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विपदा में पशुसंपदा

घाटे का सौदा साबित हो रही खेती और घटते चरागाह की वजह से भारत में हर साल पशुधन में तेजी से कमी हो रही है, जबकि इंसानी आबादी बढ़ रही है। मांग के बनिस्बत दूध की कमी फिलहाल देश के सामने बड़ी समस्या है। मांस का बढ़ता कारोबार भी पशुधन के लिए मुसीबत का संकेत है। इसकी पड़ताल कर रहे हैं अवधेश कुमार मिश्रा।

Author January 31, 2016 1:40 AM

ऐसे दौर में जब भारत को दुनिया के सबसे तेज विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में एक माना जा रहा है, तब सर्वाधिक चिंतित करने वाली खबर यह है कि कृषि प्रधान देश में पशुधन में तेजी से गिरावट हो रही है। देश भर में पशुधन की गणना करने वाली एजेंसी लाइव स्टाक सेंसस के मुताबिक हर साल औसतन 3.38 लाख पशुओं की कमी हो रही है। पांच साल में करीब सत्तरह लाख पशुओं की कमी दर्ज की गई है। समझनेवाली बात यह है कि पशुधन न केवल खेती, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।

भारत की तरक्की और खुशहाली में बुनियादी जरूरतें उपलब्ध कराने के मामले में कृषि के साथ पशुधन की भी गहरी भूमिका रही है। अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने और आम आदमी का जीवन-स्तर उठाने के लिए लिए जो क्रातिंया हुर्इं, उनका सीधा संबंध कृषि से है। कृषि क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद में करीब चौदह फीसद का योगदान करता है। श्वेत क्रांति, नीली क्रांति या गुलाबी क्रांति का सीधा संबंध पशुधन से है। कृषि व्यवस्था में पशुधन का योगदान करीब पच्चीस फीसद है।

25 करोड़ 226 लाख टन खाद्यान्न , 28.31 करोड़ टन फलोत्पादन, 14.1 करोड़ टन दुग्ध, 24 लाख टन मीट और अंडा उत्पादन भारत में हर साल होता है। इन्हीं आंकड़ों ने न केवल हरित, श्वेत, नील और गुलाबी क्रांति को सफल बनाया बल्कि दुनिया के सामने भारत को मजबूती के साथ खड़ा किया। भारतीय जनजीवन और अर्थव्यस्था में पशुधन कितना महत्त्वपूर्ण है, इसकी तस्वीर उन्नीसवीं पशुधन गणना में पूरी तरह से उभर कर सामने आती है। हमारा देश पशुधन के मामले में अपने ही आंकड़ों से पीछे जा रहा है। नवीनतम पशुधन गणना में पाया गया कि पांच साल में 3.3 फीसद यानी 16.89 लाख पशुधन में कमी आई है। हालांकि, नवीतम रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 51 करोड़ 20 लाख हैं। इनमें मोटे तौर पर गाय, बैल, भैंस, बकरी, सुअर, भेंड़, घोड़े, गधे, खच्चर, ऊंट, याक और मिथुन जैसे पशु शामिल हैं। लाइवस्टॉक सेंसस के मुताबिक देश में मौजूद पशुधन में 37.28 फीसद गोवंश, 26.40 फीसद बकरियां, 21.23 फीसद भैंस, 12.71 फीसद भेंड़ और 0.37 फीसद में मिथुन, याक, घोड़ा, खच्चर, गधा और ऊंट आदि शामिल हैं।

बदलते वक्त के साथ परिस्थितियां बदलीं, परिवेश बदला, परंपराएं बदलीं और पारंपरिक नियमों के प्रति समाज का नजरिया भी बदलता चला गया। पशुधन का सीधा संबंध खेती से है। पूरे देश में खेती को लेकर निराशा का माहौल है। इसका असर पशुधन पर पड़ रहा है। जानवर पालना अब टेढ़ीखीर साबित हो रहा है। सरकारों की तरफ से जिस तरह की मदद होनी चाहिए थी, वह नहीं हो रही है। यह विडंबना है कि एक तरफ दूध और मांस की मांग प्रतिदिन बढ़ रही है और दूसरी तरफ जानवरों की संख्या घट रही है। यह एक चेतावनी सरकार के लिए। अगर गिरावट इसी तरह जारी रही तो आने कुछ कुछ दशक में हमें जानवरों को देखने के लिए तरसना पड़ेगा।

पशुधन को संजोकर रखने वाली परंपरा कमजोर हुई है। पशुओं के प्रति संवेदनशीलता का भाव भी कम हुआ है। हालांकि, इनकी उपयोगिता बनी हुई है। खासकर, गांव के किसान और गरीब वर्ग के लिए पशुधन संजीवनी होता है। यह हालत क्यों हुई है, इस पर गौर करना जरूरी है। पशुधन गणना के मुताबिक 2007 से 2012 के बीच दुधारू पशुओं की संख्या में थोड़ा इजाफा हुआ है। गायों की संख्या 6.25 फीसद बढ़कर लगभग तेरह करोड़ हो गई है जबकि भैंसों की संख्या में 3.19 फीसद का इजाफा हुआ है और इनकी संख्या अब दस करोड़ अस्सी लाख पहुंच गई है। इसके साथ ही साथ संकरित दुधारू पशुओं की संख्या में भी लगभग चार करोड़ का इजाफा हुआ है। दुधारू पशुओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई तो दुग्ध उत्पादन में 14.1 करोड़ टन उत्पादन पहुंच गया। लेकिन, देश में दूध की कमी बनी हुई है। इसी वजह से सिंथेटिक दूध का चलन भी बढ़ा है। बढ़ती मांग के हिसाब से दूध की आपूर्ति न होने के कारण नकली दूध बड़े पैमाने पर तैयार किया जा रहा है।

इन सबके बीच दूसरी तस्वीर यह है कि जो गैरदुधारू पशुओं की संख्या में जबर्दस्त घटोतरी हुई है। लाइवस्टॉक सेंसस के मुताबिक बैल और भैंसों की संख्या में 19.32 और 17.85 फीसद की कमी आई है। यह चिंताजनक है। बैल कभी खेती की रीढ़ हुआ करते थे। मांसाहार की बढ़ती मांग की वजह से बकरियों की संख्या में भी 3.82 फीसद की कमी दर्ज की गई। मतलब साफ है कि इन पशुओं को मांस उद्योग के हवाले किया गया, जिससे इनकी संख्या में भारी कमी आई। भारत 24 लाख टन मांस सालाना निर्यात करके दुनिया में नंबर एक पायदान पर पहुंच गया है।
दुधारू पशुओं को छोड़ दें तो भारत में लगभग हर पशुओं की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है। मसलन, भेंड़ों की संख्या 9.07 फीसद घटोतरी हुई, उनकी संख्या इस समय छह करोड़ रह गई है। सुअरों की संख्या में 7.54 फीसद कमी आई है। फिलहाल, इनकी तादाद एक करोड़ है। घोड़े और खच्चरों की संख्या 2.08 फीसद घटकर साठ हजार रह गई है। रेगिस्तान का जहाज कहे जाने वाले ऊंटों की संख्या में 24.48 फीसद की भारी गिरावट हुई है। इन सबके बीच, मुर्गीपालन में जरूर इजाफा हुआ है। इनकी संख्या सत्तर करोड़ तक पहुंच गई है। यही वजह है कि देश का मुर्गीपालन उद्योग दहाई के आंकड़े के साथ वृद्धि कर रहा है।

पशुधन के मामले में भारत के शहरी और ग्रामीण आबादी का जीवन स्तर पशुपालन से किस तरह जुड़ा है, यह जानना जरूरी है। आॅल इंडिया लाइवस्टॉक सेंसस के मुताबिक भारत के लगभग छब्बीस करोड़ परिवार गाय, भैंस, बकरी, भेंड़, सुअर और मुर्गीपालन के धंधे से जुड़े हैं। यही उनकी जीविका और कमाई का बड़ा आधार है।

इसमें से लगभग 19 करोड़ 56 लाख परिवार ग्रामीण अंचल के हैं और छह करोड़ 73 लाख परिवार शहरी हैं। मतलब साफ है कि पशुधन ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जीवन के लिए आज भी जीविकोपार्जन का सबसे बड़ा और सुगम साधन हैं। शहरी और ग्रामीण इलाकों में पशुधन का पारिवारिक तौर पर जीविका के लिए जो इस्तेमाल हो रहा है, उसका वर्गीकरण लाइव स्टॉक सेंसस में कुछ इस तरह से नजर आता है। भारत में लगभग छह करोड़ तिरसठ परिवार गाय, 3.91 करोड़ परिवार भैंस, 3.3 करोड़ परिवार बकरी, 3.31 करोड़ परिवार मुर्गीपालन, दो करोड़ परिवार बड़े पैमाने पर मुर्गीपालन और मत्स्य पालन, पैंतालीस लाख परिवार भेंड़ और पच्चीस लाख लाख परिवार सुअर पालन के जरिए अपनी आजीविका चला रहे हैं। ग्रामीण परिवेश में पशुधन की उपलब्धता उन छोटे किसानों के लिए संजीवनी है, जिनके पास दो हेक्टेअर से भी कम जमीन है। ऐसे छोटे किसानों के आय का साधन गाय, भैंस और बकरियां ही हैं। पशुधन का उपयोग जिस तरह से होना चाहिए, वह आज भी नहीं हो पा रहा है।

यह बात नीतिकार भी मानते हैं। दरअसल देश में पशुधन के बेहतर उपयोग के लिए नेशनल लाइव स्टॉक पॉलिसी 2013 में कुछ चुनौतियों जिक्र किया गया है। पशुधन होने के बावजूद उनका संपूर्ण दोहन न हो पाना चिंताजनक है। सबसे पहली समस्या नष्ट होते चरागाह और पशुओं के चारे की कमी है। कुछ समय पहले जहां हरेभरे चरागाह थे या खेती थी, आज वहां वैध-अवैध कब्जा करके कंक्रीट के जंगल खड़े दिए गए हैं। जंगल काटे जा रहे हैं। खेती की भूमि निरंतर कम हो रही है। यहां तक नदियों और तालाबों तक पर अवैध कब्जा कर लिया गया है। पशुओं के पास चरने के लिए जगह नहीं है। बड़ी संख्या में आवासीय कालोनियों की जगह खेती की जगह अधिगृहीत कर ली गई। बढ़ते शहरीकरण की सबसे पहली गाज जानवरों पर गिरी है।

दूसरी चुनौती उत्तम नस्लों की कमी है। पशुधन के स्वास्थ्य को लेकर सरकारें संवेदनशील नहीं है। चिकित्सा का जो ढांचा है, वह नहीं है। गांवों में आज भी कोई जानवर बीमार पड़ता है तो उसे मरने के लिए छोड़ देने के अलावा कोई चारा नहीं है। पशुपालकों में ज्ञान और जागरूकता की कमी भी बड़ी समस्या है। नई तकनीकी से दूरी और समुचति ढांचे की कमी भी समस्या से जुड़ी है। जाहिर सी बात है कि अगर इन सभी समस्याओं का बेहतर निदान ढूंढ़ लिया जाए तो पशुधन हमारी अर्थव्यवस्था और आम आदमी के जीवन स्तर को सुधारने की दिशा में और ज्यादा उपयोगी हो सकता है।
मौजूदा वक्त में खेती को लेकर कुछ गंभीर मुश्किलें सामने हैं, जिनका समाधान पशुधन के सही उपयोग के जरिए किया जा सकता है। आज के दौर में घटते कृषि के रकबे के साथ उत्पादकता में कमी एक बड़ी कठिनाई है। इस चुनौती के कारण जहां किसानों को घाटा हो रहा है वहीं रासायनिक खाद के इस्तेमाल से उगाई गई फसल हमारे स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो रही है। कोई शक नहीं कि भारत में 1960-61 में जो खाद्यान्न उत्पादन महज 8.2 करोड़ टन था, वह आज बढ़कर 25 करोड़ टन हो गया है। लेकिन रासायनिक खाद के अंधाधुंध प्रयोग ने धरती की उर्वरा शक्ति को खत्म कर दिया है। जहां 1951-52 में प्रति हेक्टेअर लगभग एक किलोग्राम रासायनिक खाद का इस्तेमाल किया जाता था, वहीं आज के दौर में प्रति हेक्टेअर लगभग एक सौ पैंतीस किलोग्राम खाद का प्रयोग हो रहा है।

रासायनिक खाद के इस्तेमाल के बाद भी अगर अपने पड़ोसी देश चीन से उत्पादकता के मामले में तुलना की जाए तो भारत में चावल की उत्पादकता 3,264 किलोग्राम प्रति हेक्टेअर है, जबकि चीन में यह 6,548 किलोग्राम प्रति हेक्टेअर है। गेंहू की प्रति हेक्टेअर उत्पादकता भारत में 3,264 किलोग्राम है जबकि चीन में 4748 किलोग्राम प्रति हेक्टेअर। जाहिर है इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए जैविक खाद के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है। जिस देश में पशुधन की इतनी बड़ी संख्या मौजूद हो वहां पर जैविक खाद की उपलब्धता समस्या नहीं होनी चाहिए।

अ गर समस्या कहीं है तो सराकार की नीतियों और सोच में है। दुनिया में पशुधन की सबसे बड़ी संपदा वाले देश को जैविक खाद के इस्तेमाल के बारे में ही नहीं सोचना चाहिए, बल्कि इसके निर्यात की भी संभावनाएं है।
पशुधन का बेहतर इस्तेमाल किसी सूबे या किसी देश को किस तरह से सफलता के ऊंचे पायदान पर ले जा सकता है, इसका ताजा उदाहरण पंजाब है। पंजाब सरकार के मुताबिक 2015 में पंजाब से 10,351 टन दूध, 426.4 करोड़ अंडे, 236.87 टन मांस का उत्पादन हुआ, जो अर्थव्यवस्था के लिए उत्साहवर्धक है। इस कामयाबी के बाद पंजाब सरकार अपने किसानों को कृषि के साथ दुग्ध उत्पादन, सुअर पालन, मुर्गी पालन और भेंड़ पालन जैसे वैकल्पिक पेशे अपनाने की भी सलाह दे रही है।

ऐसा भी नहीं है कि पंजाब की तर्ज पर अन्य राज्यों में कोशिशें नहीं चल रही। अपने-अपने स्तर पर विभिन्न राज्य पशुधन के बेहतर इस्तेमाल की कोशिश में लगे हुए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर पशुधन में 3.33 फीसद की कमी दर्ज की गई है, मगर कुछ राज्य ऐसे हैं जहां पर लगातार पशु संवर्धन हुआ है। इस मामले में सबसे अव्वल गुजरात है जहां पशुधन में 15.36 फीसद की बढ़ोतरी हुई। उत्तर प्रदेश में 14.1 फीसद, असम में 10.77 फीसद, पंजाब में 9.57 फीसद, बिहार में 8.56 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

जाहिर सी बात है कि पशुधन की उपयोगिता को इन राज्यों ने बेहतर समझा है और उसका असर यहां के निवासियों के जीवन स्तर पर दिख रहा है। भले ही इक्कीसवीं सदी में चल रही तरक्की की तेज रफ्तार में अपनी खास जगह बना रहा हो, भले ही तकनीकी से लेकर औद्यौगिक क्रांति तक आत्मनिर्भरता की कहानियां सुनाई जा रही हैं, लेकिन आज भी हमारे देश की पहचान कृषि प्रधान देश के रूप में ही होती है। कृषिप्रधानता की इस पूरी कहानी में पशुधन की भूमिका और योगदान भी अहम है। ऐसे में जरूरत है पशुधन के इस्तेमाल की बेहतर नीति बनाने की, जिससे हमारे देश की अर्थव्यवस्था को बल मिलता रहे और पशुधन की परिकल्पना वरदान साबित होती रहे। १

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