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रविवारी शख्सियत: बिस्मिल्लाह खां

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान शहनाई का दूसरा नाम है। दुनियाभर में शहनाई की मधुर धुन और तान को पहचान दिलाने का श्रेय अगर किसी को जाता है, तो वे हैं बिस्मिल्लाह खां।

शख्सियतशहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान।

विरासत में मिला संगीत
बिस्मिल्लाह खां का जन्म बिहार के डुमरांव में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम कमरुद्दीन था। वे अपने माता-पिता की दूसरी संतान थे। बाद में उनके दादा रसूल बख्श ने उनका नाम ‘बिस्मिल्लाह’ रखा था, जिसका मतलब होता है ‘अच्छी शुरुआत’।
बिस्मिल्लाह खां को संगीत विरासत में मिली थी। उनके परदादा हुसैन बख्श खां, दादा रसूल बख्श, चाचा गाजी बख्श खां और पिता शहनाई वादक थे। सभी लोग दरवारी राग बजाने में माहिर थे, जो बिहार की भोजपुर रियासत में अपने संगीत का हुनर दिखाने के लिए अकसर जाया करते थे।

बिस्मिल्लाह खां के पिता बिहार की डुमरांव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरबार में शहनाई बजाया करते थे। छह साल की उम्र में वे पिता के साथ बनारस आ गए। वहां उन्होंने अपने मामा अलीबख्श ‘विलायती’ से शहनाई बजाना सीखा। उनके मामा काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थायी रूप से शहनाई-वादन का काम करते थे। बिस्मिल्लाह खां ने छोटी उम्र में ही ठुमरी, चैती, कजरी और स्वानी जैसी कई विधाओं को सीख लिया था। चौदह साल की उम्र में इलाहाबाद के संगीत परिषद में अपने मामा के साथ शहनाई बजाने के कार्यक्रम में भाग लिया। इसके बाद से ही उनकी गिनती पहली श्रेणी के शहनाई वादक के रूप में होने लगी।

शहनाई बनी बेगम
सोलह साल की उम्र में उनका निकाह मुग्गन खानम के साथ हुआ। उनसे उन्हें नौ संतानें हुई। बिस्मिल्लाह खां न सिर्फ अपनी बेगम बल्कि शहनाई से भी बहुत प्यार करते थे। इसलिए वे शहनाई को अपनी दूसरी बेगम कहा करते थे। उन्होंने तीस-पैतीस सालों तक शहनाई की साधना की, हर रोज छह घंटे का रियाज करते थे। अपने मामा के निधन के बाद उन्होंने अकेले ही साठ साल तक इस साज को बुलंदियों तक पहुंचाया। बनारस के घाट, गंगा का किनारा और मंदिरों में रियाज करते-करते बिस्मिल्लाह खां को बनारस से प्यार हो गया था। वो कहते थे, ‘उनकी शहनाई बनारस का हिस्सा है। वह जिंदगी भर मंगलागौरी और पक्का महल में रियाज करते हुए जवान हुए हैं तो कहीं न कहीं बनारस का रस उनकी शहनाई में टपकेगा ही।’

शहनाई को दिलाई पहचान
बिस्मिल्लाह खां ने उस दौर में शहनाई को संगीत परिदृश्य में स्थापित किया, जब सारंगी का दबदबा हुआ करता था। 1937 में कलकत्ता के अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन में उन्होंने अपनी शहनाई से ऐसी धुन बजाई कि हर कोई उनकी साज का दीवाना हो गया। यहीं से उन्हें और उनसे शहनाई को पहचान मिली। इस सम्मेलन में उन्होंने तीन पदक जीते। इसके बाद ही उन्हें 1938 में लखनऊ, आॅल इंडिया रेडियो में काम करने का मौका मिला।

सम्मान और पुरस्कार
देश ही नहीं, पूरी दुनिया उनकी शहनाई की धुन की कायल थी। उन्हें पुरस्कार और सम्मान खूब मिले। 1956 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1961 में पद्म श्री, 1968 में पद्म भूषण, 1980 में पद्म विभूषण। 1994 में संगीत नाटक अकादेमी का फेलो और मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें तानसेन पुरस्कार से नवाजा था। 2001 में उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से भी नवाजा गया।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई की धुन अफगानिस्तान, यूरोप, ईरान, इराक, कनाडा, पश्चिम अफ्रीका, अमेरिका, जापान, हांगकांग और विश्व भर की लगभग सभी देशों में गूंजती रही। दूरदर्शन और आकाशवाणी की सिग्नेचर ट्यून में बिस्मिल्लाह खां की शहनाई की आवाज है, जो उन्हें अमर बनाती है। यही नहीं, संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली ने उनके सम्मान में 2007 में उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार की स्थापना की। यह संगीत, रंगमंच और नृत्य के क्षेत्र में युवा कलाकारों को दिया जाता है।

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