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कहानी: पराजय

देवनाथ के पिता विद्याधर पंडित यानी पंडीजी, धर्मभीरु, डरपोक, जिद्दी, क्षणजीवी और आत्ममुग्ध व्यक्ति हैं। अपने गांव के मूर्खों के बीच वे परम ज्ञानी माने जाते थे, पर ज्ञान की अनंत सीमा का उन्हें आभास नहीं था।

Author May 20, 2018 5:16 AM
कहानी

देवशंकर नवीन

विद्याधर पंडित मिडिल स्कूल में शिक्षक थे। अब सेवामुक्त हो चुके हैं। पत्नी निरक्षरा गृहणी हैं। गांव में लोग इनको पंडीजी कहते हैं। जब विद्याधर जी मास्टरी करने लगे, तो गांव के कुछ लोग साक्षर और कुछ अल्प-शिक्षित हो गए। सही रूप में शिक्षित तो अब भी कोई नहीं है। पर इतनी शिक्षा उस गांव में भारत-पाक सीमा संघर्ष के समय में ही फैल गई थी कि लोग सामाजिक प्रेम भूल कर स्वार्थ में लिप्त हो गए। गांव में रेडियो बजने लगा। लोग रसीले गीतों के साथ-साथ समाचार भी सुनने लगे। कभी-कभार अखबार भी पढ़ने लगे। अब वे पंडीजी की खिल्ली उड़ाने लगे थे।
यह समय आते-आते पंडीजी का पुत्र देवनाथ मैट्रिक पास कर गया। पूरे देश में आपातकाल लगा हुआ था। परीक्षा पद्धति ऐसी थी कि अपने गांव के बत्तीस छात्रों में से अकेला देवनाथ पास हुआ था। पंडीजी दोनों जीव की छाती डगरे की तरह चौड़ी हो गई और गांव के सारे लोगों की चलनी जैसी सहस्रछिद्र। गांव के बूढ़े और अधेड़, सब देवनाथ से ईर्ष्या करने लगे। चर्चा करने लगे- भिखारी के पूत! खाने-पहनने को तरसता है, पर तकदीर देखो कि इमरजेंसी की परीक्षा में भी पास कर गया!

देवनाथ ने कई जगह ये बातें सुनीं। पर आर्थिक रूप से इतने जर्जर परिवार का बच्चा था कि उन लोगों के मुंह नहीं लग सकता था। देवनाथ को जीवन में पहली बार अपनी जाति के लोगों से नफरत वहीं से शुरू हुई थी। वह सोचता, जो मेरे अपने हैं, काका हैं, बाबा हैं, भैया हैं, स्वजातीय हैं, गोतिया हैं, उनकी आंखों में मैं चुभ रहा हूं।… देवनाथ सदा-सदा के लिए उन्हीं दिनों अपनी जाति से कट गया।

देवनाथ के पिता विद्याधर पंडित यानी पंडीजी, धर्मभीरु, डरपोक, जिद्दी, क्षणजीवी और आत्ममुग्ध व्यक्ति हैं। अपने गांव के मूर्खों के बीच वे परम ज्ञानी माने जाते थे, पर ज्ञान की अनंत सीमा का उन्हें आभास नहीं था। वे धर्म-शास्त्र की अधकचरी व्याख्याएं करके अपने को ज्ञानी माने बैठे थे। धर्मभीरु थे इसलिए दूसरों को ठगने की चेष्टा नहीं करते थे, पर आत्ममुग्ध थे इसलिए अपनी प्रशंसा और आत्मवंचना में हरदम लिप्त रहते थे। पर गांव वालों के कटाक्षों से देवनाथ आहत होता, तो वह पिता को समझाता। लेकिन क्षणजीवी और आत्ममुग्ध व्यक्ति के लिए तो ऐसी स्थिति मृत्यु के समान होती है। वे तिलमिला उठते। क्रोध से फुत्कार कर उठते। तीक्ष्ण स्वर में कहते- मेरी ही बिल्ली, मुझसे ही म्याऊं! शरम नहीं आती मुझसे बहस करते! चार दिन कॉलेज क्या चला गया कि पंख लग गया। जिस धर्म के बारे में कोई ज्ञान नहीं है, उस पर मुझसे विवाद कर रहे हो! गलती मेरी ही है! गांव वालों ने सही कहा था कि बेटे को कॉलेज मत भेजो!

गांव वालों ने सच में यही कहा था। पर उन लोगों ने पंडीजी का हित सोच कर नहीं कहा था। अपमान करने के लिए कहा था। मगर पंडीजी यह नहीं समझ पाते थे। कहावत है न कि मनुष्य को लाख बातें कह लीजिए, वह वही सुनेगा, जो वह सुनना चाहता है। आत्मवंचकों के लिए तो यह जीवन का आधार होता है। पंडीजी जनम के आत्मवंचक हैं। निर्धन हैं। एक बेटा, तीन बेटियां और पत्नी समेत छह सदस्यों का परिवार चलाते रहे। मिडिल स्कूल की मास्टरी करते रहे। रोटी-दाल-चावल-सब्जी भले पूरी तरह नसीब न हो, पर चाय-पान पर जीवन काटते रहे। नाना तरह की बीमारियों से जूझते रहे। पर चाय-पान की आदत पाले रहना, उनके लिए सम्मान की बात थी। जब कोई कह देता कि ‘इस इलाके में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा, जिसने पंडीजी की एक कप चाय, एक बीड़ा पान न खाया हो।’ तो पंडीजी के पांव जमीन पर नहीं रहते, वे हवा में झूलने लगते। पर जिन लोगों को पान बना कर खिलाते, वे चलते बनते। मगर पंडीजी सोचते, इस गांव का आदमी मुझे इज्जत बहुत देता है। ग्रामीण सोचता जाता, मास्टरबा मूर्ख है, एक ही लाईन में जमीन छोड़ देता है!

गांव वालों को ईर्ष्या थी कि जब हमारे बच्चे कॉलेज नहीं जा सके, तो इस फटेहाल का बेटा कॉलेज कैसे जाएगा?’ उन लोगों ने सीधे शब्दों में कहा था- ‘पंडीजी, सपना मत देखिए! कॉलेज में एक बेटे को पढ़ाना, एक हाथी पालने जैसा होता है। ज्यादा उड़ने की कोशिश करेंगे, तो गिरेंगे और फिर जमीन पर चलने लायक नहीं रहेंगे। मास्टरी करके आपने अपना गुजर-बसर किसी तरह कर ही लिया न!… क्या सोचते हैं कि कॉलेज में पढ़ कर आपका बेटा हाकिम हो जाएगा?… अरे नहीं कुछ तो हमारे घर के बच्चों को चार अक्षर पढ़ा देगा। कुछ-कुछ अग्रांश भी हम लोगों के यहां से मिलेगा, तो उसका जीवन कट जाएगा…।’

पंडीजी ने तब भी सोचा था और जब बेटा बहस करने लगा तब भी सोचा कि ‘गांव वालों ने सही कहा था!’

पंडीजी के समक्ष शिष्टाचार का इतना घृणास्पद फरमा था, जिसमें देवनाथ का फिट होना मुश्किल था। उसने कहा- पिताजी, हम दोनों तर्क कर रहे हैं। संबंधों के शिष्टाचार में और शास्त्रार्थ के शिष्टाचार में अंतर होता है। ज्ञान की कोई उम्र कहां होती है पिताजी! मैं तर्क में आपको परास्त कर भी दूं, तो भी आप मेरे पिता रहेंगे। और मैंने तो सुना था कि मनुष्य हर किसी से हार कर दुखी होता है, पर अपने शिष्यों और अपनी संतानों से हार कर प्रसन्न होता है। आपको अगर मेरा तर्क तकलीफ दे रहा है, तो मैं चुप हो जाता हूं।

पर, पंडीजी लगातार चीखते रहे और बेटे के अशिष्ट हो जाने की घटना पर पश्चात्ताप करते रहे। गांव में दुर्गंध की तरह बात फैलती रही कि ‘आज पंडीजी की बेटे के साथ उठा-पटक हो गई।’ कहीं-कहीं तो किसी-किसी ने यह भी सुन लिया कि ‘बेटे ने पंडीजी को ऐसी पटकी मारी कि उनका हाथ टूट गया!’ कई लोग पंडीजी को देखने आ गए। बल्कि मजे लेने आ गए। पर पंडीजी की आंखें तब भी नहीं खुलीं। पंडीजी जैसे होश खो बैठे और गांव वालों से माफी मांगी कि आप लोगों ने सही कहा था, मैंने इसे कॉलेज भेज कर बहुत बड़ी गलती की।

गांववालों को निशाना सही लगता दिखा। लोहा गरम देख कर उन्होंने एक और चोट की- और सपना देखिए! यही बेटा हाकिम बनेगा। कल बाप को नौकर कहेगा …

देवनाथ अकाल में वृद्ध हो गया था। वह गांव वालों की सारी हरकतें देखता आ रहा था। उसकी प्रतिभा इतनी तीक्ष्ण और उसकी सोच इतनी ठोस थी कि वह पूरी दुनिया को परास्त कर आता था और घर आकर देखता था कि पिता उसकी सारी विजयश्री पर कालिख पोत चुके हैं। वे उन्हीं मूर्खों के चंगुल में बैठ कर अपने पुत्र को बुला रहे हैं, जिन्हें वह सड़क की धूल चटा चुका है। उस समय देवनाथ अपनी तुलना उस मोर से करने लगता जो नाच कर पूरी दुनिया को प्रसन्न करने के बाद अपने पैर की तरफ देखता है और उसकी बदसूरती पर आंसू बहाने लगता है।

देवनाथ की सबसे बड़ी समस्या थी कि उसके पिता को उसकी प्रतिभा पर कोई आस्था नहीं थी। गांव वालों के दबाव में आकर पंडीजी ने देवनाथ की शादी इस शर्त पर कर दी कि लड़की वाले उसे नौकरी दिला देंगे। देवनाथ क्षुब्ध था कि एमएलए के घर पुरोहिताई करने वाले व्यक्ति, कौन-सी नौकरी दिलाएंगे! पर उसे शादी करनी पड़ी। उसने सोचा कि शायद मेरी इस कुबार्नी के बाद भी पिता उन दरिंदों के चंगुल और अपने अंधकार से निकल आएं। पर, कहां…

एक दिन देवनाथ सचमुच हाकिम हो गया। भारत सरकार के अधीन संचालित एक कार्यालय में प्रथम श्रेणी का अधिकारी। पंडितजी को यह खबर मिली, तो वे खुशी से नाच उठे। लाख मनोमालिन्य हो, पर बेटे का हाकिम हो जाना किसको अच्छा नहीं लगता?… पति-पत्नी दोनों ने उस दिन उपवास किया और शाम को तुलसी चौरा के सामने दीप जला कर सांझ की देवी को प्रणाम किया।

इधर देवनाथ ने सोचा कि अपनी तमाम सीमाओं, कुंठाओं और आपदाओं के बावजूद मां-पिता ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है, भोगा है; अभाव, अपमान, तिरस्कार के जहर न जाने कितनी बारे पिए हैं, अब इन्हें सुख और आराम दिया जाना चाहिए, इन्हें अपने साथ रख कर सेवा करनी चाहिए…।

जब मां-पिता को वह गांव से शहर ला रहा था तो गांव के सारे लोग जल कर, ऐंठ कर छटपटा रहे थे, जैसे जोंक के मुंह पर चूने का पानी डालने से वह ऐंठती है। देवनाथ के एक करीबी और अनुभवी दोस्त रमेश ने पूछा था- देवनाथ जी! मां-बाप को साथ रख पाएंगे?

देवनाथ ने क्रोधित होकर जवाब दिया था- ‘मेरी क्षमता को चुनौती देते आपको शर्म नहीं आती, तो मैं क्या कह सकता हूं!’

गांव के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे एक व्यक्ति पेशे से वकील हैं। देवनाथ उन्हें पढ़ुआ काका कहता आया है। उन्होंने जब सुना कि देवनाथ हाकिम हो गया और मां-बाप को साथ लिए जा रहा है तो वे बहुत प्रसन्न हुए, शाबासी देते हुए गले से लगा लिया और कहा- ‘वाह रे सपूत! मेरी भी आयु लेकर जिओ! काश! मेरा बेटा भी ऐसा होता!’ देवनाथ प्रसन्न हुआ और मां-पिता के साथ दिल्ली आ गया। निवास के ठौर-ठिकाने तय करने के बाद उसने मां-बाप से कहा कि ‘आप लोग सुख और आराम की कल्पना कीजिए और मुझे बताइए कि आप क्या-क्या कल्पना कर सके हैं। मेरी इच्छा है कि आपकी सारी कल्पनाओं को मैं साकार करूं…।’

विडंबना देखिए कि मुर्गे को नियति ने पंख तो दिए, पर उड़ने की ताकत नहीं दी। विद्याधर पंडित के डैने दो-एक बार हिलते-न-हिलते, उड़ान चौपट हो जाती।

इधर देवनाथ को बीते दिनों की व्यथाएं याद आतीं- स्कूल शिक्षक पिता का मामूली वेतन था। वह भी कभी समय से नहीं मिलता। दुकानों से उधार खाने, पड़ोसियों से कर्ज लेने की जड़िआई बीमारी की वजह से पंडितजी को हरदम लाले पड़े रहते थे। वेतन मिलने का समय आते-आते इतना कर्ज चढ़ चुका होता कि अगले माह के वेतन से भी उबरने लायक नहीं होता। कभी-कभी तो हालत यह होती कि मां ओखली में धान कूटती, एल्मुनियम के बड़े कटोरे में तीन मुट्ठी चावल सिझाती। भात देवनाथ को खिला देती, मांड तीनों बेटियों को पिला देती और खुद उपवास कर जाती। सात हाथ चौड़ा, तेरह हाथ लंबा फूस का एक घर होता, जिसे कभी साबुत छप्पर नसीब नहीं हुआ।…

वे सारी स्थितियां देवनाथ को याद आतीं तो वह चीख उठता। उसे लगता कि अतीत ने उसे और उसके मां-बाप-बहनों पर जितना अत्याचार किया है, उस सबका बदला अभी उससे ले ले। उसका मन करता कि मेरे मां-बाप खूब फल-फूल, दूध-दही खाएं, अच्छे-अच्छे कपड़े पहनें… वह इन सारी सुविधाओं की व्यवस्था घर में करने लगा। अपने मित्रों को निमंत्रण देकर घर बुलाता, अपने मां-बाप से मिलवाता। अपने गुरुओं को बुलाता और मां-बाप से परिचय करवाता। यह देख कर उसे बड़ी प्रसन्नता होती कि कहां स्कूल सब-इंस्पेक्टर जैसे छोटे अधिकारी या जिला शिक्षा कार्यालय के क्लर्कों के सामने मेरे पिता को हाथ जोड़ कर मिन्नत करनी पड़ती थी, आज एसपी, डीएम जैसे बड़े अधिकारी उनके पैर छू रहे हैं। वह सोचता कि मेरे पिता को यह सम्मान पाकर बड़ी प्रसन्नता होती होगी, वे अपने पुत्र की उपलब्धि से गर्वोन्नत हो रहे होंगे। वह सूक्ष्मता से अपने मां-पिता के चेहरे पर वह खुशी तलाशने की कोशिश करता। शुरू-शुरू में तो दस-बीस दिन मां-पिता प्रसन्न रहे। पर धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि वह प्रसन्नता गायब हो रही है।

विद्याधर पंडित और उनकी पत्नी को अपने बेटे और उसके आगंतुक मित्रों से धीरे-धीरे चिढ़ होने लगी। जब वे सारे पंडितजी के समक्ष देवनाथ की तारीफ के पुल बांधते और कहते- ‘चाचाजी, देवनाथ भाई जैसे पुत्र का पिता होना बड़े गौरव की बात है, आप धन्य हैं!’ तो पंडितजी को लगता कि उनके बेटे की संपन्नता और उपलब्धि उनके बीते दिनों के अभाव का मजाक उड़ा रही है। उन्हें देवनाथ से ईर्ष्या होने लगी। वे बैठे-बैठे सोचते कि ऐसे-ऐसे कितने छोकरों को मैंने स्कूल में पढ़ाया, उनमें से कितने तो अफसर हो ही गए होंगे। कभी किसी ने स्कूल में मेरे सामने तेज सांस तक नहीं ली और ये छोकरे, मुझसे तर्क करते हैं! मुझे नसीहत देते हैं। जरूर देवनाथ इन लोगों को सिखा-पढ़ा कर मुझे अपमानित करने के लिए लाता होगा।

देवनाथ आदमी के मन को पढ़ने में माहिर है। वह बातें ताड़ गया। पिताजी के उचटते मन को थिर करने के लिए मित्रों का आवागमन कम करा दिया। पिता के साथ बैठ कर अनुकूल बातें करनी शुरू कीं। पर मनुष्य का स्वभाव और संदेह कहां बदलता है! देवनाथ के पिता का चित्त थिर नहीं हुआ।
एक दिन देवनाथ के गुरु उसके घर आए। उन्होंने पंडितजी से चिढ़ कर कह दिया- ‘पंडितजी! मनुष्य का भाग्य देखिए! मुझ जैसों को देवनाथ जैसा बेटा होना चाहिए, तो मुझे मिल गया एक कुलांगार। और आपको यह सौभाग्य मिला, तो आपको इसकी पहचान नहीं है।’

बस, पंडितजी गुस्से में अंगारे उगलने लगे। उन्होंने तत्काल अपना झोला-झपटा बांध लिया और वापस गांव जाने को तैयार हो गए। देवनाथ ने बहुत समझाया- ‘पिताजी! आप वृद्ध हो चुके हैं। बुढ़ापे का कोई ठिकाना नहीं। कब क्या हो जाए। मैं इतनी दूर रहता हूं। खबर पहुंचते-पहुंचते पता नहीं क्या हो जाए…!’

‘हो जाने दे, जो होना है’, देवनाथ की बात पूरी होने से पहले ही पंडित जी चीखने लगे। कांपती आवाज में बोलते गए- ‘गांव वालों ने सही कहा था कि मैं सपना न देखूं, जमीन पर रहूं। तुम अपनी दुनिया में रहो। तुम्हारे साथ रहने से बेहतर है कि उस गांव में मर जाऊं और चील-कौवे मेरी लाश को नोचकर खा लें। जा रहा हूं, गांववालों से जल्दी माफी मांग लूंगा। अपमानित और अपराधी व्यक्ति को ज्यादा नहीं जीना चाहिए। अपने अपराध का प्रायश्चित कर लिया मैंने। बहुत अपमान तुम्हारे घर सह लिया…।’

देवनाथ अब हार गया था। गांव के स्वजातीयों की कुटिल नीति और पिता की अंधकार-यात्रा से लड़-लड़ कर वह थक गया था। अब उसे लगा कि उसे सीधे रमेश के पास जाना और कहना चाहिए- ‘दोस्त! वाकई, मुझे क्षमता नहीं थी कि मैं मां-बाप को रख सकूं। समूची दुनिया को जीत लेने वाला व्यक्ति घर में पराजित हो जाता है।’

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