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गीता, हिंदी कविता और लाखों का करार

योगेश कुमार ने उद्भ्रांत के साथ ‘प्रज्ञावेणु’ और ‘रुद्रावतार’ का ऑडियो-वीडियो निर्माण संबंधी अनुबंध किया है। खास बात यह है कि यह कॉपीराइट अनुबंध नौ लाख रुपए और सात फीसद रॉयल्टी के साथ किया गया है।

यह कॉपीराइट अनुबंध नौ लाख रुपए और सात फीसद रॉयल्टी के साथ किया गया है।

मैं समय हूं…। हरीश भिमानी की आवाज में बीआर चोपड़ा के बनाए धारावाहिक ‘महाभारत’ में यह शब्द गूंजा तो इतना लोकप्रिय हुआ कि दुनिया के सबसे ज्यादा देखे जाने वाले धारावाहिकों में शुमार हो गया। महाभारत संस्कृत में रचा ऐसा पौराणिक ग्रंथ है जो हर लोक भाषा और लोक माध्यमों में लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा। महाभारत के ही एक अंश ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के रमाकांत शर्मा ‘उद्भ्रांत’ द्वारा हिंदी में पुनर्सृजन ‘प्रज्ञावेणु’ ने भी लोकप्रियता का ऐसा ही इतिहास रचा है। संस्कृत में लिखी इस पौराणिक रचना को आमजनों के बीच सहज, सरल, सुबोध और सुगेय हिंदी में पहुंचाया उद्भ्रांत ने। इसी के साथ उद्भ्रांत की लंबी और मिथकीय छंद कविता ‘रुद्रावतार’ भी शैव, वैष्णव और शाक्त दर्शन के समाहार के रूप में लोकप्रिय हुई। अब ये दो रचनाएं दृश्य और श्रव्य माध्यम से घर-घर पहुंचाएंगे चर्चित धारावाहिक ‘पंखुड़ियों’ के निर्माता-निर्देशक योगेश कुमार। योगेश कुमार ने उद्भ्रांत के साथ ‘प्रज्ञावेणु’ और ‘रुद्रावतार’ का ऑडियो-वीडियो निर्माण संबंधी अनुबंध किया है। खास बात यह है कि यह कॉपीराइट अनुबंध नौ लाख रुपए और सात फीसद रॉयल्टी के साथ किया गया है। लेखक को साइनिंग एमाउंट के तौर पर दो लाख रुपए भी दिए गए हैं। उद्भ्रांत दावा करते हैं कि खड़ी बोली के इतिहास में किसी काव्य रचना के लिए अभी तक इतना बड़ा अनुबंध नहीं किया गया है।

विश्व प्रसिद्ध पंक्तियों को उद्भ्रांत अपनी रचनात्मकता के साथ पुनर्सृजित करते हैं, ‘मैं अजन्मा/और अविनाशी/तथा सब प्राणियों का ईश हूं पर/नियंत्रित कर निज प्रकृति को/प्रकट होता/योगमाया से यहां।’ इसी तरह श्रीकृष्ण के उद्गार को प्रज्ञावेणु इस तरह प्रस्तुत करता है, ‘हे भरत/जब-जब पतन हो धर्म का/अपधर्म की हो वृद्धि/तब-तब मैं (किसी भी जीवन का आकार लेकर) प्रकट होता हूं स्वयं’। इस पुनर्सृजन में उद्भ्रांत आज के समय और ज्ञान के हिसाब से अपनी व्याख्या भी जोड़ते हैं। कोष्ठक में ‘किसी भी जीवन का आकार लेकर’ के जरिए उद्भ्रांत अपने पाठकों के साथ संवाद करते हैं।

निर्माता-निर्देशक योगेश कुमार एक साहित्यकार की काव्य रचनाओं के साथ इस व्यावसायिक करार को लेकर उत्साहित हैं। उन्हें पूरा भरोसा है कि उद्भ्रांत की इन कालजयी रचनाओं को दृश्य-श्रव्य माध्यम के रूप में दर्शकों का भरपूर प्यार मिलेगा। योगेश कुमार ने कहा, ‘प्रज्ञावेणु’ को मैं पिछले बीस साल से पढ़ रहा हूं। इसमें भगवान के जरिए भारतीय विज्ञान का संदेश है। आज आम जन संस्कृत से दूर है। उद्भ्रांत ने गीता को साधारण तरीके से आम जनों के बीच पहुंचाया है। इससे पहले भी श्रीमद्भगवद्गीता के अंग्रेजी सहित विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद हुए, लेकिन वे उतने लोकप्रिय नहीं हुए’।

योगेश कुमार गीता को एक धार्मिक और पौराणिक ग्रंथ से ज्यादा वैज्ञानिक ग्रंथ मानते हैं। वे कहते हैं कि गीता में राज-समाज के साथ विज्ञान भी है। यह ग्रंथ अंधविश्वास के खिलाफ एक सार्वजनिक संदेश है। यह आमजनों को संदेश देता है कि वे अंधविश्वास से दूर होकर अपना कर्म करें। कुमार कहते हैं कि यह ग्रंथ हमें वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान करने के साथ-साथ प्रबंधन का कौशल भी सिखाता है। आज भी हमारे देश में बहुत से लोग अंधविश्वास में डूब कर अपना अहित कर रहे हैं। गीता एक मजबूत विज्ञान है जो एक मजबूत इंसान तैयार करती है।

महर्षि वेदव्यास ने श्रीमद्भगवद्गीता की रचना संस्कृत में की। गीता शब्द गीति से बना है जिसे गाया भी जा सके, लेकिन संस्कृत और हिंदी की प्रकृति अलग-अलग है। इसका एक तरह से काव्यानुवाद होना था। उद्भ्रांत ने गीता के पद्मानुवाद को मुक्त छंद में रखा। वे कहते हैं कि आज संस्कृत आम लोगों से दूर है। गीता पूरे देश के लोगों के दिल में है तो यह उनकी जुबान पर भी होनी चाहिए थी। और उस जुबान में होनी चाहिए, जो आम जन की हो। गीता के श्लोकों की गेयता में कृष्ण की वाणी का ओज भी होना चाहिए। प्रज्ञावेणु में उद्भ्रांत अपने शब्दों को वह ओज देने में सफल हो पाए हैं कि एक आम शिक्षक उसे बच्चों के सामने गा पाए या हिंदी पट्टी का एक आम बच्चा उसे अपनी मनपसंद कविता के रूप में स्कूल के मंच पर गा पाए। गेयता का यही ओज इसे छापेखाने से निकालकर दृश्य और श्रव्य माध्यमों के लिए बेहतरीन रचना बनाता है।

योगेश उद्भ्रांत की दूसरी रचना ‘रुद्रावतार’ को भी हिंदी साहित्य में मील का पत्थर मानते हैं। उन्होंने कहा कि मैंने उद्भ्रांत के साथ ‘रुद्रावतार’ को लेकर भी करार किया है। वे कहते हैं, ‘मेरा मानना है कि लोगों को हनुमान चालीसा के पहले रुद्रावतार पढ़ना चाहिए’। कुमार रुद्रावतार में शब्दों के चयन की सराहना करते हुए कहते हैं कि ये शब्द, इनकी गेयता पढ़ने वाले को ऊर्जा से भर देते हैं।

‘रुद्रावतार’ की तुलना सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की लंबी कविता ‘राम की शक्ति पूजा’ से की जाती है। इस कविता की पंक्तियों की गेयता और ऊर्जा ही इसे विशिष्ट बनाती है। रुद्रावतार में शिव कहते हैं, ‘मैं संहारक हूं इस जग का लेकिन/दशकंधर को न मार सकता/निज मस्तक काट-काट रखता/वह मेरी ही भक्ति में लीन पल-छिन/मैं संहारक हूं इस जग का लेकिन’। रुद्रावतार की प्रतीक्षा में उद्भ्रांत के शब्द हैं-‘युग-युग से इसकी सभी प्रतीक्षा में/कब आप धरा पर उतरेंगे/निर्बल के पल कब संवरेंगे/सार्थक शिवत्व कब?/ब्रह्म परीक्षा में/युग-युग से इसकी सभी प्रतीक्षा में’।

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