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फिल्मों के संगीत घराने

आमतौर पर लोग मानते हैं कि फिल्मों में संगीत देने वाले लोगों का शास्त्रीय संगीत से कुछ लेना-देना नहीं होता या शास्त्रीय संगीत में दीक्षित लोग प्राय: फिल्म संगीत के क्षेत्र में आकर विफल साबित होते हैं। पर यह धारणा ठीक नहीं है। फिल्म संगीत के क्षेत्र में लगभग सभी संगीतकार जोड़ियां शास्त्रीय संगीत के घरानों से जुड़ी रही हैं। कुछ ऐसे भी संगीतकार रहे हैं, जिन्होंने शास्त्रीय संगीत में प्रसिद्धि हासिल की, मुख्य रूप से शास्त्रीय संगीत से जुड़े रहे और फिल्मों में भी कई यादगार गीतों की रचना की। फिल्म संगीत के क्षेत्र में घरानों से जुड़े संगीतकारों के बारे में बता रहे हैं रघुवीर सिंह।

Author January 13, 2019 6:16 AM
फिल्म संगीत के क्षेत्र में लगभग सभी संगीतकार जोड़ियां शास्त्रीय संगीत के घरानों से जुड़ी रही हैं।

सुर-लय-ताल में प्रकृति, मौसम, समय से लेकर प्रेम, क्रोध, भय, शृंगारिक, आध्यात्मिक भाव की नित नई खोज ही भारतीय संगीत की आत्मा है। इन्हीं खोजों के गर्भ से अलग-अलग संगीत शैलियां निकलीं और फिर इन्हीं शैलियों से घराने बनते चले गए- संगीत घराने। अपने देश में शास्त्रीय संगीत के इन घरानों का इतना व्यापक प्रभाव रहा कि फिल्म संगीत को भी इन्हीं से प्रेरणा मिली। हिंदी फिल्मों ने जब बोलना सीखा, तो उनमें संगीत हिंदुस्तानी संगीत के घरानों से ही आया। बाद में बॉलीवुड में अलग संगीत घराने बन गए। खेमचंद प्रकाश, रोशन, हेमंत कुमार, चितलकर रामचंद्र, सज्जाद हुसैन, श्रीनाथ त्रिपाठी, वसंत देसाई, नौशाद, सचिन देव बर्मन, चित्रगुप्त, जयदेव, मुहम्मद रफी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, जतिन-ललित ने बकायदा शास्त्रीय उस्तादों से संगीत की सरगम सीखी। दीनानाथ मंगेशकर के घराने में बेटी लता, आशा, मीना और उषा और बेटा हृदयनाथ हुए, तो मुकेश और किशोर कुमार की गायन परंपरा को उनके बेटों क्रमश: नितिन मुकेश और अमित कुमार ने आगे बढ़ाया। राहुल देव बर्मन, राजेश रोशन, दिलीप सेन-समीर सेन, अनु मलिक, आनंद-मिलिंद, विजू शाह, संजीव-दर्शन ने भी अपने-अपने पिता की विरासत को संभाला।

हिंदी सिनेमा के शुरुआती दिनों में संगीत शास्त्रीय घरानों से ही आया। ‘ऐ मेरे वतन के लोगो’ जैसी दर्दभरी धुन देकर 1962 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आंखों में पानी भर देने वाले सी. रामचंद्र ने विनायक बुआ पटवर्धन और शंकर राव से संगीत की स्वर-लहरियां सीखी थीं। सज्जाद हुसैन ने अपने पिता मुहम्मद अमीर खान से सितार पर उंगलियां दौड़ाना सीखा, लेकिन उनकी संगीत शिक्षा के सफर ने मैंडोलिन वादक के रूप में पहुंच कर विश्राम लिया। ‘जरा सामने तो आओ छलिए’ जैसी श्रुति-मधुर धुनें देने वाले एसएन त्रिपाठी ने लखनऊ के मौरिस कॉलेज आॅफ म्यूजिक से शास्त्रीय संगीत और लोक गायिका मैना देवी से लोक संगीत की तालीम ली। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ के ‘नैन सो नैन नाही मिलाओ’ गीत को राग मालगुंजी में ढालने वाले वसंत देसाई ने उस्ताद आलम खान और उस्ताद इनायत खान से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली। सर्वश्रेष्ठ संगीत के लिए नौ बार फिल्म फेयर पुरस्कार जीतने वाली शंकर-जयकिशन की जोड़ी के शंकर सिंह रघुवंशी ने उस्ताद नसीर खान से तबले पर उंगलियों को थिरकाना सीखा। जयकिशन के बड़े भाई बलवंत भजन मंडली में गाते-बजाते थे। जयकिशन ने संगीत की शुरुआती तालीम बाडीलाल और प्रेमशंकर नायक से ली। जयदेव ने प्रोफेसर बरकत राय से संगीत की तालीम ली थी। इसलिए उस्ताद अली अकबर खान ने जब ‘आंधियां’ और ‘हमसफर’ फिल्मों में संगीत देने का जिम्मा संभाला, तो जयदेव को ही अपना सहायक बनाया। सात बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्म फेयर पुरस्कार जीतने वाली लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी के लक्ष्मीकांत शांताराम कुदलकर ने उस्ताद हुसैन अली से सारंगी की स्वर-लहरियां सीखीं और बालमुकुंद इंदौरकर से मैंडोलिन बजाना। प्यारेलाल के पिता पंडित रामप्रसाद शर्मा बिगुल वादक थे। उन्होंने प्यारेलाल के मस्तिष्क में लय पिरोई।

हेमंत कुमार

बनते गए घराने
संगीतकार दिलीप सेन-समीर सेन का संबंध तानसेन की संगीत परंपरा से है। इनके पूर्वज केसरी सेन, तानसेन के शिष्य रहे थे। दिलीप संगीतकार जमाल सेन के बेटे हैं और समीर, दिलीप के सगे भाई शंभू सेन के। फिल्मी दुनिया में जमाल सेन का कोई जवाब नहीं था, लेकिन वह अंतिम दिनों में गुमनामी में रहे। दूसरी और तीसरी पीढ़ी के चाचा-भतीजे यानी दिलीप सेन-समीर सेन की जोड़ी ने ‘ओले-ओले’ गीत से वह मुकाम हासिल किया। दिलीप नृत्य शिक्षक से संगीतकार बने और समीर ने अपने पिता शंभू सेन से शास्त्रीय गायकी के गुर सीखे। चौथी पीढ़ी में समीर सेन के बेटे सोहैल सेन ने ‘गुंडे’ के गीत ‘तूने मारी एंट्री’ से लोगों के दिलों में घंटियां बजाई हैं। संगीतकार जोड़ी जतिन-ललित का ताल्लुक मेवाती घराने से है। पंडित जसराज उनके चाचा और सुलक्षणा पंडित और विजयता पंडित उनकी बहनें हैं। दोनों भाइयों ने संगीत की सरगम पिता पंडित प्रताप नारायण से सीखी। ‘पहला नशा’ गीत से स्टार बनी इस जोड़ी ने ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘कभी खुशी कभी गम’ जैसी फिल्मों को अपने संगीत से सजाया। 2006 में जतिन पंडित और ललित पंडित ने जोड़ी तोड़ दी। फिर ललित पंडित ने कुछ फिल्मों में अकेले संगीत दिया और ‘दबंग’ के संगीत के लिए साजिद-वाजिद के साथ सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्म फेयर पुरस्कार जीता।

कव्वाली को सुरों में पिरोने में महारत रखने वाले रोशन ने मैहर घराने की संगीत परंपरा से हिंदी सिने जगत को गुंजायमान किया। मैहर के बाबा उस्ताद अलाउद्दीन खान उनके गुरु थे। बाबा ने रोशन को तीन साल राग यमन का अभ्यास कराया और नतीजा देखिए, रोशन के तमाम गाने राग यमन कल्याण के गर्भ से ही जन्मे। वैसे मनोहर बर्वे उनके पहले संगीत गुरु थे और उन्होंने उस्ताद बुंदू खान से सारंगी भी सीखी थी। ‘आरती’ के ‘बार-बार तोहे क्या समझाए’ में लोक संगीत के ठुमरी अंग को प्रस्तुत कर उन्होंने अलग प्रभाव पैदा किया। पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के अनुसार रोशन ने ठुमरी अंग लेते हुए स्वरों का इस ढंग से इस्तेमाल किया कि अगर उस राग को पंचम से देखें तो बागेश्वरी लगता है और मूल ‘सा’ से देखें तो खमाज। रोशन की इस संगीत परंपरा को उनके पुत्र राजेश रोशन ने आगे बढ़ाया। उन्होंने ‘कुंवारा बाप’, ‘करण अर्जुन’, ‘कहो ना प्यार है’ जैसी फिल्मों को अपने संगीत के सुरों से नहलाया।

दिलीप सेन-समीर सेन

त्रिपुरा (बांग्लादेश) के राजा ईशानचंद्र देव बर्मन के दूसरे पुत्र नबद्वीपचंद्र देव बर्मन सितार वादक थे। सचिन देव बर्मन इन्हीं के पुत्र और शिष्य थे। उन्होंने उस्ताद बादल खान और भीष्मदेव चट्टोपाध्याय से भी संगीत की बारीकियां सीखीं और उस्ताद आफताबुद्दीन खान से मुरली बजाना भी। पिछली सदी के चौथे दशक में उन्होंने कोलकाता में ‘सुर मंदिर’ नाम से संगीत विद्यालय स्थापित किया, जहां कृष्ण चंद्र डे के सान्निध्य में भी काफी-कुछ सीखा। उनकी ‘हम हैं राही प्यार के’, ‘छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा’ जैसी मधुर धुनें आज भी मोहित करती हैं। सचिन दा का विवाह गायिका मीरा से हुआ और इन दोनों के पुत्र राहुल देव बर्मन ने लगभग तीन सौ फिल्मों में गीतों की धुनें बना कर अपने घराने की संगीत परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने उस्ताद अली अकबर खान से सरोद भी सीखी। जब सचिन दा ‘आराधना’ का संगीत तैयार कर रहे थे, तब काफी बीमार थे। आरडी ने बड़ी कुशलता से उनका काम संभाला और फिल्म की अधिकतर धुनें तैयार कीं। उन्होंने ‘अमर प्रेम’ के ‘चिंगारी कोई भड़के’ और ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ जैसे गीतों को यादगार धुनें देकर अमर कर दिया। छह सौ से अधिक गीतों को अपनी धुनों में पिरोने वाले सरदार मलिक फिल्म ‘सारंगा’ के संगीत के लिए सदैव याद किए जाएंगे। इस घराने में सरदार मलिक के तीनों बेटे- अनु मलिक, डब्बू मलिक और अबु मलिक बॉलीवुड में संगीत निर्देशक हैं। ‘बाजीगर’, ‘बॉर्डर’ जैसी फिल्मों के संगीत ने अनु मलिक को चोटी के संगीतकारों में शुमार कराया, तो डब्बू मलिक को ‘मैंने दिल तुझको दिया’ के गीत ‘थोड़ा सा प्यार हुआ’ ने स्टार बनाया। तीसरी पीढ़ी में अनु की बेटी अनमोल मलिक बॉलीवुड में अपनी आवाज का जादू बिखेर रही हैं। डब्बू के बड़े बेटे अमाल मलिक ने अपने दादा सरदार मलिक से संगीत सीखा और हिंदी फिल्मों को अपने संगीत में नहला रहे हैं। छोटे बेटे अरमान मलिक ने रीता कौल और कदीर गुलाम मुस्तफा खान से दस साल तक आलाप-तान के उतार-चढ़ाव सीखे। वे कई फिल्मों में पार्श्व गायन कर चुके हैं।

कल्याणजी आनंदजी

संगीतकार चित्रगुप्त ने पंडित शिवप्रसाद त्रिपाठी से शास्त्रीय संगीत के आलाप-तान सीखे और फिर हिंदी फिल्मों में अपनी मधुर धुनों की रसधार बहाई। उनका संगीतबद्ध भजन ‘अंबे तू है जगदंबे काली’ आज तक ‘नवरात्र’ में आध्यात्मिक रस घोलता है। कम लोग ही जानते होंगे कि चित्रगुप्त श्रीवास्तव ने लता मंगेशकर से लालबहादुर शास्त्री की पत्नी ललिता शास्त्री के लिखे दो गैरफिल्मी गीत भी रिकॉर्ड कराए थे- ‘बता दे कोई मोहे शाम’ और ‘भोला भोला रटते रटते’। उनकी संगीत परंपरा को आगे बढ़ाया उनके बेटों- आनंद-मिलिंद ने। दोनों भाइयों की संगीतकार जोड़ी ने ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा’ गीत से बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई। कल्याणजी-आनंदजी अपनी किराने की दुकान पर नून, तेल बेचते हुए ही जिंदगी गुजार देते, अगर एक तंगहाल ग्राहक ने उधारी चुकाने के बदले दोनों को संगीत की तालीम न दी होती। कल्याणजी वीरजी शाह और आनंदजी वीरजी शाह की इस जोड़ी ने ‘कसमें वादे प्यार वफा’ जैसे अनगिनत हिट गीत देकर तीन दशक तक बॉलीवुड पर राज किया। इस घराने की अगली पीढ़ी में संगीतकार विजू शाह ने बॉलीवुड में संगीत की कमान संभाली। कल्याणजी के पुत्र विजय कल्याणजी शाह यानी विजू शाह ने ही फिल्म ‘मोहरा’ के गीत ‘तू चीज बड़ी है मस्त मस्त’ की मस्तभरी धुन बनाई और उसमें एक तान भी स्वयं गाई।जयपुर के दरबारी गायक पंडित गोवर्धन प्रसाद के घराने से निकले उनके पुत्र खेमचंद प्रकाश ने ही 1948 में फिल्म ‘जिद्दी’ में पहली बार किशोर कुमार को बतौर पार्श्व गायक पेश किया था। खेमचंद स्वयं भी जयपुर और नेपाल राजदरबार के गायक रहे थे। नौशाद की यह खुशकिस्मती थी कि शुरुआती संघर्ष के दिनों में उन्हें पंडित खेमचंद प्रकाश के साथ उस्ताद मुश्ताक हुसैन खान और झंडे खान जैसे गुणी संगीतज्ञों की सोहबत मिली। वैसे संगीत का ककहरा नौशाद ने उस्ताद उमर अंसारी से सीखा था, लेकिन खेमचंद प्रकाश को वह अपना गुरु मानते थे। गुणी संगीतकारों की इसी तालीम ने नौशाद के संगीत निर्देशन में उस्ताद अमीर खान, पंडित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर, जोहराबाई अंबालेवाली, अमीरबाई कर्नाटकी जैसे सुर के शास्त्रियों को गवाया और ‘बैजू बावरा’, ‘मुगले आजम’ आदि अनगिनत फिल्मों को कालजयी बना दिया।

आनंद मिलिंद

महज तीन साल की उम्र में तबला सीखने वाले बप्पी लाहिड़ी के माता-पिता बंसारी एवं अपरेश लाहिड़ी शास्त्रीय कलाकार थे। गायक किशोर कुमार के भांजे अलोकेश बप्पी लाहिड़ी ने अपने माता-पिता से ही शास्त्रीय संगीत की सरगम सीखी। उनकी बेटी रेमा लाहिड़ी गायिका और बेटा बप्पा लाहिड़ी संगीत निर्देशक हैं। ‘दिल ने फिर याद किया’ जैसे गीत देने वाली चाचा-भतीजे यानी सोनिक-ओमी की जोड़ी ने भी अनेक मधुर धुनें दीं। मास्टर सोनिक नेत्रहीन थे। दूसरी पीढ़ी में उनके भतीजे ओम प्रकाश सोनिक और हितेश सोनिक संगीतकार और बहू सुनिधि चौहान मशहूर गायिका हैं। ‘आशिकी’ फेम नदीम-श्रवण की जोड़ी के श्रवण कुमार राठोड़ के पिता छतरभुज राठोड़ शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत के कलाकार थे। नदीम अख्तर सैफी के साथ श्रवण की जोड़ी ‘मैं दुनिया भुला दूंगा’ गीत से फिल्म संगीत के आकाश पर धूमकेतु की तरह छा गई। पार्श्व गायक विनोद राठोड़ और रूप कुमार राठोड़, श्रवण के पैतृक भाई हैं। अगली पीढ़ी में श्रवण के दोनों बेटों- संजीव-दर्शन ने फिल्म ‘मन’ में सुमधुर संगीत दिया। संजीव को पंडित कालका प्रसाद ने पारंगत किया है। संगीतकार जोड़ी साजिद-वाजिद का संबंध भी संगीत घराने से है। ये दोनों मशहूर तबला वादक उस्ताद शराफत खान के बेटे हैं।

गायकों के घराने

दीनानाथ मंगेशकर प्रसिद्ध नाट्य संगीतकार, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीतज्ञ और गायक थे। बाबा माशेलकर ने महज पांच साल की उम्र से उनकी सुर साधना शुरू कराई। उन्होंने ज्ञानाचार्य पंडित रामकृष्ण बुआ बझे की विविधतापूर्ण और आक्रामक गायन शैली सीखी और पंडित सुखदेव प्रसाद से किराना घराने की शैली। दीनानाथ के दो विवाह हुए। पहली पत्नी नर्मदा की मृत्यु के बाद दीनानाथ ने उनकी बहन शेवंती से विवाह किया। नर्मदा की बेटी लतिका की अल्पायु में ही मृत्यु हो गई थी, लिहाजा शेवंती से उत्पन्न पांच संतानों में सबसे बड़ी बेटी हृदया को दीनानाथ, लतिका की स्मृति में लता बुलाते थे। यही लड़की बड़ी होकर सुर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर के रूप में देश-दुनिया में प्रसिद्ध हुई। दीनानाथ की अन्य तीनों बेटियां- आशा भोंसले, मीना खड़िकर और उषा मंगेशकर भी गायिकाएं हैं और एकमात्र पुत्र हृदयनाथ मंगेशकर संगीतकार हैं। तीसरी पीढ़ी में आशा भोंसले के पुत्र हेमंत भोंसले ने बतौर संगीतकार कई शानदार गाने दिए, जिनमें से ज्यादातर गीत उनकी मां ने गाए।

दीनानाथ मंगेशकर

रवींद्र संगीत के अग्रगण्य गायक रहे हेमंत कुमार ने शास्त्रीय संगीत में उस्ताद फैयाज खान की शागिर्दी ली थी। उनके छोटे भाई अमल मुखोपाध्याय बांग्ला फिल्मों में संगीतकार थे। हेमंत दा की पत्नी बेला मुखर्जी बंगाली फिल्म गायिका थीं। बेटी रेणु ने भी संगीत के क्षेत्र में किस्मत आजमाई। संगीतकार कृष्ण चंद्र डे अपने दोस्त उस्ताद बादल खान के साथ रियाज करते थे। उन्हें सुन कर प्रबोध चंद्र डे यानी मन्ना डे का मन भी संगीत में रम गया। केसी डे ने भतीजे मन्ना को संगीत की सरगम सिखा दी और फिर कल्याण थाट में शास्त्रीय रंग बिखेरता ‘लागा चुनरी में दाग’ और अंत में द्रुत लय का तराना सिंधु भैरवी के साथ जन-जन में फैल मन्ना डे को अमर कर गया। सुरीले गायक मुहम्मद रफी ने उस्ताद अब्दुल वहीद खान, पंडित जीवन लाल मट्टू और फिरोज निजामी से शास्त्रीय सुरों की सरगम अपने गले में ढाली और हिंदी सिने जगत के अनगिनत गीतों को अमर कर दिया। उनके बेटे शाहिद रफी भी गायक हैं। मुकेश कुमार माथुर की गायन परंपरा को नितिन मुकेश, तो किशोर कुमार गांगुली की विरासत को अमित कुमार ने संभाला। रेशमी आवाज के गायक सुरेश वाडकर दस साल की उम्र से पंडित जियालाल वसंत से संगीत सीखने लगे थे। ‘मेघा रे मेघा रे’ जैसे अनगिनत हिट गीतों को आवाज देने वाले सुरेश वाडकर की पत्नी पद्मा भी शास्त्रीय गायिका हैं।

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