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माध्यमः फरेब का खेल

साफ है कि टीवी पर दिखाए जाने वाले ऐसे ज्यादातर कार्यक्रमों का उद्देश्य कथित मनोरंजन के नाम दर्शकों की भीड़ जुटाने (टीआरपी के खेल) और उसके बल पर टीवी चैनलों के मालिकों और विज्ञापनदाताओं के वारे-न्यारे कराने का है।

Author June 17, 2018 6:30 AM
केबीसी की बात करें तो बेहद आसान से दिखने वाले सवालों के जवाब को एक क्रम में रख कर आगे रहने वाला कोई एक प्रतिभागी हॉट सीट पर पहुंचता है और अगर उस पर किस्मत मेहरबान हुई, तो कुछ पैसे जीत जाता है।

हमारे देश में लाखों लोग ऐसे हैं, जिन्हें लगता है कि टीवी के जरिए उनकी किस्मत चमक जाएगी और वे रातोंरात अमीर हो जाएंगे। मामला इंसानी फितरत या कहें कि मनोविज्ञान को समझ कर एक झटके में बिना कोई मेहनत किए या दिमाग लगाए लाखों-करोड़ों कमाने का झांसा देने का है। यह सपना इधर टीवी के कुछ कार्यक्रमों, जैसे ‘कौन बनेगा करोड़पति’, ‘दस का दम’ और ‘सबसे स्मार्ट कौन’ के जरिए दिखाया जा रहा है। केबीसी यानी ‘कौन बनेगा करोड़पति’ का दसवां सीजन शुरू होने वाला है, जिसके लिए धड़ाधड़ पंजीकरण कराया जा रहा है। रोज एक सवाल पूछा जाता है, जिसके जवाब में एक विकल्प चुन कर छह रुपए का एसएमएस भेजना होता है।

सन 2000 में शुरू हुए केबीसी को अमिताभ बच्चन ने अपनी शानदार कलाकारी के माध्यम से उन ऊंचाइयों पर पहुंचाया है, जिसकी कल्पना शायद इसके निर्माताओं ने भी नहीं की होगी। निर्माता इसकी वाजिब फीस भी अमिताभ बच्चन को देते हैं। बताया जा रहा है कि इस साल इसकी प्रसारित होने वाली हर कड़ी के लिए अमिताभ को तीन करोड़ रुपए भुगतान किया जाएगा। इसके बदले निर्माता कार्यक्रम के बीच-बीच में दिखाए जाने वाले विज्ञापनों की बेहद ऊंची दरें वसूल करेंगे। इन विज्ञापनों को दिखाने वाली कंपनियां कार्यक्रम की ऊंची दरों के बल पर करोड़ों उपभोक्ताओं वाले इस देश में अपना सामान बेचने में सफल होंगी। जाहिर है, वे भी इस तरह करोड़ों-अरबों का वारा-न्यारा करेंगी।

कुछ ऐसा ही तौर-तरीका अभिनेता सलमान खान द्वारा प्रस्तुत टीवी शो- ‘दस का दम’ है। इसके लिए भी सलमान मोटी फीस ले रहे हैं। तीसरा कार्यक्रम- ‘सबसे स्मार्ट कौन’ अपेक्षाकृत नया है, प्रस्तोता से लेकर अपने स्वरूप में, पर यह कार्यक्रम भी अपने निर्माताओं, विज्ञापनदाताओं की मनोकामनाएं पूरी करेगा- यह आस तो वहां भी लगाई गई है। पर इससे इतर इन सारे कार्यक्रमों का जो मुख्य उद्देश्य बताया और सुनाया जाता है, वह बेचारी गरीब जनता को इनमें भाग लेकर एक झटके में लखपति-करोड़पति बनाने के संबंध में है। इन सभी में इंसान की मूल फितरत यानी लालच को समझ कर यह सपना दिखाया जाता है कि आइए, हम आपको मौका दे रहे हैं कि आप अपनी प्रतिभा यहां आकर दिखाइए और रातोंरात लाखों-करोड़ों कमा कर ले जाइए, जो आपका ही इंतजार कर रहे हैं। कुछ लोगों को अवश्य चंद हजार या लाख रुपए इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेने से मिल जाते हैं, पर सवाल है कि क्या वे लोग इनमें आकर सच में कोई प्रतिभा दिखाते हैं!

केबीसी की बात करें तो बेहद आसान से दिखने वाले सवालों के जवाब को एक क्रम में रख कर आगे रहने वाला कोई एक प्रतिभागी हॉट सीट पर पहुंचता है और अगर उस पर किस्मत मेहरबान हुई, तो कुछ पैसे जीत जाता है। लेकिन जिस प्रतिभा या सामान्य ज्ञान का इसमें मुकाबला होता है, सवाल है कि आखिर उसका स्तर क्या है? वर्ष 2000 में जब केबीसी की शुरुआत हुई थी, तो कुछ ऐसे प्रतिभागी जीते थे, जिनके बारे में दावा किया जाता है कि उन्होंने देश की प्रतिष्ठित यूपीएससी की परीक्षा दी थी। एकाध जमीनी प्रतियोगियों के जीतने की घटना भी अभूतपूर्व बताई जाती है, जो कुछ वर्ष बाद यह कहते पाए गए कि करोड़ों जीतने के बाद भी न उनकी कोई खास पहचान बनी और न अपने ज्ञान का विस्तार वे कर पाए। लालच जगाने और किस्मत पलटने का दावा करने वाले दूसरे कार्यक्रम तो केबीसी से भी ज्यादा गए-गुजरे हैं।

मसलन, सलमान खान के ‘दस का दम’ में प्रतिभागियों को सारा जोर इस पर लगाना पड़ता है कि सवाल के जवाब में उनके द्वारा सुझाए गए प्रतिशत का मिलान स्क्रीन पर ऊपर-नीचे खिसकने वाले निशान से हो जाए। इसमें कौन-सा सामान्य ज्ञान या जानकारी काम आती है, यह कार्यक्रम निर्माता ही बेहतर बता पाएंगे। क्योंकि कितने प्रतिशत महिलाएं चोरी-छिपे अपने पति के मोबाइल के मैसेज पढ़ती हैं- ऐसे अटपटे सवाल कम से कम सामान्य ज्ञान की किसी किताब या आधिकारिक सर्वेक्षण में तो नहीं मिलते हैं। कुछ ऐसा ही नजारा इन दिनों एक अन्य कार्यक्रम- ‘सबसे स्मार्ट कौन’ में दिख रहा है, जिसमें दावा किया जाता है कि सवाल का जवाब दिखाई गई तस्वीर में ही छिपा होता है। पिछले दिनों दिखाए गए कार्यक्रम में सुरंग से निकलती ट्रेन की तस्वीर के साथ पूछा गया सवाल था कि सुरंग के अंत में कौन-सी रोशनी दिख रही है। प्रतिभागी ने गलत उंगली रख दी और वह हार गया। पर यहां भी अहम सवाल यही है कि आखिर इसमें किस सामान्य ज्ञान की परीक्षा हुई। कुछ इसी तरह के उदाहरण अतीत के कई अन्य ऊटपटांग कार्यक्रमों में मिल चुके हैं, जिनमें कभी यह दावा किया जाता है कि बताइए कि आप पांचवीं पास बच्चे से कितने तेज हैं, तो कभी गुब्बारों पर बैठ-बैठ कर फोड़ने की प्रतियोगिता करवा कर कथित तौर पर प्रतिभागियों का सामान्य ज्ञान जांचा जाता रहा।

साफ है कि टीवी पर दिखाए जाने वाले ऐसे ज्यादातर कार्यक्रमों का उद्देश्य कथित मनोरंजन के नाम दर्शकों की भीड़ जुटाने (टीआरपी के खेल) और उसके बल पर टीवी चैनलों के मालिकों और विज्ञापनदाताओं के वारे-न्यारे कराने का है। पर गंभीर बात यह है कि सामान्य ज्ञान के नाम पर लालच का जाल बिछाते हुए एक नए किस्म का जुआ, सट्टा, कैसीनो हमारी मशीनरी की खुली आंखों के सामने चलाया जा रहा है और कोई कुछ नहीं कर पा रहा है। कोई यह नहीं समझ पा रहा है कि लॉटरी के धंधे और केबीसी, ‘दस का दम’ या ‘सबसे स्मार्ट कौन’ में कोई ज्यादा अंतर नहीं है, क्योंकि ये भी एक संभ्रांत किस्म का फरेब बेच रहे हैं, जिसमें दो-चार लोगों की जेब में चवन्नी-अठन्नी डाल कर पूंजीपतियों की रकम में बीसियों गुना बढ़ोतरी कराई जाती है। यह ठीक वैसे ही है जैसे इंटरनेट पर उत्पादों को पसंद करने का घोटाला चलाया जाता है। पांच सौ रुपए में स्मार्टफोन दिलाने की घंटी बजाई जाती है, बेटी बचाओ योजना या प्रधानमंत्री आवास योजना के फर्जी फॉर्म बेचे जाते हैं। हर जगह दो के चार करने को प्रेरित करने वाले इंसान के लालच का फायदा उठाने की कोशिश हो रही है, पर जनता से लेकर सरकार तक इस मामले में लाचार है।

यह बात सिर्फ कहावत तक सीमित नहीं है कि जब तक लालच जिंदा है, ठग भूखे नहीं मरेंगे, बल्कि टीवी के जरिए तो यह बात अक्षरश: सच साबित हो रही है। अफसोस कि फर्जी फाइनेंस कंपनी बना कर आम जनता के लाखों-करोड़ों रुपए लेकर भाग जाने वाला जिस तरह दोषी माना जाता है, उसी तरह टीवी के इन कार्यक्रमों को कतई नहीं देखा जाता है, क्योंकि ये कथित तौर पर ज्ञान परोस हैं और गरीब जनता के सपनों को साकार करने का पुनीत कार्य कर रहे हैं।

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