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रविवारी: ध्यान की क्रियाएं

मन से आत्मस्वरूप का चिंतन करना ध्यान है। आत्मा का वास्तविक स्वरूप में आना तथा उसका चिंतन-मनन कर उसे अनुभव करना और उसी में समा जाना ध्यान का लक्ष्य है।

रविवारीध्यान योग।

डॉ. वरुण वीर

इस लेख में ध्यान पर चर्चा करेंगे। योग के अंतिम लक्ष्य परमात्मा तक पहुंचने के लिए मन को शांत व स्थिर करने के उपाय करने चाहिए। अनेक प्रकार की त्राटक क्रियाएं, धारणा की क्रियाएं तथा प्राणायाम आदि मन में स्थिरता और एकाग्रता लाते हैं। यहां कुछ ध्यान की क्रियाओं का विवेचन कर रहा हूं।

ध्यानं निर्विषयं मन: (सांख्य दर्शन)
मन को विषयों से रहित कर देना ध्यान है। निर्विषय को यहां मन को शून्यता में लाना है। एक विषय मन में लगातार बना रहे इसी को निर्विषय मानना चाहिए। शून्यता में जाना भी एक प्रकार का विषय ही है इसलिए ध्यान करते समय मन को जिस भी विषय में लगाया जाए और वह लगातार उसी विषय में लंबे समय तक बना रहे, यही निर्विषय है।

ध्यानमात्म स्वरूपस्य वेदनं मनसा भवेत्
मन से आत्मस्वरूप का चिंतन करना ध्यान है। आत्मा का वास्तविक स्वरूप में आना तथा उसका चिंतन-मनन कर उसे अनुभव करना और उसी में समा जाना ध्यान का लक्ष्य है। यह ध्यान की चरम सीमा है। यदि ध्यान का परम लक्ष्य परमात्मा का चिंतन नहीं है तो यह कार्य बिना दूल्हे की बारात की तरह ही माना जाएगा। बारात तो है लेकिन जब दूल्हा ही नहीं है तो बारात का क्या लक्ष्य है? कुछ भी नहीं। इसलिए ध्यान बिना लक्ष्य के कहीं भी नहीं ले जाता हैं।

बिना लक्ष्य के ध्यान सदैव भटकता ही रहता है। मन यदि भटकता ही रहेगा तो वह शांत व स्थिर नहीं हो पाएगा। ध्यान का लक्ष्य आरंभ में स्थूल भी हो सकता है। लेकिन इंद्रियों के आधार पर ध्यान लंबे समय तक टिक नहीं सकता है। ध्यान सगुण या निर्गुण दोनों ही प्रकार का हो सकता है और दोनों में ही परमात्मा का अनुभव किया जा सकता है।

सगुण ध्यान : परमात्मा के द्वारा बनाए गए सूर्य, चंद्रमा, तारे, पृथ्वी तथा पंचतत्व आदि पदार्थों का का ध्यान कर परमात्मा को अनुभव करना, सूर्य की किरणों तथा चंद्रमा की शीतलता, वायु के स्पर्श आदि में परमात्मा की सगुणता को महसूस करना तथा इन सभी पदार्थों का निर्माता परमेश्वर ही है और वह उनमें विद्यमान भी है, ऐसा मानकर उसकी उपासना करना ही सगुण ध्यान है।

निर्गुण ध्यान : ईश्वर सच्चिदानंद स्वरूप निराकार सर्वशक्तिमान न्यायकारी दयालु अजन्मा अनंत निर्विकार अनादि अनुपम सर्वाआधार सर्वेश्वर सर्वव्यापक सर्वांतयार्मी अजर अमर अभय नित्य पवित्र और सृष्टि करता है उसी की उपासना करना योग्य है (आर्य समाज का दूसरा नियम), जो आनंदस्वरूप ब्रह्म है। ध्यान करने वाला ऐसा बने तथा ऐसा भाव रखना ही निर्गुण ध्यान है। प्रत्येक वस्तु निर्गुण और सगुण दोनों ही होती है। ईश्वर भी सगुण और निर्गुण है। जैसे परमात्मा प्रकृति का निर्माण करता है तब उसकी दया सूर्य, चंद्रमा तथा प्रकृति के गुणों के माध्यम से सगुण परमात्मा का आभास होता है।

परमात्मा अमूर्त होते हुए भी प्रकृति के पदार्थों में विद्यमान है। इसी प्रकार जीवात्मा का तो जन्म होता है पर परमात्मा अजन्मा है। जब लोहा अग्नि में तपने के बाद अग्निमय हो जाता है लेकिन फिर भी वह लोहा ही रहता है, उसी प्रकार जब ध्यान करने वाला आत्मा परमात्मा में लीन हो जाता है अर्थात ब्रह्ममय हो जाता है लेकिन ब्रह्म नहीं होता हैं। इस तथ्य को जानकर ध्यान करने वाला योगी ध्यान की अनंत गहराई में पहुंच जाता है।

सूर्य ध्यान : उगते हुए सूर्य को पहले कुछ सेकंड तथा फिर कुछ मिनट तक बिना पलक झपकाए लगातार देखना और फिर आंख बंद करके मन ही मन सूर्य की उसी आकृति तथा रंग पर लगातार ध्यान बनाकर रखना, यह अनुभव करना कि तेजोमय किरणें सूर्य से निकल रही हैं, वह मेरे शरीर के भीतर ईश्वर की शक्ति का संचार कर रही हैं तथा मेरे शरीर के रोग दूर हो रहे हैं।

चंद्र ध्यान : पूर्णमासी के चंद्रमा को कुछ मिनट तक लगातार देखें फिर वही दृश्य बंद आंखों से ध्यान के द्वारा अपने हृदय में स्थापित करें और अनुभव करें कि चंद्रमा की शीतल शक्ति अनाहत चक्र के माध्यम से संपूर्ण शरीर के साथ-साथ मन को भी आनंदमय बना रही है। चंद्रमा की इन शीतल धाराओं के माध्यम से सर्वशक्तिमान परमात्मा मेरे शरीर के प्रत्येक कोने में व्याप्त हो रहा है।

ज्योतिर्मयी ध्यान : ध्यान करते समय अपने आज्ञा चक्र में ज्योति को स्थापित करें जैसे दीये की लौ जलती है उसी प्रकार की ज्योति पर ध्यान केंद्रित कर अनुभव करें कि ना ही ज्योति हिल रही है और ना ही मन हिल रहा है। ज्योति की तरह मन भी स्थिर हो गया है। ज्योति की शक्ति के माध्यम से परमात्मा आपके आज्ञा चक्र में है और उसी लौ में परमात्मा के प्रकाश को अनुभव करें ।

ओंकार ध्वनि ध्यान : ध्यानात्मक आसन में बैठकर आंखें थोड़ी खुली रखें और नासिका के अग्रभाग को देखें। अष्टदल कमल पर ध्यान लगाए ओंकार ध्वनि की कणिकाओं में परमात्मा विराजमान है। अनेक प्रकार की रश्मियों को फैला रहा है। अपनी आत्म ज्योति को उस परमात्मा की ज्योति से मिला दीजिए। परमात्मा की यह ज्योति संपूर्ण जगत को भर रही है और मैं उसमें ही समाहित हो गया हूं, ऐसा अनुभव करे।

पिण्ड ध्यान : इस शरीर में परमात्मा का निवास है ‘यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे’ शरीर में स्थित चक्रों पर ध्यान को एकाग्र कर प्रभु का चिंतन करना चाहिए। यह अष्ट चक्र को शुद्ध करता है। मूलाधार से चक्रों को शुद्ध करता हुआ भूमध्य में आ जाता है जहां इडा पिंगला सुषुम्ना नाड़ी विराजमान है। यहां ध्यान का अभ्यास करने से शक्ति को गति मिलती है। तत्पश्चात सहस्त्र कमल में ध्यान लगाते समय गुरु का ध्यान करना चाहिए।

स एष पूवेर्षामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात्।
वह परमात्मा गुरु का भी गुरु है। उसी के ध्यान का विषय बनाना चाहिए। यहां अमृत का सागर बह रहा है उसी अमृत में आत्मा मग्न हो रहा है।
गुणातीत ध्यान : इस ध्यान में बैठकर तमोगुण रजोगुण तथा सत्व गुण का ध्यान करना है। सबसे पहले तमोगुण पर ध्यान को केंद्रित करें। ध्यान तमोगुण के कारण जड़त्व मोह अहंकार ने मन को ढक लिया है। चारों ओर अंधकार ने आप को ढक लिया है यह भाव बनाए रखें कुछ समय बाद मन के विचार शांत होते जाएंगे और फिर रात्रि का भेदन करते हुए सूर्य का प्रकाश आ रहा हैए सारा शरीर सूर्य की लालिमा से ढक रहा है और आपका मन मस्तिष्क लाल रंग की कणिकाओं से भर उठा है जो मन तमोगुण के कारण मोह और जड़ को प्राप्त हुआ था अब वह गतिशील हो गया है लेकिन मन को इधर-उधर ना जाने दें, हृदय में ही लगाकर रखें तथा शांत भाव से सूर्य की किरणों को देखते रहे, रजोगुण के बाद अब सत्व गुण का प्रकाश प्रकट हो रहा है, जिसने तमोगुण-रजोगुण को श्वेत प्रकाश के दूर कर दिया है।

शरीर का एक-एक अंग श्वेत हो चुका है। यह तीनों त्रिगुणात्मक प्रकृति के स्वरूप हैं जिन्होंने सभी को अपने बंधन में बांध रखा है। तीनों गुणों को दूर करते हुए अपने तथा ब्रह्म के शुद्ध स्वरूप को जानकर उस का आनंद प्राप्त करें।

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