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रविवारी कहानी: नहीं बनाना नया घोंसला

सोनू कबूतर और नीनू कबूतरी ने उन्हें दूर से ही आते हुए देख लिया था। मीठू और स्पैरो ने एक डाल पर थैली रखते हुए बड़े अंदाज में झुकते हुए कहा, ‘लीजिए हाजिर है स्पेशल घोंसला बनाने का स्पेशल सामान।’

रविवारीरविवारी कहानी: नहीं बनाना नया घोंसला।

शिखर चंद जैन

सोनू कबूतर और उसकी पत्नी नीनू कबूतरी आपस में बातें कर रहे थे और अपना घोंसला बनाने की प्लानिंग कर रहे थे। तभी बगल की टहनी पर बैठा हरियल तोते का बेटा मीठू और गोरी गौरैया की बेटी स्पैरो उनके पास आ गई। मीठू और स्पैरो ने सुना कि सोनू की तबीयत ठीक नहीं थी इसलिए वे मदद के लिए आए थे। मीठू ने कहा, ‘नीनू चाची, हमें बताइए ना क्या करना है। हम आपकी मदद करेंगे।’ स्पैरो बोली, ‘हम तो बच्चे हैं और एनर्जेटिक हैं, हमें तो काम करने में मजा आएगा।’ मीनू ने कहा, ‘बच्चों बड़ी खुशी की बात है कि तुम ऐसा सोचते हो। हमें एक दूसरे की मदद सचमुच करनी चाहिए। घोंसला तो हम दोनों मिलकर बना लेंगे लेकिन तुम हमारे लिए जंगल में जाकर कुछ सामान ला दो। छोटी बड़ी हर आकार की पतली टहनियां और पत्ते ला दो।’

‘जी ठीक है’ स्पैरो और मीठू ने एक साथ कहा।
दोनों उड़ चले। रास्ते में एक जगह खूब सारी चमकीली और रंग बिरंगी प्लास्टिक की थैलियां, प्लास्टिक की डोरी और स्ट्रा पड़े थे। स्पैरो ने कहा, ‘देखो मीठू, कितनी सुंदर लग रही हैं ये चीजें। यही ले चलें। चाचा-चाची का घोंसला सबसे अलग और रंग-बिरंगा बनेगा तो खुश हो जाएंगे। दोनों ने एक बड़ी सी थैली ली उसमें कुछ चमकीली थैलियां, स्ट्रॉ और डोरियां भर लीं और थैली का एक-एक छोर चोंच में दबाकर
उड़ चले।

सोनू कबूतर और नीनू कबूतरी ने उन्हें दूर से ही आते हुए देख लिया था। मीठू और स्पैरो ने एक डाल पर थैली रखते हुए बड़े अंदाज में झुकते हुए कहा, ‘लीजिए हाजिर है स्पेशल घोंसला बनाने का स्पेशल सामान।’ दोनों ने सोचा था कि चाचा-चाची खूब खुश होंगे और शाबाशी देंगे। लेकिन उन्होंने देखा कि चाचा-चाची के चेहरे पर परेशानी के भाव थे।

स्पैरो ने डरते-डरते पूछा, ‘क्या बात है, आप लोग परेशान दिख रहे हैं?’ सोनू ने कहा, ‘बेटा इस प्लास्टिक ने ही तो हमारा जीना दूभर कर रखा है। इंसान ने अपनी नासमझी और लापरवाही से अपना जीवन तो खराब कर ही लिया, हम पशु-पक्षियों को भी चैन से नहीं रहने देते। दुनियाभर में लाखों पशु-पक्षी प्लास्टिक की वजह से मर जाते हैं। इतना ही नहीं इन्होंने तो नदियों और समुद्रों को भी प्लास्टिक के कचरे से प्रदूषित कर दिया है, जिससे लाखों की तादाद में समुद्री जीव रसायन के उत्सर्जन और इन्हें खाने के कारण मर जाते हैं। प्लास्टिक कभी भी पच नहीं सकता। हमारी धरती माता भी इसके कारण घुट रही है और दुखी है। प्लास्टिक की एक बोतल को जमीन में दबा दो तो नष्ट होने में 400 साल लग जाते हैं।

‘अच्छा?’ मीठू ने हैरानी से पूछा। ‘हां मिठू तुम्हारे चाचा ठीक कह रहे हैं। हमने अपने दो बच्चे प्लास्टिक के कारण ही खो दिए। तुम्हारे चाचा की तबीयत भी इसीलिए खराब रहने लगी है। मेरे बच्चों ने प्लास्टिक के छोटे-छोटे मोती पड़े देखे तो नासमझ होने के कारण उन्हें कोई नया अनाज समझ लिया और ढेर सारे मोती खा लिए। दो-तीन दिनों में ही उनकी मृत्यु हो गई। वह तो फिर भी छोटे बच्चे थे, प्लास्टिक की थैलियां खाकर तो घड़ियाल और गाय जैसे बड़े प्राणी भी मर जाते हैं।’ स्पैरो ने यह बातें पहली बार सुनी थी उसने पूछा ‘चाचा यह प्लास्टिक इतने बड़े स्तर पर नुकसान पहुंचा देता है?’

‘हां बेटी, हमारे देश में हर साल 26000 टन प्लास्टिक वेस्ट तैयार हो जाता है, जिसका वजन 9000 एशियन हाथियों जितना है । इसमें से 10000 टन का सही निस्तारण यानी रीसाइक्लिंग नहीं हो पाती। जाहिर है यह जमीन पर, समुद्रों में और नदियों में ऐसे ही फेंक दिया जाता है, जिसे गाय, बकरी, कुत्ते, बिल्ली, पक्षी, मछलियां, सील, डॉल्फिन, कछुए, घड़ियाल आदि खा लेते हैं और मर जाते हैं। समुद्र के तट पर लोग टूथ ब्रश, स्ट्रा, चिप्स के पैकेट, शॉपिंग बैग आदि फेंक देते हैं। दुनिया भर में 8.3 बिलियन तो प्लास्टिक के स्ट्रा फेंके जाते हैं। इंसान इनसे कोल्ड ड्रिंक, नारियल पानी पीता है और यूं ही फेंक देता है जिन्हें खाकर समुद्री जीव मर जाते हैं। माइक्रोप्लास्टिक तो सबसे खतरनाक होता है।’

‘यह माइक्रोप्लास्टिक क्या होता है चाचा?’ मीठू ने पूछा। ‘बेटा 5 मिलीमीटर से कम परिधि वाला प्लास्टिक माइक्रोप्लास्टिक होता है। यह पानी में खाने की चीजों में घुल मिलकर अनजाने में ही शरीर में पहुंच जाता है और फिर जानलेवा साबित होता है।’ ‘हे भगवान इंसान कितना नासमझ है। हमें तो कम से कम इन चीजों से दूर रहना चाहिए।’ स्पैरो ने कहा। फिर उसने मिठू से कहा, ‘चल अपन तो अपने पारंपरिक सामान ही लाते है, नहीं बनाना डिजाइनर घोसला।’ उनकी समझदारी पर सोनू और नीनू खुश हो गए। ०

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