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रंगमंच की नई चुनौतियां

रंगमंच के सामने तेजी से बढ़ते तकनीकी माध्यमों और अन्य मनोरंजन कला माध्यमों के समक्ष अपने स्वंतत्र और वैचारिक अस्तित्व को बनाए रखने की कठिन चुनौती है। रंगमंच के प्रश्नों को लेकर पिछले कुछ वर्षों में गंभीर स्तर पर विचार किया जाने लगा है।

चित्र: अशोक भौमिक

मीना बुद्धिराजा

जब तक व्यक्ति है, मानवीय चेतना और सृष्टि है, तब तक रंगमंच खत्म नहीं हो सकता। यह अनवरत क्रियाशील, सार्थक और समसामयिक यथार्थ की अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट माध्यम बना रहा, जिसमें समय-समय पर कथ्य, निर्देशन, अभिनय, रंगशिल्प और नाटकों की मंचीयता को लेकर नए बदलाव आते रहे हैं। स्वतंत्र भारत में भी रंगमंच को समकालीन जीवन और समाज से गहराई से जोड़ने की प्रवृत्ति निरंतर बनी रही। भारतीय रंगमंच विविध रंग छवियों का कोलाज बना रहा, जिसमें परंपरा और आधुनिकता का, संस्कृत नाटशास्त्र के तत्त्व ‘रस’ और पाश्चात्य के ‘संघर्ष’ का विविधताओं और बहुलताओं का प्रासंगिक रूप से समन्वय होता रहा है।

रंगमंच को आधुनिक मूल्यों की ओर ले जाने के लिए रंग आंदोलन में हबीब तनवीर, रतन थियम, विजय तेंदुलकर और गिरीश कर्नाड जैसे नाटककारों और रंग कर्मियों ने भारतीय रंगशैली की नौटंकी जैसी पंरपराशील जड़ों और लोक से जोड़ने का सार्थक प्रयास किया, जो बहुत सफल और लोकप्रिय रहा। इसके समानांतर और साथ ही महानगरीय मध्यवर्गीय आधुनिकता से जुड़े यथार्थवादी रंगमंच का दौर गतिशील होता रहा, जो नाटकों में आधुनिक जीवन के तनाव, व्यक्ति और समाज के अंतर्विरोधों तथा विसंगतियों को सशक्त और जीवंत रूप में प्रस्तुत कर सकता था। इसी तरह नब्बे के दशक के बाद भारतीय रंगमंच में स्त्री नाटककारों और स्त्री रंग-निर्देशकों का रंगकर्म उभर कर आया, जिसने स्त्री-सशक्तिकरण और जेडंर की समानता की प्रक्रिया को प्रस्तुत करने के लिए समाज में स्त्री की पहचान और स्वतंत्र अस्मिता के प्रश्नों को उठा कर रंगमंच पर शिल्प और वस्तु दोनों को व्यापक स्तर पर बदला। ये सभी नए प्रयोग और रंगमंच में नए बदलाव समसामयिक परिवेश और उससे जुड़े गंभीर प्रश्नों के रूप में सामने आए। निस्संदेह नाटक और रंगमंच साहिय की सबसे जीवंत विधा के रूप में हमेशा प्रासंगिक रहा, जो दर्शकों से सीधा जुड़ कर उनसे प्रत्यक्ष संवाद करता है। नाटक अपनी मूल प्रकृति और स्वभाव से ही सत्ता और व्यवस्था-विरोधी होता है और साधारण जनसामान्य के संघर्ष, सामाजिक समस्याओं, ज्वलंत मुद्दों से जुड़े प्रश्नों को उठा कर असहमति और प्रतिरोध की आवाज बनता है। जनसाधारण और आम जनता से सीधे और सार्थक संवाद का यह माध्यम समाज में एक व्यापक और सकारात्मक बदलाव की रूपरेखा भी तैयार करता है। इसलिए नाटक और रंगमंच तात्कालिक प्रभाव का हथियार न होकर उसके सार्वकालिक और स्थायी प्रभाव तथा परिवर्तन को लेकर समाज में एक बड़ा दायित्व निभाता है। अपने समय की सभी संकीर्णताओं, असहिष्णुता और अन्याय के विरुद्ध लोकतंत्र में असहमति और प्रतिरोध की प्रखर आवाज उठाने का साहस और जोखिम भी रंगमंच अपने तरीके से रंगदृष्टि और प्रस्तुति में दर्ज करता है।

दरअसल, नाटक अपनी विषयवस्तु का चुनाव समाज के भीतर से ही करता है और अभिनय और रंगमंच के माध्यम से उस विषय को पुन: अपनी जीवंत प्रस्तुति में समाज को लौटा देता है। अपने समसामयिक परिवेश की विसंगतियों और जटिलताओं को उनके आंतरिक सत्य के साथ उघाड़ कर वह समाज को सोचने के लिए आलोचनात्मक विवेक को जागृत और प्रेरित भी करता है। एक सामूहिक माध्यम के रूप में नाटक में यह संदेश भी अंतर्निहित होता है कि बदलाव की नई पहल भी हमसे ही संभव होगी और इसी में इस माध्यम की सार्थकता है। बदलते हुए सामाजिक-राजनीति संदर्भों में भी जिस सच को रंगमंच के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है, वह दर्शक और पूरे समाज का भी अनूभूत सत्य बन जाता है। एक बेहतर विकल्प और विचार के लिए स्थान बनाने की भूमिका तो नाटक और रंगमंच अपने जन्मकाल से ही निभा रहा है, जिसमें इसकी सामाजिक प्रतिबद्धता और मानवीय पक्षधरता के दायित्व का बोध भी समाहित रहा है। सबसे निर्मम और कठिन समय में शोषण, अन्याय और उत्पीड़न के विरोध में जाति-धर्म, समुदाय-वर्ग, लिंग-वर्ण के भेद से परे रंगमंच अपनी सशक्त-प्रखर उपस्थिति के साथ यथार्थ का जो प्रतिबिंब सामने रखता है, वह जनतांत्रिक स्वर के साथ सबका समन्वित संघर्ष बन कर दर्शकों से पूरी तरह जुड़ जाता है। रूढ़िवाद, कट्टर सोच और संकीर्णताओं का प्रतिरोध करते हुए रंगमंच जिस प्रगतिशील और खुली विचारधारा का पक्ष लेता है वह समाज में व्यक्ति को आपस में तोड़ने के बजाय उसे जोड़ने में सामाजिक सद्भाव में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाने में सर्वाधिक समर्थ सिद्ध हो सकता है।

इक्कीसवीं सदी के रंगमंच के सामने तेजी से बढ़ते तकनीकी माध्यमों और अन्य मनोरंजन कला माध्यमों के समक्ष अपने स्वंतत्र और वैचारिक अस्तित्व को बनाए रखने की कठिन चुनौती है। रंगमंच के प्रश्नों को लेकर पिछले कुछ वर्षों में गंभीर स्तर पर विचार किया जाने लगा है, जिसमें उसकी संभावनाओं की दृष्टि से भी और उन खतरों पर सोचने की दृष्टि से भी, जो समकालीन रंगमंच के सामने हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसी संस्थाओं और भारंगम जैसे प्रयासों के साथ ही अन्य स्थलों में विविध स्तरों पर रंगमंच को दर्शक तक ले जाने और दर्शक को रंगमंच तक लाने के लिए क्या उपाय किए जा सकते है? प्रयोगशील रंगमंच को आर्थिक आधार पर किस तरह जीवित रखा जा सकता है? नाटक की रचना प्रक्रिया को रंगमंच से अधिक ईमानदारी और प्रतिबद्धता से कैसे जोड़ा जा सकता है? नाटककार और अभिनेता को रंग-प्रक्रिया का अनिवार्य अंग बना कर उन्हें एक ही धरातल पर कैसे लाया जाए, जिसमें उनकी असीम क्षमताओं पर पुनर्विचार करके रंगमंच को एक नई तैयारी के साथ समाज के केंद्र में लाया जाए और रंगमंच की दिशा निर्धारित की जाए। एक संवेदनशील लोकतांत्रिक समाज और बहुआयामी संस्कृति की संरचना में रंगमंच कैसे योगदान दे और जातीय-सांप्रदायिक भेदभाव, हिंसा, तनाव के माहौल में और एक विवेकशील जागरूक परिवेश के निर्माण में इसकी भूमिका कितनी महत्त्वपूर्ण है?

बदलते समय में व्यवस्था की विसंगतियों से संघर्षरत आम आदमी की त्रासदी से संवाद कायम करने और जमीनी स्तर पर दर्शकों तक संप्रेषित करने में रंगमंच की मौलिक दृष्टि पर भी बात होनी चाहिए। इन सभी बिंदुओं और तथ्यों को केंद्र में रख कर आने वाले समय में नए रंग-प्रयोगों और नई रंग-शैलियों के साथ हिंदी रंगमंच की एक व्यापक तस्वीर बन सकती है, जिसकी पहुंच अलग-अलग क्षेत्रों में जनमानस के अंतर्मन तक हो, जो उसकी समकालीनता और प्रासंगिकता को नया स्वरूप भी दे सकती है। मानवीय-सामाजिक सरोकारों की प्रस्तुति के लिए रंगमंच इस दृष्टि से ऐसा जीवंत माध्यम है, जिसकी बराबरी कोई विधा आसानी से नहीं कर सकती और इसकी अनंत संभावनाओं के साथ एक नए सांस्कृतिक विमर्श और समाज के निर्माण में इसकी गतिशील भूमिका निर्विवाद है।

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