ताज़ा खबर
 

अवसरः जहां से रोशनी की लकीर निकलती है

‘गोदान’ के प्रकाशन के अस्सीवें वर्ष में प्रेमचंद के इस उपन्यास का पुनर्पाठ भारतीय समाज की उन मूलभूत सच्चाइयों से रूबरू होना है, जिसे हम अपनी वैश्विक आधुनिकता के चलते दृश्यओझल करते रहते हैं।

स्वीकार करना होगा कि प्रेमचंद की भारतीय समाज की जो गहरी आतंरिक समझ थी वह उन्हें एक साथ महान लेखक और समाजशास्त्री का दर्जा देती है। ‘गोदान’ और प्रेमचंद की अमरता के स्रोत महज साहित्यिक संरचना में न होकर भारतीय सामाजिक संरचना के उन स्रोतों में हैं, जो प्रेमचंद के साहित्य का मूल आधार है।

‘गोदान’ के प्रकाशन के अस्सीवें वर्ष में प्रेमचंद के इस उपन्यास का पुनर्पाठ भारतीय समाज की उन मूलभूत सच्चाइयों से रूबरू होना है, जिसे हम अपनी वैश्विक आधुनिकता के चलते दृश्यओझल करते रहते हैं। आज से आठ दशक पूर्व स्वाधीनता आंदोलन के हलचल भरे दौर में जून, 1936 में जहां ‘गोदान’ का प्रकाशन हिंदी उपन्यास का एक नया प्रस्थानबिंदु था, वहीं आज भी इसका प्रासंगिक बना रहना इसके कालजयी होने का प्रमाण है। होरी सरीखे किसानों की त्रासदी के संदर्भ तब चाहे जितने भिन्न रहे हों, लेकिन किंचित बदले हुए स्वरूप में वे आज भी मौजूद हैं। खेती का दिनोंदिन अनुत्पादक होते जाना, किसान की अपने खेत से बेदखली, कृषि मजदूरों का शहरों की ओर पलायन, किसान से मजदूर होने की प्रक्रिया और जीवित रहने का संघर्ष जिस तरह आज वैश्वीकृत भारत का यथार्थ है, वह एक नए ‘गोदान’ की जरूरत दरपेश करता है।

होरी गाय की अधूरी लालसा लिए हुए जीवन संघर्ष में पराजित हुआ था, तो आज विदर्भ, तेलंगाना, आंध्र, कर्नाटक से लेकर पंजाब तक के हजारों किसान आत्महत्या के लिए विवश हो रहे हैं। इस अंतर के साथ कि जहां प्रेमचंद का किसान जमींदारी और महाजनी का शिकार था, वहीं आज का किसान नकदी फसल, कॉरपोरेट फार्मिंग और कॉरपोरेट बैंकिंग का बंदी है। उल्लेखनीय है कि ‘गोदान’ के देशकाल में किसानों को यंत्रणा से बचाने के लिए स्वामी सहजानंद सरीखा नेतृत्व और अखिल भारतीय किसान सभा जैसा संगठन था, लेकिन आज न वैसा कर्मठ किसान नेतृत्व है और न प्रभावी किसान संगठन। यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि प्रेमचंद ने ‘गोदान’ में किसानों की जिन समस्याओं को कथात्मक बनाया था, स्वामी सहजानंद प्राय: उन्हीं मुद्दों को लेकर किसानों को संगठित कर रहे थे। जहां आजादी के आंदोलन का राष्ट्रीय नेतृत्व ब्रिटिश शासन से सीधे मुठभेड़ की मुद्रा में था, वहीं होरी सरीखे खेतिहर किसान दोहरी गुलामी से त्रस्त थे। स्वामी सहजानंद के ही शब्दों में: ‘किसानों को विदेशी शासकों और देशी शोषकों दोनों से लड़ना था।’

सच है कि होरी देशज सत्ता-संरचना से ही उत्पीड़ित था। उसे खेत से बेदखल करने वाले गांव के पुरोहित और मुखिया थे। होरी की त्रासदी के मूल में दो घटनाएं थीं- द्वार पर खूंटे से बंधी गाय का मरना और बेटे गोबर द्वारा गैर-बिरादरी की विधवा झुनिया को पत्नी के रूप में अपनाना। होरी इन दोनों घटनाओं के लिए उत्तरदायी नहीं था, लेकिन वर्णाश्रम व्यवस्था में शूद्र होने की नियति के चलते उसे धर्म, बिरादरी, मरजाद के बंधनों में जकड़ कर पहले जुर्माना और डांड़ के बहाने कर्ज के जाल में फंसाया गया, फिर उसकी जमीन-जायदाद गिरवी रख कर किसान से मजदूर होने के लिए बाध्य किया गया। यहां प्रेमचंद भारतीय समाज की उस विभेदकारी जातिगत संरचना को बेपर्दा करते हैं, जो आज के भारत का भी सच है।

मृत गाय का चमड़ा उतारने के अपने पारंपरिक पेशे को अंजाम देते दलित युवकों की हरियाणा के झज्जर में हत्या, गुजरात के भरे बाजार में पिटाई और रस्से से बांध कर घुमाया जाना और ऊंची जाति में विवाह करने के अपराध में दलित युवकों की हत्या की घटनाओं का आम होना ‘गोदान’ के यथार्थ से कहीं अधिक त्रासद है। कहना न होगा कि अगर आज की खाप पंचायतें ‘गोदान’ के देशकाल में होतीं तो गोबर और झुनिया को जुर्माना और बिरादरी भोज से ही छुटकारा न मिलता, बल्कि उन्हें अपनी जान भी गंवानी पड़ती।
प्रेमचंद भविष्यद्रष्टा लेखक थे। आज गुजरात में दलित प्रतिरोध और आक्रोश के जो स्वर सुनाई पड़ रहे हैं, प्रेमचंद ने इन आहटों को आठ दशक पहले सुन लिया था। ‘गाय तुम्हारी माता है तो तुम्हीं अपनी माता का क्रिया-कर्म करो’ के नारे के साथ गुजरात के दलितों द्वारा मृत गायों का चमड़ा उतारने से इनकार के प्रतिरोधी स्वर की अनुगूंज ‘गोदान’ के सिलिया-मातादीन प्रसंग में सुनी जा सकती है। यहां दलित युवती सिलिया का पिता हरखू चर्मकार अधिकार पूर्वक यह मांग करता है कि ‘‘तुम हमें ब्राह्मण नहीं बना सकते, मुदा हम तुम्हें चमार बना सकते हैं… हमारी इज्जत लेते हो, तो अपना धरम हमें दो।’’ दलित हरखू द्वारा पंडित मातादीन के मुंह में हड्डी डालने के प्रसंग में प्रेमचंद सोच-समझ कर प्रतिरोध का धार्मिक मुहावरा अपनाते हैं, क्योंकि जो धर्म मात्र ‘खानपान, छूत विचार’ पर टिका हुआ था उसे ‘जनेऊ तोड़ने’ और खानपान को भ्रष्ट करके ही चुनौती दी जा सकती थी।

इस घटना को उपन्यास की अंतर्वस्तु में विन्यस्त करके प्रेमचंद भारतीय समाज में दलितों की उस उभरती शक्ति और प्रतिरोधी चेतना को अभिव्यक्त कर रहे थे, जिसकी खबर राष्ट्रीय आंदोलन को नहीं थी और जो राष्ट्रीय इतिहास से आज भी बेदखल है। यहां यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि ‘गोदान’ का यह प्रसंग न मनोगत है और न ही आरोपित। कारण कि ‘गोदान’ लिखे जाने के लगभग एक दशक पूर्व 1927 में महार सत्याग्रह के दौरान आंबेडकर ने ‘मनुस्मृति’ जला कर हिंदू धर्म के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त किया था और 1935 में तो हजारों दलितों के समक्ष उन्होंने यह घोषणा भी की थी कि वे ‘‘भले ही हिंदू धर्म में जन्मे हों, लेकिन हिंदू के रूप में मरेंगे नहीं।’’ गांधी-आंबेडकर के बीच ‘पूना पैक्ट’ का महाविवाद भी ‘गोदान’ के इस प्रसंग के औचित्य को तर्क-सिद्ध करता है।
आज जिस दलित और स्त्री-विमर्श को हिंदी साहित्य के जनतांत्रिक विस्तार के रूप में स्वीकार किया जाता है वह ‘गोदान’ सहित प्रेमचंद के समूचे साहित्यिक और सामाजिक चिंतन में स्वाभाविक रूप से शामिल था। ‘गोदान’ के पात्रों के रूप में हाशिये के समाज की स्त्रियों की मुखरता श्रम की शक्ति के रेखांकन के साथ-साथ कुलीन पुरुष सत्ता को प्रश्नांकित भी करती है। ‘गोदान’ के जिस पुरोहित दातादीन ने होरी की जमीन-जायदाद को गिरवी रख कर किसान से मजदूर बना दिया, धनिया उसे भी ललकारते हुए कहती है- ‘‘भीख मांगो तुम, जो भिखमंगे की जात हो। हम तो मजूर ठहरे, जहां काम करेंगे, वहीं चार पैसे पाएंगे।’’ प्रेमचंद यहां नारी स्वतंत्रता को नारी श्रम से जोड़ते हुए स्त्री मुक्ति का जो रास्ता दिखाते हैं, वह स्त्री की आत्मनिर्भरता का ही नहीं, बल्कि आत्मनिर्णय का भी द्वार खोलता है।

‘गोदान’ के स्त्री-विमर्श पर ध्यान केंद्रित करते हुए यह तथ्य भी उजागर होता है कि उपन्यास की दलित और श्रमशील समाज की स्त्रियां अपने अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रति अधिक सजग और मुखर हैं। धनिया के अलावा झुनिया, नोहरी, चुहिया, सोना सहित कई अन्य स्त्रियों में नारी अस्मिता के अंकुरण और प्रतिरोध की चेतना को लक्षित किया जा सकता है। ‘अबला जीवन की आंचल में दूध और आंखों में पानी’ की छवि से अलग ये स्त्रियां बिना किसी नारीवादी मुहावरे में ढले, अपने प्रतिरोध को स्वत:स्फूर्त ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। ‘गोदान’ का नारी-विमर्श एकलवादी न होकर भारतीय सामाजिक संरचना के अनुकूल बहुलवादी है। यहां पितृसत्ता का अनुकूलन है, तो उससे मुक्ति की बेचैनी भी। विवाह संस्था की आलोचना है, तो उसके महत्त्व का रेखांकन भी। मेहता-मालती की तर्ज पर बिन विवाह ‘लिव इन’ की मुक्ताकांक्षा है, तो आदर्शवादी प्यार का छलावा भी। पति परमेश्वर का आदर्श है, तो तलाक के अधिकार का रेखांकन भी।

सच है कि ‘गोदान’ में प्रेमचंद नारीवाद का कोई एक नुस्खा न आरोपित कर जो व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करते हैं, वही भारतीय समाज का स्त्री यथार्थ है, जो आज भी प्रासंगिक है। महत्त्वपूर्ण यह है कि यह सब प्रेमचंद तब कर सके थे, जब न तो नारी मुक्ति की कोई मुखर चेतना थी और न ही कोई संगठित नारी आंदोलन। सही अर्थ में ‘गोदान’ आजादी के पूर्व बनते हुए भारतीय राष्ट्र का रूपक है। इसे किसान जीवन की महागाथा के रूप में ही सीमित न करके भारतीय राष्ट्रवाद के आलोचनात्मक भाष्य के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। ‘गोदान’ के जिन अंशों को नगरीय और ग्रामीण जीवन की फांक के रूप में ग्रहण कर अनावश्यक मानने का सरलीकरण किया जाता रहा है, उन्हीं में भारतीय राष्ट्र बनने की प्रक्रिया और वर्तमान जनतंत्र की विकृति की पहचान भी की जा सकती है। राय साहब, मेहता, खन्ना और मिर्जा सरीखे आरामतलब भू-स्वामियों, बौद्धिकों, पूंजीपतियों द्वारा पुष्पित-पल्लवित राष्ट्रीय आंदोलन किस तरह के जनतंत्र की नींव डालेगा, इसके भरपूर संकेत प्रेमचंद ने ‘गोदान’ में दिए हैं।

यह अनायास नही है कि जनतंत्र के धनिकतंत्र में बदलने की प्रक्रिया को बेपर्दा करते हुए ‘गोदान’ के पात्र मिर्जा साहिब से प्रेमचंद यह कठोर टिप्पणी करवाते हैं कि ‘‘…जिसे हम डेमोक्रेसी कहते हैं, वह व्यवहार में बड़े-बड़े व्यापारियों और जमींदारों का राज्य है और कुछ नहीं। चुनाव में वही बाजी ले जाता है, जिसके पास रुपए हैं। बड़े-बड़े पंडित, बड़े-बड़े मौलवी, बड़े-बड़े लिखने और बोलने वाले, जो जबान और कलम से पब्लिक को जिस तरफ चाहें फेर दें, सभी सोने के देवता के पैरों पर माथा रगड़ते हैं। मैंने तो इरादा कर लिया है, अब इलेक्शन के पास न जाऊंगा! मेरा प्रोपेगंडा अब डेमोक्रेसी के खिलाफ होगा। ध्यान देने की बात यह है कि प्रेमचंद ने यह सब देश आजाद होने के दस वर्ष से भी अधिक पहले लिखा था। स्वीकार करना होगा कि प्रेमचंद की भारतीय समाज की जो गहरी आतंरिक समझ थी वह उन्हें एक साथ महान लेखक और समाजशास्त्री का दर्जा देती है। ‘गोदान’ और प्रेमचंद की अमरता के स्रोत महज साहित्यिक संरचना में न होकर भारतीय सामाजिक संरचना के उन स्रोतों में हैं, जो प्रेमचंद के साहित्य का मूल आधार है। जब तक ये स्रोत जीवित रहेंगे तब तक प्रेमचंद और ‘गोदान’ की अमरता और अनिवार्यता बरकरार रहेगी। प्रेमचंद होने का महत्त्व भी यही है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X