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रविवारी आखरनामा: फिक्र तौंसवी और उनका तौंसा शरीफ

फिक्र तौंसवी को अब उसे सिर्फ पुराने लोग ही जानते होंगे। इस शख्स ने लगभग आधी सदी तक अपने पाठकों के चेहरों पर मुस्कानें बिखेरीं। उनका तनाव छीना। वे एक ऐसा लेखक थे, जिसके हास्य-व्यंग्य लेख के कारण अखबार बिकते थे।

लेखक फिक्र तौंसवी।

भारत के बहुत से नगरों में अब भी ऐसे परिवारों की संख्या सैकड़ों में है, जो वर्तमान पाक-पंजाब के जिला डेरा गाजी खान की तहसील तौंसा-शरीफ से आए थे। इनमें से डॉ. अमृतलाल मदान सरीखे कई लोग अध्यापक व लेखन से जुड़ गए। शेष लोग व्यवसाय में जूझने लगे। ऐसे लेखक-पत्रकारों में एक नाम फिक्र तौंसवी का भी था, जिसके व्यंग्य लेखन व स्तंभ लेखन का अब भी उर्दू साहित्य व उर्दू पत्रकारिता में अनूठा स्थान है।

‘तौंसा’ का शाब्दिक अर्थ होता है-प्यास। पुराने वक्त में पानी को एक बहुत बड़ी नेमत माना जाता था। प्राय: आबादियां वहीं होतीं थीं, जहां करीब कोई नदी या सरोवर होता था। इस क्षेत्र में भी पानी बेहद कम था, इसलिए नाम पड़ गया तौंसा। कहा यही जाता है कि जब से एक सूफी संत मुहम्मद सुलेमान ने यहां डेरा जमाया तब से पानी आसानी से मिलने लगा। अब यहां के समीप ही सिंधु नदी पर तौंसा बराज बना हुआ है, फसलें चहचहाती हैं और यह शहर जिसका नामकरण ही प्यास के आधार पर हुआ था, अब हरेभरे इलाके में तब्दील हो चुका है। अब तो विश्व बैंक की मदद से ‘तौंसा-पंजनद लिंक कैनाल’ भी बन चुकी है।

तौंसा के साथ अब ‘शरीफ’ शब्द भी जुड़ गया है क्योंकि जहां-जहां भी सूफी दरगाहें हैं वहां कस्बों, शहरों के नाम के साथ ‘शरीफ’ जोड़ दिया जाता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे हमारे यहां अजमेर शरीफ है या पाकिस्तान में पाकपत्तन शरीफ। तौंसा व उसके आसपास बलोच व पठान ज्यादा रहते हैं। उनकी सामंती पृष्ठभूमि है। ‘वडेरे’ कहलाते हैं उनके कबीलों के सरदार।

यह शहर कराची-पेशावर हाईवे पर स्थित है। मगर लाहौर से 450 किलोमीटर और कराची से लगभग 975 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अब तो यहां एक छोटा चिड़ियाघर भी है। इस पर लगभग 12 करोड़ 50 लाख रुपए खर्च किए गए हैं। अलग-अलग प्रजातियों के परिंदों के लिए बड़े-बड़े पिंजरे व दरबे बनाए गए हैं ताकि परिंदे उड़ान भी भर सकें। विशेष जोर इस बात पर दिया जा रहा है कि तमाम प्रकार की हिरणों व बंदरों की प्रजातियों को यहां एकत्र किया जाए ताकि वन्य प्राणियों पर शोध करने वालों या उनकी जीवनशैली को कैमरों में उतारने वालों को विशेष आकर्षण का आधार मिल सके।

अपने जिस शख्स के नाम पर हम लोग तौंसा को याद करते हैं, चलिए उस शख्स को भी याद कर लिया जाए। फिक्र तौंसवी को अब उसे सिर्फ पुराने लोग ही जानते होंगे। इस शख्स ने लगभग आधी सदी तक अपने पाठकों के चेहरों पर मुस्कानें बिखेरीं। उनका तनाव छीना। वे एक ऐसे लेखक थे, जिसके हास्य-व्यंग्य लेख के कारण अखबार बिकते थे। अब ऐसे सेलिब्रिटी हास्य-व्यंग्य लेखक दुर्लभ हैं, जिनके लेखों के आधार पर अखबार या पत्रिकाएं बिकती हों। यह शख्स तकरीबन 35 साल तक एक स्तंभ लिखता रहा। ‘प्याज के छिलके’ नामक यह स्तंभ, जिस दिन अखबार में नहीं छपता, पाठक बिफरने लगते। अक्सर संपादक को चिट्ठियां भेजी जातीं- जिस दिन ‘प्याज के छिलके’ कॉलम न छपना हो उसकी पूर्व सूचना एक दिन पहले छाप दिया करें ताकि मूड खराब न हो।

संपादक ने एकाध बार ऐसा ही किया। फिक्र तौंसवी एक बार तीन दिन की छुट्टी पर थे। अखबार में इस आशय की सूचना छाप दी गई कि तीन दिन फिक्र साहब का स्तंभ नहीं छप पाएगा। उन तीन दिनों में अखबार की बिक्री पर काफी बुरा असर पड़ा। जो लोग ‘प्याज के छिलके’ के लिए अखबार खरीदते थे, उन्होंने उन तीन दिन अखबार नहीं खरीदा। खबरों के लिए अखबार मांग कर पढ़ लेते मगर ‘प्याज के छिलके’ से विहीन अखबार पर पाठक एक पैसा भी खर्च करने को तैयार नहीं होते थे।
फिक्र तौंसवी नाम के इस स्तंभकार ने तकरीबन 37 साल दिल्ली में गुजारे। विभाजन के बाद अपने जन्मस्थान, गांव तौसां शरीफ का नाम तखल्लुस के रूप में अपने नाम से जोड़ दिया और इस तरह से रामलाल भाटिया नाम का यह शख्स फिक्र तौंसवीं बन गया।

बीच-बीच में कुछ दिन जालंधर भी बिताने होते थे क्योंकि जिस अखबार में वे काम करते थे वह दिल्ली और जालंधर से एक साथ छपता था। मुझे कुछ दिन उनके साथ काम करने का अवसर भी मिला था। उन्होंने एक बार बताया था कि एक कातिब के रूप में उन्होंने 18 वर्ष की उम्र में ही शेखूपुरा (पाकिस्तान) से छपने वाले अखबार ‘किसान’ में काम शुरू किया था। युवा पाठकों के लिए इस बात का जिक्र जरूरी है कि कातिब उन दिनों उर्दू अखबारों के लिए खबरों व लेखों को पहले कलम-दवात के माध्यम से कागज पर लिखते। फिर उन्हें एक बड़ी पेपर-शीट पर सिलसिलेवार व प्राथमिकता के अनुसार चिपकाया जाता। इस तरह से अखबार के पन्ने तैयार होते। एक साल तक कातिब के रूप में काम करने के बाद फिक्र तौंसवीं उकता गए थे।

दरअसल, वे जब भी अखबार के मालिक से अपनी लिखी सामग्री छापने की प्रार्थना करते, मालिक-संपादक डांटने लगते। तंग आकर तौंसवीं ने दीवारी बोर्ड लिखने व साइन बोर्ड की पेंटिंग करने वाला पेशा चुन लिया। वहां भी मन नहीं रमा तो आर्य हाई स्कूल में नौकरी कर ली। 1928 में वे लाहौर के पंजाब बुक डिपो में क्लर्की करने लगे और वहीं पे मौका मिला तो प्रख्यात शायर अहमद नदीम कासमी के संपादन में छपने वाले मासिक ‘अदबे-लतीफ’ में उपसंपादक हो गए। उन्हीं दिनों फिक्र ने मुमताज मुफ्ती के साथ मिलकर ‘सवेरा’ निकाला। मगर भारत-पाक विभाजन ने सारे सपने बिखेर दिए।

1947 में फिक्र तौंसवीं जालंधर आ गए। वहां से छपने वाले एक उर्दू दैनिक में उपसंपादक व स्तंभ लेखक के रूप में नौकरी मिल गई। कुछ ही दिनों में उनका स्तंभ ‘प्याज के छिलके’ इतना लोकप्रिय हो गया कि अखबार की पहचान का हिस्सा बन गया। अपने दैनिक अखबार के अलावा फिक्र तौंसवी छद्म नाम से दिल्ली से ही प्रकाशित ‘बीसवीं सदी’ में ‘तीरो-नश्तर’ नामक स्तंभ भी लिखते थे।

तौंसवी वैचारिक रूप से प्रगतिशील लेखक थे। एक बार बता रहे थे मैंने अपने असल नाम रामलाल भाटिया के नाम से कुछ लेख अपने समय की एक प्रतिष्ठित पत्रिका ‘शम्मअ’ को भेजे, मगर सभी लेख वापस आ गए। वही लेख मैंने मामूली तब्दीली के साथ फिक्र तौंसवी के नाम से भेजे तो सभी लेख न सिर्फ छपे, मुझे अच्छा पारिश्रमिक भी मिला और भविष्य में भी पत्रिका के लिए लिखते रहने की दावत भी मिली।

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