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आखिर क्यों हो फांसी की सजा

फांसी की सजा के कानूनी प्रावधान को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों का तर्क है कि किसी के जीने का अधिकार छीनना न्याय नहीं हो सकता। पर जघन्यतम श्रेणी के अपराधों में पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाने का क्या प्रावधान हो, इस पर अक्सर मतभेद उभरते रहे हैं। हालांकि भारत में फांसी की सजा पर अमल की दर दुनिया के बहुत सारे देशों से काफी कम है, पर जब दुनिया के ज्यादातर देश इस प्रावधान को खत्म कर चुके हैं, तो भारत जैसे देश को इसे त्यागने में क्यों गुरेज होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कुछ मौकों पर इसके औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। फांसी की सजा के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण कर रहे हैं श्रीशचंद्र मिश्र।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

श्रीशचंद्र मिश्र

सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले के जरिए फांसी की सजा के औचित्य पर एक नई बहस छेड़ दी है। मामला यह है कि 19 अक्तूबर, 2011 को छत्तीसगढ़ के छन्नूलाल वर्मा ने आनंद राम साहू के घर में घुस कर उनकी, उनकी पत्नी और बहू की हत्या कर दी थी। बहू ने छन्नूलाल पर बलात्कार का आरोप लगाया था। एक साल की सजा काट कर रिहा होने के बाद उसने बदला ले लिया। निचली अदालत और हाईकोर्ट ने उसे मौत की सजा दी। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने छन्नूलाल की मौत की सजा को उम्र कैद में बदल दिया। इस फैसले में न्यायाधीश जोसफ की टिप्पणी काफी अहम रही। उन्होंने विधि आयोग की 262वीं रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें सुझाव दिया गया है कि मौत की सजा का प्रावधान खत्म करने का समय आ गया है। न्यायाधीश जोसफ ने विधि आयोग की रिपोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि मौत की सजा की वैधानिकता बनाए रखने और जघन्य से जघन्यतम अपराध की श्रेणी परिभाषित करने के संवैधानिक पीठ के फैसले के बावजूद अक्सर मौत की सजा वैयक्तिक आधार पर दे दी जाती है।

मामला सचमुच पेचीदा है कि फांसी की सजा को बहाल रखा जाए या उनका प्रावधान ही खत्म कर दिया जाए। बहस नई नहीं है। 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया कांड के चारों आरोपियों की मौत की सजा को बहाल रखा। इसके कुछ ही दिन बाद निर्भया जैसी परिस्थितियों में मारी गई नयना के तीन आरोपियों को बंबई हाई कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई। दोनों मामलों में अदालत ने अपराध को जघन्य से जघन्यतम प्रकृति का माना। इन फैसलों की स्वाभाविक ही सराहना हुई। मगर अलग-अलग मिजाज के दो सवाल जरूर उठे। एक यह कि क्या बलात्कार के हर कृत्य को कू्ररतम अपराध मान कर उसके दोषियों को फांसी की सजा नहीं दे दी जानी चाहिए। इस दलील को व्यापक समर्थन मिलना ही था। ऐसे में दूसरे सवाल को खास तवज्जो नहीं मिल पाई। मौत की सजा के औचित्य पर यह सवाल उठा। अपराधियों को फांसी की सजा दी जाए या नहीं। इस मुद्दे पर पिछले पचास साल से बहस हो रही है। हाल के वर्षों में देश की विभिन्न अदालतों में अपराधियों को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद फांसी दिए जाने की व्यावहारिकता और अनिवार्यता पर बहस ज्यादा तेज हो गई है। विरोध की आवाज समय-समय पर उठाने वाले मानवाधिकार संगठन मानते हैं कि मौत की सजा देने से अपराध का बढ़ता सिलसिला कम नहीं होने वाला। सरकारी स्तर पर पिछले पचास साल में बार-बार यही कहा गया है कि मौत की सजा का प्रावधान खत्म करने का उपयुक्त समय नहीं आया है। विधि आयोग ने इस मसले पर आम लोगों की राय जानने की कवायद भी शुरू की और राय दी कि इस सजा को खत्म किया जाए। मसला खासा उलझा हुआ है। निचली अदालतों से मौत की सजा के जो आदेश आते हैं उनमें से ज्यादातर सुप्रीम कोर्ट में पहुंच कर उम्र कैद में बदल जाते हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक निचली अदालतों में हर साल औसतन सौ लोगों को मौत की सजा सुनाई गई। सुप्रीम कोर्ट में हर साल ऐसे तीन या चार मामलों की ही पुष्टि हो पाती है। मुंबई हमले के दोषी पाक आतंकवादी अजमल कसाब, संसद पर हमले के अभियुक्त अफजल गुरु और 1993 के मुबंई बम धमाकों में शामिल याकूब अब्दुल रज्जाद मेमन के अलावा 2004 के बाद से किसी भी अपराधी को फांसी पर नहीं लटकाया गया है। आजादी के बाद से कुल पचपन लोगों की मौत की सजा पर अमल हुआ है।

भारतीय दंड संहिता के तहत देशद्रोह, विद्रोह के लिए उकसाने, हत्या करने आदि के लिए फांसी दिए जाने का प्रावधान है। दिसंबर, 2012 के निर्भया कांड के बाद संसद ने कानून में संशोधन कर दूसरी बार बलात्कार करने वाले को भी इस दायरे में खड़ा कर दिया। 1980 में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा देने का आधार जघन्य से जघन्यतम अपराध को माना था। सालों से इसकी अलग-अलग व्याख्या होती रही है। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के पास देश में हर तीन रोज में औसतन एक व्यक्ति को मौत की सजा सुनाए जाने का रिकार्ड है। पर न्यायिक प्रक्रिया में जटिलता इतनी है कि अक्सर ऊपरी अदालत में निचली अदालत से मिली सजा बदल जाती है। एक बार अंतिम फैसला हो जाने के बाद भी उसके अमल में इतनी देर हो जाती है कि इस देरी को आधार बना कर मौत की सजा पाए अपराधी या तो अदालत की शरण ले लेते हैं या राष्ट्रपति तक दया याचिका पहुंचा देते हैं। लगभग हर रोज मौत की सजा पाने वाले व्यक्ति की सजा उम्र कैद में बदल जाती है। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो का आकलन है कि निचली अदालतों ने मौत की सजा सुनाने में ज्यादा तत्परता दिखाई और उतनी तेजी से ही ऊपरी अदालतों ने इन फैसलों को बदल दिया। आंकड़ों से साफ है कि निचली अदालतें जिस अपराध को जघन्य से जघन्यतम मान कर अभियुक्त को मौत की सजा सुना देती है, ऊपरी अदालतों में उसकी व्याख्या और नजरिया ही बदल जाता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि निचली अदालतें कड़ी से कड़ी सजा देना चाहती हैं। इसमें जनभावना का भी खासा योगदान रहता है। सजा पाए लोग जब अपील करते हैं तो हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में उन मामलों की फिर समीक्षा होती है। और इसमें तस्वीर बदल जाती है।

फांसी पर सियासत: सिद्धांत और व्यवस्था के तौर पर मौत की सजा उन्हें दी जाती है, जिन्होंने कानूनी भाषा में जघन्य से जघन्यतम अपराध किया हो। उनके मानवाधिकार के हनन का सवाल उठाने वालों की कभी कमी नहीं रही है। दूसरों के जीने का अधिकार छीनने वालों को जीने की छूट देने की बेतुकी दलील के सहारे एक राय तेजी से उभर रही है कि मौत की सजा ही खत्म कर दी जाए। तर्क है कि ऐसी सजा मानवता के खिलाफ और व्यवस्था पर धब्बा है। अगर ज्यादा से ज्यादा लोगों को मौत की सजा सुनाई जाती है, तो इसका मतलब यही है कि व्यवस्था में कुछ भी ठीक नहीं है। एक समस्या यह भी है कि हर मुद्दे पर राजनीति होने का चलन कुछ इतना ज्यादा बढ़ गया कि मौत की सजा भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की चपेट में आने से नहीं बच पाई है। पिछले डेढ़ दशक में सिर्फ तीन लोगों को फांसी पर लटकाए जाने से यह सवाल उठना लाजिमी है कि अन्य मामलों में सजा की तामील जल्दी करने में सरकारी स्तर पर लगातार संकोची और तटस्थ रुख क्यों अपनाया जा रहा है। जबकि अफजल गुरु और याकूब मेमन के मामले में ज्यादा तत्परता दिखाई गई। इसी वजह से दोनों को फांसी दिए जाने को सांप्रदायिक मुद्दा बना कर उसे मानवता के खिलाफ सरकारी हिंसा बताने का कथित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को बहाना मिल गया। दिलचस्प है कि तमाम अदालती प्रक्रियाओं में दोषी साबित होने के बाद भी याकूब को सजा से बचाने के लिए जो कानूनी जोड़ तोड़ की गई, वैसी व्याकुलता या मशक्कत फांसी की सजा पाने वाले किसी अन्य आम व्यक्ति के लिए कभी नहीं दिखाई गई।

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के आरोप में फांसी की सजा पाए बलवंत सिंह राजोआना की सजा पर अभी तक अमल नहीं हुआ है तो राजनीति की वजह से। खालिस्तान समर्थक इस आतंकवादी ने सरकार को खुला पत्र लिख कर उसे फांसी पर लटकाने की मांग की थी लेकन 2012 को शिरोमणि अकाली दल के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील से मिल कर बलवंत सिंह के लिए दया याचिका दाखिल करने के बाद केंद्र ने उसकी फांसी पर रोक लगा दी थी। इसे मिसाल बना कर बाद के मामलों में तो राजनीति होनी ही थी। हुई भी। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की दया याचिका ठुकरा दिए जाने के बाद 3 फरवरी, 2013 को उसे बेहद गुपचुप तरीके से फांसी पर लटका दिया गया। यह मुद्दा उग्र राजनीतिक रूप ले गया। राजीव गांधी की हत्या के आरोप में नलिनी को मिली मौत की सजा को अप्रैल, 2000 में तमिलनाडु के तत्कालीन राज्यपाल ने इस आधार पर उम्रकैद में बदल दिया कि उसका बच्चा छोटा है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी उन लोगों में थीं जो नलिनी के लिए रहम चाहते थे। नलिनी और उसके साथियों को मौत की सजा का यूरोपीय संघ तक ने विरोध किया। इन अभियुक्तों को बचाने के लिए तमिलनाडु में चला अभियान इस बात का प्रमाण है कि यह मुद्दा अपराध और सजा तक सीमित न रह कर राजनीतिक खेल बन गया। 1999 में सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की जिस बेंच ने आम राय से राजीव गांधी के हत्यारों को मौत की सजा सुनाई थी, उस बेंच के प्रमुख न्यायाधीश केटी थामस ने 2013 में यह कह कर नई खलबली मचा दी कि तब दी गई मौत की सजा पर पुनर्विचार होना चाहिए। उनकी दलील थी कि फैसला तकनीकी रूप से सही नहीं था, क्योंकि बेंच ने मौत की सजा देने के लिए उनके अपराध को जघन्यतम करार देने की अनिवार्यता का पालन नहीं किया और अभियुक्तों के स्वभाव और चरित्र पर गौर नहीं किया। इस टिप्पणी ने मामले को कानूनी वैधता का सवाल बनाने का आधार तैयार कर दिया। सवाल उठा कि जो अभियुक्त पहले ही बाईस साल से ज्यादा समय तक जेल में रह चुके हैं उन्हें फांसी देना क्या असंवैधानिक नहीं होगा? खामी व्यवस्था की भी है। सामान्य नियम यह है कि मौत की सजा पर अधिकतम पांच साल में अमल हो जाना चाहिए लेकिन हाई प्रोफाइल मामलों में कानूनी दाव पेंच के सहारे इसे बरसों लटका दिया जाता है। कुछ मामलों में अकारण देरी होती है। 1996 में एक व्यक्ति का सिर काट कर कटे हुए सिर के साथ आत्मसमर्पण करने वाले महेंद्र नाथ की दया याचिका खारिज हुए पांच साल से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन उसे आज तक फांसी नहीं दी जा सकी है। यही स्थिति 2004 में मौत की सजा पाए वीरप्पन के चार साथियों की है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जिन मामलों में दया याचिका खारिज की, उनमें अफजल गुरु और याकूब मेमन की सजा पर अमल हो गया। लेकिन जिन दो और मामलों में उन्होंने दया याचिका खारिज की थी, उसके अभियुक्त अंतिम सजा पा नहीं सके हैं। इसीलिए अफजल गुरु और याकूब को फांसी दिए जाने में सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए राजनीति शुरू हुई। इसे मुद्दा बना कर अल्पसंख्यकों के खिलाफ सरकारी आतंकवाद की संज्ञा दे दी गई। तथ्य हालांकि इसके उलट हैं।

सजा का औचित्य: भारत में भले ही राजनीतिक या सांप्रदायिक आधार पर मौत की सजा के औचित्य पर विमर्श होता रहा हो, पूरी दुनिया में अरसे से कई अन्य नजरियों से इस पर बहस और मंथन का सिलसिला जारी है। इसी का नतीजा है कि 1997 में जहां चौंसठ देशों में मौत की सजा खत्म कर दी गई थी वहीं आज ऐसे देशों की संख्या 141 हो गई है। ब्राजील, चिली और कजाकिस्तान समेत सात देशों में सैन्य कानून के तहत ही फांसी का प्रावधान है। साठ से ज्यादा देशों में यह सजा अभी प्रचलन में है। 2014 में पचपन देशों में 2466 अपराधियों को मौत की सजा सुनाई गई। 2015 में देश बढ़े, पर आंकड़े घटे। तब इकसठ देशों में मौत की सजा 1998 लोगों के हिस्से में आई। 2016 में यह संख्या दो हजार को पार कर गई। इसमें अकेले चीन का योगदान एक हजार का रहा। ईरान में 567 अपराधियों को फांसी दी गई। यह 2015 के 977 मामलों से बयालीस फीसद कम था। सऊदी अरब में 154 लोगों का सिर कलम कर दिया गया। इराक में 88 और पाकिस्तान में 87 दोषियों को मौत दी गई। भारत में 2016 में 136 लोगों को विभिन्न अदालतों से मौत की सजा मिली। अमल किसी मामले में नहीं हुआ। दुनिया के 18848 लोगों में 373 भारत के हैं जो सजा पर अमल का इंतजार कर रहे हैं। 2013 में 778 लोगों को फांसी दी गई थी, जिनमें दो मामलों के साथ भारत सबसे निचले पायदान पर था। फांसी की सजा दिए जाने का आधार बरसों से यही माना जाता है कि किसी की हत्या करने वाला खुद जीने का अधिकार खो देता है। यह धारणा भी रही है कि मौत की सजा लोगों को जघन्य अपराध करने से रोक सकती है। हालांकि अमेरिका में हुए एक अध्यपन से खुलासा हुआ है कि वहां जिन राज्यों में मौत की सजा खत्म कर दी गई है, वहां 1991 की तुलना में अपराध की दर में कमी आई। इंग्लैंड में पिछले दिनों हुए एक सर्वे में करीब बयालीस फीसद लोगों ने आतंकवादियों तक को मौत की सजा देने को गलत बताया। फांसी का विरोध करने वालों की दलील है कि अक्सर गरीब और पिछड़े वर्ग के लोग कानूनी लड़ाई लड़ने में सक्षम न होने की वजह से सजा पा जाते हैं। अब फैसला इस बात का होना है कि फांसी की सजा को बहाल रखा जाए या उसे खत्म कर दिया जाए? अगर सजा को बनाए रखना जरूरी लगता है तो पूरी प्रक्रिया को दुरस्त करना होगा, ताकि विवाद या असमंजस की कोई गुंजाइश न रहे।

राष्ट्रपति की माफी पर सवाल: सुप्रीम कोर्ट से फांसी की पुष्टि होने के बाद सजा पाने वाले को एक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत सुप्रीम कोर्ट में ही पुनर्विचार याचिका दायर करने और उसके खारिज हो जाने के बाद राष्ट्रपति से दया मांगने का अधिकार होता है। राष्ट्रपति चाहें तो फांसी की सजा पाए लोगों को माफी दे या उनकी मौत की सजा को उम्रकैद में बदल सकते हैं। समय-समय पर राष्ट्रपति के इस अधिकार पर सवाल उठते रहे हैं। 2013 में इस सवाल पर उस समय विवाद गहरा गया जब तीन नाबालिग बच्चियों से बलात्कार और उनकी हत्या करने के अलावा एक बच्चे का सिर काट देने के आरोप में पांच लोगों की मौत की सजा के उम्र कैद में बदलने की राष्ट्रपति की सिफारिश को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर हुई। याचिका में दलील दी गई कि इन पांचों की मौत की सजा को इसलिए बहाल किया जाना चाहिए, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट समेत तीनों अदालतों ने उन्हें जघन्य और सामाजिक संचेतना को झकझोर देने वाले अपराध का दोषी पाया। इस मामले पर दो जनहित याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। एक पक्ष में और दूसरी विपक्ष में। पक्ष वाली जनहित याचिका में पांचों लोगों की दया याचिका इस आधार पर ठुकराने का विरोध किया गया है कि राष्ट्रपति ने दया अर्जी पर विचार करने में काफी देर लगा दी। दूसरी याचिका में मांग की गई है कि राष्ट्रपति को जघन्य अपराध करने वालों पर दया नहीं दिखानी चाहिए। इस तरह एक बार फिर इस मुद्दे पर बहस शुरू हो गई है कि अपराधियों को माफी देने का राष्ट्रपति का अधिकार कहां तक उपयुक्त है? संविधान की धारा 72 में व्यवस्था है कि राष्ट्रपति किसी की भी सजा को माफ कर सकते, उसे स्थगित या सजा की प्रकृति बदल सकते हैं। किसी भी अदालत से किसी भी अपराध में सजा पाए व्यक्ति पर रहम करने या उसकी दया याचिका को खारिज करने का राष्ट्रपति को अधिकार है। पर संविधान की धारा 74 के मुताबिक रहम करने का राष्ट्रपति को मिला अधिकार वैयक्तिक नहीं, बल्कि एक सामूहिक फैसले से बंधा है। दया याचिका पर कोई फैसला करते समय राष्ट्रपति को केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह या मदद पर निर्भर रहना पड़ता है। राष्ट्रपति चाहें तो केंद्रीय मंत्रिमंडल से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए कह सकते हैं। मंत्रिमंडल से फैसले की पुष्टि हो जाने के बाद राष्ट्रपति को उसे मानना ही पड़ता है। ऐसे में राष्ट्रपति के पास अपने स्तर पर कोई फैसला करने की गुंजाइश नहीं बचती। संविधान में यह भी व्यवस्था है कि किसी दया याचिका पर राष्ट्रपति को दी गई केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह के बारे में किसी भी अदालत में पूछताछ नहीं होगी। इन शर्तों की वजह से अक्सर राष्ट्रपति संविधान की उस मामूली-सी खामी का फायदा उठाना पसंद करते हैं, जिसमें दया याचिका पर अंतिम फैसला करने के लिए राष्ट्रपति को किसी निर्धारित समय सीमा में नहीं बांधा गया है।

लिहाजा अक्सर राष्ट्रपति दया याचिकाओं को अपने कार्यकाल में लटकाए रहते हैं। कुछ दया याचिकाओं का निपटारा करने में तत्परता दिखाते हैं जैसे कि पिछले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पद संभालने के सात महीने के भीतर ही मौत की सजा पाए सात अपराधियों की दया याचिका ठुकरा दी। दया याचिकाओं पर गौर करने में प्रणब मुखर्जी जैसी गंभीरता अन्य राष्ट्रपतियों ने भी दिखाई। शंकर दयाल शर्मा जब राष्ट्रपति थे, उनके सामने चौदह दया याचिकाएं आर्इं और उन्होंने सभी को ठुकरा दिया। केआर नारायणन और एपीजे अब्दुल कलाम ने तो मौत की सजा के खिलाफ सरकार से आपत्ति जताई। नारायणन ने अपने कार्यकाल में मृत्यदंड पाए एक व्यक्ति पर ही हालांकि दया दिखाई और कलाम ने भी एक ही दया याचिका स्वीकार की और एक याचिका को ठुकरा दिया। कलाम जब राष्ट्रपति पद से हटे तो प्रतिभा पाटील के लिए पच्चीस लंबित दया याचिकाएं छोड़ गए। उन्होंने चौंतीस अपराधियों पर रहम दिखाया और पांच अपराधियों की तीन दया याचिकाओं को खारिज कर दिया। कानून के जानकारों का मानना है कि धारा 72 के तहत माफी के अधिकार का इस्तेमाल करने की केंद्रीय मंत्रिमंडल जब भी सलाह देता है, तो स्पष्ट दिशा निर्देश न होने की वजह से फैसला काफी हद तक वैयिक्तक हो जाता है। जाहिर है कि नैतिकता और सामाजिक सुरक्षा के लिए ऐसे निश्चित मापदंड होने ही चाहिए, जिनके आधार पर गृह मंत्रालय और राष्ट्रपति सही फैसला कर सकें।

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