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कहानीः कबूलनामा

अगर साहित्य का कहीं गिरजाघर होता, तो मैं कभी का कन्फेशन कर लेता। कहीं और मुझे वह बात नजर नहीं आती है, जो गिरजाघर के कन्फेशन में महसूस होती है। कन्फेशन में अपराध का जिक्र होता है, लेकिन माफी या प्रायश्चित की शर्त नहीं होती, मुझे ऐसा लगता है..

Author July 1, 2018 5:59 AM
प्रतीकात्मक चित्र

राबिक सदा

अगर साहित्य का कहीं गिरजाघर होता, तो मैं कभी का कन्फेशन कर लेता। कहीं और मुझे वह बात नजर नहीं आती है, जो गिरजाघर के कन्फेशन में महसूस होती है। कन्फेशन में अपराध का जिक्र होता है, लेकिन माफी या प्रायश्चित की शर्त नहीं होती, मुझे ऐसा लगता है। मुझे क्या पता, मैं कोई ईसाई तो हूं नहीं। मगर मेरे अपराध या गलती के लिए मुझे कन्फेशन ही भला लगता है। मैं ऐसा भी नहीं कह रहा हूं कि इस अपराध या गलती में मैं शामिल नहीं हूं! हूं… पूरी तरह से हूं, लेकिन उसकी पटकथा मेरी लिखी नहीं थी, मैं तो भूमिका निभा रहा था, लिखा तो किसी और ने था। उसे शायद कभी कन्फेशन की जरूरत ही महसूस न हुई हो, जबकि मेरी गलती, मेरे अपराध में वह बड़ा भागीदार था। हां, मेरी गलती यही थी कि कुछ पाने की चाह में मैं उस समय चुप रहा, जबकि मुझे वह कागज ही फेंक देना चाहिए था, जिस पर पटकथा लिखी हुई थी। शामिल होने से इंकार कर देना चाहिए था कि नहीं चाहिए काम, दाम और नाम… किसी और के काम का। मैं यह कह कर बच सकता हूं कि मैं तो नया-नया था, मुझे क्या मालूम था कि यहां काम कैसे होता है! वरिष्ठ यानी सीनियर के आगे कुछ कहने की हिम्मत कहां आ पाती है, बेरोजगार, बेदर और ऊपर से कवि-गीतकार होने की कोशिश करते युवक में…।

साफ-साफ कहने की हिम्मत तो अब भी नहीं है, लेकिन इतना साहस तो अब आ गया है कि कह सकूं… हां, उस गलती में मैं भी शामिल था। चलिए यों करते हैं कि बात को वहीं से शुरू करते हैं, जहां से शुरू होनी चाहिए थी। ऐसा भी कर लें कि ‘मैं’ की बजाय उस चरित्र को नाम देते हैं… अं… अं… नाम से जाति, धर्म, वर्ण, वर्ग की जन्मपत्री सामने आ जाती है ,तो ऐसा करते हैं कि ऐसा कोई नाम तलाशते हैं, कबीर जैसा कि लोग ढूंढ़ते ही रह जाएं कि बंदा आखिर कौन था। समीर… यह नाम बढ़िया है! किसी भी जाति का नाम हो सकता है यह!… तो, सीधी बात शुरू करता हूं- समीर की शुरुआत फैक्टरी में गरम लोहा कूटते हुई थी। वहीं कहीं अखबार के पर्चे जब उसके हाथ, मसाले की पुड़िया या किसी और सामान के साथ आते हुए, पड़ जाते थे तो वह सामान देखने के बजाय पुड़िया को पढ़ने लगता था। कई बार तो वह मसाले यों डिब्बे में उलट देता कि हल्दी में मिर्ची गिर जाती और धनिये में गरम मसाला… क्योंकि मसाले से ज्यादा स्वाद उन पुड़ियों में आता था, जो खाली होते ही पढ़ने के काबिल कागज हो जाती थीं।

ऐसे ही एक दिन किसी पुड़िया में से अमृता प्रीतम की पंजाबी कविता ने सिर उठाया, तो हमारे यह समीर मियां फिर किसी काम के नहीं रहे। कमरे के तीन साथी भी उस दिन भूखे ही सोये कि समीर की बारी थी खाना बनाने की और वह तो कविता से ही डकार ले रहा था। दूसरे दिन भी भिंडी की सब्जी में उसने न जाने किस झोंक में पानी डाल दिया था… कि सभी ने रोटी मसल-मसल कर खाई थी… और यह तय पाया गया कि भिंडी में पानी भी कोई गलत मिलावट नहीं है। उस दिन सब्जी कम नहीं पड़ी और शाम को भी काम आई। अब तो समीर का जुनून कुछ ज्यादा ही उरूज पर आ गया कि पान की दुकान पर जब सभी तंबाकू मल रहे होते थे तो वह पान बांधने के लिए फाड़ कर रखी गई अखबार की कतरन यों पढ़ने लगता, जैसे कोई पुराने बिल का हिसाब जोड़ रहा हो!

पानवाला भी उसे ऐसा करने देता कि ऐसा करने से उसका एक पुड़िया का भी नुकसान नहीं था और उसे उम्मीद नजर आ रही थी कि यह बालक जल्द ही अखबार के बराबर टुकड़े करते नजर आने वाला है। पान बेचते-बेचते उसे इतना तो समझ में आ जाता था कि पढ़ने का चस्का तंबाकू-चूने का भी बाप होता है। पानवाले की उम्मीद रंग लाई और समीर को फुरसत के समय में अखबार पढ़ने के बदले, पुड़िया के लिए कागज फाड़ने की छूट मिल गई। अब कोई, किसी के अहसान तले नहीं था। समीर को यह समझ आ गया कि पढ़ने वाले की पानवाले भी कद्र करते हैं। अखबार के पुरजों से समीर का साहित्य-प्रेम पल्लवित होने लगा। जब वह पढ़ नहीं रहा होता तो कुछ न कुछ सोच रहा होता… गुनगुना रहा होता। लोहे के घन से गरम तपते लोहे को कूटने वाले हाथ कलम पकड़ते डरते थे कि कहीं पिघल न जाए। इसीलिए वह अपनी सोच को जुबान और गले में रखता और पान की गिलौरी की तरह चुभलाया करता। ऐसे ही एक दिन कारवाले बाबू आए थे पान खाने। पानवाले ने पान और जर्दे की पुड़िया देकर कहा था समीर से- ‘बंगाली बाबू को दे आना! पैसा बाद में आ जाएगा।’ जब पान और जर्दे की पुड़िया समीर के हाथ से बंगाली बाबू की कार में जा रही थी, तभी उसके मुंह में चुभला रही लाइनें भी समानांतर यात्रा तय कर रही थीं। बंगाली बाबू ने पुड़िया तो रख ली, मगर समीर को रोक लिया, ‘यह क्या गुनगुना रहे थे?’ हकबकाया समीर भूल ही गया कि वाकई क्या गुनगुना रहा था। ‘कुछ नहीं… यों ही…।’ कहते हुए समीर उलटे पैर लौट आया। मगर पहली बार उसे ऐसा लगा कि आज नई शुरुआत हुई है… किसी ने उसका कहा… कच्चा-पक्का ही सही, सुना तो है। पूछने को ही शाबाशी मान कर समीर ने विचार को लय में शुरू कर दिया।

ऐसे ही एक दिन जब वह फिर से बंगाली बाबू की कार में माल पहुंचाने गया, तो बंगाली बाबू ने कार का दरवाजा खोल कर उसे पास में बैठने के लिए कहा। उसने देखा- आसपास किसी ने नहीं देखा, सभी अपने में लगे थे… वह घबरा कर कार की सीट पर बैठ गया।
‘अब सुनाओ, तुम क्या गुनगुनाते रहते हो!’ बंगाली बाबू ने कार स्टार्ट करते हुए कहा।

‘बस, यों ही… जो मन में आता है।’ उसने झिझकते हुए कहा।

‘फिर भी, जरा हम भी तो सुनें।’

वह ठहर कर सोचने लगा। अमृता प्रीतम की वह कविता ही सुना दी, जो पंजाबी में पढ़ी थी। कुछ लाइनें अपनी तरफ से भी जोड़ दीं। बंगाली बाबू को तो मजा आ गया… तंबाकू की पिनक थी या कविता समझने की कोशिश… ‘वाह बहुत खूब’ करते रहे।
‘यहां क्या करते हो?’ पूछा तो उसने बता दिया।

‘तुम तो अच्छे गीतकार बन सकते हो फिल्म में…। यहां क्यों समय पर घन चला रहे हो। कल से आ जाओ, मेरे साथ।’ कहते हुए बंगाली बाबू ने अपना कार्ड दिया और कार का दरवाजा खोल दिया। अब समीर के लिए जैसे सारे बंद दरवाजे खुल गए थे। वह आसमान में उड़ना चाह रहा था, पर आजमाना चाहता था, जो अभी-अभी उगे हैं। वह पैदल न जाने कितनी दूर चला… जब पैर थक गए तो पता चला, खोली यानी कमरा सामने ही है।

बंगाली बाबू फिल्म के निर्देशक थे और कमाल की फिल्में बनाते थे। फिल्में हिंदी में बनाते थे, मगर हिंदी नहीं आती थी और उर्दू भी नहीं। इस कमी को पूरा करने के लिए समीर को आजमाया गया, जो कि थोड़े ही समय में जम गया। बंगाली बाबू टूटी-फूटी हिंदी में बोलते, बंगाली में बोलते और समीर लिख देता। कई बार मन से भी जोड़-घटा देता। बंगाली बाबू का भाषा-दर्द कम हो गया और धड़ल्ले से फिल्में बनने, चलने लगीं। अगर आप यह समझ रहे है कि समीर ने इसी अपराध या गलती के लिए कन्फेशन की बात कही है, तो आप जरा ठहरिए, ‘पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!’

दरअसल, बंगाली बाबू के चक्कर या सोहबत में समीर को बंगाली भी समझ में आने लगी थी और इसीलिए वह शुरू में तो प्रभाव जमाने के लिए बंगाली पढ़ने लगा था, लेकिन बाद में उसे रस आने लगा- रसगुल्ले जैसा। वह कई नामचीन बंगाली लेखकों को पढ़ गया। जिंदगी मजे से चल रही थी, कलम वाले हाथों में लाली नजर आने लगी थी कि घन से रिश्ता टूट गया था।… लेकिन समीर का मकसद बंगाली बाबू की उल्टी को कागज पर पकवान की तरह सजाना नहीं था, वह खुद कुछ करना चाहता था, जहां उसका अपना नाम हो, पहचान हो। अभी तो बंगाली बाबू का लेखक या असिस्टेंट ही कहलाता है। वह जब बड़े-बड़े, नए-नए फिल्मी पोस्टर देखता और बंगाली बाबू का नाम अजय मुखर्जी पढ़ता, तो उसे अपना नाम भी उस नाम के पीछे साए की तरह सहमा नजर आता। वह ठहर कर गौर से बोर्ड के नाम को यों घूरते हुए पढ़ता कि अजय मुखर्जी की जगह ‘समीर…’ दिखाई देने लगता।

तभी… यह सब हुआ! हुआ यों कि बंगाली बाबू ने ‘कैदी’ नाम की नई फिल्म अनाउंस की… संगीतकार जय चौधरी और गीतकार- उस समय के सबसे मकबूल और काबिल नाम- इंद्रदेव! यह जोड़ी कई सफल फिल्में दे चुकी थीं। इसी सफलता ने दोनों के बीच ‘अहं’ को पैदा कर दिया कि कोई भी, किसी से एक रुपया कम लेने को तैयार नहीं! बंगाली बाबू ने दोनों ध्रुवों को मिलाने के लिए न जाने कितनी कुलांचे अपनी घोड़ी को लात मार कर भरी, मगर दोनों टस से मस नहीं हुए। आखिरकार बंगाली बाबू ने संगीतकार की कीमत पर गीतकार को दांव पर लगा दिया। बंगाली बाबू ने इंद्रदेव से कहा ‘या तो आप दोनों तय कर लो… वरना फिर ना कहना मेरी गलती थी।’ इंद्रदेव ने नाम वापस ले लिया कि जय चौधरी के साथ काम नहीं करना है। इंद्रदेव गीतकार तो अच्छे थे ही, आदमी भी कम अच्छे नहीं थे! बंगाली बाबू से रोज मिलने आते और हालचाल पूछते!

बात अटक रही थी कि ‘कैदी’ के गीत कौन लिखे! एक दिन जब बंगाली बाबू देरी का रोना रो रहे थे कि जय चौधरी को कोई गीतकार नहीं जम रहा है, तो इंद्रदेव ने हंसते हुए कहा था- ‘अजय बाबू, बगल में छोरा नगर ढिंढोरा… अरे, ये है न समीर! ये लिखेगा गीत! पूरी कहानी तो पता है इसे…, संवाद और पटकथा भी लिख रहा है… तो गीत भी लिख देगा। फिर मैं हूं न!’ बंगाली बाबू ने समीर को इंद्रदेव के हवाले कर गंगा-स्नान कर लिया।

पहले ही कौर में मक्खी… यानी ‘कैदी’ का जो पहला गीत लिखा जाना था, उसमें पंजाबी, बंगाली, हिंदी नहीं, ब्रज और बुंदेलखंडी टच चाहिए था! पंजाब का रहने वाला समीर कहां से यूपी, बिहार के गांव की भाषा लाए। इंद्रदेव ने उसे सहारा दिया और कहा- ‘तुम लिखो तो सही…, मैं ठीक कर दूंगा।’ विचार तो कई आ-जा रहे थे, लेकिन भाषा आड़े आ रही थी। रात-दिन पढ़-पढ़, सुन-सुन कर समीर ने कुछ मुखड़े तैयार किए। जब इंद्रदेव को दिखाए तो वे कुछ नहीं बोले। कागज लिया… एक-एक लाइन लिखने लगे और देखते ही देखते वह गाना तैयार हो गया। समीर ने गीत पढ़ा, तो झूम कर रह गया… कमाल का गीत बना था। पर तभी जैसे आसमान से जमीन पर आ गिरा कि यह गीत मेरा तो नहीं है। इंद्रदेव ने अपने हाथ से लिखा- गीतकार समीर!

‘जाओ, उस टेढ़े बंगाली को दिखा दो… सीधा हो जाएगा यह गीत देख कर। मगर खबरदार, जिक्र मत करना कि मैंने इसमें मदद की है। सनकी टाइप का है… काबिल संगीतकार है। जाओ।’ और समीर जब गीत लेकर जय चौधरी के पास पहुंचा तो वह चिल्ला पड़ा- ‘क्या वो यूपी का भय्यन हमें दिमाग से खाली समझता है? ये गीत तो तुम्हारा बाप भी नहीं लिख सकता…। इंद्रदेव के सिवाय यह कोई लिख ही नहीं सकता… कहां है वो?’ समीर का पूरा शरीर कांप गया। उससे कुछ बोलते नहीं बना। गीत का कागज हाथ में लिए संगीतकार जय चौधरी पूरे स्टूडियो में इंद्रदेव को ढूंढ़ रहा था और इंद्रदेव यहां-वहां छिपता फिर रहा था… कि तभी दोनों आमने-सामने आ गए।

‘क्यों, हमें उल्लू समझता है क्या? तुम किसी के भी नाम से गीत लिख देगा तो क्या हम पकड़ नहीं पाएगा? जय चौधरी है हमारा नाम…। लिखना है तो सीधा सामने आ के बोलो ना… दूसरे के कंधे पर से क्यों बंदूक चलाता है?’ और भी न जाने क्या-क्या बातें एक-दूसरे को सुनाई गई और अंत में रात को दोनों मछली के साथ रम पीते हुए अगले गीतों की बात करते रहे। समीर को समझ नहीं आ रहा था कि वह इस चक्रव्यूह से बाहर कैसे निकले। दोनों के बीच पिस रहा था वह।

अगले दिन जैसे ही जय चौधरी के सामने समीर पड़ा, तो त्योरियां चढ़ गर्इं- ‘तुम बेईमान हो… दूसरों का लिखा हमें दिखाता है… कहता मैंने लिखा है। तुम कभी गीतकार नहीं बन सकोगे। अजय बाबू की धोती पकड़े रहोगे होल लाइफ…। तुम्हारा जमीर है या नहीं? चोट्टे कहीं के!’ तभी इंद्रदेव ने जय चौधरी को संभाल लिया- ‘यह गीत इसी लड़के के नाम है… और इस गीत पर इसका ही नाम जाएगा। मैं कह रहा हूं… यह मेरा गीत नहीं है। इस बारे में कोई बात नहीं होगी। समीर का पहला गीत सेलिब्रेट करेंगे आज रात घर के टेरेस पर।’

समीर उस रात छत पर सेलिब्रेट करने नहीं गया। ‘कैदी’ के बाकी छह गाने इंद्रदेव ने लिखे और अकेले एक गीत पर समीर का नाम गया। ‘कैदी’ सुपरहिट फिल्म रही… सभी गीत खूब चले, पर समीर के नाम पर लिखा गया इंद्रदेव का गीत कुछ ज्यादा ही मकबूल हो गया।

कहते हैं न, खाया-पिया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा बारह आना! दोनों के झगड़े में समीर का भला तो हो गया, लेकिन जय चौधरी ने धोती में गांठ लगा ली कि इस ‘चोट्टे लड़के’ के साथ कभी काम नहीं करूंगा। यह खबर अफवाह की तरह फिल्म इंडस्ट्री में फैल गई कि इंद्रदेव लिखते हैं समीर के लिए। बस, एक गाने की मकबूलियत ने समीर को दस साल बेरोजगार रखा। अजय मुखर्जी ही थे, जो उसे अपने साथ रखे रहे… जानते थे कि उसकी गलती नहीं थी! पर फिर भी गलती तो थी न… कि इनकार तो नहीं करना था कि यह गीत मेरा नहीं है… मकबूलियत भी मुझे नहीं चाहिए। क्यों मंजूर किया कि इंद्रदेव के गीत पर समीर का नाम लिखा जाए!

यहां से समीर की कहानी का गियर बदला और वह लगातार मेहनत के दम पर न सिर्फ गीतकार, लेखक, अभिनेता और निर्देशक बना बल्कि प्रोड्यूसर भी हो गया। उस एक गीत के अलावा जो भी उसने हासिल किया है, उसका है। यहां तक कि उसने अपनी अलग छवि भी बना ली है इतने बरसों में कि छाया से काया का पता लग जाता है। एक शादी, एक तलाक, एक बेटी और अनेक प्रेम प्रसंग समीर के ओरिजनल हैं! हां, विचार को लेकर लोग कहते रहे कि यहां से उठाया, वहां से उठाया, लेकिन लिखता तो वो खुद ही है। लिखना और दिखना उसे आ गया है! आज उसके पास वह सब है, जो ‘दीवार’ के तस्कर अमिताभ बच्चन उर्फ विजय के पास था! आज भी कहीं उसका जिक्र होता है तो कैदी के पहले गीत से ही बात शुरू होती है और उसे यों लगता है, जैसे ये लोग सम्मान नहीं कर रहे, पानी में भिगो-भिगो कर चमरौधा मार रहे हैं। उसे इस गीत से इतनी नफरत है कि उसका बस चले तो जाहिर सूचना छपवा दे कि मेरे बारे में बोलना जरूरी हो तो कृपया इस पहले गीत का जिक्र न करें। पहले तो कुछ लोग पूछ भी लेते थे हकीकत क्या है…, लेकिन नई पीढ़ी को पुरानी पीड़ा क्या पता। जिस दिन उसका उस अवांछित गीत से रिश्ता जुड़ता, वह सो नहीं पाता। कई बार मन हुआ, शहर की सबसे ऊंची छत पर चढ़ कर कह दे- ‘यह गीत मेरा नहीं है। मेरे सामने इसका जिक्र न किया जाए।’ लेकिन जानता है, इससे दुनिया को पता नहीं चलेगा। दस साल की बेकारी में इस गीत की लोकप्रियता ने उससे खूब वसूली की है! लोग तारीफ तो करते, मगर काम नहीं देते।

तो फिर से समीर को विदा करते हैं और मैं को आने देते हैं! यही कहानी है मेरे… पहले गीत की! इस गीत ने मुझे नाम तो दिया, मगर वह मेरा नहीं था! आज मैं इसी बात का कन्फेशन करने के लिए पूरी कथा लिखने बैठा हूं। मुझे इस श्राप से अब मुक्ति चाहिए। नहीं चाहिए नाम, दाम और काम! मैं आज पूरे होश-हवास में कहता हूं कि ‘कैदी’ का पहला गीत मेरा नहीं… इंद्रदेव का लिखा था। इस सलीब को अब मैं उतार देना चाहता हूं। इसका बोझ और नहीं उठता मुझसे!

अब कोई नहीं पूछता कि किसने लिखा था… लेकिन मैं तो हर रात अपने आप को बताता हूं कि वह गीत मैंने नहीं लिखा था। यह भी कि मुझे उस समय इनकार कर देना चाहिए था कि नहीं चाहिए किसी और की प्रतिभा पर मेरा नाम…। आज मैं कन्फेशन करना चाहता हूं… पूरी ईमानदारी और तकलीफ के साथ! शायद इस बहाने मैं अपने बाकी काम की सराहना, वाहवाही का आनंद ले सकूं…, बाकी बचे चंद बरसों के लिए!

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