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‘चर्चा’ कॉलम में रमणिका गुप्ता का लेख : स्त्री-विमर्श वाया नगालैंड

नगा परिवार में लड़कों को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इस बच्ची को भी पहनने के लिए भाइयों के उतरे हुए पुराने कपड़े दिए जाते हैं, नए नहीं।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 1:15 AM
ईस्टराईन इरालू का पहला कविता संग्रह तेईस वर्ष की उम्र में प्रकाशित हुआ था। वे अतीत और वर्तमान के यथार्थ को मिश्रित करके लिखती हैं। अपनी विरासत पर उन्हें गर्व है।

नगालैंड में नेचुरियाजो चुचा और सिबैस्टियन जुमवू ने जहां नगा संस्कृति, जीवन-शैली और नगालैंड की राजनीतिक हलचलों को चिह्नित किया है, वहीं ईस्टराईन इरालू और टेनीडाईड भाषा की कवयित्री और उपन्यासकार केखरीबाउन योमे अपने सृजनात्मक गद्य के जरिए दबी महिलाओं की आवाज बन कर उभरी हैं। इन्होंने अपने कथा साहित्य के जरिए नगा विमर्श की सैद्धांतिकी विकसित की है।

ईस्टराईन इरालू का पहला कविता संग्रह तेईस वर्ष की उम्र में प्रकाशित हुआ था। वे अतीत और वर्तमान के यथार्थ को मिश्रित करके लिखती हैं। अपनी विरासत पर उन्हें गर्व है। उनकी रचना ‘टैरीबल मैट्रीआर्की’ (भयावह मातृसत्ता) नगा मातृसत्ता की लड़की के प्रति भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण को व्याख्यायित करती है। नगालैंड में लड़कियों का शोषण दादी, नानी, बहन और आस-पड़ोस की महिलाएं भी करती हैं। स्त्री-विमर्श के सिद्धांत के लिए यह एक चुनौती है। केवल पितृ वर्चस्व नहीं, वहां मातृ सत्ता भी स्त्री को कष्ट भरी जिंदगी देने में समान हैं।
इस रचना में एक पांच वर्ष की लड़की डिलीनियो की कथा है, जो पांच बच्चों में सबसे छोटी है और अपनी दादी के हाथों उत्पीड़ित होती है।

नगा परिवार में लड़कों को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इस बच्ची को भी पहनने के लिए भाइयों के उतरे हुए पुराने कपड़े दिए जाते हैं, नए नहीं। खाने के वक्त उसकी दादी उसे मुर्गे की टांग खाने नहीं देती, इसलिए कि वह लड़कों के लिए आरक्षित मानी जाती है। पानी भी वही भर कर लाती है। उसे स्कूल जाने की मनाही है, क्योंकि वह लड़की है। दादी उसे उसका नाम लेकर नहीं बल्कि ‘ए लड़की’ कह कर पुकारती है। लड़की अपने ही घर में खुद को पराया मानती है और जिंदगी भर अत्याचार सहन करती है। इतने के बाद भी वह लड़की अपनी मरती हुई दादी को उसके अंतिम क्षणों में माफ कर देती है।

केखरीबाउन योमे के तीन प्रमुख उपन्यास हैं- ‘किजु नू केलहऊ’, ‘केफोमा जका’ और ‘रीलेटयूटो’। ये उपन्यास समाज में स्त्री की भूमिका का पुनरीक्षण करते हैं। योमे अपनी इच्छा से परिवार गढ़ती हैं और सशक्त आवाज बुलंद करती हैं। योमे का लेखन विद्रोही है। वह एक वैकल्पिक यथार्थ को परिभाषित करता है, जो नगा समाज की परंपराओं और स्त्री-शक्ति को परिभाषित करता है। उनकी स्त्री पारिवारिक रिश्तों की विध्वंसक और निर्माता दोनों है।

उनके पाठ में राजनीतिक चेतना निहित है। वे पितृसत्ता की हावी संस्कृति को भी चुनौती देती हैं, साथ ही नगा स्त्री और उसके संसार के छिपे खजाने के सांस्कृतिक कौशल और कुशाग्रता को भी उजागर करती हैं। योमे अपने समुदाय और जनजातीय समूह अंगामी का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनके साहित्य में अंगामी स्त्रियों में व्याप्त पुरातन विश्वास और उनका अनुकूलित मानस भी प्रतिबिंबित होता है। घर के अंदर और बाहर लिंगभेद, गालीगलौज, हिंसा और चुप रह कर कष्ट सहने की स्त्रियों की प्रवृत्ति का बयान कर के, वे नगा स्त्री की पल-पल होती अवमानना को दर्शाती हैं।

उनका सबसे सशक्त उपन्यास है- ‘किजु नू केलहऊ’ (पृथ्वी पर जीवन) या इस दुनिया में जिंदगी। यह उपन्यास नगा स्त्री का परंपरा और लिंग के मुद्दों पर वैकल्पिक और ऐतिहासिक विमर्श बन गया है। वे एक विशेष स्त्रीवाची पद्धति पर जोर देती हैं, जहां पाठक नगा स्त्री के उत्पीड़न को एक सांस्कृतिक इतिहास और उत्पीड़न-दमन की राजनीति के नजरिए से देखता है। उनका आख्यान बहुत सशक्त है। कुंआरी लड़किों के साथ आत्मीयों के दुराचार को उन्होंने कथा का विषय बनाया है। इस उपन्यास की नायिका खेरीनयू का चरित्र पुरानी पीढ़ी के एक कथानक से लिया गया है, जो नगा समाज में बहुत प्रचलित है।

योमे का नवीनतम उपन्यास ‘रीलेटयूटो’ शराबियों और व्यभिचारी पुरुषों पर केंद्रित है, जो नगा परिवारों में त्रासदी का कारण बनते हैं। हिंसा, शराब, पितृसत्ता का चक्र, जो समाज, परिवार और माताओं द्वारा संरक्षित और पोषित है, की हृदय विदारक कहानी, इस उपन्यास के माध्यम से उजागर हुई है। योमे शराब, स्त्री गमन और व्यभिचार के चलते दोस्तों के शादी टूटने के दुखद घटनाक्रम की गवाह हैं। वे शादी और रिश्तों के खोखलेपन का नकाब उलट देती हैं।

नगा महिलाएं अपने भाई-बहनों और घरों के लिए अत्यंत जिम्मेदार होने के लिए मजबूर हैं। उनकी यह मजबूरी ही उन्हें मजबूत और लचीला बना देती है और वे जीवन बुरी से बुरी स्थिति से भी निपटने के लिए तैयार हो जाती हैं। योमे ने इस उपन्यास में विवाह में ऐसी स्थितियों के लिए महिलाओं की बेबसी, परंपरा और शादी के लिए परिवार के प्रति प्रतिबद्धता और उसके सम्मान से बंधे रहने की त्रासदी पर बल दिया है।

इस उपन्यास में एक नई बात यह भी दर्शाई गई है कि किस प्रकार औरतें अपने परिवार और समाज में ही आपस में रिश्ते कायम कर लेती हैं और अपने कामुक पतियों के खिलाफ मोर्चाबंदी करती हैं। इस प्रकार सब औरतें मिल कर अपने अनुभव और दुख आपस में बांटती हैं। सिडजेलू का पति निच्ऊ एक मिस्ट्रेस को रखे हुए है, लेकिन सिडजेलू बच्चों के मोह में अपने पति को छोड़ नहीं सकती और उसकी मार सहती रहती है। उसका दुर्भाग्य यह भी है कि उसके बच्चे उसके त्याग, बलिदान को नहीं सराहते, जिसने अपना सारा सुख उनके लिए त्याग दिया था।

अपने उपन्यास ‘केपफोमा जखा’ में वे जिम्मेदार लोगों के जीवन में व्याप्त गर्भपात की प्रवृत्ति को उजागर करती हैं। अमीर युवक नीथो-ओ, जो धर्मशास्त्र का अध्ययन करता है- स्त्रीगमन का आदि के बावजूद चर्च का नेता बन जाता है। वह अपनी प्रेमिका को बच्चे का गर्भपात कराने के लिए बाध्य करता है। शादी के बाद वह कभी बच्चे का पिता नहीं बनता। उसका अपराधबोध उसे ‘हांट’ करता रहता है और रात में भी उसे ‘नवजात, बच्चे के रोने की आवाज’ सुनाई देती रहती है। दूसरी तरफ शादी कर लेने और अपने बच्चे होने के बाद भी वह युवा प्रेमिका गर्भपात में खोए अपने पहले बच्चे की याद में बेचैन रहती है। जिंदगी भर यह अपराधबोध उसका पीछा नहीं छोड़ता।

योमा उस नगा समाज की वास्तविकता को चित्रित करती हैं, जो अपने बिगड़ैल सिरचढ़े बच्चों को धर्मशास्त्र की पढ़ाई के लिए भेजते हैं- भले वह पढ़ाई उनके मनोनुकूल हो या नहीं। वे युवा जोड़ों पर इस गर्भपात के प्रभाव को भी दर्शाती हैं, खासकर उन युवा लड़कियों पर पड़े प्रभाव को, जिनके पास गर्भपात के अलावा और विकल्प नहीं होता। वे कहती हैं- ‘मैंने उनके बारे में सुना है और मैं कई गर्भपातों की गवाह भी हूं। यह कहानी उन युवा लड़कियों के जीवन के प्रति मेरी गहरी चिंता से उपजी है।’

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