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रूमानियत और बगावत का शायर

फैज़ अहमद फ़ैज़ संभवत: भारतीय उपमहाद्वीप के ऐसे दूसरे शायर थे, जिनका नाम नोबेल पुरस्कार के लिए नामित हुआ था। यह अलग बात है कि नोबेल नहीं मिल पाया, लेकिन उन्हें 1962 में लेनिन शांति पुरस्कार दिया गया।

फ़ैज़ के घर में मुसलिम धर्म को लेकर कट्टरपंथी रुझान था, मगर उनकी परवरिश खुले माहौल में हुई थी।

फैज़ अहमद फ़ैज़ संभवत: भारतीय उपमहाद्वीप के ऐसे दूसरे शायर थे, जिनका नाम नोबेल पुरस्कार के लिए नामित हुआ था। यह अलग बात है कि नोबेल नहीं मिल पाया, लेकिन उन्हें 1962 में लेनिन शांति पुरस्कार दिया गया। रूमानियत और बगावत के इस विलक्षण शायर ने पूरे उपमहाद्वीप में अपनी गहरी छाप छोड़ी। पाकिस्तान बनने के बाद उन्हें अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण उम्र का लंबा हिस्सा जेलों में काटना पड़ा। फ़ैज़ का जन्म 13 फरवरी, 1911 में मौजूदा पाक-पंजाब के जिला नैरोवाल के कस्बे काला कदर में हुआ था। अब उस कस्बे का नाम भी फ़ैज़ नगर पड़ गया है। पिता सुल्तान अहमद खान बैरिस्टर थे और ब्रिटिश शासन की खिदमत में थे। साथ ही कलम पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी। उन्होंने उन दिनों में शाही अफगानिस्तान के एक अमीर सामंत अमीर अब्दुर्रहमान की जीवनी लिखी थी, जिसकी खूब चर्चा हुई।

फ़ैज़ के घर में मुसलिम धर्म को लेकर कट्टरपंथी रुझान था, मगर उनकी परवरिश खुले माहौल में हुई थी। उन दिनों परंपरा यही थी कि बच्चे को शुरुआती तालीम के लिए मौलवी के पास भेजा जाता था। फ़ैज़ को अरबी, फारसी, उर्दू और विशेष रूप से कुरान के अध्ययन के लिए मौलवी मुहम्मद इब्राहीम मीर रियालकोटी के पास भेजा गया। बाद में एक इस्लामिक स्कूल में भेजा गया। कुछ वक्त ‘स्कॉच मिशन स्कूल’ में भी छोड़ा गया। मैट्रिक तक की शिक्षा के बाद उन्हें ‘मरी कॉलेज सियालकोट’ में दाखिला मिला। इंटर के बाद वे गवर्नमेंट यूनिवर्सिटी कॉलेज लाहौर चले गए। 1926 में बीए के बाद वहीं से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। फिर 1932 में वहीं से अरबी में भी मास्टर डिग्री प्राप्त की। उन्हीं दिनों वे वामपंथी विचारक एमएन राय से मिले, फिर उनकी जिंदगी और सोच की दिशा ही बदल गई।

फ़ैज़ का समूचा करिअर दिलचस्प मोड़ों से गुजरा। वामपंथी झुकावों के बावजूद 1942 में द्वितीय महायुद्ध के दौरान वे ब्रिटिश फौज में कैप्टन के रूप में भरती हो गए। 1943 में दिल्ली में ‘पोस्टिंग’ मिली। रैंक बढ़ता गया। 1943-44 में ही ‘मेजर’ और फिर लेफ्टीनेंट कर्नल हो गए थे। पारिवारिक कारणों से विभाजन के समय फ़ैज़ ने पाकिस्तान को प्राथमिकता दी, मगर 1947 में ही उन्होंने सेना से त्याग पत्र दे दिया। वैसे फ़ैज़ भारत में सदा चर्चा का विषय बने रहे। हाल ही में उनकी बेटी मोनीजा हाशमी के बहाने उन पर फिर से चर्चा हुई। मोनीजा हाशमी को दिल्ली में आयोजित पंद्रहवें एशिया मीडिया सम्मेलन में विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। लेकिन जब वे सम्मेलन में शिरकत के लिए पहुंचीं, तो उन्हें उसमें भाग लेने से रोक दिया गया। फिर वे अपने स्तर पर किसी और होटल में रुकीं। अपनी एक पुरानी दोस्त से मिलीं और कुछ अनौपचारिक बातचीत में उदास मन से अपने पिता फ़ैज़ की पक्तियां याद कीं, ‘लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है।’

उनका कहना था फ़ैज़ साहब अपने देश पाकिस्तान में कभी वहां के सांप्रदायिक, कट्टरपंथी या तानाशाहों के पक्षधर नहीं रहे। उन्हें अपनी खुली और उदारवादी सोच के लिए आजाद पाकिस्तान में भी लंबी उम्र तक जेल काटनी पड़ी थी। मोनीजा को बार-बार अपने पिता की नज्मों के अंश याद आ रहे थे। यह उस शख्स की बेटी है, जिसने भारत-पाक विभाजन का विरोध किया था। उनकी एक नज्म ‘सुब्हे आजादी’ आज भी पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में बार-बार दोहराई जाती है। ‘ये दाग-दाग, उजाला, ये शबगजीदा सहर/ वो इंतिजार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं/ ये वो सहर तो नहीं जिनकी आरजू लेकर/ चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं/ फलक के दश्त में तारों की आखिरी मंजिल/ कहीं तो होगा शबे-सुस्तमौज का साहिल…’

थोड़ा पीछे लौटें। लाहौर के मॉडल एफ ब्लॉक में मकान नंबर 126 के बाहर एक तख्ती पर अंग्रेजी और उर्दू में दर्ज है, ‘फ़ैज़ घर’। यह मकान फ़ैज़ ने अपनी आर्थिक तंगदस्ती के दिनों में शायद बेच दिया था। मगर बाद में उसी शख्स ने यह मकान ‘फ़ैज़ फाउंडेशन’ को एक रुपए की लीज पर दे दिया। फ़ैज़ की दोनों बेटियों ने 2009 में ‘फ़ैज़ फाउंडेशन ट्रस्ट’ के बैनर तले उसे औपचारिक रूप से शुरू किया था। वैसे इस घर का नाम शुरू से ही ‘फ़ैज़ घर’ रहा है। इसमें प्रवेश के लिए जूते उतारने पड़ते हैं। अब यहां लगभग हर दिन शायरी, संगीत, पेंटिंग और योग पर चर्चा होती है। एक बड़ा-सा हॉल भी है, जो शायद पहले ‘फ़ैज़ ड्राइंग रूम’ था। एक ओर फ़ैज़ की ‘लाइब्रेरी’ है, जिसके रखरखाव के लिए वहां की पंजाब सरकार आर्थिक मदद भी देती है। फ़ैज़ और उनकी पत्नी एलिस की कुछ पुरानी चीजें भी एक ‘म्यूजियम’ की मानिंद सजा कर रखी गई हैं। अब यहां ‘ध्यान योग’ के सत्र होने लगे हैं। पिछले दो वर्षों से यहां ‘फ़ैज़ इंटरनेशनल फेस्टीवल’ भी आयोजित हो रहा है।

यह उस बंगले के करीब ही है, जहां फ़ैज़ अपने अंतिम दिनों में रहे थे। फ़ैज़ घर अभी तंगदस्ती का शिकार है। अब ट्रस्ट ने ‘कॉपी राइट’ को लेकर कुछ सक्रियता दिखाई है, ताकि गतिविधियों के लिए कुछ पैसा एकत्र हो सके। अपनी जिंदगी में फ़ैज़ ने अपनी रचनाओं के हिंदी अनुवादों का सारा अधिकार नई दिल्ली के राजकमल प्रकाशन को दे दिया था। वह ‘एग्रीमैंट’ आज भी कायम है। हाशमी चाहती हैं कि मुल्क के हर छोटे-बड़े शहर में फ़ैज़ घर बने और फ़ैज़ की वैचारिकता से जुड़े लेखकों की रचनाएं ‘एफएफटी पब्लिशिंग हाउस’ के बैनर तले छापी जाएं।

फ़ैज़ की पत्नी एलिस लंदन के एक बुकसेलर की बेटी थीं। वहां भी वे ज्यादातर भारतीय बुद्धिजीवियों के संपर्क में रहतीं थी और उन दिनों वहां इंडिया हाउस में कृष्ण मेनन की सेक्रेटरी के रूप में काम करती थीं। अपनी बहन क्रिस्टोबल के साथ वे 1930 के दशक में भारत आर्इं, जहां उनका मन रम गया। यहीं अमृतसर में फ़ैज़ से मुलाकात हुई और दोनों करीब आते गए। वर्ष 1941 में श्रीनगर के परीमहल में (तत्कालीन महाराजा का ग्रीष्म-महल) दोनों का निकाह हुआ। उन दिनों क्रिस्टोबल के पति एमडी तासीर, वहां पर एसपी कॉलेज के प्रिंसिपल थे और वह भी वहीं ‘परी महल’ के एक हिस्से में रहते थे। निकाह की ज्यादातर रस्में शेख अब्दुल्ला ने निभाई थी। बाद में ‘फ़ैज़’ पाकिस्तान टाइम्स के संपादक बने तो एलिस ने उसी अखबार में बच्चों और महिलाओं के फीचर पेज संभाल लिए।

फ़ैज़ 1936 में गठित प्रगतिशील लेखक संघ के पहले सचिव चुने गए थे। 1941 में उनकी पहली साहित्यिक कृति ‘अदबे-लतीफ’ छपी। पाकिस्तान टाइम्स के संपादक बनने के कुछ समय बाद ही 1951 में उन पर ‘रावलपिंडी-षड्यंत्र केस’ बना और इस शख्स ने चार वर्ष जेल में बिताए। पाकिस्तान में कम्युनिस्ट पार्टी के गठन में भी फ़ैज़ और उनके एक साथी सज्जाद जहीर की मुख्य भूमिका थी। मगर फ़ैज़ कभी कट्टरपंथी कामरेड नहीं रहे। यह भी तथ्य है कि उनकी गिनती कभी पार्टी के ‘कार्ड होल्डरों’ में नहीं की गई।
1955 में तत्कालीन प्रधानमंत्री सुहरावर्दी ने उनकी सजा माफ की, मगर उन्हें कुछ समय के लिए देश छोड़ने का हुक्म मिला। कुछ वर्ष लंदन में बिताने के बाद जब वे लौटे तो फिर से वामपंथी लेखन के आरोप में गिरफ्तार कर लिए गए। 1958 में भुट्टो के हस्तक्षेप से छूटे। कुछ वर्ष ब्रिटेन और सोवियत संघ में बिताने के बाद 1964 में स्वदेश लौटे और स्थायी रूप से कराची में बस गए।

जुल्फीकार अली भुट्टो के शासनकाल में वे वहां के संस्कृति मंत्रालय के सलाहकार रहे। भुट्टो के मुकदमे और फांसी की सजा के बाद फ़ैज़ ने चुपचाप देश छोड़ दिया। उन्होंने बेरुत (लेबनान) में शरण ली। मगर 1982 में फिर लौट आए। बाकी जिंदगी लाहौर में ही गुजारी। इसी बीच फ़ैज़ आधा दर्जन बार भारत आए। कहते थे, लगता है ‘सगे रिश्तेदारों से बगलगीर होने आया हूं।’ उन्हें ‘लेनिन शांति पुरस्कार’ और कुछ अन्य सम्मान जीते-जी मिले, लेकिन उनके अपने देश पाकिस्तान में उन्हें ‘निशान-ए-इम्तियाज’ से मरणोपरांत ही नवाजा जा सका। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अब भी ‘फ़ैज़’ एक काव्यमय मुहावरा बने हुए हैं।

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