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ये दिल्ली है…

संस्कृत में कहा गया, ‘दिल्ली नरो वा जगदीश वरो वा पुश्तेशु मल्ली नगरीशु दिल्ली’। उर्दू अर्ज करती है, ‘इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी कद्र-ए-सुख़न, कौन जाए ‘ज़ौक़’ पर दिल्ली की गलियां छोड़ कर’। नरेंद्र मोहन अपनी डायरी के पन्ने पर लिखते हैं, ‘दिल्ली में रहना, दिल्लगी नहीं है यारों।’ जिस चांदनी चौक में चांद की रोशनी न उतरे, उस गली की रौनक पूरी दुनिया में मशहूर है। न किसी को बुलाने वाले और न किसी को भुलाने वाले इस शहर को कल से लेकर आज तक में देखना वक्त के साथ रुमानियत है। इस साल के आखिरी अंक में विपिन जैन उस दिल्ली को सलाम कर रहे हैं जिसकी बादशाहत पाना हर सियासी सफर का आखिरी पड़ाव होता है।

Author Published on: December 30, 2018 1:10 AM
इस दिल्ली को ‘गालिब की दिल्ली’ भी कहा जाता है।

दिल्ली पर लिखने की शुरुआत किस दिल्ली से की जाए। एक वो दिल्ली जो महाभारतकालीन नगरी और पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ थी। एक वो दिल्ली जो एक हजार साल पहले बसी और उसके बाद सात बार उजड़ी और फिर बसाई गई। एक वो दिल्ली जो अंग्रेजों ने जॉर्ज पंचम के फैसले पर सौ साल पहले नई दिल्ली के नाम से बसाई थी और उसे राजधानी बनाया था। एक वो दिल्ली जो छह गेटों- अजमेरी गेट, कश्मीरी गेट, लाहौरी गेट, मोरी गेट, तुर्कमान गेट व दिल्ली गेट के अंदर बसती थी और आज महानगर बन गई है। दिल्ली को मौजूदा आईने में देखने से पहले इतिहास के झरोखों से देख लेते हैं, जहां इसे इंद्र्रप्रस्थ, देहली, शाहजहांनाबाद, दिल्ली और नई दिल्ली जैसे नाम मिले। मुगल सम्राट शाहजहां ने दिल्ली को दूसरे रूप में बसाया। उससे पहले दिल्ली यमुना के किनारे बसी एक बस्ती थी। जब शाहजहां ने इसे बसाया तो लाल किले के पीछे यमुना बहती थी। आज जहां चांदनी चौक है वहां कभी दरिया था। कल की दिल्ली गली-कूचों में बसती थी।

इन्हीं गली-कूचों में गालिब की शायरी परवान चढ़ी। इस दिल्ली को ‘गालिब की दिल्ली’ भी कहा जाता है। तब हर घर में शायरी का माहौल हुआ करता था। आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के साम्राज्य में शायरों और शायरी को काफी संरक्षण मिला। दिल्ली का अपना एक अलग रंग-रूप और महक है। इसके हर गली-कूचे अपने भीतर कोई न कोई इतिहास छिपाए हुए हैं। इन तंग गलियों में दरियादिली भी खूब थी। तभी तो मशहूर शायर जौंक ने दिल्ली में बसने के बाद कहा था- ‘कौन जाए जौंक पर दिल्ली की गलियां छोड़कर।’ पुरानी दिल्ली के बाशिंदे इरशाद जश्न-ए-शाहजहां नाम के नाटक के जरिए वहां के बच्चों को इन गली-कूचों के किस्सों को जानकारी देने की कोशिश में लगे रहते हैं। उनके नाटक में बच्चे ही काम करते हैं। दिल्ली की सैकड़ों इमारतें सदियों पुराना इतिहास समेटे खड़ी हैं। शीशगंज गुरुद्वारा गुरु तेग बहादुर के बलिदान की कहानी कहता है। बिरला भवन, गांधीजी की स्मृति संजोए हुए है। लाल किले के सामने बना जैन धर्म का लाल मंदिर और गौरी शंकर मंदिर सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल है।

निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर होने वाला जश्न-ए-खुसरो महोत्सव और गालिब की मजार पर हर साल होने वाला जश्न-ए-गालिब मजहबी सरहदों को तोड़ता है और जब सिख गुरुओं के बलिदान का जुलूस निकलता है तो दिल्ली की सड़कें उसका स्वागत करती हैं। रिवायतों में बसी दिल्ली अपनी रिवायतों को निभाना खूब जानती है। यहां के लोग खाने-पीने के शौकीन तो रहे ही हैं, लेकिन कुश्ती, कबूतरबाजी, पतंगबाजी, अखाड़े का दंगल और तीतर-बटेर व मुर्गों की लड़ाई का लुत्फ उठाना भी दिल्लीवालों का शौक रहा है। दिल्ली में सिर्फ शायरी का शौक ही नहीं पनपा, बल्कि मिठास और जहनियत से भरपूर उर्दू भाषा ने भी जन्म लिया। उस समय दिल्ली में कई उम्दा और नामवर शायर रहा करते थे और हर तरफ मुशायरों के दौर चलते थे। गालिब के अलावा जौंक, जफर, दाग देहलवी, बेखुद देहलवी, सीमांत अकबराबादी, जोश मलीहाबादी जैसे शायरों ने दिल्ली का खूब नाम रोशन किया।

फोटो : आरुष चोपड़ा

दिल्ली में लंबे समय तक अखाड़ा परंपरा भी रही जिसने देश को कई नामी पहलवान दिए। दिल्ली ने सिर्फ शायरी और गजल को ही बुलंदियों पर नहीं पहुंचाया बल्कि किस्सागोई को भी जन्म दिया। किस्सागोई शब्द अरबी के किस्सा और गोई को मिलाकर बना है, जिसमें दिल्लीवाले खूब माहिर थे। यहां के तांगे वाले पहले बहुत से किस्से सुनाते थे ताकि सवारी का दिल बहलता रहे। दिल्ली एक लंबी और समृद्ध विरासत का शहर है। आजादी के बाद स्वतंत्र भारत की राजधानी बनने के बाद इस शहर ने एक नई करवट ली। दिल्ली के साथ सुखद और दुखद दोनों पहलू जुड़े हुए हैं। इसी दिल्ली में बहादुरशाह जफर को देश निकाला मिला। दिल्ली ने गांधी की हत्या देखी, नादिरशाह का कत्लेआम देखा और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की विफलता के बाद अंग्रेजों का जुल्म और सरेआम दी गर्इं फांसी की सजाएं भी देखीं। तब दिल्ली जफर की उदास गजल बन गई थी जो कहती थी-न किसी का आंख का नूर हूं, न किसी के दिल का करार हूं, किसी काम में जो न आ सके, मैं वो एक मुश्त-ए-गुबार हूं।

न बुलाती है, न भुलाती है

दिल्ली न किसी को बुलाती है न भुलाती है, दिल्ली चलो, दिल्ली छोड़ो, के साथा यह स्वतंत्रत भारत की गरीब जनता को आशियाना भी देती है। दिल्ली में जो आया लौटकर नहीं गया। रामलीला मैदान में कई ऐतिहासिक रैलियां हुई हैं जिन्होंने राजनीति की तस्वीर बदल दी। आपातकाल के बाद जनता पार्टी का आना, अण्णा हजारे का अनशन पर बैठना, सब कुछ इसने देखा। दिल्ली सिर्फ यहां रहने वालों की नहीं है। लाखों लोग रोज यहां काम करने के लिए आते हैं और शाम ढले घर लौटते हैं। बेदिल दिल्ली सबको अपने में समाहित करती है। दिल्ली राजधानी होने के नाते यह सारे देश से जुड़ी है। दिल्ली के नाम से 7 स्टेशन हैं। दिल्ली और नई दिल्ली स्टेशन पर रोजाना करीब दस हजार लोग उतरते हैं जो वापस अपने गांव-देहात नहीं लौटते, लेकिन फिर भी दिल्ली की रौनक और रंगत कम नहीं हुई। आज दिल्ली मेट्रो का नगर है। दिल्ली आने वाला मेट्रो की सवारी न करे यह मुश्किल है। दिल्ली ने आजादी के बाद पाकिस्तान से विस्थापित हुए लोगों को भी अपने दिल में जगह दी और उनके रहन-सहन व खान-पान को अपनाया। दिल्ली हर दौर में बदली, कई बार उजड़ी और फिर बसी। बदलते वक्त के साथ इस शहर की फिजा भी बहुत तेजी से बदली है। इस शहर की इंद्रधनुषी छटा और इसकी महक कुछ अलग ही है।

गांधी जी की हत्या, इंदिरा गांधी की हत्या, मंडल आयोग का विरोध, अण्णा हजारे का आंदोलन, सब दिल्ली ने देखा है। गांधी जी कर्मभूमि भले ही पूरा देश रहा हो, लेकिन उनका आखिरी अनशन दिल्ली में हुआ जो बढ़ते दंगों की वजह से था। उनका परिवार दिल्ली स्थित बिरला भवन से पहले पंचकुइयां रोड के वाल्मीकि मंदिर में रहता था। दिल्ली में ही उन्होंने प्राण त्यागे और यहां की सड़कें उनकी अंतिम यात्रा की साक्षी बनीं। दिल्ली कई महापुरुषों, शासकों, लेखकों, पत्रकारों व अन्य नामचीन लोगों का ठिकाना भी बनी। जवाहरलाल नेहरू, भीमराव आंबेडकर, लाल बहादुर शास्त्री, जगजीवन राम, सरदार पटेल, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, कृष्णा मेनन आदि लोगों ने दिल्ली को अपना निवास स्थान बनाया। दिल्ली चारदीवारी से बाहर निकली तो जहां-जहां विस्तार मिला, फैलती चली गई। देश के दूसरे शहरों से लोग रोजगार के लिए दिल्ली आते हैं और फिर यहीं बस जाते हैं। दिल्ली का मन कभी शाही होता है तो कभी फकीरी में रमता है। चांदनी चौक में चांदनी उतरे न उतरे, लेकिन इसकी रौनक हमेशा बरकरार रहती है। शहर की एकमात्र नदी यमुना आज भले ही प्रदूषण और गंदगी के कारण काली पड़ गई हो, पर वह आज भी शहर की पहचान है।

डाक टिकटों ने भी दिल्ली की तस्वीर को बड़ी खूबसूरती से उभारा है। इस पर छपा पहला डाक टिकट पुराने किले की तस्वीर दिखलाता है। दिल्ली दस्तकारी, कलाकारी, चित्रकारी सभी के लिए बाजार मुहैया कराती है। राजधानी दिल्ली की खिड़की हर तरफ खुलती है। यहां कई उच्च शिक्षण संस्थान हैं, जिनमें डीयू, आइआइटी, एनएफटी, एनएसजी, हाईटेक अकादमी, जेएनयू, आइआइएम आदि प्रमुख हैं। साहित्य का सबसे बड़ा पुरस्कार ज्ञानपीठ दिल्ली से ही तय होता है। दिल्ली हंस ज्ञानोदय, कथादेश, समकालीन साहित्य, समयांतर व कादंबिनी जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन स्थल भी है। दिल्ली के सात स्टेशनों ने इसे पूरे देश से जोड़ रखा है। दिल्ली में सारा भारत बसता है। शहरीकरण की हवा से दिल्ली की हवा भी बदली है। फिल्मकार अब यहां लाल किला या कुतुबमीनार ही नहीं दिखाते, बल्कि मेट्रो में बैठे हीरो-हीरोइन भी दिखाते हैं। फिल्म ‘देव डी’ का एक संवाद है ‘दिल्ली से बिल्ली मार लो, खा लो, मगर पालो मत’। ‘फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ में भी दिल्ली की चकल्लस नजर आती है, जब हीरोइन कहती है, ‘चंदू के चाचा ने चंदू की चाची को चांदनी रात में चांदनी चौक में चटनी चटाई’। अब दिल्ली नए मिजाज का शहर बन चुकी है। अज्ञेय की एक कविता है- ‘सांप! तुम सभ्य तो हुए नहीं, नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया। एक बात पूछूं-(उत्तर दोगे?) तब कैसे सीखा डसना- विष कहां पाया’? दिल्ली मरता हुआ शहर नहीं है। उसके पास समस्याएं हैं तो समाधान भी है’। निराला के शब्दों में कहें तो- ‘बोलते हैं लोग यहां मुंह फेरकर’। दिल्ली की बादशाहत पाना राजनीतिक यात्रा की आखिरी मंजिल है, जहां हर क्षेत्र से आकर कोई प्रभुत्व और प्रमुखता पा सकता है। दिल्ली का राजा होना गौरव व शक्ति का प्रतीक है। संस्कृत में उक्ति है-‘दिल्ली नरो वा जगदीश वरो वा पुश्तेशु मल्ली नगरीशु दिल्ली।’

घायल दिल में जिंदादिली

दिल्ली का दिल बार-बार हुए हमलों से घायल होता रहा, लेकिन उसकी जिंदादिली ने उसे जिंदा रखा। जिस दिल्ली में मुगल सम्राज्य का परचम काबुल तक लहराता था, उसी दिल्ली के अंतिम बादशाह बहादुर शाह की सल्तनत सिर्फ लाल किले तक ही सिमट गई थी। दिल्ली जितनी पुरानी है, उतनी ही आधुनिक भी है। ‘दिल्ली के सौ वर्ष’ नाम की किताब में आदित्य अवस्थी ने कहा है कि जून से सितंबर तक चली 1857 की आजादी की पहली लड़ाई को दिल्लीवालों ने विपदा की तरह नहीं, बल्कि धर्मयुद्ध की तरह लड़ा और देश की आजादी के यज्ञ में आहुति दी। पैंतालीस हजार लोग इस युद्ध में शहीद हुए। दिल्ली महानगर भी है और आजाद भारत की राजधानी भी, जिसकी अपनी बुनियादी जरूरतें हैं और सुविधाएं हैं। यूनेस्को में दिल्ली को पौराणिक शहर घोषित करने का प्रस्ताव भी विचाराधीन है। हर शहर, नगर और गांव अपने इतिहास के सामाजिक प्रसंगों या घटनाओं से जुड़ा रहता है। समय की शिला पर घिसकर वह थोड़ा बदल जरूर जाता है, लेकिन अपनी पहचान नहीं खोता।

दिल्ली की पहचान उसकी दरियादिली और सबको जगह देने की रही है। कहते हैं दिल्ली के नाम का दिल से कुछ लेना-देना नहीं है। यह नाम दहलीज से बिगड़कर बना है। महानगरों की तरह आज की दिल्ली देर रात तक जागती है और सुबह तक सोती है। भीड़, ट्रैफिक जाम, दुर्घटनाएं, अपराध, हत्या, लूट ये सब घटनाएं रोज उसके खाते में लिखी जाती हैं। दिल्ली के लोग हर त्योहार चाहे वो होली हो, दिवाली हो या ईद सब कुछ पूरे उत्साह और खुशी से मनाते रहे हैं। चांदनी चौक की पराठे वाली गली आज भी देसी घी की महक से सराबोर रहती है। दिल्ली को पाने के लिए खोजना जरूरी है। एक कहावत है, ‘जिन खोजा तिन पाइयां’। दिल्ली को कई झरोखों से देखा और खोजा जा सकता है। दिल्ली आम आदमी का शहर है, पर यहां खास लोगों की भी रिहाइश है। यह देश की राजनीतिक राजधानी है और इसे रैलियों का शहर भी कहा जाता है। नेताजी का ‘दिल्ली चलो’ का नारा भी आज राजनीतिक पार्टियों के खूब काम आ रहा है। व्यंगकार हरिशंकर परसाई ने भी इस शहर को व्यंग्य में ढाला है, वे लिखते हैं-‘सर्वोदयी भी दिल्ली में रैली करेंगे, किसलिए? सरकार पर नैतिक दबाव डालने के लिए। दिल्ली के नेता और मंत्री बडेÞ नैतिकतावादी हैं! वो सुधरना चाहते हैं पर क्या करें कोई उन पर नैतिक दबाव ही नहीं डालता।’ प्रसिद्ध साहित्यकार कृष्णा सोबती ने हम हसमत के लेख में दिल्ली में दुल्हन के तहत कहा है ‘राजधानी में धुंध का धुंधलका हम हसमत को परेशान किए है। यहां मौजूदा देवी-देवता, नागरिक, राजनीतिक रंग बढ़ाने में आज लगे रहते हैं जो ऊंचे थे वो ठिगने हो गए और ठिगने ऊंचे नजर आ गए।’

उर्वशी जैसे खंड काव्य के रचयिता प्रसिद्ध राष्ट्रकवि कहलाने वाले रामधारी सिंह दिनकर ने दिल्ली में सांसद के रूप में 18 साल बिताए। उन्होंने दिल्ली नाम की एक लंबी कविता लिखी। इस कविता में दिल्ली को कई तरीके से अभिव्यक्त किया गया है। उसकी दरियादिली, जीवन मूल्य और उदारता को ऐतिहासिकता और वर्तमान से जोड़कर रचनाबद्ध किया है। यह रेशमी नगर भारत भाग्य-विधाताओं का प्रवासी शहर बना हुआ है। उनकी पंक्तियां हैं-‘हो गया एक नेता मैं भी, बंधु सुनो, भारत के रेशमी नगर में रहता हूं। जनता तो चट्टानों का बोझ उठा रखती, मैं चांदनियों का बोझ लिए फिरता हूं।’ दिल्ली में जीवन-यापन की मुश्किलों के बारे में गालिब ने भी कहा था-‘है अब इस मामुरा में, रहते गर आफ्ते अशद, हमने माना कि दिल्ली में रहे हैं, पर खाएंगे क्या?’ दिल्ली का गौरवशाली अतीत पन्नों में सिमटे कल के अलावा आज की आधुनिकता की उड़ान भी है। पुरातत्व के दस्तावेजों में अतीत के चलचित्र देखने को मिल जाएंगे। दिल्ली में लंबा समय गुजारने वाले अंग्रेजी के लेखक खुशवंत सिंह ने ‘दिल्ली’ नाम का एक उपन्यास लिखा है जिसमें उन्होंने दिल्ली की बदलती जिंदगी को अपने दोस्तों, पसंदीदा शायरों और दिल्ली के इतिहास से जोड़कर किस्सागोई की है। वो कहते हैं दिल्ली उन्हें एक कंकाल के रूप में मिली जिसमें उन्होंने इस उपन्यास के जरिए रक्त और मज्जा भरकर उसे प्राणवान बनाने का कार्य किया।

अपने पहले कथन से पूर्व वे दिल्ली की परिभाषा करते हैं, मैंने दिल्ली की आत्मा से पूछा कि दिल्ली क्या है? उसने कहा दुनिया एक शरीर है तो दिल्ली उसकी जिंदगी है। दिल्ली के साथ यह ट्रैजेडी खूब रही है कि जो दिल्ली से गुजरा उसे भूल गया। वो उसके संस्मरण में कभी नहीं रही। वरिष्ठ नव गीतगार योगेंद्र दत्त शर्मा ने दिल्ली पर दोहा शतक लिखा है। उसमें दो दोहे हैं, ‘तब भी हम मजबूर थे, अब भी हम मजबूर हैं। दिल्ली तब भी दूर थी, दिल्ली अब भी दूर। कई बार उजड़ी बसी, लेकिन हुई न नष्ट। दिल्ली पुख्ता ही हुई, सह-सह कर हर कष्ट’। दिल्ली आज भी गालिब को याद करते हुए जश्न-ए-गालिब का आयोजन करती है। गालिब की मजार पर शब्दकारों का मेला लगता है। निजामुद्दीन औलिया की मजार पर सूफी रंग बिखरता है और दिल्ली अमीर खुसरो के रंग में रंगती चली जाती है। यह शहर सांप्रदायिक एकता और सद्भाव का स्वागत करता है और हर साल ‘फूलवालों की सैर’ जैसा उत्सव भी मनाता है। दिल्ली आज हिंदी प्रकाशन का एक गढ़ है। यहां पुस्तकों के साथ पुस्तकालय भी चल रहे हैं, जिनमें दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी, हरदयाल लाइब्रेरी, मारवाड़ी लाइब्रेरी प्रमुख हैं। किताबों से सूनी होती दुनिया में इनका वजूद आज भी बरकरार है।

त्रिमूर्ति भवन जो पहले प्रधानमंत्री का निवास था, आज वहां की लाइब्रेरी में एक हजार से अधिक दस्तावेज लिखित में और ऑनलाइन उपलब्ध हैं। यह नेहरू मेमोरियल के नाम से जाना जाता था। आजादी के आंदोलन के इतिहास के पन्ने भी यहां संरक्षित हैं। इन पुस्तकालयों में दुर्लभ पांडुलिपियां भी संरक्षित हैं। इसके अलावा अमेरिकन ब्रिटिश लाइबे्ररी भी दिल्ली की पसंद है। दिल्ली ने रंगमंच को भी उत्कृष्टता और गरिमा प्रदान की है। मनोहर सिंह, ओमपुरी, नसीरुद्दीन शाह, हिमानी शिवपुरी जैसे रंगकर्मी दिल्ली से जुडेÞ रहे। शाहरुख खान, अक्षय कुमार व कुंदन लाल सहगल जैसे अभिनेताओं का बचपन भी यहीं बीता है। दिल्ली के कई उत्कृष्ट लेखक और कवि साहित्य जगत में भी ख्यातिलब्ध रहे हैं। इनमें जैनेंद्र कुमार, विष्णु प्रभाकर, राजेंद्र यादव और नामवर सिंह जैसे बड़े नाम शामिल हैं। दिल्ली क्या है इस प्रश्न का उत्तर कुछ इस तरह है, ‘दिल्ली सदियों से बहती वेगवती नदी की तरह है जिसमें अनेक जलधाराएं मिलती आई हैं और नए-नए लोग इस नदी के किनारे बसते रहे। धीरे-धीरे वो नदी तो खो गई, लोग और बस्तियां ही रह गईं। वेगवती नदी के बहाव की लय और नाद गुम हो गई। उसके बहाव में भंवर पैदा होते रहे और दिल्ली हलचलों, हादसों और अव्यवस्था में बदलती रही।’ 1914 में तत्कालीन वायसराय जॉर्ज पंचम के फैसले के बाद कलकत्ता से बदलकर दिल्ली को राजधानी बनाने का फैसला किया गया था। तब दिल्ली छह गेटों में बसी थी। नई दिल्ली के मुख्य वस्तुकार सर लुटियंस थे इसलिए नई दिल्ली को लुटियन दिल्ली भी कहा जाता है। यह दिल्ली सौ साल पहले जंगल का हिस्सा थी। यहां सबसे पहले संसद भवन और फिर राष्ट्रपति भवन बना। दिल्ली के विशिष्ट और धनाढ्य लोगों को कनॉट प्लेस में भूमि आबंटित की गई थी। धीरे-धीरे लुटियंस की बसाई नई दिल्ली बेहिसाब बढ़ती गई। नई-नई कॉलोनियां विकसित होने से नई दिल्ली में रहन-सहन की कल्चर उभरा। फ्लैट, सोसायटी और अपार्टमेंट की जीवन शैली ने जन्म लिया। धीरे-धीरे शहर के पुराने जीवन का रंग उड़ता गया और मिजाज में नयापन आया। दिल्ली के मूल निवासियों की राय लें तो वो कहेंगे कि दिल्ली तो सबकी है। राजधानी में रहने का हक सबको है, लेकिन बाहर के लोगों ने दिल्ली को अपनी महक से दूर कर दिया। दिल्ली की गंगा-जमुनी तहजीब भले ही आज पीछे छूट रही हो, लेकिन यह पुराने रंग और रिवायतों में ही जीती रही है। यह शहर राजधानी होने के साथ सत्ता का केंद्र तो रहा ही है साथ ही यह सियासी उथल-पुथल और राजनीतिक गतिविधियों का भी गवाह रहा है।

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