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आधी दुनियाः हकीकत और फसाना

हाल में टॉम्सन रायटर फाउंडेशन ने एक सर्वे रपट जारी की। सर्वे में औरतों के बारे में लोगों की राय पूछी गई थी। बताया जाता है कि इसमें शिक्षाशास्त्रियों, विकास और सहायता से जुड़े समूहों, स्वास्थ्य के लिए काम करने वालों, स्व-सहायता समूहों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की राय ली गई थी।

Author Published on: July 8, 2018 6:20 AM
मात्र पांच सौ लोगों के आधार पर एक अरब तीस करोड़ लोगों के देश के बारे में राय बना ली गई।

क्षमा शर्मा

हाल में टॉम्सन रायटर फाउंडेशन ने एक सर्वे रपट जारी की। सर्वे में औरतों के बारे में लोगों की राय पूछी गई थी। बताया जाता है कि इसमें शिक्षाशास्त्रियों, विकास और सहायता से जुड़े समूहों, स्वास्थ्य के लिए काम करने वालों, स्व-सहायता समूहों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की राय ली गई थी। जिन लोगों से बात की गई, उनकी संख्या लगभग पांच सौ बताई जा रही है। इसमें यह भी कहा गया है कि इस रपट को उन लोगों की धारणा के आधार पर बनाया गया, जिनसे बातचीत की गई। इसमें तीन पक्षों पर सवाल पूछे गए थे- एक, औरतों के प्रति यौन हिंसा और यौन अपराध। दो, सांस्कृतिक समूहों, आदिवासियों और तमाम पारंपरिक कार्य व्यापार के कारणों से पैदा होने वाले खतरे, जिन्हें औरतें झेलती हैं।

तीन, वे देश, जिनमें औरतों पर जबरिया मजदूरी, मानव तस्करी और घरेलू गुलामी का सबसे अधिक खतरा मंडराता है। सांस्कृतिक सवालों के दायरे में वे सवाल थे, जिन कारणों से औरतों को निशाना बनाया जाता है। जैसे कि भ्रूण हत्या, तेजाब के हमले, सुन्नत, बाल विवाह, जबरिया शादी, मारपीट आदि। इसके अलावा भारत की रैंकिंग इन बातों के आधार पर भी तय की गई, जैसे कि यौन हिंसा, जिसमें दुष्कर्म को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, घरेलू जनों द्वारा दुष्कर्म, अपरिचित द्वारा दुष्कर्म, दुष्कर्म के मामलों में न्याय न मिलना, और भ्रष्टाचार के रूप में औरतों के शरीर का इस्तेमाल। उत्तर देने वालों से छह श्रेणियों में पांच सबसे खतरनाक देशों के नाम पूछे गए थे। और विद्वानों ने इन्हीं आधारों पर भारत को औरतों के लिए सबसे खतरनाक देश साबित करने की कोशिश की।

इन लोगों से बात करके इस रपट में बताया गया कि औरतों के लिए भारत दुनिया का सबसे खतरनाक देश है। यहां तक कि भारत में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, सोमालिया आदि देशों के मुकाबले भी औरतों की हालत बदतर है। मात्र पांच सौ लोगों के आधार पर एक अरब तीस करोड़ लोगों के देश के बारे में राय बना ली गई। प्रसंगवश यह बताना जरूरी है कि जैसे ही कोई ऐसी रिपोर्ट आती है, चैनलों के पौ बारह हो जाते हैं। जितनी नकारात्मक खबर, उतने ही उसे देखने वाले और उतनी ही उसकी रेटिंग और विज्ञापनों के रूप में भारी मुनाफा।

जिस दिन यह रिपोर्ट आई उसके अगले दिन मेरी एक रिश्तेदार लड़की का फोन आया। यह लड़की विदेश में रहती है। परिवार के तीन-चौथाई सदस्य विदेशों में रहते हैं। उनमें से अधिकतर लड़कियां और महिलाएं हैं। जिस लड़की ने फोन किया था, न केवल वह बल्कि अन्य लड़कियां और महिलाएं कहती हैं कि इस तरह की रपटों से उन्हें विदेशों में बहुत अपमान का समाना करना पड़ता है। वहां रहने वाले लोग कहते हैं कि तुम्हारे देश में तो औरतों के साथ बहुत बुरा बर्ताव होता है। हर औरत यौन अपराधों और दुष्कर्म जैसी घटनाओं से गुजरती है। क्या तुम्हारे साथ भी ऐसा हो चुका है। यहां तक कि वे परिवार के अन्य सदस्य जैसे पिता या भाइयों के बारे में भी ऐसे ही अपमानजनक सवाल किए जाते हैं। पिछले दिनों बहुत से विदेशी परिवार जो भारत आने और घूमने की योजना बना रहे थे, वे अब आना नहीं चाहते। ऐसा कई सालों से हो रहा है।

उस लड़की की बात सही है। यह बात ठीक है कि इन दिनों दरिंदे मासूम बच्चियों को अपना शिकार आसानी से बना लेते हैं। मंदसौर, इंदौर, कठुआ न जाने कितनी बच्चियां ऐसे हादसों की शिकार होती हैं। दुष्कर्म और यौन अपराध हमारे सामाज की भारी मुसीबतें हैं। लेकिन सोचने की बात यह जरूर है कि क्या भारत में हर एक औरत को दुष्कर्म जैसी घटनाओं को झेलना पड़ रहा है। क्या सबकी सब औरतें यौन अपराध की शिकार हैं। अगर एक अरब तीस करोड़ की आबादी में आधी औरतें हैं, तो क्या वे सब ऐसे हादसों की शिकार बन चुकी हैं। दुष्कर्म और औरतों के प्रति तमाम तरह के अपराध और हिंसा की घटनाएं शर्मनाक हैं। महिलाओं की सुरक्षा किसी भी देश के लिए सबसे जरूरी कदम होना चाहिए। लेकिन पांच सौ लोगों की राय के आधार पर भारत को उन देशों से भी पीछे धक्का देना, जहां औरतें हर तरह के अपराधों का शिकार होती हैं और न कानून, न धर्म, न सरकार, उनकी कोई मदद नहीं करता।

इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले भूल गए कि अकेले पाकिस्तान में ही परिवार की इज्जत के नाम पर सैकड़ों औरतों को परिवार के लोग ही मौत के घाट उतार देते हैं और कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। अफगानिस्तान में औरतों की हालत क्या है, इसे और कुछ नहीं तो सारा शाह की फिल्म ‘बिनीथ द वेल’ देख कर पता किया जा सकता है। महिला बाल विकास मंत्रालय और राष्ट्रीय महिला आयोग ने रपट के वैज्ञानिक आधार और नमूना आकार पर सवाल उठाते हुए इसे सिरे से खारिज कर दिया। इस रिपोर्ट के निष्कर्षों को देख कर ऐसा लगता है जैसे कि सत्य के सारे अधिष्ठान सिर्फ अमेरिका और यूरोप में रहते हैं। बेचारे दुनिया भर की औरतों की चिंता में मरे जाते हैं, अपने देशों की औरतों की हालत दिखाई नहीं देती। जहां नौ-दस साल के बच्चे मां-बाप बन रहे हैं। लड़कियां बहुत कम उम्र में ही मां बनने और बच्चे पालने का अभिशाप झेलती हैं। ब्रिटेन, यूरोप या अमेरिका की जितनी आबादी है, उस हिसाब से वहां औरतों के प्रति अपराध कोई कम नहीं होते। मगर उनकी खबर इस तरह नहीं दी जाती जैसे कि अपने यहां रात-दिन एक कर दिया जाता है।

इसीलिए जैसे ही यह रिपोर्ट आई, बहुत से लोग अपने ही देश में गला फाड़ कर चिल्लाने लगे कि देखो-देखो अमेरिका की एक संस्था ने भारत के बारे में क्या कहा है। जब तक अमेरिका या यूरोप हमारे बारे में कोई राय प्रकट नहीं करते तब तक अपने देश के लोगों के ज्ञान चक्षु नहीं खुलते। ऐसा लगता है जैसे कि इन देशों में औरतें बहुत सुरक्षित हैं। वहां उनके प्रति कोई अपराध नहीं होते और धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है तो वहीं है। जबकि कम आबादी के बावजूद इन देशों में औरतों के प्रति भारी मात्रा में संगीन अपराध होते हैं। यहां तक कि छोटे बच्चे, बच्चियों और दादी-नानियों को भी नहीं बख्शा जाता।

मगर उस तरफ देखने की जरूरत उन्हें क्यों हो। आखिर पश्चिम हमें तीसरी दुनिया का देश समझता है, हमीं उनके उपनिवेश रहे हैं। तो जो गुलाम रहा हो, उसे बार-बार यह बताने की जरूरत होती है कि तुम बेशक कहते रहो खुद को आजाद, लेकिन तुम पड़े हो अब तक वहीं के वहीं हमसे सैकड़ों मील पीछे। क्योंकि ज्ञान का सारा ठेका हमारे पास है। दुनिया हमारी बनाई तकनीक से ही आगे चलती है, वरना तो वहीं की वहीं रहती अंधकार काल में। और अगर मान लीजिए, धारणा के आधार पर ही बात करनी हो तो मोनिका लेंवेंस्की प्रकरण में जिस तरह वहां के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन दोषी पाए गए थे और एक और राष्ट्रपति जान एफ कैनेडी के औरतों से संबंधित ऐसे बेशुमार किस्से कहे-सुने जाते हैं, तो क्या यह मान लिया जाए कि वहां जब राष्ट्रपति के दफ्तर में काम करने वाली औरतें सुरक्षित नहीं, तो अन्य दफ्तरों में औरतों को न जाने क्या-क्या झेलना पड़ता होगा।

और जिस हालीवुड में जाने के सपने हमारे यहां का हर अभिनेता-अभिनेत्री देखता है, उसी हालीवुड के कारनामे को बयान करने वाला ‘मी टू’ भी वहीं से शुरू होता है। कायदे से तो ऐसी संस्थाओं की रिपोर्टों को कानूनी चुनौती दी जानी चाहिए। उनसे पूछा जाना चाहिए कि मात्र पांच सौ लोगों के नजरिए के आधार पर उन्होंने सभी को अपराधी साबित करने की कोशिश किसके इशारे पर की!

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