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शख्सियतः बाल गंगाधर तिलक

स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा!’ यह नारा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नेता बाल गंगाधर तिलक ने दिया। आजादी का बिगुल बजाने वाले तिलक ने ब्रिटिश राज की क्रूरता की निंदा अपने लेखों में भी की।

Author July 8, 2018 7:26 AM
तिलक

जन्म : 23 जुलाई, 1856, निधन : 1 अगस्त, 1920
स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा!’ यह नारा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नेता बाल गंगाधर तिलक ने दिया। आजादी का बिगुल बजाने वाले तिलक ने ब्रिटिश राज की क्रूरता की निंदा अपने लेखों में भी की। उन्होंने देश की जनता को आजादी के लिए प्रेरित किया। इसलिए उन्हें लोकमान्य की उपाधि दी गई। बाल गंगाधर तिलक को हिंदू राष्ट्रवाद का पिता भी कहा गया। वे शिक्षक, वकील, समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी थे।

व्यक्तिगत जीवन

बाल गंगाधर तिलक का जन्म महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के गांव चिखली में हुआ था। तिलक को बचपन से पढ़ाई-लिखाई का माहौल मिला। उनके पिता गंगाधर शास्त्री रत्नागिरी में संस्कृत विद्वान और स्कूल शिक्षक थे। उनकी माता का नाम पार्वती बाई गंगाधर था। 1871 में तिलक ने तापीबाई से शादी की, जो बाद में सत्यभामाबाई के रूप में प्रख्यात हुर्इं। अंग्रेजी शिक्षा के आलोचक तिलक ने स्कूल और कॉलेजों में गणित पढ़ाया। उन्होंने भारत में शिक्षा के सुधार के लिए दक्खन शिक्षा सोसायटी की स्थापना की।

तिलक की पत्रकारिता

अंग्रेजी शासन के विरुद्ध और जनता में आजादी की चाह जगाने के लिए तिलक ने अंग्रेजी में मराठा दर्पण और मराठी में केसरी नामक दैनिक समाचार पत्र शुरू किए। इन पत्रों को जनता ने खूब सराहा। सत्ता के विरुद्ध पत्रकारिता करने की वजह से उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा।

राजनीतिक जीवन

भारतीय राजनीति में लाल-बाल-पाल की जोड़ी ने कमाल कर दिखाया। इनकी जोड़ी के संघर्ष के कारण ही देश को आजादी का स्वाद चखने को मिला। बाल गंगाधर तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में 1890 में शामिल हुए। 1907 में कांग्रेस गरम दल और नरम दल में विभाजित हो गई। इसलिए तिलक गरम दल में शामिल हो गए। गरम दल में तिलक के साथ लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल शामिल थे। 1908 में उन्हें प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस के बम हमले का समर्थन करने पर म्यांमा स्थित मांडले की जेल भेज दिया गया। जेल से छूट कर वे फिर कांग्रेस में शामिल हो गए और 1916 में एनी बेसेंट और मुहम्मद अली जिन्ना के साथ अखिल भारतीय होम रूल लीग की स्थापना की।

समाज सुधारक

तिलक कई बार जेल गए, लेकिन अपने लक्ष्य पर डटे रहे। वे एक आंदोलनकारी और शिक्षक के अलावा समाज सुधारक भी थे। उन्होंने बाल विवाह जैसी कुरीतियों का विरोध किया और इसे प्रतिबंधित करने की मांग की। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का भी समर्थन किया। आंदोलन, विभिन्न पत्रों और भाषणों के माध्यम से देश की आवाम को एक साथ लाने वाले तिलक कुशल संयोजक भी थे। उन्होंने गणेश उत्सव और शिवाजी के जन्मोत्सव जैसे सामाजिक उत्सव शुरू किए।

पुस्तकें

तिलक ने कई पुस्तकें लिखीं, लेकिन उनके द्वारा मांडले जेल में लिखी गई गीता-रहस्य सर्वोत्कृष्ट है, जिसका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं- वेद काल का निर्णय, श्रीमदभगवतगीता रहस्य या कर्मयोग शास्त्र, आर्यों का मूल निवास स्थान, हिंदुत्व, श्यामजीकृष्ण वर्मा को लिखे तिलक के पत्र, वेदों का काल-निर्णय और वेदांग ज्योतिष आदि।

निधन

बाल गंगाधर तिलक मधुमेह के शिकार हो गए और उनका स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन बिगड़ता चला गया। जुलाई 1920 में उनकी हालत खराब हो गई और 1 अगस्त को मुबंई में उनका निधन हो गया। मरणोपरांत श्रद्धांजलि देते हुए गांधीजी ने उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा और जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय क्रांति का जनक बताया।

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