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रविवारी शख्सियत: भगत सिंह होने का मतलब

भगत सिंह होने का मतलब सिर्फ गोली-बंदूक के माध्यम से और खुद का बलिदान देकर आजादी पाना भर नहीं है। भगत सिंह की चिंता और चेतना की दुनिया इससे कहीं ज्यादा समृद्ध है। अपनी तार्किक समझ और व्यापक अध्ययन के बूते वे हर वर्ग के लोगों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास के साथ समतामूलक समाज की रचना के प्रति प्रतिबद्ध थे।

Author Published on: March 22, 2020 12:59 AM
भगत सिंह।

संगीता सहाय
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांति-पुरुष शहीदे आजम भगत सिंह निस्संदेह नवीन भारत के महानतम लोगों में से एक हैं। मात्र 23 वर्ष की अल्प उम्र में निर्भीकता, बौद्धिकता और विचारशीलता की नई इबारत लिखने वाला यह शख्स भारतीयों के बीच आज भी उतना ही लोकप्रिय है, जितना तब था। पर यह एक अहम तथ्य है कि भगत सिंह अपनी क्रांतिकारी छवि, विदेशी सरकार के दांत खट्टे करने वाले कारनामों और गतिविधियों के कारण भारतवासियों, विशेषकर युवाओं के बीच ज्यादा लोकप्रिय हैं। अधिकतर उन्हें अंग्रेजों के ऊपर गोली चलाने वाले निर्भीक युवा की राष्ट्रवादी की रोमांटिक छवि से परे नहीं देख पाते। इसका कारण शायद यह है कि उनकी यही छवि उस दौर के सरकारी दस्तावेजों, पत्र-पत्रिकाओं आदि में दर्ज की गई।

गौरतलब है कि भगत सिंह का मतलब अपने कारनामों से सिर्फ विदेशी हुकूमत को दहशतजदा करना और आतंक फैलाना ही नहीं था। उस अल्प आयु में जब वो बमुश्किल अपनी किशोरावस्था से बाहर ही आए थे, उसी उम्र में उनके पास देश के विकास के संदर्भ में व्यापक दृष्टिकोण था। उन्होंने एक ऐसे भारत का स्वप्न देखा था, जहां बगैर किसी जातीय और धार्मिक भेदभाव के प्रत्येक भारतवासी को सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास की सुविधा एवं सहूलियत उपलब्ध हो। उनके विभिन्न वक्तव्य, विचार, डायरी के पन्ने और सीमित अवधि में विभिन्न संदर्भों में उठाए गए कदम स्पष्टता के साथ उनकी वैचारिक व्यापकता को हमारे सामने लाते हैं।

भगत सिंह का लक्ष्य एक वर्गविहीन समाज की स्थापना था और उनका अल्पकालिक जीवन उस आदर्श को समर्पित रहा। वे और उनके साथी उस समय के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक दो मूलभूत मुद्दों को लेकर सजग थे। पहला, बढ़ती हुई धार्मिक व सांस्कृतिक वैमनस्यता और दूसरा, समाजवादी आधार पर समाज का पुनर्गठन। भगत सिंह और उनके साथियों ने भारत में समाजवाद की स्थापना के उद्देश्य से सितंबर 1928 में दिल्ली स्थित फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में महत्वपूर्ण क्रांतिकारियों की बैठक में काफी विचार-विमर्श के बाद ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (एचआरए) में सोशलिस्ट शब्द जोड़कर उसे ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट एसोसिएशन’ (एचएसआरए) की नई पहचान दी।

वे इस बात पर जोड़ देते थे कि ऐसा कोई कार्य किया जाए जिससे उनके क्रांतिकारी दल एचएसआरए का मजदूर और किसान आंदोलन के साथ घनिष्ठ संबंध प्रमाणित हो सके। उन्हें यह मौका मिला 8 अगस्त 1929 को, जब उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर दिल्ली स्थित असेंबली हाल में जनता विरोधी बिलों ‘ट्रेड डिसप्यूट बिल’ तथा ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ के विरोध में बम-धमाका किया व सरकार विरोधी पर्चे बांटे। उस समय देश की बड़ी-बड़ी हस्तियां उस हाल में उपस्थित थीं।

भगत सिंह का पहला खुला परिचय देश-विदेश की जनता को इस ऐतिहासिक बम कांड के बाद ही मिला था। इस बम कांड के बाद भगत सिंह ने बीके दत्त के साथ गिरफ्तारी दे दी। उन पर दिल्ली और लाहौर की अदालतों में मुकदमा चलाया गया। 23 मार्च 1931 को राजगुरु और सुखदेव के साथ उन्हें तय तारीख से पहले ही फांसी पर चढ़ा दिया गया। इस खबर को भारत और लंदन के साथ-साथ विश्व के अन्य देशों के अखबारों ने भी प्रमुखता से छापा। फांसी के तख्ते पर ये नौजवान क्रांतिकारी गा रहे थे – ‘दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फत, मेरी मिट्टी से भी खुशबु-ए-वतन आएगी।’

भगत सिंह और उनके साथी अपनी अल्पायु में शोषण और साम्राज्यवाद के खिलाफ एक वीर योद्धा व महान विचारक के रूप में लड़े और अपने अमूल्य जीवन को देश के लिए समर्पित कर दिया। अपना सर्वस्व देश की बेहाल और पीड़ित जनता को अर्पित करने के बावजूद अपने प्रस्थान के वक्त भगत सिंह ने कहा था- ‘मैं देश की जितनी सेवा करना चाहता था, उसका हजारवां हिस्सा भी नहीं कर सका।’ भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों ने पहली बार लोगों के समक्ष क्रांति का दर्शन रखा और बताया कि क्रांति का लक्ष्य उन तमाम व्यवस्थाओं का अंत करना है, जिसके तहत एक व्यक्ति दूसरे का शोषण करता है। उन्होंने रेल, परिवहन के अन्य साधनों तथा इस्पात और जहाज-निर्माण जैसे बड़े-बड़े उद्योगों के राष्ट्रीयकरण का भी प्रस्ताव रखा था।

क्रांतिकारी अजीत सिंह के भतीजे भगत सिंह असाधारण बुद्धिजीवी थे। उनकी समझ और विषयों पर पकड़ गहरी थी। द्वारकादास पुस्तकालय (लाहौर) में सामाजवाद, सोवियत संघ और क्रांतिकारी आंदोलन से संबद्ध तमाम किताबों का उन्होंने गहराई से अध्ययन किया था। लाहौर में सुखदेव व अन्य लोगों की मदद से उन्होंने कई अध्ययन केंद्र स्थापित किए थे, जहां राजनीतिक विषयों पर जोरदार बहस होता था। जब एचएसआरए का कार्यालय आगरा चला गया, तो वहां भी भगत सिंह ने तुरंत एक पुस्तकालय की स्थापना की। उन्होंने सहयोगियों को समाजवाद और अन्य क्रांतिकारी विचारधाराओं का अध्ययन करने और उन पर बहस करने की सलाह दी। गिरफ्तार होने के बाद उन्होंने जेल को ही विश्वविद्यालय बना दिया। जेल में रहते हुए भगत सिंह ने चार किताबें लिखीं। हालांकि वो किताबें नष्ट कर दी गईं, पर उनकी लिखी डायरी बच गई।

404 पेज की भगत सिंह की डायरी, उनकी कविताओं, संस्मरणों, देश की आजादी और उसके बाद के भारत के लिए देखे गए उनके सपनों और विचारों से भरा है। जो न केवल उनके गंभीर अध्ययन और बौद्धिक अंतर्दृष्टि को दशार्ती है, बल्कि उनकी सामाजिक और राजनीतिक चिंताओं को भी सामने लाती है। पूंजीवाद और समाजवाद जैसे विषयों से लेकर अपराध और कानूनी न्यायशास्त्र तक, उनकी डायरी में इन तमाम विषयों पर लिखे गए अंश ये दर्शाते हैं कि युवा भगत सिंह की जो आतंकवादी छवि ब्रिटिश सरकार ने दिखाई थी, वह सही नहीं थी।

व्यक्तिगत बहादुरी की कारवाइयों और आतंकवाद से भगत सिंह का विश्वास गिरफ्तारी (1929) से बहुत पहले ही उठ गया था। वे मार्क्सवादी हो चले थे और इस बात में विश्वास करने लगे थे कि व्यापक जनांदोलन से ही क्रांति लाई जा सकती है। यानी ‘जनता ही जनता के लिए’ क्रांति कर सकती है। क्रांतिकारी लक्ष्य प्राप्त करने में दर्शन या विचारधारा की भूमिका के महत्व को लोगों तक पहुंचाने के लिए भगत सिंह ने लाहौर कोर्ट में कहा था, ‘क्रांति की तलवार में धार वैचारिक पत्थर पर रगड़ने से ही आती है।’ 1929 से 1931 के दौरान अदालत में तथा अदालत के बाहर भगत सिंह तथा उनके क्रांतिकारी साथियों ने जो बयान दिए, उसका सार यह है कि क्रांति का अर्थ है क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में समाज के शोषित, दलित व गरीब तबकों के जनांदोलन का विकास। साम्राज्यवाद का अंत कर एक समाजवादी समाज यानी एक ऐसे समाज की स्थापना, जहां एक व्यक्तिद्वारा दूसरे व्यक्तिका शोषण न हो।

‘द फिलासफी आफ द बम’ में उन्होंने क्रांति को सामाजिक, आर्थिक और राजानीतिक स्वाधीनता’ के रूप में परिभाषित किया है। भगत सिंह ने अदालत में कहा था, ‘क्रांति के लिए किसी बम, पिस्तौल और खूनी संघर्ष के लिए कोई जगह नहीं है। इसका सीधा अर्थ है अन्याय पर आधारित मौजूदा व्यवस्था की समाप्ति।’ एक जगह उन्होंने लिखा है, ‘किसानों को विदेशी शासकों के साथ-साथ जमींदारों और पूंजीपतियों से भी मुक्तिपानी है।’ भगत सिंह के समाजवाद का अर्थ है, वर्ग-प्रभुत्व और पूंजीवाद का पूरी तरह से खात्मा।

भगत सिंह सांप्रदायिकता, अंधविश्वास आदि को उपनिवेशवाद के जितना ही खतरनाक मानते थे। उनके अनुसार धर्म व्यक्तिका निजी मामला है। अत: इस विषय पर जनता के बीच समझ और सहनशीलता की भावना विकसीत करना आवश्यक है। उन्होंने अंधविश्वास की जकड़न से जनता को मुक्त करने पर बहुत जोड़ दिया। अपने लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ में उन्होंने लिखा है, ‘प्रगति के लिए संघर्षशील किसी भी व्यक्तिको अंधविश्वासों की आलोचना करनी ही होगी और पुराणपंथी विचारों को चुनौती देनी ही होगी। प्रत्येक प्रचलित विश्वासों की हरेक कड़ी की प्रासंगिकता और सत्यता को परखना ही होगा।’

अंतत: कहा जा सकता है कि भगत सिंह होने का मतलब सिर्फ गोली-बंदूक के माध्यम से और खुद का बलिदान देकर आजादी पाना भर नहीं था। बल्कि भगत सिंह होने का मतलब था उच्च वैचारिकता, विद्वता, अध्ययन-वृति और समझ से पूरे देश में राष्ट्रीय चेतना का संचार करना, राष्ट्रीय मुक्तिसंघर्ष को एक नई दिशा देना। इसके साथ अपने अनन्य राष्ट्रप्रेम, अदम्य साहस, अटूट प्रतिबद्धता और गौरवमय बलिदान के द्वारा भारतीय जनता के लिए प्रेरणा-स्रोत बनना और समाज के हर वर्ग के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास एवं एक समतामूलक समाज के निर्माण के लिए आजीवन संघर्ष करना।

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