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बच्चा पालना केवल मां की जिम्मेदारी नहीं

हमारे समाज में आम धारणा है कि बच्चों की परवरिश महिलाओं की जिम्मेदारी है। ज्यादातर परिवारों में पुरुष बच्चों की देखभाल बिल्कुल नहीं करते। यहां तक कि सास-ससुर भी इस काम से खुद को दूर ही रखते हैं। इसके चलते अनेक महिलाओं को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है। इस तरह उनका करिअर समाप्त हो जाता है। मगर सवाल है कि बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी सिर्फ मां की क्यों हो। यह सामूहिक जिम्मेदारी होनी चाहिए, बता रही हैं मीना।

Author November 11, 2018 4:23 AM
प्रतीकात्मक फोटो

मीना

शालिनी ने छह साल सीएनसीएस इंस्टीट्यूट में नौकरी की। फिर उनकी शादी हो गई। शादी के बाद भी उसने नौकरी की। पर जब वह गर्भवती हुई तो उसे नौकरी छोड़नी पड़ी। शालिनी का कहना है कि एक बच्चा होने के बाद डॉक्टर ने मुझे बेड रेस्ट बोल दिया था। फिर भी मैंने बेटे के थोड़ा बड़ा हो जाने पर नौकरी करने की सोची, पर परिवार का सहयोग नहीं मिला। नौकरी करने की मेरी जिद पर ससुराल वालों ने कहा कि अगर नौकरी करनी है, तो बच्चे को भी साथ ले जाओ। मेरे लिए बच्चे को साथ ले जाना मुश्किल था, क्योंकि दफ्तर में कोई पालना घर नहीं था। दफ्तर नोएडा में था और मैं चांदनी चौक में रहती थी। एक दुधमुहे बच्चे को चांदनी चौक से नोएडा लाना और ले जाना मुश्किल था। इसलिए मैंने नौकरी छोड़ने का फैसला लिया। शालिनी कहती है कि जब तक बेटा बड़ा हुआ तब तक दूसरी बेटी का भी जन्म हो गया। दोनों बच्चों को पालने-पोसने में ही मेरा समय निकलता गया। फिर दुबारा नौकरी करने की सोची, लेकिन तब तक मेरी सारी नेटवर्किंग खत्म हो चुकी थी। निराश मन से शालिनी कहती है कि दो बच्चों की परवरिश में घर में इतना समय निकाल दिया कि अब लगता है कि शरीर को भी घर में रहने की आदत पड़ गई है।’ यह व्यथा केवल शालिनी की नहीं है। ज्यादातर भारतीय महिलाओं की यही स्थिति है।

दिल्ली मेंं एक हजार शादीशुदा महिलाओं का एक सर्वेक्षण किया गया था, जिसमें पाया गया कि बच्चे को जन्म देने के बाद केवल अठारह से चौंतीस फीसद महिलाएं नौकरी कर पाती हैं। दरअसल, यह सच है कि शादी के बाद बेशक कुछ महिलाएं नौकरी कर पाती हों, लेकिन जब बच्चे को जन्म देती हैं, तो बच्चे को संभालने की सारी जिम्मेदारी उनके ऊपर आ जाती है। और वे महिलाएं जो समाज के इस नियम से इतर कुछ करने का प्रयास करती हंै, तो उन्हें ‘बुरी औरत’ के कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। समाज की इस मानसिकता को तोड़ने का काम ज्योति ने किया। ज्योति पिछले दो सालों से अपने बच्चों से दूर बदायूं में रह रही है। ज्योति का कहना है कि पारिवारिक क्लेश के कारण मुझे घर छोड़ना पड़ा। मैं पार्लर का काम करती थी। एक बेटी हो जाने के बाद मैं उस काम को आगे बढ़ाना चाहती थी। पर परिवार चाहता था कि मैं केवल बच्ची और घर को संभालूं। पर मुझे अपना करिअर बनाना था, केवल घर और बच्चे तक अपनी जिंदगी सीमित नहीं करनी थी। पर परिवार ने मेरी बात नहीं मानी और मुझे आज बच्चों से दूर रहना पड़ रहा है।

ज्योति का कहना है कि बच्चों से दूर रहने और मन मुताबिक अपनी जिंदगी जीने पर आसपास के लोग मुझे बेशक बुरी औरत कहते हों, लेकिन अब मैंने भी बच्चों के बिना जिंदगी जीने की आदत डाल ली है। वह कहती है कि समाज में मैं बदनाम तो हो गई हूं, तो अब इस बदनामी की बदौलत मैं अब अपनी मर्जी की मालिक हूं। जो मन में आता है वह करती हूं। ज्योति के अलावा आज ऐसी भी महिलाएं हैं, जो अपना करिअर बनाने की वजह से देर से बच्चे पैदा करती हैं। इस वजह से उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं झेलनी पड़ती हैं।

प्राय: देखा गया है कि अधिकतर महिलाएं जब करिअर के लिए अपने बच्चों की देखभाल नहीं कर पाती हैं, तो वे अपराधबोध में जीने लगती हैं। उन्हें लगता है कि बच्चा संभालना सिर्फ उनकी जिम्मेदारी है। भोपाल में रहने वाली रेखा की शादी को उन्नीस साल हो गए हैं। शादी के कुछ साल बाद एक बेटा होने के बाद जब बेटी हुई तो उसे अपनी नौकरी चलाए रखने के लिए बेटी को उसके ननिहाल भेजना पड़ा। रेखा बताती है कि जब उसने तीन साल की बेटी को अपनी मां के पास भेजने का फैसला किया था, तब उसे आस-पड़ोस के लोगों ने खूब ताने मारे। कहा कि यह कैसी मां है कि अपनी बेटी को अपने पास नहीं रख सकती। मगर रेखा मजबूर थी, क्योंकि उसे नौकरी करनी थी। रेखा बताती है कि थोड़े समय बाद उसे खुद अपराधबोध होने लगा कि वह अच्छी मां नहीं है। इसलिए वह बेटी को जल्दी वापस ले आई। आज उसकी बेटी नौ साल की हो गई है, पर दोनों बच्चों की पूरी जिम्मेदारी रेखा पर है। उसके पति इसमें कोई सहयोग नहीं करते। रेखा घर और नौकरी दोनों संभालती है। रेखा का कहना है कि अगर पति बच्चे की देखभाल थोड़े समय के लिए भी करता है तो उसका भी औरतों पर अहसान जताता है। पर औरतें ऐसा नहीं करतीं। पतियों को यह बताना पड़ता है कि बच्चा संभालना केवल पत्नी की जिम्मेदारी नहीं है।

अक्सर महिलाओं में बच्चे को पालने की जिम्मेदारी का बोध क्यों होता है? इस सवाल के जवाब में जागोरी संस्था से जुड़ी मधुबाला का कहना है कि बच्चा और औरत को हमेशा जोड़ कर देखा गया है। इसीलिए कहा जाता है कि अगर औरत चाहे तो घर बिगाड़ सकती है और चाहे तो सुधार सकती है। यह एक रूढ़िवादी सोच है। इस सोच के कारण औरत और आदमी के काम को बांट दिया गया है। पितृसत्तात्मक मूल्यों के तहत तय है कि औरत घर की देखभाल करेगी और आदमी बाहर कमाने जाएगा। यह सोच लंबे समय से चलती आ रही है, जिस वजह से औरत और आदमी दोनों को लगता है कि बच्चा संभालना औरत की जिम्मेदारी है। मधुबाला का कहना है कि यह कुदरत का नियम है कि उसे बच्चा पैदा करने का दायित्व मिला है। पर कुदरत ने यह नहीं कहा कि जब बच्चा नौ महीने के बाद मां के पेट से बाहर आएगा तब भी उसका पालन पोषण मां की ही जिम्मेदारी है। बल्कि बच्चा जब समाज में आता है, तो पूरे परिवार की जिम्मेदारी होती है उसे पालना। खासकर, जिन घरों में पति-पत्नी अकेले रहते हैं और दोनों नौकरी करते हैं, उनके लिए राज्य की जिम्मेदारी होनी चाहिए बच्चे को पालने की। पर राज्य ने पालना घर की ऐसी कोई व्यवस्था नहीं कर रखी है, जहां बच्चे को छोड़ा जा सके। पालना घर केवल उन कार्यलयों में न बनाए जाएं, जहां औरतें काम करती हैं। बल्कि वहां भी होने चाहिए, जहां पुरुष काम करते हैं। ऐसे राज्य की यह भी जिम्मेदारी है कि वे पुरुषों में यह भावना लेकर आएं कि वे भी बच्चे को पाल सकते हैं। किसी भी जेंडर के लोग हों वहां पालना घर होना चाहिए।

आज डे बोर्डिंग स्कूलों की बहुत ज्यादा जरूरत है। कुछ जगह डे बोर्डिंग स्कूल हैं, पर अभी और बनाने की जरूरत है। लेकिन ये डे बोर्डिंग स्कूलों तक पहुंच आर्थिक रूप से संपन्न लोगों की ही है। गरीब या मध्यवर्ग यहां तक नहीं पहुंच सकता है। ऐसे में राज्य की जिम्मेदारी है कि वह ऐसी व्यवस्था करे, जिसमें बच्चा पालना केवल किसी एक व्यक्ति का दायित्व न हो, बल्कि वह सामूहिक जिम्मेदारी हो।

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