंद्र मे रहे। एक कारण उनकी विचारधारा में निरन्तर होने वाले परिवर्तन रहे तो दूसरा राजनीतिक व्यक्तियों पर की गई कटु टिप्पणियां। उन पर प्रतिक्रियावादी और अवसरवादी होने का आरोप भी लगता रहा। पर नागार्जुन किसी राजनीतिक विचारधारा या दल के साथ स्वयं को सम्बद्ध न करके देश की बहुसंख्यक जनता के साथ बंधे रहे। वे लोक मन और लोक जीवन की आत्मीय अभिव्यक्ति करने वाले समर्थ जनकवि के रूप में स्वीकृत हैं। नागार्जुन के काव्य का महत्त्व इस अर्थ में भी है कि उन्होंने निराशा और हताशा के दौर में भी जीवन के प्रति आस्था और संघर्ष की कविताएं लिखी है।

उन्होंने प्रगतिशील और जनवादी तत्त्वों की प्रतिष्ठा के लिए निरंतर प्रयास किया। उनके लिए कविता न केवल यथार्थ को चित्रित करने का माध्यम है, बल्कि उसके माध्यम से यथार्थ को भी बदला जा सकता है। इसलिए उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से समतामूलक, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील समाज की स्थापना का सार्थक प्रयास किया है। इसलिए कविता के चरितार्थ होने के प्रसंग में, देश और युग की यथार्थचेतना की अभिव्यक्ति के संदर्भ में, सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्रचना और उसे प्रकट करने में कविता की भूमिका और निष्ठा के परिप्रेक्ष्य में नागार्जुन निस्संदेह प्रशंसनीय हैं।

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