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समाज: बैंड-बाजा और रोजगार

दावा किया जाता है कि हमारे देश में शादियों से जुड़ी खरीद-फरोख्त से देश में डेढ़ से दो लाख करोड़ रुपए का बड़ा कारोबार होता है। भारतीय शादियों में इतने बड़े पैमाने पर होने वाले कारोबार के मद्देनजर ही देश-दुनिया में ‘बिग फैट इंडियन वेडिंग’ का मुहावरा चल पड़ा है।

Author December 23, 2018 6:28 AM
प्रियंका चोपड़ा और निक जोनस।

हमारे देश की सामाजिक परंपराओं के तहत विवाह दो आत्माओं का पवित्र मिलन है। विवाह से जुड़ी परंपराएं बहुत कुछ करने और दिखाने का मौका देती हैं। इधर कुछ नए बदलावों ने भारतीय शादियों को दिलचस्प बना दिया है। जैसे, पिछले दिनों एक भारतीय कारोबारी के यहां हुई शादी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद शामिल होने आए। साथ ही, भारत में इन दिनों विवाह पर्यटन का विस्तार होते हुए भी दिखाई दिया है, जिसके तहत विदेशी भारत आकर यहां की शादियों में शामिल होते हैं। खासतौर से फिल्म अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने जिस तरह राजस्थान के जोधपुर स्थित उमेद भवन में और कारोबारी मुकेश अंबानी ने अपनी बेटी की शादी के लिए झीलों की नगरी उदयपुर में भव्य आयोजन किया, उससे एक बार फिर हमारे देश में विवाह समारोहों की रौनक लौटती दिखाई दी है। इन दिलचस्पियों के पीछे जो अहम कारण है, वह भारतीय शादियों का महंगा, साज-सज्जा व दिखावे आदि के कारण आडंबरपूर्ण होना। जिसे लेकर समाज में एक किस्म की हिकारत का भाव भी रहता है। कहा जाता है कि भारतीय परिवार परंपरा के नाम पर शादी में अत्यधिक दिखावा करते हैं जो सामाजिक विद्वेष की भी एक वजह बनता है, लेकिन इससे परे इन शादियों का एक महत्त्व देश में पैदा होते रोजगार और व्यवसाय का भी है, जिसने इन्हें एक सार्थक परिघटना के रूप में दर्ज करने को विवश किया है।

निस्संदेह आडंबर और दिखावा कुछ अर्थों में इस केंद्रीय अनुष्ठान यानी विवाह का एक अनिवार्य पहलू बन गया है। यह दिखावा सिर्फ अमीरों की शादी में नहीं दिखता, बल्कि मध्यवर्ग तक खिंच आया है जहां इससे जुड़ी कई बातें दिखाई देती हैं। झूठी शान और दिखावे के कई जानलेवा प्रसंग भी इन शादियों में अक्सर सामने आते हैं। दहेज से लेकर हर्ष फायरिंग तक के कई पहलू ऐसे हैं, जिन पर अंकुश की मांग कतई गलत नहीं है। लेकिन जहां तक विवाह के इर्द-गिर्द परंपरा के नाम पर होने वाले खर्च और तामझाम की बात है तो इससे इनकार नहीं है कि अमीर तो अमीर, मध्यवर्गीय परिवार भी कई बार इस मामले में हैसियत से बाहर जाते दिखाई देते हैं। यों अमीरों और राजसी परिवारों में आमतौर पर होने वाली शादियों के ज्यादा चर्चे उनमें होने वाले खर्च और उनकी भव्यता की वजह से होते हैं। उनका एक पहलू यह है कि वैभव दर्शाने वाले इस आयोजन से कई तरह के रोजगार पैदा होते हैं और इससे कई तबकों की आर्थिक मदद भी हो जाती है। अमीरों के अलावा देश के विशाल मध्यवर्ग में भी काफी बड़ा फीसद ऐसे लोगों का है जो अपने बच्चों की शादियों में दिल के सारे अरमान निकाल लेना चाहते हैं। हालांकि ऐसी कई शादियों में इसका आरोप लगता है कि वहां पैसे का फूहड़ प्रदर्शन होता है, पर बैंड-बाजा-बारात के आयोजन का एक बड़ा पहलू यह है कि इससे कई तरह के रोजगार पैदा होते हैं।

दावा किया जाता है कि हमारे देश में शादियों से जुड़ी खरीद-फरोख्त से देश में डेढ़ से दो लाख करोड़ रुपए का बड़ा कारोबार होता है। भारतीय शादियों में इतने बड़े पैमाने पर होने वाले कारोबार के मद्देनजर ही देश-दुनिया में ‘बिग फैट इंडियन वेडिंग’ का मुहावरा चल पड़ा है। महंगे गहनों की खरीद, आकर्षक तोहफे, थीम वेडिंग के आलीशान मंडप, लजीज व्यंजन, यादगार हनीमून पैकेज के अलावा अमीर परिवारों की शादियों में फिल्मी सितारों का नाच-गाना उन्हें अद्भुत बना देता है। सिर्फ दूल्हा-दुल्हन ही नहीं, बल्कि पूरा परिवार, रिश्तेदार और दोस्त भी इस मौके को जश्न के अवसर के रूप में देखते हैं और इसमें वे तन-मन से शामिल होते हैं। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि आधुनिकता के बावजूद नई पीढ़ी विवाह में पारंपरिक रीति-रिवाजों की मुरीद बन जाती है, जिससे खर्च और भी बढ़ जाता है। हाल में एक नया चलन शादियों में स्थापित होता दिखाई दिया है। यह है दो धर्मों या समुदायों के बीच होने वाली शादियों में दो अलग-अलग रीति-रिवाजों के साथ विवाह के सारे संस्कार होना। इधर हाल में दीपिका और रणवीर सिंह के विवाह के दौरान ऐसा ही किया गया। पहले कोंकणी और फिर सिंधी परंपरा से शादी कराई गई। विदेशी निक जोनास से प्रियंका चोपड़ा की शादी में भी यही किया गया। वहां पहले हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह हुआ। अगले दिन क्रिश्चियन रीतियों से। कुछ साल पहले रितेश देशमुख और जिनेलिया डिसूजा की शादी में भी ऐसा ही किया गया था। यह हमारे समाज की बदलती सोच का परिचायक है।

अब इस धारणा को मान्यता मिल रही है कि अगर दो अलग धर्मों या समुदायों के बीच कोई विवाह हो रहा है, तो उसे दोनों ही ओर की परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ संपन्न कराया जाए जिससे दोनों पक्षों के लोग संतुष्ट हों और उपेक्षित महसूस न करें। हालांकि बदलाव के पैमाने पर देखें तो आधुनिकता के कई चलन शादियों में शामिल हुए हैं, जिसके आधार पर कहा जाता है कि भारतीय शादियां बदल गई हैं। चूंकि शादी जिंदगी का सबसे यादगार पल मानी जाती है, इसलिए लोग इस अवसर की मधुर स्मृतियों को हमेशा के लिए संजोकर रखना चाहते हैं। अब लोग शादी के समारोह के लिए किराए पर हॉल लेने, टेंट के सामान की व्यवस्था करने और हलवाई ढूंढ़कर पार्टी की व्यवस्था नहीं करते। बल्कि इसके स्थान पर ये सारी सहूलियतें एक पैकेज के रूप में एक साथ देने वाले होटल या बैंक्विट हॉल को बुक किया जाता है। सजे-सजाए बैंक्विट हॉल में भोजन और संगीत आदि का ही खर्च न्यूनतम पांच-सात लाख रुपए हो जाता है। ज्यादा हैसियत रखने वाले परिवार वेडिंग प्लानर की व्यवस्था में रुचि लेते हैं जो मेहमानों के स्वागत, उनकी आवभगत, महिला संगीत, मेहंदी की रस्म, दुल्हन के मेकअप, खानपान और सजावट की सारी व्यवस्था खुद करते हैं। इनके पैकेज भी दस-पंद्रह लाख रुपए से कम नहीं होते। ऊपरी तौर पर इन इंतजामों पर होने वाला खर्च पैसे को बिना वजह फूंकने वाला लगता है, लेकिन इसमें ध्यान रखना होगा कि अब हमारे देश में असंख्य परिवारों की रोजी-रोटी दूसरों की शादियों के भरोसे चलती है। शादियों के सीजन में मिलने वाले रोजगार से कई परिवारों का साल भर का खर्च चलता है। अगर इस सीजन में ऐसे तबके को पर्याप्त काम और पैसे नहीं मिलते हैं, तो कामगार अपने मूल स्थानों को लौट जाते हैं। निश्चय ही, शादियों में बूते से बाहर जाकर की जाने वाली शाहखर्ची और पैसे के दिखावे की परंपरा गलत है पर अगर किसी परिवार की आर्थिक हैसियत पैसे खर्च करने की है, तो विवाह के मौके पर उसे ऐसा करने से रोकना उचित नहीं होगा। इसकी बजाय शादियों में अब जिन असली बदलावों की जरूरत है। समाज को उस पर विचार होना चाहिए। जैसे दहेज की मांग से अभी भी समाज मुक्त नहीं हो पाया है।

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