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शख्सियत: ठुमरी की रानी गिरिजा देवी को मिला था पद्म विभूषण, हर शौक किया पूरा

गिरिजा देवी को 1972 में पद्म श्री, 1989 में पद्म भूषण और 2016 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अलावा संगीत नाटक अकादेमी अवार्ड, अकादेमी फेलोशिप, यश भारती समेत कई पुरस्कारों से उन्हें सम्मानित किया गया।

Author Published on: May 12, 2019 1:58 AM
ठुमरी का नाम लेते ही एक चेहरा सामने आता है और वह है गिरिजा देवी का।

ठुमरी का नाम लेते ही एक चेहरा सामने आता है और वह है गिरिजा देवी का। इसीलिए उन्हें ठुमरी की रानी कहा जाता था। वे बनारस घराने से गाती थीं और पूरबी अंग ठुमरी शैली में अपनी प्रस्तुति देती थीं। उनके प्रदर्शनों की सूची में अर्द्ध शास्त्रीय शैलियों में कजरी, चैती और होली शामिल हैं। वे खयाल, भारतीय लोक संगीत और टप्पा भी गाती थीं। उन्होंने एक ऐसे समय में परिवार से बगावत की, जब लड़कियों का घर की दहलीज पार करना भी मुश्किल था। संगीत सीखना है तो घर के भीतर और उसकी प्रतिभा दिखानी है तो वह भी घर में। सार्वजनिक रूप से संगीत की कला को लड़कियां नहीं दिखा सकती थीं। ठुमरी की रानी गिरिजा देवी ने इस परंपरा को तोड़ा। उन्होंने जब गायन शुरू किया तो अपनी दादी और मां का काफी विरोध झेलना पड़ा था। पहले माना जाता था कि उच्च वर्ग की महिलाओं को सार्वजनिक रूप से गायन नहीं करना चाहिए, लेकिन गिरिजा देवी संगीत की ऐसी आग बन कर निकलीं कि उनकी लौ को कोई रोक नहीं पाया।

प्रारंभिक जीवन
गिरिजा देवी का जन्म बनारस में हुआ। वे स्वभाव से ठेठ बनारसी थीं। उन्हें संगीत के प्रति लगाव बचपन से ही था। उन्होंने पांच साल की उम्र में सारंगी वादक सरजू प्रसाद मिश्र से खयाल और टप्पा गाना सीखा लिया था। सरजू प्रसाद मिश्र की आकस्मिक मृत्यु के बाद उन्होंने गुरु श्रीचंद मिश्र से संगीत सीखना शुरू कर दिया। उन्होंने नौ साल की उम्र में फिल्म ‘याद रहे’ में काम किया था। उनके पिता रामदेव हारमोनियम बजाते और संगीत भी सिखाते थे। गिरिजा देवी का विवाह बहुत कम उम्र में कर दिया गया था। उन्होंने अठारह साल की उम्र में एक बेटी को भी जन्म दे दिया था।

हर शौक किया पूरा
उन्होंने अपने समय के सभी शौक पूरे किए। उस दौर में जो काम केवल लड़के करते थे, गिरिजा देवी ने वे भी किए। उन्होंने घुड़सवारी, तलवारबाजी, लड़कों से झगड़े सब किए। यहां तक कि उन्होंने लड़कियों वाले कपड़े तक नहीं पहने। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा भी था कि उन्हें सलवार कुर्ता के बारे में कुछ पता ही नहीं था, क्योंकि कभी पहना ही नहीं। पैंट-शर्ट से सीधे साड़ी में आ गर्इं। इन सब के बीच उन्होंने संगीत को भी पूरी जगह दी। उनका मन संगीत में ही रमता था।

करिअर
गिरिजा देवी के सार्वजनिक गायन की शुरुआत 1949 में ऑल इंडिया रेडियो इलाहाबाद से हुई। महिलाओं का सार्वजनिक मंचों पर प्रस्तुति देना उस समय ठीक नहीं माना जाता था। इस वजह से गिरिजा को लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा। विरोध के बावजूद उन्होंने 1951 में बिहार में अपना पहला सार्वजनिक संगीत कार्यक्रम दिया। इसके बाद गिरिजा देवी की अनवरत संगीत यात्रा शुरू हुई। 1980 में उन्हें कोलकाता स्थित आइटीसी संगीत रिसर्च अकादमी ने आमंत्रित किया। वे वहां की फैकल्टी सदस्य बन गर्इं। वहां रह कर उन्होंने न केवल कई योग्य शिष्य तैयार किए, बल्कि शोध कार्य भी कराए। 1990 में गिरिजा देवी काशी हिंदू विश्वविद्यालय से भी जुड़ीं और वहां की फैकल्टी सदस्य बनीं।

सम्मान
गिरिजा देवी को 1972 में पद्म श्री, 1989 में पद्म भूषण और 2016 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अलावा संगीत नाटक अकादेमी अवार्ड, अकादेमी फेलोशिप, यश भारती समेत कई पुरस्कारों से उन्हें सम्मानित किया गया।

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