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रविवारी: कविता

मेरे सामने की सड़क पर रेत डाल गया है रेत व्यापारी मैं गेट पर खड़ा इस चिंता में मरा जा रहा हूं कि कल आंधी आएगी तो यह रेत मेरे घर में समा जाएगी

Author Published on: March 29, 2020 4:57 AM
जनसत्ता रविवारी कविता।

रामदरश मिश्र
घर
मेरे सामने की सड़क पर
रेत डाल गया है रेत व्यापारी
मैं गेट पर खड़ा इस चिंता में मरा जा रहा हूं कि
कल आंधी आएगी
तो यह रेत मेरे घर में समा जाएगी
सहसा देखता हूं
मेरे बच्चे खुश होकर रेत पर खेल रहे हैं
और उसमें घर बना रहे हैं।

गली
‘किस गली में जाना है आपको?’
अपनी गली में भटके हुए से
एक आदमी से मैंने पूछा
‘जाना तो गली से बाहर है
लेकिन सभी गलियां एक सी हैं
कब से भटका रही हैं अपने में’
कहता हुआ वह दूसरी गली की ओर मुड़ गया।

चट्टान और बिरवा
तुम भले ही सत्य मान कर
इस विराट और निस्पंद चट्टान को
देखते रहो
मैं मुग्ध होकर
उस बिरवे को देख रहा हूं
जो आज न जाने कहां से
इस चट्टान पर उग आया
और तन कर खड़ा हो गया
जो अपनी दो हरी पत्तियों से
आकाश से बातें करने लगा
और अपनी लघुता में भी
इस चट्टान से बड़ा हो गया।

रचना
बच्चों ने कल
मेरे दरवाजे पर मिट्टी का एक मकान
बनाया था
तिनके चुन-चुन कर छाजन दी थी
और बड़े खुश थे कि
उन्होंने एक रचना की है

आज सुबह देख रहा हूं-
मिट्टी की खंडित दीवारों पर
गहरे घाव की लकीरें खोदता
पानी बह गया है
और बिखरे हुए तिनके
बही हुई मिट्टी के नीचे दब कर
दम तोड़ चुके हैं

रात को चीखती हुई बारिश
और अनंत भूतनियों की तरह
डाल-डाल झूलती हुई
उन्मुक्तकुंतला आंधियां
निस्पंद खामोशी छोड़ कर चली गयी हैं
और मैं सारी खामोशी निगाहों में पी कर
एकटक देख रहा हूं-
खंडित घायल दीवारें …
बिखरे दबे हुए तिनके …
इस बीच न जाने बच्चे कब जुट आए हैं
और फिर मिट्टी और तिनके बटोरने लगे हैं।

खुशबू
कहां से आई मकान में
यह खुशबू
मैंने तो जाते समय
इसे चारों ओर से
बंद कर दिया था
लगता है
कोई झरोखा खुला रह गया
और कहीं कुछ खुला रह जाए
तो वसंत की हवा को
वहां आने से कौन रोक सकता है?

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